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Books > Hindu > हिन्दी > पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय: The Four Purusharthas in the Puranas
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पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय: The Four Purusharthas in the Puranas
पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय: The Four Purusharthas in the Puranas
Description

लेखक परिचय

 

डॉ० मंजुलता शर्मा पिछले बीस वर्षो से भारतीय विद्या के विविध क्षेत्रों में निरन्तर चिन्तनशील रही हैं । उनके चिन्तन के विशिष्ट क्षेत्र रहे हैं पुराण तथा नाटक । इसके अतिरिक्त डॉ ० शर्मा की संस्कृत एवं हिन्दी भाषा में विरचित कविताएँ तथा वार्ताएँ नियमितरूप से आकाशवाणी से प्रसारित होती रहती हैं । सुम्प्रति आप आधुनिक संस्कृत समालोचना के क्षेत्र में एक चिर परिचित हस्ताक्षर हैं । सम्प्रति सेंट जोन्स कालेज, आगरा के संस्कृत विभाग में अध्यक्षा हैं ।

 

पुस्तक परिचय

 

हमारी भारतीय परम्परा में वेद और पुराण दो ऐसे महान् ग्रन्थ हैं जिन पर हम समस्त भारतवासियों को गर्व होना स्वाभाविक ही नहीं समुचित भी है । जहाँ एक ओर वेदों के मन्त्र दुरूह एवं जनमानस की पहुँच से दूर रहे, वहीं पुराणों की कथाएँ अपनी सुहत् सम्मित शैली के कारण सामान्य पुरुष एवं स्त्रियों के लिये अत्यन्त बोधगम्य तथा उपयोगी रही हैं । डॉ० मंजुलता शर्मा ने इन कथाओं में पुरुषार्थ चतुष्टय को रेखांकित करने की चेष्टा की है ।

 

अवतरणी

 

विकासशील मानव अनादिकाल से ही अपनी बाह्याभ्यन्तर प्रगति के लिये सतत प्रयत्नशील रहा है । ज्ञान, तप, यज्ञ योग, संस्कार, आश्रम एवं विभिन्न धार्मिक कृत्य सदैव उसके चिन्तन के केन्द्रबिन्दु रहे हैं । अपनी संस्कृति के अनुगमन में उसे आत्मसन्तुष्टि प्राप्त होती है । अत उसका चिन्तन पुरातन से चिरनवीन की ओर गतिशील रहता है ।

आजकल यद्यपि मानव की भौतिक प्रगति अपने उच्चतम शिखर पर है, तथापि धार्मिक आस्था का निरन्तर हास हो रहा है । आज से सहस्रों वर्ष पूर्व भारतीय ऋषियों ने व्यष्टि और समष्टिगत जीवन को सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाने के लिये समय समय पर जो मौलिक परिवर्तन किये उनका निष्कर्ष ही धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त कर विकसित होता रहा है । वेद पुराणों से उदृत धर्म की सरिता आदिकाल से अनेक धाराओं में निसृत होकर अपने धर्मामृत से जनजीवन को आप्यायित करती रही है ।

मानव जीवन का प्रमुख लक्ष्य है सुख की प्राप्ति । वह विभिन्न उपायों द्वारा सुख के साधनों का एकत्रीकरण चाहता है । उसकी यही प्रवृत्ति उसे दुःख की ओर ले जाती है क्योंकि जो भी वस्तु आसक्ति परायण होकर भोगी जाती है, वह कष्टसाध्य होती है । मनुष्य के कर्मों का विधान धर्म और जीविकोपार्जन के लिये किया गया है । इस विधान में पुरुषार्थ चतुष्टय का त्रिवर्ग धर्म, अर्थ और काम संग्रहीत हो जाता है । जब यह त्रिवर्ग शुद्ध मन से उपसेवित होता है तब नि श्रेयस् की प्राप्ति में सहायक होता है । इसमें प्रथम त्रिवर्ग साधन है और मोक्ष साध्य है । इनका यथोचित सम्पादन करना ही मानववमात्र का धर्म है ।

संस्कृत वाक्य में पुराण जन जन की आस्था के प्रमाण हैं । ये वेदनिहित बीजों के पल्लवित रूप हैं । भारतीय संस्कृति के मेरुदण्डस्वरूप पुरुषार्थ चतुष्टय की यह अजस्र धारा पुराणों में भी प्रवाहित हुई है और अपने पावन अमृत से मानवमात्र के लिये मोक्षप्रदायिनी गंगा बन गयी है । इस ज्ञान गंगा में स्नात हुआ प्राणी जीवन के अभिलषित उद्देश्य को प्राप्त करके पुलकित होता है ।

निरन्तर अध्ययनरत रहते हुए भी कुछ प्रश्न मेरे मन को नित्य प्रति व्यथित करते रहे है कि आखिर मनुष्य के जीवन का लक्ष्य क्या है? हमारे शास्त्र, वेद, पुराण किस मार्ग का समर्थन करते हैं? किस साधन से मन की शान्ति और ईश्वरप्राप्ति की जा सकती है? इन अनेकों प्रश्नों ने मुझे सतत चिन्तन के लिये प्रेरित किया और इसी चिन्तन के फलस्वरूप पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय नामक कथ आज भारतीयविद्या के मनीषियों तथा पौराणिक साहित्य के अनुरागियों के समक्ष उपस्थित है ।

यह ग्रंथ एक समग्र जीवन दृष्टि है । इसमें केवल अठारह पुराणों के कथ्य को ही जिज्ञासुओं के लिये यथावत् प्रस्तुत नहीं किया है अपितु उसका आलोडन करके नवीन तथ्यों के नवनीत को जिज्ञासुओं तक पहुँचाने का प्रयास किया है । पुरुष के जीवन का लक्ष्य पुरुषार्थ है और इसकी प्राप्ति में ही उसकी सन्तुष्टि निहित है । पुराण व्यक्ति की इसी पिपासा के शमन हेतु शुद्ध निर्झर प्रदान करते हैं । यह ग्रन्थ मेरे आठ वर्षों के सतत चिन्तन का परिणाम है परन्तु इसमें न तो भाषा की घनघोर अटवी है और न ही शब्दार्थ के चमत्कार का प्रदर्शन । इसमें सरलतम शैली में धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष पर विस्तार से चर्चा की गयी है । पुराण इनकी प्राप्ति में कितने सहायक सिद्ध हो सकते हैं इस भाव को पदे पदे रेखांकित करने का प्रयास किया गया है । धर्म एवं मोक्ष से आबद्ध अर्थ और काम व्यक्ति के लिये कितने फलदायी हो सकते हैं यही इस पुस्तक की सामयिकता है । वर्तमान समय में जहाँ एक ओर मनुष्य प्रतिस्पर्द्धा के चक्रव्यूह से स्वयं को मुक्त नहीं कर पा रहा है, राजधर्म अपने विकृत रूप में उपस्थित है, ऐसे पथभ्रष्ट एवं दिग्भ्रमित समाज के लिये धर्मयुक्त पुरुषार्थ संजीवनी सिद्ध हो सकते हैं ।

अन्ततः इस ग्रन्थ के सफल प्रणयन के लिये मैं अपने स्वर्गीय पिता पं० राधेश्याम शास्त्री के प्रति श्रद्धावनत हूँ जिनकी सतत प्रेरणा ने मुझे इस ओर प्रेरित किया । मैं अपने सहधर्मी श्री मोहन शर्मा के सौजन्य हेतु भी आभारी हूँ जिन्होंने अत्यन्त विचलन एवं अधीरता के क्षणों में भी मेरा उत्साहवर्द्धन किया । इसके साथ ही अपने उन सहृदयी मित्रों को भी धन्यवाद देती हूँ जिन्होंने मेरी इस कृति में सक्रिय सहयोग दिया है । अन्त में, मैं परिमल पब्लिकेशन्स के स्वामी श्री कन्हैयालाल जोशी की हृदय से आभारी हूँ जिनके परिश्रम के बिना यह महायज्ञ सम्पन्न होना कष्टसाध्य था । उन्होंने विशेष रुचि लेकर इस ग्रन्थ के प्रकाशन का दायित्व पूर्ण किया ।

मेरा यह लघु प्रयास मनीषियों के समक्ष प्रस्तुत है । कालिदास के शब्दों में इसकी सफलता और निष्फलता की कसौटी उन्हीं का परितोष है

आपरितोषाद् विदुषां साधुमन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।

 

प्राक्कथन

 

विकासशील मानव अनादिकाल से ही अपनी बाह्याभ्यंतर प्रगति के लिए सतत संघर्षरत रहा है । ज्ञान, तप, यज्ञ, योग चिन्तन मनन, संस्कार एवं विभिन्न धार्मिक कृत्यों के विविध सोपानों से वह जीवन लक्ष्य की उपलब्धि के लिए अग्रसर होता रहा है ।

आजकल यद्यपि मानव की भौतिक प्रगति अपने उच्चतम शिखर पर है तथापि उसकी गरिमा के आकलन का प्रमुख तत्व उसकी धार्मिक आस्था का निरन्तर हास होता जा रहा है । आज से सहस्रों वर्ष पूर्व भारतीय ऋषियों ने व्यष्टि और समष्टिगत जीवन को सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाने के लिए समय समय पर जो मौलिक परिवर्तन किये हैं उनका निष्कर्ष ही धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त कर विकसित होता रहा है । वेद, पुराणों से उद्गत धर्म की सरिता आदि काल से अनेकों धाराओं में निःसृत होकर अपने धर्मामृत से जनजीवन को आप्यायित करती रही है ।

मानव जीवन का प्रमुख लक्ष्य है सुख की प्राप्ति । वह विभिन्न उपायों द्वारा भुख के साधनों का एकत्रीकरण चाहता है । उसकी यही प्रवृत्ति उसे दुःख की ओर ले जाती है । क्योंकि जो भी वस्तु आसक्ति परायण होकर भोगी जाती है वह कष्टसाध्य हो जाती है । मनुष्य के कर्मों का विधान धर्म और जीविकोपार्जन के लिए किया गया है । इस विधान में पुरुषार्थ चतुष्ट्य का त्रिवर्ग धर्म, अर्थ, काम संग्रहीत हो जाता है जब यह त्रिवर्ग शुद्ध मन से उपसेवित होता है । तब नि श्रेयस की प्राप्ति में सहायक होता है । इसमें प्रथम त्रिवर्ग साधन है और मोक्ष साध्य है इनका यथोचित सम्पादन करना ही मानव जाति का लक्ष्य है ।

संस्कृत वाङ्मय में पुराण मनुष्य की जन जन की आस्था के प्रमाण हैं । वह वेद निहित बीजों के पल्लवित रूप हैं । भारतीय संस्कृति के मेरुदण्ड स्वरूप पुरुषार्थ चतुष्ट्य की यह अमृतनद पुराणों में भी प्रवाहित हुई है और अपने पावन अमृत से जन जन के लिए मन्दाकिनी बन गयी है । फलत इस ज्ञान गंगा से स्नात हुआ प्राणी तृप्त होकर पुलकित हो जाता है । संस्कृत भाषा में निरन्तर संवर्धित विषयों की गौरवमयी स्थिति देखते हुए शोध कार्य की निरन्तरता अपेक्षणीय है । कुछ प्रश्न निरन्तर मेरे मन को व्यथित करते थे कि आखिर मानव जीवन का लक्ष्य क्या है? हमारे शास्त्र, वेद पुराण किस मार्ग का समर्थन करते हैं? किस साधन से मन की शान्ति और ईश्वर प्राप्ति की जा सकती है? इन अनेकों प्रश्नों ने मुझे पुन अनुसंधित्सुओं की श्रेणी में खड़ा कर दिया और मैंने पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय की धारणा. को समझने का प्रयास किया । मेरा यही प्रयास इस रूप में मनीषियों, पौराणिक साहित्य के अनुरागियो के समक्ष उपस्थित है ।

प्रस्तुत शोध प्रबन्ध को आठ अध्यायों में विभाजित किया गया है प्रथम अध्याय में पुराणों के सामान्य विवेचन के अन्तर्गत संस्कृत साहित्य में अठारह पुराणों को प्रस्तुत करते हुए पुराणों का लक्षण बताया गया है । इसके साथ ही इसका समाधान भी प्रस्तुत किया गया है कि आखिर पुराणों को अष्टादश रूप में ही क्यों स्वीकार किया गया । पुराणों के वर्ण्य विषय का भी इसमें विस्तार से उल्लेख है । इस प्रकार प्रथम अध्याय पुराणों की संख्या, लक्षण, विषय वस्तु आदि को व्यक्त करता है । द्वितीय अध्याय में पुरुषार्थ चतुष्टय धर्म, अर्थ काम, मोक्ष पर एक विहंगम दृष्टि डालते हुए उन्हें सामान्य रूप में प्रस्तुत किया है । इन पुरुषार्थों में धर्म का श्रेष्ठत्व प्रतिपादित करना एक लक्ष्य है । यह पुरुषार्थ मानव जीवन के प्रधान लक्ष्य है इस तथ्य का समर्थन करते हुए पुराणों में इसकी को स्पष्ट करने का भी प्रयास वर्णित है । तृतीय अध्याय धर्म की धारणा धारणा को व्यक्त करता है । इसमें सामान्य धर्म एवं धर्म का अनुष्ठान दोनों ही भिन्न भिन्न रूपों में दर्शनीय हैं । नित्य और नैमित्तिक रूप में भी धर्म का विस्तार किया गया है । चतुर्थ अध्याय विशेष धर्म के स्वरूप को व्यक्त करता है । इसमें वर्णाश्रम धर्म, संस्कार, यज्ञ, तप एवं तीर्थ, व्रतोत्सव एवं उसके प्रयोजन पर प्रकाश डाला गया है । इसी अध्याय में राजधर्म का भी विस्तार हे उल्लेख है । सम्भवत विषय की व्यापकता ने इस अध्याय को विस्तृत रूप प्रदान किया है । पंचम अध्याय द्वितीय पुरुषार्थ के रूप में अर्थ को वर्णित करता है । अर्थ का अभिप्राय और महत्व के अतिरिक्त इसमें पौराणिक शासन की एक इकाई के रूप में अर्थ को अभिव्यज्जित किया है । इसमें राज्यों की वित्तीय व्यवस्था के अन्तर्गत आय के साधन और अर्थ के विनियोग की अवस्थाओं का चित्रण भी किया गया है । अध्याय के अन्त में धर्म और अर्थ का पारस्परिक अनुकूलन सिद्ध करने का प्रयास किया गया है । षष्ठ अध्याय काम पर आधारित है । इसमें काम का तात्पर्य, उपादेयता, उसके प्रकार के साथ साथ मनुष्य की प्रवृत्ति और मनःस्थिति की भावपूर्ण व्यंजना की गयी है । पुराणों में काम सम्बन्धी व्यवहार के विभिन्न स्वरूप एवं स्थितियों का वर्णन भी दृष्टव्य है । धर्मविरुद्ध एवं धर्मयुक्त काम का विवेचन भी इसमें प्राप्त होता है । शोध प्रबन्ध का सप्तम अध्याय जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को लक्ष्य करके लिखा गया है । इसमें मोक्ष की नि श्रेयस रूप में प्रवृत्ति मोक्ष के यम नियम आदि साधनों का वर्णन विस्तार से किया गया है । इसके अतिरिक्त मोक्ष के अधिकारी और मोक्ष में त्रिवर्ग की सार्थकता बताते हुए मोक्ष को परम पुरुषार्थ के रूप में वर्णित किया गया है । अन्तिम अष्टम अध्याय उपसंहार है जिसमें समस्त विषयों का समाहार करते हुए सम्पूर्ण शोध प्रबन्ध का सार प्रस्तुत किया है ।

अनेक वर्षों के अश्रान्त श्रम के उपरान्त आज यह मधुर क्षण उपस्थित हुआ है जब मैं अपनी उत्कट अभिलाषा को उस परमब्रह्म की कृपा से साकार करने में सफल हुई हूँ । उस ब्रह्म को ब्रह्मा, विष्णु, शिव इस त्रिगुणात्मक रूप में प्रणाम करती हूँ जिनकी कृपा से यह मांगलिक अनुष्ठान पूरा हुआ है ।

आज पौराणिक साहित्य के अनुरागी उन समस्त महामनीषियों एवं उदार सहृदयों के प्रति भी मैं हार्दिक श्रद्धा एवं कृतज्ञता अभिव्यक्त करती हूँ जिनके परिश्रम का फल मेरे प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में सदा सहायक रहा है । जिनके ज्ञान प्रेरणा एवं पोषण ने मेरे अध्ययन को जीवन्तता प्रदान की है ।

लेखिका का यह लघु एवं विनम्र प्रयास मनीषियों के समक्ष प्रस्तुत है । इसकी सफलता एवं निष्फलता की कसौटी उन्हीं का परितोष है ।

 

विषयानुक्रम

प्रथम

 पुराणों का सामान्य विवेचन

1

(1)

संस्कृत साहित्य में पुराण

1

(2)

पुराण लक्षण

15

(3)

पुराणों के अष्टादश होने का रहस्य

28

(4)

पुराणों का वर्ण्य विषय

34

द्वितीय

 पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा

52

(1)

पुरुषार्थ चतुष्टय एक विहंगम दृष्टि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष

52

(2)

पुरुषार्थों में धर्म का श्रेष्ठत्व

67

(3)

पुरुषार्थ मानव जीवन के प्रधान अभिलषित विषय

77

(4)

पुरुषार्थ चतुष्टय और पुराण

87

तृतीय

 पुराणों में धर्म की धारणा

107

(1)

सामान्य धर्म अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, क्षमा, शौच, धृति, दम, अक्रोध, इन्द्रिय निग्रह

108

(2)

धर्म का अनुष्ठान

123

(क)

नित्य धर्म पंचमहायज्ञ अग्नि होत्र आदि

123

(ख)

नैमित्तिक धर्म श्राद्ध, प्रायश्चित्त, पुष्टि कर्म, शान्ति कर्म ।

130

चतुर्थ

 पुराणों में वर्णित विशेष धर्म

141

(क)

वर्णाश्रम धर्म

141

(ख)

संस्कार

155

(ग)

यज्ञ

166

(घ)

तप एवं तीर्थ

170

(ङ)

व्रतोत्सव एवं उसके प्रयोजन

186

(2)

पुराणों में राजधर्म की परिकल्पना

196

पंचम

 पुराणों में अर्थ का प्रतिपादन

209

(1)

अर्थ का अभिप्राय एवं महत्त्व

209

(2)

द्वितीय पुरुषार्थ के रूप में अर्थ की सार्थकता

212

(3)

पौराणिक शासन व्यवस्था में अर्थ एक इकाई के रूप में

216

(4)

राज्यों की वित्तीय व्यवस्था

221

(क)

अर्थागम के साधन

222

1.

राजकोश

222

2.

व्यापार एवं परिवहन

226

3.

कृषि एवं पशुपालन

230

4.

उद्योग

233

5.

मुद्रा एवं वित्तीय व्यवस्था

235

6.

प्राकृतिक साधन

238

7.

कराधान एवं अर्थदण्ड

241

(ख)

अर्थ का विनियोग

244

1.

जन कल्याण की योजनाएँ

245

2.

धार्मिक क्रिया कलापों के लिए अर्थव्यय

247

3.

सैन्य व्यवस्था हेतु होने वाला व्यय

250

4.

राज्य व्यवस्था में अर्थ का विनियोग

258

5.

राजसी वैभव एवं भोज्य पदार्थों पर किया गया व्यय

255

6.

अन्य व्यय

258

(5)

धर्म एवं अर्थ का पारस्परिक अनुकूलन

260

षष्ठ

 पुराणों में काम का स्वरूप

263 307

(1)

काम का तात्पर्य एवं उपादेयता

263

(2)

काम के प्रकार

272

(3)

मनुष्य की काम में प्रवृत्ति और उसकी मनःस्थिति की भावपूर्ण व्यंजना

276

(4)

पुराणों में काम सम्बन्धी व्यवहार

283

(क)

विलास एवं उपभोग

283

(ख)

संयोग एवं विनोद के प्रसंग

286

(ग)

कामोद्दीपक रूप में ऋतु चित्रण

289

(घ)

वियोग की मार्मिक अभिव्यंजनाएँ

293

(ड़)

कृशता एवं ताप निवारण

296

(5)

धर्म विरुद्ध काम

299

(6)

धर्मार्जित एवं अर्थपरिष्कृत काम

305

सप्तम

पुराणों में मोक्ष अन्तिम पुरुषार्थ के रूप में

308 339

(1)

मोक्ष की नि श्रेयस रूप में प्रवृत्ति

309

(2)

मोक्ष के साधन, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि

312

(3)

मोक्ष के अधिकारी

325

(4)

पुराणों में मोक्ष परम पुरुषार्थ के रूप में

329

(5)

मोक्ष में त्रिवर्ग की सार्थकता

331

अष्टम

 उपसंहार

340

 

पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय: The Four Purusharthas in the Puranas

Item Code:
HAA174
Cover:
Hardcover
Edition:
2002
ISBN:
8171102151
Language:
Sanskrit Text to Hindi Translation
Size:
8.5 inch X 6.0 inch
Pages:
365
Other Details:
Weight of the Book: 550 gms
Price:
$30.00   Shipping Free
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लेखक परिचय

 

डॉ० मंजुलता शर्मा पिछले बीस वर्षो से भारतीय विद्या के विविध क्षेत्रों में निरन्तर चिन्तनशील रही हैं । उनके चिन्तन के विशिष्ट क्षेत्र रहे हैं पुराण तथा नाटक । इसके अतिरिक्त डॉ ० शर्मा की संस्कृत एवं हिन्दी भाषा में विरचित कविताएँ तथा वार्ताएँ नियमितरूप से आकाशवाणी से प्रसारित होती रहती हैं । सुम्प्रति आप आधुनिक संस्कृत समालोचना के क्षेत्र में एक चिर परिचित हस्ताक्षर हैं । सम्प्रति सेंट जोन्स कालेज, आगरा के संस्कृत विभाग में अध्यक्षा हैं ।

 

पुस्तक परिचय

 

हमारी भारतीय परम्परा में वेद और पुराण दो ऐसे महान् ग्रन्थ हैं जिन पर हम समस्त भारतवासियों को गर्व होना स्वाभाविक ही नहीं समुचित भी है । जहाँ एक ओर वेदों के मन्त्र दुरूह एवं जनमानस की पहुँच से दूर रहे, वहीं पुराणों की कथाएँ अपनी सुहत् सम्मित शैली के कारण सामान्य पुरुष एवं स्त्रियों के लिये अत्यन्त बोधगम्य तथा उपयोगी रही हैं । डॉ० मंजुलता शर्मा ने इन कथाओं में पुरुषार्थ चतुष्टय को रेखांकित करने की चेष्टा की है ।

 

अवतरणी

 

विकासशील मानव अनादिकाल से ही अपनी बाह्याभ्यन्तर प्रगति के लिये सतत प्रयत्नशील रहा है । ज्ञान, तप, यज्ञ योग, संस्कार, आश्रम एवं विभिन्न धार्मिक कृत्य सदैव उसके चिन्तन के केन्द्रबिन्दु रहे हैं । अपनी संस्कृति के अनुगमन में उसे आत्मसन्तुष्टि प्राप्त होती है । अत उसका चिन्तन पुरातन से चिरनवीन की ओर गतिशील रहता है ।

आजकल यद्यपि मानव की भौतिक प्रगति अपने उच्चतम शिखर पर है, तथापि धार्मिक आस्था का निरन्तर हास हो रहा है । आज से सहस्रों वर्ष पूर्व भारतीय ऋषियों ने व्यष्टि और समष्टिगत जीवन को सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाने के लिये समय समय पर जो मौलिक परिवर्तन किये उनका निष्कर्ष ही धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त कर विकसित होता रहा है । वेद पुराणों से उदृत धर्म की सरिता आदिकाल से अनेक धाराओं में निसृत होकर अपने धर्मामृत से जनजीवन को आप्यायित करती रही है ।

मानव जीवन का प्रमुख लक्ष्य है सुख की प्राप्ति । वह विभिन्न उपायों द्वारा सुख के साधनों का एकत्रीकरण चाहता है । उसकी यही प्रवृत्ति उसे दुःख की ओर ले जाती है क्योंकि जो भी वस्तु आसक्ति परायण होकर भोगी जाती है, वह कष्टसाध्य होती है । मनुष्य के कर्मों का विधान धर्म और जीविकोपार्जन के लिये किया गया है । इस विधान में पुरुषार्थ चतुष्टय का त्रिवर्ग धर्म, अर्थ और काम संग्रहीत हो जाता है । जब यह त्रिवर्ग शुद्ध मन से उपसेवित होता है तब नि श्रेयस् की प्राप्ति में सहायक होता है । इसमें प्रथम त्रिवर्ग साधन है और मोक्ष साध्य है । इनका यथोचित सम्पादन करना ही मानववमात्र का धर्म है ।

संस्कृत वाक्य में पुराण जन जन की आस्था के प्रमाण हैं । ये वेदनिहित बीजों के पल्लवित रूप हैं । भारतीय संस्कृति के मेरुदण्डस्वरूप पुरुषार्थ चतुष्टय की यह अजस्र धारा पुराणों में भी प्रवाहित हुई है और अपने पावन अमृत से मानवमात्र के लिये मोक्षप्रदायिनी गंगा बन गयी है । इस ज्ञान गंगा में स्नात हुआ प्राणी जीवन के अभिलषित उद्देश्य को प्राप्त करके पुलकित होता है ।

निरन्तर अध्ययनरत रहते हुए भी कुछ प्रश्न मेरे मन को नित्य प्रति व्यथित करते रहे है कि आखिर मनुष्य के जीवन का लक्ष्य क्या है? हमारे शास्त्र, वेद, पुराण किस मार्ग का समर्थन करते हैं? किस साधन से मन की शान्ति और ईश्वरप्राप्ति की जा सकती है? इन अनेकों प्रश्नों ने मुझे सतत चिन्तन के लिये प्रेरित किया और इसी चिन्तन के फलस्वरूप पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय नामक कथ आज भारतीयविद्या के मनीषियों तथा पौराणिक साहित्य के अनुरागियों के समक्ष उपस्थित है ।

यह ग्रंथ एक समग्र जीवन दृष्टि है । इसमें केवल अठारह पुराणों के कथ्य को ही जिज्ञासुओं के लिये यथावत् प्रस्तुत नहीं किया है अपितु उसका आलोडन करके नवीन तथ्यों के नवनीत को जिज्ञासुओं तक पहुँचाने का प्रयास किया है । पुरुष के जीवन का लक्ष्य पुरुषार्थ है और इसकी प्राप्ति में ही उसकी सन्तुष्टि निहित है । पुराण व्यक्ति की इसी पिपासा के शमन हेतु शुद्ध निर्झर प्रदान करते हैं । यह ग्रन्थ मेरे आठ वर्षों के सतत चिन्तन का परिणाम है परन्तु इसमें न तो भाषा की घनघोर अटवी है और न ही शब्दार्थ के चमत्कार का प्रदर्शन । इसमें सरलतम शैली में धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष पर विस्तार से चर्चा की गयी है । पुराण इनकी प्राप्ति में कितने सहायक सिद्ध हो सकते हैं इस भाव को पदे पदे रेखांकित करने का प्रयास किया गया है । धर्म एवं मोक्ष से आबद्ध अर्थ और काम व्यक्ति के लिये कितने फलदायी हो सकते हैं यही इस पुस्तक की सामयिकता है । वर्तमान समय में जहाँ एक ओर मनुष्य प्रतिस्पर्द्धा के चक्रव्यूह से स्वयं को मुक्त नहीं कर पा रहा है, राजधर्म अपने विकृत रूप में उपस्थित है, ऐसे पथभ्रष्ट एवं दिग्भ्रमित समाज के लिये धर्मयुक्त पुरुषार्थ संजीवनी सिद्ध हो सकते हैं ।

अन्ततः इस ग्रन्थ के सफल प्रणयन के लिये मैं अपने स्वर्गीय पिता पं० राधेश्याम शास्त्री के प्रति श्रद्धावनत हूँ जिनकी सतत प्रेरणा ने मुझे इस ओर प्रेरित किया । मैं अपने सहधर्मी श्री मोहन शर्मा के सौजन्य हेतु भी आभारी हूँ जिन्होंने अत्यन्त विचलन एवं अधीरता के क्षणों में भी मेरा उत्साहवर्द्धन किया । इसके साथ ही अपने उन सहृदयी मित्रों को भी धन्यवाद देती हूँ जिन्होंने मेरी इस कृति में सक्रिय सहयोग दिया है । अन्त में, मैं परिमल पब्लिकेशन्स के स्वामी श्री कन्हैयालाल जोशी की हृदय से आभारी हूँ जिनके परिश्रम के बिना यह महायज्ञ सम्पन्न होना कष्टसाध्य था । उन्होंने विशेष रुचि लेकर इस ग्रन्थ के प्रकाशन का दायित्व पूर्ण किया ।

मेरा यह लघु प्रयास मनीषियों के समक्ष प्रस्तुत है । कालिदास के शब्दों में इसकी सफलता और निष्फलता की कसौटी उन्हीं का परितोष है

आपरितोषाद् विदुषां साधुमन्ये प्रयोगविज्ञानम् ।

 

प्राक्कथन

 

विकासशील मानव अनादिकाल से ही अपनी बाह्याभ्यंतर प्रगति के लिए सतत संघर्षरत रहा है । ज्ञान, तप, यज्ञ, योग चिन्तन मनन, संस्कार एवं विभिन्न धार्मिक कृत्यों के विविध सोपानों से वह जीवन लक्ष्य की उपलब्धि के लिए अग्रसर होता रहा है ।

आजकल यद्यपि मानव की भौतिक प्रगति अपने उच्चतम शिखर पर है तथापि उसकी गरिमा के आकलन का प्रमुख तत्व उसकी धार्मिक आस्था का निरन्तर हास होता जा रहा है । आज से सहस्रों वर्ष पूर्व भारतीय ऋषियों ने व्यष्टि और समष्टिगत जीवन को सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाने के लिए समय समय पर जो मौलिक परिवर्तन किये हैं उनका निष्कर्ष ही धर्म के रूप में मान्यता प्राप्त कर विकसित होता रहा है । वेद, पुराणों से उद्गत धर्म की सरिता आदि काल से अनेकों धाराओं में निःसृत होकर अपने धर्मामृत से जनजीवन को आप्यायित करती रही है ।

मानव जीवन का प्रमुख लक्ष्य है सुख की प्राप्ति । वह विभिन्न उपायों द्वारा भुख के साधनों का एकत्रीकरण चाहता है । उसकी यही प्रवृत्ति उसे दुःख की ओर ले जाती है । क्योंकि जो भी वस्तु आसक्ति परायण होकर भोगी जाती है वह कष्टसाध्य हो जाती है । मनुष्य के कर्मों का विधान धर्म और जीविकोपार्जन के लिए किया गया है । इस विधान में पुरुषार्थ चतुष्ट्य का त्रिवर्ग धर्म, अर्थ, काम संग्रहीत हो जाता है जब यह त्रिवर्ग शुद्ध मन से उपसेवित होता है । तब नि श्रेयस की प्राप्ति में सहायक होता है । इसमें प्रथम त्रिवर्ग साधन है और मोक्ष साध्य है इनका यथोचित सम्पादन करना ही मानव जाति का लक्ष्य है ।

संस्कृत वाङ्मय में पुराण मनुष्य की जन जन की आस्था के प्रमाण हैं । वह वेद निहित बीजों के पल्लवित रूप हैं । भारतीय संस्कृति के मेरुदण्ड स्वरूप पुरुषार्थ चतुष्ट्य की यह अमृतनद पुराणों में भी प्रवाहित हुई है और अपने पावन अमृत से जन जन के लिए मन्दाकिनी बन गयी है । फलत इस ज्ञान गंगा से स्नात हुआ प्राणी तृप्त होकर पुलकित हो जाता है । संस्कृत भाषा में निरन्तर संवर्धित विषयों की गौरवमयी स्थिति देखते हुए शोध कार्य की निरन्तरता अपेक्षणीय है । कुछ प्रश्न निरन्तर मेरे मन को व्यथित करते थे कि आखिर मानव जीवन का लक्ष्य क्या है? हमारे शास्त्र, वेद पुराण किस मार्ग का समर्थन करते हैं? किस साधन से मन की शान्ति और ईश्वर प्राप्ति की जा सकती है? इन अनेकों प्रश्नों ने मुझे पुन अनुसंधित्सुओं की श्रेणी में खड़ा कर दिया और मैंने पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय की धारणा. को समझने का प्रयास किया । मेरा यही प्रयास इस रूप में मनीषियों, पौराणिक साहित्य के अनुरागियो के समक्ष उपस्थित है ।

प्रस्तुत शोध प्रबन्ध को आठ अध्यायों में विभाजित किया गया है प्रथम अध्याय में पुराणों के सामान्य विवेचन के अन्तर्गत संस्कृत साहित्य में अठारह पुराणों को प्रस्तुत करते हुए पुराणों का लक्षण बताया गया है । इसके साथ ही इसका समाधान भी प्रस्तुत किया गया है कि आखिर पुराणों को अष्टादश रूप में ही क्यों स्वीकार किया गया । पुराणों के वर्ण्य विषय का भी इसमें विस्तार से उल्लेख है । इस प्रकार प्रथम अध्याय पुराणों की संख्या, लक्षण, विषय वस्तु आदि को व्यक्त करता है । द्वितीय अध्याय में पुरुषार्थ चतुष्टय धर्म, अर्थ काम, मोक्ष पर एक विहंगम दृष्टि डालते हुए उन्हें सामान्य रूप में प्रस्तुत किया है । इन पुरुषार्थों में धर्म का श्रेष्ठत्व प्रतिपादित करना एक लक्ष्य है । यह पुरुषार्थ मानव जीवन के प्रधान लक्ष्य है इस तथ्य का समर्थन करते हुए पुराणों में इसकी को स्पष्ट करने का भी प्रयास वर्णित है । तृतीय अध्याय धर्म की धारणा धारणा को व्यक्त करता है । इसमें सामान्य धर्म एवं धर्म का अनुष्ठान दोनों ही भिन्न भिन्न रूपों में दर्शनीय हैं । नित्य और नैमित्तिक रूप में भी धर्म का विस्तार किया गया है । चतुर्थ अध्याय विशेष धर्म के स्वरूप को व्यक्त करता है । इसमें वर्णाश्रम धर्म, संस्कार, यज्ञ, तप एवं तीर्थ, व्रतोत्सव एवं उसके प्रयोजन पर प्रकाश डाला गया है । इसी अध्याय में राजधर्म का भी विस्तार हे उल्लेख है । सम्भवत विषय की व्यापकता ने इस अध्याय को विस्तृत रूप प्रदान किया है । पंचम अध्याय द्वितीय पुरुषार्थ के रूप में अर्थ को वर्णित करता है । अर्थ का अभिप्राय और महत्व के अतिरिक्त इसमें पौराणिक शासन की एक इकाई के रूप में अर्थ को अभिव्यज्जित किया है । इसमें राज्यों की वित्तीय व्यवस्था के अन्तर्गत आय के साधन और अर्थ के विनियोग की अवस्थाओं का चित्रण भी किया गया है । अध्याय के अन्त में धर्म और अर्थ का पारस्परिक अनुकूलन सिद्ध करने का प्रयास किया गया है । षष्ठ अध्याय काम पर आधारित है । इसमें काम का तात्पर्य, उपादेयता, उसके प्रकार के साथ साथ मनुष्य की प्रवृत्ति और मनःस्थिति की भावपूर्ण व्यंजना की गयी है । पुराणों में काम सम्बन्धी व्यवहार के विभिन्न स्वरूप एवं स्थितियों का वर्णन भी दृष्टव्य है । धर्मविरुद्ध एवं धर्मयुक्त काम का विवेचन भी इसमें प्राप्त होता है । शोध प्रबन्ध का सप्तम अध्याय जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को लक्ष्य करके लिखा गया है । इसमें मोक्ष की नि श्रेयस रूप में प्रवृत्ति मोक्ष के यम नियम आदि साधनों का वर्णन विस्तार से किया गया है । इसके अतिरिक्त मोक्ष के अधिकारी और मोक्ष में त्रिवर्ग की सार्थकता बताते हुए मोक्ष को परम पुरुषार्थ के रूप में वर्णित किया गया है । अन्तिम अष्टम अध्याय उपसंहार है जिसमें समस्त विषयों का समाहार करते हुए सम्पूर्ण शोध प्रबन्ध का सार प्रस्तुत किया है ।

अनेक वर्षों के अश्रान्त श्रम के उपरान्त आज यह मधुर क्षण उपस्थित हुआ है जब मैं अपनी उत्कट अभिलाषा को उस परमब्रह्म की कृपा से साकार करने में सफल हुई हूँ । उस ब्रह्म को ब्रह्मा, विष्णु, शिव इस त्रिगुणात्मक रूप में प्रणाम करती हूँ जिनकी कृपा से यह मांगलिक अनुष्ठान पूरा हुआ है ।

आज पौराणिक साहित्य के अनुरागी उन समस्त महामनीषियों एवं उदार सहृदयों के प्रति भी मैं हार्दिक श्रद्धा एवं कृतज्ञता अभिव्यक्त करती हूँ जिनके परिश्रम का फल मेरे प्रस्तुत शोध प्रबन्ध में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में सदा सहायक रहा है । जिनके ज्ञान प्रेरणा एवं पोषण ने मेरे अध्ययन को जीवन्तता प्रदान की है ।

लेखिका का यह लघु एवं विनम्र प्रयास मनीषियों के समक्ष प्रस्तुत है । इसकी सफलता एवं निष्फलता की कसौटी उन्हीं का परितोष है ।

 

विषयानुक्रम

प्रथम

 पुराणों का सामान्य विवेचन

1

(1)

संस्कृत साहित्य में पुराण

1

(2)

पुराण लक्षण

15

(3)

पुराणों के अष्टादश होने का रहस्य

28

(4)

पुराणों का वर्ण्य विषय

34

द्वितीय

 पुराणों में पुरुषार्थ चतुष्टय की अवधारणा

52

(1)

पुरुषार्थ चतुष्टय एक विहंगम दृष्टि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष

52

(2)

पुरुषार्थों में धर्म का श्रेष्ठत्व

67

(3)

पुरुषार्थ मानव जीवन के प्रधान अभिलषित विषय

77

(4)

पुरुषार्थ चतुष्टय और पुराण

87

तृतीय

 पुराणों में धर्म की धारणा

107

(1)

सामान्य धर्म अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह, क्षमा, शौच, धृति, दम, अक्रोध, इन्द्रिय निग्रह

108

(2)

धर्म का अनुष्ठान

123

(क)

नित्य धर्म पंचमहायज्ञ अग्नि होत्र आदि

123

(ख)

नैमित्तिक धर्म श्राद्ध, प्रायश्चित्त, पुष्टि कर्म, शान्ति कर्म ।

130

चतुर्थ

 पुराणों में वर्णित विशेष धर्म

141

(क)

वर्णाश्रम धर्म

141

(ख)

संस्कार

155

(ग)

यज्ञ

166

(घ)

तप एवं तीर्थ

170

(ङ)

व्रतोत्सव एवं उसके प्रयोजन

186

(2)

पुराणों में राजधर्म की परिकल्पना

196

पंचम

 पुराणों में अर्थ का प्रतिपादन

209

(1)

अर्थ का अभिप्राय एवं महत्त्व

209

(2)

द्वितीय पुरुषार्थ के रूप में अर्थ की सार्थकता

212

(3)

पौराणिक शासन व्यवस्था में अर्थ एक इकाई के रूप में

216

(4)

राज्यों की वित्तीय व्यवस्था

221

(क)

अर्थागम के साधन

222

1.

राजकोश

222

2.

व्यापार एवं परिवहन

226

3.

कृषि एवं पशुपालन

230

4.

उद्योग

233

5.

मुद्रा एवं वित्तीय व्यवस्था

235

6.

प्राकृतिक साधन

238

7.

कराधान एवं अर्थदण्ड

241

(ख)

अर्थ का विनियोग

244

1.

जन कल्याण की योजनाएँ

245

2.

धार्मिक क्रिया कलापों के लिए अर्थव्यय

247

3.

सैन्य व्यवस्था हेतु होने वाला व्यय

250

4.

राज्य व्यवस्था में अर्थ का विनियोग

258

5.

राजसी वैभव एवं भोज्य पदार्थों पर किया गया व्यय

255

6.

अन्य व्यय

258

(5)

धर्म एवं अर्थ का पारस्परिक अनुकूलन

260

षष्ठ

 पुराणों में काम का स्वरूप

263 307

(1)

काम का तात्पर्य एवं उपादेयता

263

(2)

काम के प्रकार

272

(3)

मनुष्य की काम में प्रवृत्ति और उसकी मनःस्थिति की भावपूर्ण व्यंजना

276

(4)

पुराणों में काम सम्बन्धी व्यवहार

283

(क)

विलास एवं उपभोग

283

(ख)

संयोग एवं विनोद के प्रसंग

286

(ग)

कामोद्दीपक रूप में ऋतु चित्रण

289

(घ)

वियोग की मार्मिक अभिव्यंजनाएँ

293

(ड़)

कृशता एवं ताप निवारण

296

(5)

धर्म विरुद्ध काम

299

(6)

धर्मार्जित एवं अर्थपरिष्कृत काम

305

सप्तम

पुराणों में मोक्ष अन्तिम पुरुषार्थ के रूप में

308 339

(1)

मोक्ष की नि श्रेयस रूप में प्रवृत्ति

309

(2)

मोक्ष के साधन, यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि

312

(3)

मोक्ष के अधिकारी

325

(4)

पुराणों में मोक्ष परम पुरुषार्थ के रूप में

329

(5)

मोक्ष में त्रिवर्ग की सार्थकता

331

अष्टम

 उपसंहार

340

 

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