Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
Share
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Your Cart (0)
Books > Hindi > वैदिक वाङ्मय में महर्षि कात्यायन का योगदान: The Contribution of Maharishi Katyayana to Vedic Literature
Displaying 6216 of 10918         Previous  |  NextSubscribe to our newsletter and discounts
वैदिक वाङ्मय में महर्षि कात्यायन का योगदान: The Contribution of Maharishi Katyayana to Vedic Literature
Pages from the book
वैदिक वाङ्मय में महर्षि कात्यायन का योगदान: The Contribution of Maharishi Katyayana to Vedic Literature
Look Inside the Book
Description

पुस्तक के विषय में

 

वैदिक वाङ्मय में महर्षि कात्यायन के नाम से अनुक्रमणी श्रौतसूत्र, गह्यसूत्रादि अनेक ग्रन्थप्रसिद्ध हैं। शुक्लयजुर्वेद की दोनों ही शाखाओं-माध्यन्दिन तथा काण्व में उनका अत्याधिक योगदान है कात्यायन श्रौतसूत्र कल्प साहित्य की विशिष्ट निधि है। प्रस्तुत ग्रन्थ में महर्षि कात्यायन के जीवन कृतित्व और अवदान पर अत्यन्त प्रामाणिक सामग्री का समीक्षात्मक संकलन किया गया है । यह ग्रन्थ वैदिक वाङ्मय के गम्भीर अध्येताओं तथा सामान्य पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी है ।

लेखक के विषय में

 

दिनांक 1 जुलाई 1976 को जन्में डॉ. अनूपकुमार मिश्र ने प्राचीन एवं आधुनिक पद्धतियों से शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की है । इन्होंने संस्कृत ( वेद वर्ग) तथा एम. . (हिन्दी) एवं पी-एच. डी. की उपाधियाँ अर्जित की हैं । इसके अतिरिक्त इनको वैदिक कर्मकाण्ड के सम्पादन में दक्षता प्राप्त है । इन्होंने विश्व संस्कृत सम्मेलन बंगलौर सहित अनेक वैदिक सम्मेलनों एवं शोध गोष्ठियों में भाग लिया है ।

भूमिका

 

वैदिक एवं वैदिकोत्तर वाङ्मय क्रमश : श्रौत एवं स्मार्त कर्म के अन्तर्गत आने वाले महत्वपूर्ण विषय हैं । ये कर्म प्राचीन काल से ही देवता और मनुष्यों के लिए सभी मनोरथों की पूर्ति मुख्य साधन रहे हैं । वैदिक अनुष्ठानों का आधार संहिताओं के मन्त्र हैं लेकिन मन्त्रों की जानकारी मात्र से ही कोई याज्ञिक कर्म सम्पन्न नहीं होता बल्कि अनुष्ठान की पद्धति का भी पूर्ण ज्ञान हीना आवश्यक है, जो वेदाक् कल्प की सहायता से उपलब्ध हो सकता है । इसीलिए महर्षि पाणिनि ने कल्प को वेद का हस्त कहा है । जिस प्रकार हस्त के बिना मानव का कार्य नहीं चल सकता उसी प्रकार कल्प की जानकारी के बिना यज्ञानुष्ठान का साड़न्ता भी नहीं हो सकती ।

महर्षि कात्यायन ने वैदिक अनुष्ठानों को सम्पन्न करने हेतु संहिताओं का ज्ञान उनके अनुष्ठानों की प्रक्रियाओं का सूक्ष्मतम परिचय एवं गुरु परम्परा से प्राप्त अनुभव सभी याज्ञिकों के लिए अनिवार्य बताया है। कोई भी याज्ञिक छोटा से छोटा वैदिक अनुष्ठान अकेले नहीं सम्पन्न कर सकता है । वैदिक अनुष्ठान की प्रक्रिया समान योग्यता वाले निष्ठावान् ब्राह्मणों का सामूहिक अनुष्ठान है । किसी समय वैदिक अनुष्ठान अत्यधिक लोकप्रिय अवश्य थे । बहुलता से उनके अनुष्ठान सम्पन्न होते थे । ब्राह्मणों के अतिरिक्त तीनों वर्ण इसमें तन, मन और धन से हाथ बँटाकर अपने को कृतार्थ मानते थे, लेकिन समय की गति के अनुसार वर्तमान स्थिति बिल्कुल परिवर्तित हो चुकी है । अश्वमेध वाजपेय, अग्निचयन आदि बड़े श्रौत अनुष्ठानों की बात छोड़िए प्रात काल तथा सायंकाल नियमित रूप से आहुति देने वाले अग्निहोत्रियों के दर्शन भी दुर्लभ हो गये हैं ।

वैदिक कल्पकारों में महर्षि कात्यायन का नाम अन्यतम है । उन्होंने अपने श्रौतसूत्र के प्रथम अध्याय में ही श्रौत की परिभाषाओं का प्रतिपादन किया है । अनन्तर दूसरे अध्याय से प्रक्रिया रूप में ग्रन्थ की रचना की है । अन्त तक उसी क्रम का निर्वाह किया है । अपनी रचना में यह भी ध्यान रखा है कि जहाँ 'दर्शपूर्णमासाभ्यां' यजेत कहने से प्रथम दर्श का ग्रहण होता है। तदनुसार प्रथम दर्शयाग का वर्णन करना चाहिए । किन्तु यदि ऐसा किया गया होता तो प्रतिज्ञा भंग हो जाती । कारण, कात्यायन लिखित ' प्रतिज्ञासूत्र ' में पूर्ण मासेष्टि को प्रत्येक इष्टियों को प्रकृति कही है । यह प्रसिद्ध है कि 'प्रकृति वद्धिकृति, कर्त्तव्या अर्थात् प्रकृति ने जो साधारण नियम कहे हैं वही विकृति में लागू होते हैं । उन्होंने यह भी ध्यान रखा है कि दर्श-पूर्णमास याग के कथनानुसार प्रथम दर्श का ग्रहण है और तदनुसार प्रथम दर्श का प्रतिपादन होना चाहिए ।

वैदिक वाङ्मय के अन्तर्गत कात्यायन श्रौतसूत्र में पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दो भाग, 27 अध्याय और 6117 सूत्र हैं। इस रचना की विशेषता यह भी है कि इन्होंने सर्वप्रथम प्रथम अध्याय में श्रौत की परिभाषा का वर्णन किया है । इससे यह लाभ हुआ कि श्रौत जैसे जटिल विषयों को परिभाषाओं की जानकारी हो जाने के कारण याग की कठोर जानकारी सुलभ हो जाती है । इस अध्याय के अनन्तर क्रमश : छोटे-छोटे यागों का प्रारम्भ किया है । 2-4 अध्यायों में पूर्ण मासयाग समाप्त करके छोटी-छोटी इष्टियों का वर्णन है। तत्पश्चात् क्रमश. बड़े यागों का निरूपण किया गया है । पणम अध्याय में चातुर्मास्य याग, मित्रविन्देष्टि और काम्येष्टि का वर्णन समाप्त किया है । छठे अध्याय में निरूढ़पशुबन्धयाग जो कि सबसे छोटा पशुयाग है का वर्णन विहित है । 7-11 अध्यायों में अग्निष्टोम स्मृति सोमयागों का प्रतिपादन हुआ है । यहीं पर कात्यायन श्रौतसूत्र का पूर्वार्द्ध समाप्त होता है।

उत्तरार्द्ध के प्रारम्भ के बारहवें अध्याय में इन्होंने सत्रात्मक द्वादशाह का वर्णन वर्णित है, जो रक्तसत्र और अहीन उभयात्मक हैं । तेरहवें अध्याय में गवामयनयाग को और चौदहवें में वाजपेययाग निरूपित है । पन्द्रहवें में राजसूय याग को कहकर सोलह से अठारह तक चयनयाग का प्रतिपादन किया है । उन्नीसवें अध्याय में सौत्रामणी याग और बीसवें अध्याय में अश्मेध को कहा है । इक्कीसवें में पुरुषमेध, पितृमेध और सर्वमेध का वर्णन किया है । बाइसवें एकाह और तेइसवें में अहीन को दिखाया है । चौबीसवें अध्याय में सहस्रसंवत्सर सत्रपर्यन्त सत्रों का वर्णन किया है । पचीसवें अध्याय मैं श्रौत विषयक समस्त प्रायश्चितों का प्रतिपादन किया है । छब्बीसवें अध्याय में प्रवर्ग्य विधि को कहते हुए श्रौतसूत्र की समाप्ति की है । इस प्रकार समस्त श्रौतसूत्रों में शुक्ल यजुर्वेदीय कात्यायन श्रौतसूत्र सर्वप्रधान एवं अप्रतिम है ।

वैदिकोत्तर वाङम्य में स्मार्त कर्मों को विहित किया गया है । स्मृति शब्द से स्मार्त धर्म विहित है इसीलिए कात्यायन स्मृति को स्मार्त से जाना जा सकता है । यद्यपि कात्यायन स्मृति अद्य तक प्राप्त नहीं हो पायी है तथापि जीवानन्द द्वारा सम्पादित कात्यायन स्मृति के नाम से तीन प्रपाठक उन्तीस खण्ड एवं लगभग पाँच सौ श्लोकों में प्रकाशित है । इसके प्रतिपाद्य विषयों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-यरोपवीत धारण विधि, आचमन तथा अंग स्पर्श विधि, प्रत्येक कर्म के आरम्भ में गणेश चौदहमातृकाओं के पूजन का विधान, कुश का प्रयोग, श्राद्धविधि, अग्निस्थापन तथा अरणियों एवं सुच प्रमृति पात्रों का वर्णन दन्त धावन तथा स्नान-विधि, सन्ध्या प्राणायाम-जप, देवता-पितृतर्पण, पज्ञमहा-यज्ञ, श्राद्ध करने का अधिकारी अशौचकाल निशा, पत्नी के कर्त्तव्य एवं विविध प्रकार के श्राद्धों के संपादन की विधि विहित है ।महर्षि कात्यायन की जो रचनाएँ एवं परिशिष्ट नहीं प्राप्त हो सके हैं उन पर संस्कृत मनीषियों द्वारा अविरल अनुसंधान किया जा रहा है । अन्य समस्त रचनाओं एवं परिशिष्टों को लेखक ने अपने इस ग्रन्थ में परिलक्षित किया है ।

वेदों के अन्य श्रौतसूत्रों एवं स्मार्त कर्मों पर पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानों ने विचार किया है, लेकिन शुक्ल यजुर्वेदीय कात्यायन श्रौतसूत्र एवं स्मार्त कर्मकाण्डों पर सम्यक् अध्ययन का अभाव रहा है । इस ग्रन्थ में हमने श्रौतयाग जैसे महनीय किन्तु अल्प चर्चित विषय के विवेचन का यथागति प्रयत्न किया है । यह विषय भारतीय इतिहास के एक विशिष्ट युग की संस्कृति का मेरुदण्ड है, जिसका सरल और सुबोध विश्लेषण वैदिक विद्वानों की चिरकाल से प्रतीक्षा कर रहा था । लेखक इस महासमुद्र में स्वान्त : सुखाय वर्षों तक अवगाहन करता रहा । मुझे पूर्ण विश्वास है कि जो रत्न इससे प्राप्त किये गए हैं इनसे जिज्ञासुओं की परितृप्ति अवश्यमेव होगी और नीरक्षीर विवेकी विद्वज्जन प्रमुदित होंगे ।

लेखक ने इस ग्रन्थ को सात अध्यायों में विभक्त किया है । प्रथम अध्याय में महर्षि कात्यायन का जीवनवृत्त एवं काल निर्णय जिसमें धर्मग्रन्थों के आधार पर उनका परिचय एवं इनके सम्बन्ध में पौर्वास्त्य एवं पाश्चात्य मनीषियों के विचारों को ध्यान में रखकर लेखक ने अपना अभिमत प्रस्तुत किया है । द्वितीय अध्याय में महर्षि कात्यायन द्वारा प्रणीत गन्थों का परिचयात्मक विवरण प्रस्तुत किया है । जिसमें कात्यायन श्रौतसूत्र, प्रातिशाख्य, ऋक्सर्वानुक्रम सूत्र, शुक्लयजु : सर्वानुक्रम सूत्र, वार्तिक पाठ, कात्यायन स्मृति या कर्मप्रदीप, उपग्रन्थ सूत्र, त्रिकण्डिकासूत्र, सामसर्वानुक्रम, अथर्वसर्वानुक्रम सूत्र इत्यादि ग्रन्थ हैं । तृतीय अध्याय में वैदिक श्रौत अनुष्ठानों के सन्दर्भ में महर्षि कात्यायन का योगदान यथा शुक्लयजुर्वेदीय कात्यायन श्रौतसूत्र के अध्वर्य के कार्य विधानों का वर्णन, श्रौतानुष्ठानों के प्रकार, उनके अधिकारी, अनुष्ठान के यजमान और ऋत्विज, श्रौतयागों में अपेक्षित ऋत्विजों की संख्या, ऋत्विजों के गण व कार्य, कात्यायन श्रौतसूत्र परभाव्य जैसे- भर्तृयज्ञ, वृद्धयप्ज्ञिक, यशोगोपी, आचार्य पितृभूति, कर्काचार्य आदि का विवेचन किया गया है । कात्यायन श्रौतसूत्र का अध्याय-क्रम से विषय-वस्तु का विवरण-परिभाषा, दर्शपूर्णमास, पिण्ड पितृयज्ञ, दाक्षायण-यज्ञ, अन्वारम्भणीयेष्टि, आग्नयणेष्टि, अग्न्याधेय, अग्निहोत्र, चातुर्मास्य, निरुढपशुकन्धयाग, अग्निष्टोम, द्वादशाह, गवामयन, वाजपेय, राजसूय, अग्निचयन, कौकिली सौत्रामणी, अश्वमेध, पुरुषमेध, सर्वमेध, पितृमेध, एकाह, अहीन, प्रायश्चित्त, प्रवर्ग्य का निरूपण किया गया है । वैदिकोत्तर कर्मकाण्ड के प्रसंग में महर्षि कात्यायन के योगदान की समीक्षा चतुर्थ अध्यायन में की गई है, जिसमें स्मार्त एवं स्मृति महत्त्व कात्यायन स्मृति या कर्मप्रदीप जो हिन्दू विधि और व्यवहार के अपर कात्यायन एक प्रमुख प्रमाण और अधिकारी शास्त्रकार हैं, इनका सम्पूर्ण स्मृति कथ अभी तक प्राप्त नहीं हो सका है । लेकिन भाष्यों एवं निबन्धों में इनके उद्धरण प्राप्य हैं । उसी का अध्याय-क्रम से विषय-वस्तु का विवरण दिया गया है । पंचम अध्याय में वैदिक वाङम्य के संरक्षण के सन्दर्भ में महर्षि कात्यायन के अठारह परिशिष्टों का परिशीलन किया गया है । प्रस्तुत ग्रन्थ के षष्ठ अध्याय में अन्य योगदान-' पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या ' है । इस मथ के अन्तिम लेकिन महत्त्वपूर्ण सप्तम अध्याय में सम्पूर्ण ग्रन्थ का निष्कर्ष बताते हुए भारतीय सांस्कृतिक शेवधि के संरक्षण. संवर्धन एवं परिपालन की दिशा में महर्षि कात्यायन के योगदान का समग्र मूल्यांकन किया गया है । इसके अनन्तर परिशिष्ट भाग में दो अध्याय हैं प्रथम भाग के अध्याय में कात्यायन विषयक साक्ष्य एवं सन्दर्भ तथा पुरा कथाओं का संकलन तथा द्वितीय में सहायक ग्रन्थ सूची परिलक्षित है ।

ग्रन्थ को मूर्तरूप देने के बाद लेखक सर्वप्रथम महर्षि कात्यायन सहित समस्त प्राचीन एवं अर्वाचीन सम्बन्धित ग्रन्थ कर्ताओं के प्रति अपने हृदय से सम्पूर्ण श्रद्धा एवं आभार अर्पित करता है जिनके ज्ञान-रश्मियों की छटा ही इस ग्रन्थ-विषय की सम्पत्ति है । लेखक नहीं जानता कि वह लखनऊ विश्वविद्यालय के अपने मार्ग-दर्शक प्रवर, पूज्य गुरुओं प्रो. पाण्डेय जी के प्रति किन शब्दों से कृतज्ञता व्यक्त करे, जिनकी प्रेरणा से प्रस्तुत ग्रन्थ यह स्वरूप ग्रहण कर सका । पूज्य प्रो. पाण्डेय जी लेखक के मार्गदर्शक ही नहीं अपितु अवसाद तथा निराशा के समय में प्रेरणास्रोत रहे हैं । उनके प्रति शब्दों द्वारा आभार प्रदर्शन सम्भव नहीं, अत:मौनवलम्बन ही श्रेयस्कर है ।

मैं अपने माता-पिता का आजीवन ऋणी रहूँगा जिन्होंने वात्सल्य रस से सराबोर रखते हुए आर्थिक सहायता से कभी उदास नहीं होने दिया । इनके अतिरिक्त मैं अपने अग्रज श्री राजेन्द्र मिश्र को भी भूल नहीं सकता जिन्होंने विदेश (न्यूयार्क, अमेरिका) में रहते हुए भाई तुल्य नहीं वरन् पितृ तुल्य सहयोग किया जिनका मैं हृदय से स्मरण करता हूँ ।

मेरे इस ग्रन्थ के लेखन काल में सत् धर्मानुरागिणी भार्या श्रीमति नम्रता मिश्रा का नम्रपूर्ण व्यवहार रहा है साथ-साथ श्वशुर गृह के माता-पिता (श्रीमती राजेश्वरी वाजपेयी एवं श्री रामचन्द्र वाजपेयी जी) ने अपनी ज्ञान रश्मियों की निधि से मेरे ज्ञान को आलोकित किया है उनके प्रति लेखक सदा कृतज्ञ रहेगा ।

लेखक के इस ग्रन्थ को मूर्त रूप देने में डॉ. आनन्द दीक्षित, डॉ. रामकृष्ण पाण्डेय एवं अन्य मित्रों का भी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रचुर योगदान मिला है जिसे कदापि विस्मृत नहीं किया जा सकता ।

 

 

विषय-अनुक्रमणिका

 

1

प्राक्कथन

iii

2

भूमिका

v

3

संकेत सूची

xi

4

प्रथम अध्याय

1-13

5

महर्षि कात्यायन जीवन वृत्त रम्य कालनिर्णय

 

6

द्वितीय अध्याय

14-35

7

महर्षि कात्यायन प्रणीत ग्रन्थों का परिचयात्मक

 

8

तृतीय अध्याय

36-130

9

वैदिक श्रौत अनुष्ठानों के सन्दर्भ में महर्षि कात्यायन के योगदान

 

10

चतुर्थ अध्याय

131-169

11

वैदिकोत्तर कर्मकाण्ड के प्रसंग में महर्षि कात्यायन योगदान की समीक्षा

 

12

पंचम अध्याय

170-196

13

वैदिक वाङ्मय के संरक्षण के सन्दर्भ में महर्षि कात्यायन के परिशिष्टों का परिशीलन

 

14

षष्ठ अध्याय

अन्य योगदान परिभाषिक शब्दों की व्याख्या

197-230

15

सप्तम अध्याय

निष्कर्ष - भारतीय सांस्कृतिक शेवधि के संरक्षण, संवर्धन एवं परिपालन की दिशा में

महर्षि कात्यायन के योगदान का समग्र मूल्यांकन

 

231-256

16

परिशिष्ट: सहायक ग्रन्थ सूची

257

  

Sample Pages











वैदिक वाङ्मय में महर्षि कात्यायन का योगदान: The Contribution of Maharishi Katyayana to Vedic Literature

Item Code:
NZA608
Cover:
Hardcover
Edition:
2004
Publisher:
Nag Publishers
ISBN:
8170815967
Language:
Sanskrit Text with Hindi Translation
Size:
9.0 inch X 6.0 inch
Pages:
280
Other Details:
Weight of the Books: 450 gms
Price:
$15.00   Shipping Free
Look Inside the Book
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
वैदिक वाङ्मय में महर्षि कात्यायन का योगदान: The Contribution of Maharishi Katyayana to Vedic Literature

Verify the characters on the left

From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 2414 times since 11th May, 2015

पुस्तक के विषय में

 

वैदिक वाङ्मय में महर्षि कात्यायन के नाम से अनुक्रमणी श्रौतसूत्र, गह्यसूत्रादि अनेक ग्रन्थप्रसिद्ध हैं। शुक्लयजुर्वेद की दोनों ही शाखाओं-माध्यन्दिन तथा काण्व में उनका अत्याधिक योगदान है कात्यायन श्रौतसूत्र कल्प साहित्य की विशिष्ट निधि है। प्रस्तुत ग्रन्थ में महर्षि कात्यायन के जीवन कृतित्व और अवदान पर अत्यन्त प्रामाणिक सामग्री का समीक्षात्मक संकलन किया गया है । यह ग्रन्थ वैदिक वाङ्मय के गम्भीर अध्येताओं तथा सामान्य पाठकों के लिए समान रूप से उपयोगी है ।

लेखक के विषय में

 

दिनांक 1 जुलाई 1976 को जन्में डॉ. अनूपकुमार मिश्र ने प्राचीन एवं आधुनिक पद्धतियों से शिक्षा-दीक्षा ग्रहण की है । इन्होंने संस्कृत ( वेद वर्ग) तथा एम. . (हिन्दी) एवं पी-एच. डी. की उपाधियाँ अर्जित की हैं । इसके अतिरिक्त इनको वैदिक कर्मकाण्ड के सम्पादन में दक्षता प्राप्त है । इन्होंने विश्व संस्कृत सम्मेलन बंगलौर सहित अनेक वैदिक सम्मेलनों एवं शोध गोष्ठियों में भाग लिया है ।

भूमिका

 

वैदिक एवं वैदिकोत्तर वाङ्मय क्रमश : श्रौत एवं स्मार्त कर्म के अन्तर्गत आने वाले महत्वपूर्ण विषय हैं । ये कर्म प्राचीन काल से ही देवता और मनुष्यों के लिए सभी मनोरथों की पूर्ति मुख्य साधन रहे हैं । वैदिक अनुष्ठानों का आधार संहिताओं के मन्त्र हैं लेकिन मन्त्रों की जानकारी मात्र से ही कोई याज्ञिक कर्म सम्पन्न नहीं होता बल्कि अनुष्ठान की पद्धति का भी पूर्ण ज्ञान हीना आवश्यक है, जो वेदाक् कल्प की सहायता से उपलब्ध हो सकता है । इसीलिए महर्षि पाणिनि ने कल्प को वेद का हस्त कहा है । जिस प्रकार हस्त के बिना मानव का कार्य नहीं चल सकता उसी प्रकार कल्प की जानकारी के बिना यज्ञानुष्ठान का साड़न्ता भी नहीं हो सकती ।

महर्षि कात्यायन ने वैदिक अनुष्ठानों को सम्पन्न करने हेतु संहिताओं का ज्ञान उनके अनुष्ठानों की प्रक्रियाओं का सूक्ष्मतम परिचय एवं गुरु परम्परा से प्राप्त अनुभव सभी याज्ञिकों के लिए अनिवार्य बताया है। कोई भी याज्ञिक छोटा से छोटा वैदिक अनुष्ठान अकेले नहीं सम्पन्न कर सकता है । वैदिक अनुष्ठान की प्रक्रिया समान योग्यता वाले निष्ठावान् ब्राह्मणों का सामूहिक अनुष्ठान है । किसी समय वैदिक अनुष्ठान अत्यधिक लोकप्रिय अवश्य थे । बहुलता से उनके अनुष्ठान सम्पन्न होते थे । ब्राह्मणों के अतिरिक्त तीनों वर्ण इसमें तन, मन और धन से हाथ बँटाकर अपने को कृतार्थ मानते थे, लेकिन समय की गति के अनुसार वर्तमान स्थिति बिल्कुल परिवर्तित हो चुकी है । अश्वमेध वाजपेय, अग्निचयन आदि बड़े श्रौत अनुष्ठानों की बात छोड़िए प्रात काल तथा सायंकाल नियमित रूप से आहुति देने वाले अग्निहोत्रियों के दर्शन भी दुर्लभ हो गये हैं ।

वैदिक कल्पकारों में महर्षि कात्यायन का नाम अन्यतम है । उन्होंने अपने श्रौतसूत्र के प्रथम अध्याय में ही श्रौत की परिभाषाओं का प्रतिपादन किया है । अनन्तर दूसरे अध्याय से प्रक्रिया रूप में ग्रन्थ की रचना की है । अन्त तक उसी क्रम का निर्वाह किया है । अपनी रचना में यह भी ध्यान रखा है कि जहाँ 'दर्शपूर्णमासाभ्यां' यजेत कहने से प्रथम दर्श का ग्रहण होता है। तदनुसार प्रथम दर्शयाग का वर्णन करना चाहिए । किन्तु यदि ऐसा किया गया होता तो प्रतिज्ञा भंग हो जाती । कारण, कात्यायन लिखित ' प्रतिज्ञासूत्र ' में पूर्ण मासेष्टि को प्रत्येक इष्टियों को प्रकृति कही है । यह प्रसिद्ध है कि 'प्रकृति वद्धिकृति, कर्त्तव्या अर्थात् प्रकृति ने जो साधारण नियम कहे हैं वही विकृति में लागू होते हैं । उन्होंने यह भी ध्यान रखा है कि दर्श-पूर्णमास याग के कथनानुसार प्रथम दर्श का ग्रहण है और तदनुसार प्रथम दर्श का प्रतिपादन होना चाहिए ।

वैदिक वाङ्मय के अन्तर्गत कात्यायन श्रौतसूत्र में पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध दो भाग, 27 अध्याय और 6117 सूत्र हैं। इस रचना की विशेषता यह भी है कि इन्होंने सर्वप्रथम प्रथम अध्याय में श्रौत की परिभाषा का वर्णन किया है । इससे यह लाभ हुआ कि श्रौत जैसे जटिल विषयों को परिभाषाओं की जानकारी हो जाने के कारण याग की कठोर जानकारी सुलभ हो जाती है । इस अध्याय के अनन्तर क्रमश : छोटे-छोटे यागों का प्रारम्भ किया है । 2-4 अध्यायों में पूर्ण मासयाग समाप्त करके छोटी-छोटी इष्टियों का वर्णन है। तत्पश्चात् क्रमश. बड़े यागों का निरूपण किया गया है । पणम अध्याय में चातुर्मास्य याग, मित्रविन्देष्टि और काम्येष्टि का वर्णन समाप्त किया है । छठे अध्याय में निरूढ़पशुबन्धयाग जो कि सबसे छोटा पशुयाग है का वर्णन विहित है । 7-11 अध्यायों में अग्निष्टोम स्मृति सोमयागों का प्रतिपादन हुआ है । यहीं पर कात्यायन श्रौतसूत्र का पूर्वार्द्ध समाप्त होता है।

उत्तरार्द्ध के प्रारम्भ के बारहवें अध्याय में इन्होंने सत्रात्मक द्वादशाह का वर्णन वर्णित है, जो रक्तसत्र और अहीन उभयात्मक हैं । तेरहवें अध्याय में गवामयनयाग को और चौदहवें में वाजपेययाग निरूपित है । पन्द्रहवें में राजसूय याग को कहकर सोलह से अठारह तक चयनयाग का प्रतिपादन किया है । उन्नीसवें अध्याय में सौत्रामणी याग और बीसवें अध्याय में अश्मेध को कहा है । इक्कीसवें में पुरुषमेध, पितृमेध और सर्वमेध का वर्णन किया है । बाइसवें एकाह और तेइसवें में अहीन को दिखाया है । चौबीसवें अध्याय में सहस्रसंवत्सर सत्रपर्यन्त सत्रों का वर्णन किया है । पचीसवें अध्याय मैं श्रौत विषयक समस्त प्रायश्चितों का प्रतिपादन किया है । छब्बीसवें अध्याय में प्रवर्ग्य विधि को कहते हुए श्रौतसूत्र की समाप्ति की है । इस प्रकार समस्त श्रौतसूत्रों में शुक्ल यजुर्वेदीय कात्यायन श्रौतसूत्र सर्वप्रधान एवं अप्रतिम है ।

वैदिकोत्तर वाङम्य में स्मार्त कर्मों को विहित किया गया है । स्मृति शब्द से स्मार्त धर्म विहित है इसीलिए कात्यायन स्मृति को स्मार्त से जाना जा सकता है । यद्यपि कात्यायन स्मृति अद्य तक प्राप्त नहीं हो पायी है तथापि जीवानन्द द्वारा सम्पादित कात्यायन स्मृति के नाम से तीन प्रपाठक उन्तीस खण्ड एवं लगभग पाँच सौ श्लोकों में प्रकाशित है । इसके प्रतिपाद्य विषयों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-यरोपवीत धारण विधि, आचमन तथा अंग स्पर्श विधि, प्रत्येक कर्म के आरम्भ में गणेश चौदहमातृकाओं के पूजन का विधान, कुश का प्रयोग, श्राद्धविधि, अग्निस्थापन तथा अरणियों एवं सुच प्रमृति पात्रों का वर्णन दन्त धावन तथा स्नान-विधि, सन्ध्या प्राणायाम-जप, देवता-पितृतर्पण, पज्ञमहा-यज्ञ, श्राद्ध करने का अधिकारी अशौचकाल निशा, पत्नी के कर्त्तव्य एवं विविध प्रकार के श्राद्धों के संपादन की विधि विहित है ।महर्षि कात्यायन की जो रचनाएँ एवं परिशिष्ट नहीं प्राप्त हो सके हैं उन पर संस्कृत मनीषियों द्वारा अविरल अनुसंधान किया जा रहा है । अन्य समस्त रचनाओं एवं परिशिष्टों को लेखक ने अपने इस ग्रन्थ में परिलक्षित किया है ।

वेदों के अन्य श्रौतसूत्रों एवं स्मार्त कर्मों पर पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानों ने विचार किया है, लेकिन शुक्ल यजुर्वेदीय कात्यायन श्रौतसूत्र एवं स्मार्त कर्मकाण्डों पर सम्यक् अध्ययन का अभाव रहा है । इस ग्रन्थ में हमने श्रौतयाग जैसे महनीय किन्तु अल्प चर्चित विषय के विवेचन का यथागति प्रयत्न किया है । यह विषय भारतीय इतिहास के एक विशिष्ट युग की संस्कृति का मेरुदण्ड है, जिसका सरल और सुबोध विश्लेषण वैदिक विद्वानों की चिरकाल से प्रतीक्षा कर रहा था । लेखक इस महासमुद्र में स्वान्त : सुखाय वर्षों तक अवगाहन करता रहा । मुझे पूर्ण विश्वास है कि जो रत्न इससे प्राप्त किये गए हैं इनसे जिज्ञासुओं की परितृप्ति अवश्यमेव होगी और नीरक्षीर विवेकी विद्वज्जन प्रमुदित होंगे ।

लेखक ने इस ग्रन्थ को सात अध्यायों में विभक्त किया है । प्रथम अध्याय में महर्षि कात्यायन का जीवनवृत्त एवं काल निर्णय जिसमें धर्मग्रन्थों के आधार पर उनका परिचय एवं इनके सम्बन्ध में पौर्वास्त्य एवं पाश्चात्य मनीषियों के विचारों को ध्यान में रखकर लेखक ने अपना अभिमत प्रस्तुत किया है । द्वितीय अध्याय में महर्षि कात्यायन द्वारा प्रणीत गन्थों का परिचयात्मक विवरण प्रस्तुत किया है । जिसमें कात्यायन श्रौतसूत्र, प्रातिशाख्य, ऋक्सर्वानुक्रम सूत्र, शुक्लयजु : सर्वानुक्रम सूत्र, वार्तिक पाठ, कात्यायन स्मृति या कर्मप्रदीप, उपग्रन्थ सूत्र, त्रिकण्डिकासूत्र, सामसर्वानुक्रम, अथर्वसर्वानुक्रम सूत्र इत्यादि ग्रन्थ हैं । तृतीय अध्याय में वैदिक श्रौत अनुष्ठानों के सन्दर्भ में महर्षि कात्यायन का योगदान यथा शुक्लयजुर्वेदीय कात्यायन श्रौतसूत्र के अध्वर्य के कार्य विधानों का वर्णन, श्रौतानुष्ठानों के प्रकार, उनके अधिकारी, अनुष्ठान के यजमान और ऋत्विज, श्रौतयागों में अपेक्षित ऋत्विजों की संख्या, ऋत्विजों के गण व कार्य, कात्यायन श्रौतसूत्र परभाव्य जैसे- भर्तृयज्ञ, वृद्धयप्ज्ञिक, यशोगोपी, आचार्य पितृभूति, कर्काचार्य आदि का विवेचन किया गया है । कात्यायन श्रौतसूत्र का अध्याय-क्रम से विषय-वस्तु का विवरण-परिभाषा, दर्शपूर्णमास, पिण्ड पितृयज्ञ, दाक्षायण-यज्ञ, अन्वारम्भणीयेष्टि, आग्नयणेष्टि, अग्न्याधेय, अग्निहोत्र, चातुर्मास्य, निरुढपशुकन्धयाग, अग्निष्टोम, द्वादशाह, गवामयन, वाजपेय, राजसूय, अग्निचयन, कौकिली सौत्रामणी, अश्वमेध, पुरुषमेध, सर्वमेध, पितृमेध, एकाह, अहीन, प्रायश्चित्त, प्रवर्ग्य का निरूपण किया गया है । वैदिकोत्तर कर्मकाण्ड के प्रसंग में महर्षि कात्यायन के योगदान की समीक्षा चतुर्थ अध्यायन में की गई है, जिसमें स्मार्त एवं स्मृति महत्त्व कात्यायन स्मृति या कर्मप्रदीप जो हिन्दू विधि और व्यवहार के अपर कात्यायन एक प्रमुख प्रमाण और अधिकारी शास्त्रकार हैं, इनका सम्पूर्ण स्मृति कथ अभी तक प्राप्त नहीं हो सका है । लेकिन भाष्यों एवं निबन्धों में इनके उद्धरण प्राप्य हैं । उसी का अध्याय-क्रम से विषय-वस्तु का विवरण दिया गया है । पंचम अध्याय में वैदिक वाङम्य के संरक्षण के सन्दर्भ में महर्षि कात्यायन के अठारह परिशिष्टों का परिशीलन किया गया है । प्रस्तुत ग्रन्थ के षष्ठ अध्याय में अन्य योगदान-' पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या ' है । इस मथ के अन्तिम लेकिन महत्त्वपूर्ण सप्तम अध्याय में सम्पूर्ण ग्रन्थ का निष्कर्ष बताते हुए भारतीय सांस्कृतिक शेवधि के संरक्षण. संवर्धन एवं परिपालन की दिशा में महर्षि कात्यायन के योगदान का समग्र मूल्यांकन किया गया है । इसके अनन्तर परिशिष्ट भाग में दो अध्याय हैं प्रथम भाग के अध्याय में कात्यायन विषयक साक्ष्य एवं सन्दर्भ तथा पुरा कथाओं का संकलन तथा द्वितीय में सहायक ग्रन्थ सूची परिलक्षित है ।

ग्रन्थ को मूर्तरूप देने के बाद लेखक सर्वप्रथम महर्षि कात्यायन सहित समस्त प्राचीन एवं अर्वाचीन सम्बन्धित ग्रन्थ कर्ताओं के प्रति अपने हृदय से सम्पूर्ण श्रद्धा एवं आभार अर्पित करता है जिनके ज्ञान-रश्मियों की छटा ही इस ग्रन्थ-विषय की सम्पत्ति है । लेखक नहीं जानता कि वह लखनऊ विश्वविद्यालय के अपने मार्ग-दर्शक प्रवर, पूज्य गुरुओं प्रो. पाण्डेय जी के प्रति किन शब्दों से कृतज्ञता व्यक्त करे, जिनकी प्रेरणा से प्रस्तुत ग्रन्थ यह स्वरूप ग्रहण कर सका । पूज्य प्रो. पाण्डेय जी लेखक के मार्गदर्शक ही नहीं अपितु अवसाद तथा निराशा के समय में प्रेरणास्रोत रहे हैं । उनके प्रति शब्दों द्वारा आभार प्रदर्शन सम्भव नहीं, अत:मौनवलम्बन ही श्रेयस्कर है ।

मैं अपने माता-पिता का आजीवन ऋणी रहूँगा जिन्होंने वात्सल्य रस से सराबोर रखते हुए आर्थिक सहायता से कभी उदास नहीं होने दिया । इनके अतिरिक्त मैं अपने अग्रज श्री राजेन्द्र मिश्र को भी भूल नहीं सकता जिन्होंने विदेश (न्यूयार्क, अमेरिका) में रहते हुए भाई तुल्य नहीं वरन् पितृ तुल्य सहयोग किया जिनका मैं हृदय से स्मरण करता हूँ ।

मेरे इस ग्रन्थ के लेखन काल में सत् धर्मानुरागिणी भार्या श्रीमति नम्रता मिश्रा का नम्रपूर्ण व्यवहार रहा है साथ-साथ श्वशुर गृह के माता-पिता (श्रीमती राजेश्वरी वाजपेयी एवं श्री रामचन्द्र वाजपेयी जी) ने अपनी ज्ञान रश्मियों की निधि से मेरे ज्ञान को आलोकित किया है उनके प्रति लेखक सदा कृतज्ञ रहेगा ।

लेखक के इस ग्रन्थ को मूर्त रूप देने में डॉ. आनन्द दीक्षित, डॉ. रामकृष्ण पाण्डेय एवं अन्य मित्रों का भी प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से प्रचुर योगदान मिला है जिसे कदापि विस्मृत नहीं किया जा सकता ।

 

 

विषय-अनुक्रमणिका

 

1

प्राक्कथन

iii

2

भूमिका

v

3

संकेत सूची

xi

4

प्रथम अध्याय

1-13

5

महर्षि कात्यायन जीवन वृत्त रम्य कालनिर्णय

 

6

द्वितीय अध्याय

14-35

7

महर्षि कात्यायन प्रणीत ग्रन्थों का परिचयात्मक

 

8

तृतीय अध्याय

36-130

9

वैदिक श्रौत अनुष्ठानों के सन्दर्भ में महर्षि कात्यायन के योगदान

 

10

चतुर्थ अध्याय

131-169

11

वैदिकोत्तर कर्मकाण्ड के प्रसंग में महर्षि कात्यायन योगदान की समीक्षा

 

12

पंचम अध्याय

170-196

13

वैदिक वाङ्मय के संरक्षण के सन्दर्भ में महर्षि कात्यायन के परिशिष्टों का परिशीलन

 

14

षष्ठ अध्याय

अन्य योगदान परिभाषिक शब्दों की व्याख्या

197-230

15

सप्तम अध्याय

निष्कर्ष - भारतीय सांस्कृतिक शेवधि के संरक्षण, संवर्धन एवं परिपालन की दिशा में

महर्षि कात्यायन के योगदान का समग्र मूल्यांकन

 

231-256

16

परिशिष्ट: सहायक ग्रन्थ सूची

257

  

Sample Pages











Post a Comment
 
Post Review
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy

Related Items

Katyayana-Srautasutra : Two Volumes
by Ganesh Umakant Thite
Hardcover (Edition: 2006)
New Bharatiya Book Corporation
Item Code: IDJ428
$70.00
Add to Cart
Buy Now
Katyayana Srauta Sutra (With the Commentary of Karka) (Two Volumes in Sanskrit Only)
by Dr. Mandan Mishra
Hardcover (Edition: 2009)
Sri Lal Bahadur Shastri Rashtiya Sanskrit Vidyapitham
Item Code: NAC792
$40.00
Add to Cart
Buy Now
Katyayana Sulba Sutra (With English Translation, Explanatory Notes, Diagrams and Articles)
by S. D. Khadilkar
Paperback (Edition: 2003)
Vaidika Samsodhana Mandala, Pune
Item Code: NAG958
$20.00
Add to Cart
Buy Now
The Srauta Sutra of Katyayana
by Shri Vidyadhar
Hardcover (Edition: 2005)
Chaukhambha Sanskrit Pratishthan
Item Code: NZA159
$40.00
Add to Cart
Buy Now
Vedanga Literature (Auxiliary to the Vedas)
by Prof. B.B. Chaubey
Paperback (Edition: 2004)
Katyayan Vaidik Sahitya Prakashan
Item Code: NAC051
$10.00
Add to Cart
Buy Now
Treatment of Nature in the Rgveda (A Rare Book)
by Dr. Braj Bihari Chaubey
Hardcover (Edition: 1970)
Katyayan Vedic Sahitya Parkashan
Item Code: IHL824
$25.00
Add to Cart
Buy Now
Vedic Concepts
by B.B. Chaubey
Paperback (Edition: 1997)
Katyayan Vedic Sahitya Prakashan, Hoshiarpur
Item Code: NAC004
$10.00
Add to Cart
Buy Now
वेद विज्ञान चिन्तन: Science of The Vedas
by प्रो. व्रजबिहारी चौबे (Prof. Vraj Bihari Choube)
Hardcover (Edition: 2005)
Katyayan Vedic Sahitya Prakashan 
Item Code: NZE598
$20.00
Add to Cart
Buy Now
Lectures on Vedic Language - A Rare Book
by B.B. Chaubey
Hardcover (Edition: 2005)
Katyayan Vaidik Sahitya Prakashan
Item Code: NAE410
$20.00
Add to Cart
Buy Now
Layout For Different Sacrifices According to Different Srauta Sutras
by Dr. R.P. Kulkarni
Hardcover (Edition: 1997)
Nag Publishers
Item Code: IDH216
$25.00
Add to Cart
Buy Now
Paraskara Grhyasutra
by Translated By: Hermann Oldenberg, Edited By: V. Narain
Hardcover (Edition: 2005)
Chaukhambha Sanskrit Pratishthan
Item Code: IDE779
$27.00
Add to Cart
Buy Now
Srautasutras
by Kundan Lal Sharma
Hardcover (Edition: 2004)
Vishveshvaranand Book Agency, Hoshiarpur
Item Code: NAC010
$25.00
Add to Cart
Buy Now
Srautakosa (Encyclopedia of Vedic Sacrificial Ritual Sanskrit and English) (In Eight Volumes)(An Old Book)
by R.N. Dandekar
Hardcover (Edition: 1958)
Vaidika Samsodhana Mandala, Poona
Item Code: NAB862
$195.00
Add to Cart
Buy Now
Layout and Construction of Citis According to Baudhayana, Manava and Apastamba Sulbasutras
by R.P. Kulkarni
Paperback (Edition: 1987)
Bhandarkar Oriental Research Insitute, Pune
Item Code: NAG518
$20.00
Add to Cart
Buy Now

Testimonials

I recieved my Mahavir pendant today. It is wonderful. I was recently in Delhi and as it was a spiritual trip visiting Jain temples in Rajasthan, Agra, Rishikesh and Delhi i did not have the opportunity to shop much. The pendant is beautiful and i shall treasure it. I have attached a picture of me in India. Your country and the people will always be in my heart.
Evelyn, Desoto, Texas.
I received my Order this week, It's wonderful. I really thank you very much.
Antonio Freitas, Sao Paulo, Brazil.
I have been ordering from your site for several years and am always pleased with my orders and the time frame is lovely also. Thanks for being such a wonderful company.
Delia, USA
I recviced Book Air Parcel(Nadi-Astrology). I am glad to see this book. Thankx. Muhammad Arshad Nadeem Pakistan.
Muhammad Arshad Nadeem
It is always a great pleasure to return to Exotic India with its exquisit artwork, books and other items. As I said several times before, Exotic India is far more than a highly professional Indian online shop; it is in fact an excellent ambassador to the world for the splendour of Indian wisdom and spirituality. I wish a happy and successful New Year 2017 to Exotic India and its employees! You can be very proud of yourself!
Dr Michael Seeber (psychiatrist and psychotherapist, Essen/Germany)
My last order arrived in a reasonable amount of time, regarding the long way it had to take! I am glad to find this and some other ayurvedic remedy, as well as books and much other things at your online-store and I am looking forward to be your customer again, some time.
Andreas, Germany.
Намаскар! Честно говоря, сомневался. Но сегодня получил свой заказ. Порадовала упаковка, упаковано всё очень тщательно и аккуратно. Большое спасибо, как раз подарок к Новому Году! Namaskar! Frankly, I doubted. But today received my order. We were pleased with the packaging. Everything is packed carefully and accurately. Thank you very much, just a gift for the New Year!
Ruslan, Russia.
Thanks for the great sale!! It really helped me out. I love Exotic India.
Shannon, USA
I have got the 3 parcels with my order today and everything is perfect. Thank you very much for such a good packaging to protect the items and for your service.
Guadalupe, Spain
Great books! I am so glad you make them available to order, thank you!
Yevgen, USA
TRUSTe online privacy certification
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2017 © Exotic India