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Books > History > काव्यशिला पर विद्यापति और नरसिंह मेहता: (Narsi Mehta and Vidhyapati on Kavyashila)
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काव्यशिला पर विद्यापति और नरसिंह मेहता: (Narsi Mehta and Vidhyapati on Kavyashila)
काव्यशिला पर विद्यापति और नरसिंह मेहता: (Narsi Mehta and Vidhyapati on Kavyashila)
Description

लेखक परिचय

नाम: डॉ० संध्या गुप्ता

पदनाम: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर, हिन्दी विभाग,

सि० का० मु० विश्वविद्यालय, दुमका

पिता: स्व० श्री श्रीकृष्ण प्रसाद

प्रमुख स्वतत्रता सेनानी, लेखकसम्पादक (प्रताप, वीरभारत, गाँधीमार्ग गाँधी संदेश, आज, अमृत प्रभात नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, अम्बर इत्यादि से सम्बद्ध)

कार्यक्षेत्र मुख्यत बिहार झारखंड, उतर प्रदेश, गुजरात ।

माता श्रीमती प्रेमा देवी

प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेविका

कार्यक्षेत्र मुख्यत. बिहार झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, गुजरात जन्म 28 जनवरी, सताल परगना स्थित गाँव मोहनपुर (देवघर) शिक्षादीक्षा और निर्माण अहमदाबाद (गुजरात)

पति श्री इन्द्र दयाल साह, विज्ञान शिक्षक, पर्यावरणविद्

संतान

पुत्र कुमार पीयूष

पुत्री प्रज्ञा रश्मि

शैक्षणिक योग्यता बी० ए० ऑनर्स (हिन्दी)

एम० ए० हिन्दी, एम० ए० अँग्रेजी, पी एच०डी० सृजन हंस, पहल, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, वागथ साक्षात्कार, शीराजा वर्तमान साहित्य, वसुधा, अतएव आकंठ काव्यम् उद्भावना, उत्तर प्रदेश नयी धारा, साक्ष्य, दोआबा, नया ज्ञानोदय, सापेक्ष, जनसत्ता, हिन्दुस्तान, आज, आर्यावर्त, पुनर्नवा (दैनिक जागरण), प्रभात खबर , अमर उजाला आदि प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में रचनायें

कृतियाँ

1 स्वातत्र्य चेतना और संताल परगना में स्वतत्रता संग्राम (इतिहास ग्रंथ)

2 भारतीय वाङ्मय संवेदना के मूल स्वर (आलेख संग्रह)

3 सुनो! जवाब दो न! (कहानी सग्रह)

4 कोहरे का भोर (कविता सग्रह)

5 बना लिया मैंने भी घोसला (कविता सग्रह)

6 झुमकी का ब्रह्माण्ड (कविता संग्रह)

तानाशाही के खिलाफ, तानाशाही के पक्ष में गहरे मानवीय सरोकारों से जुड़ी सतत संघर्षशील

 

प्रकाशकीय

मनुष्य का सामाजिक आचार व्यवहार और सम्पूर्ण कार्य कलाप अपनी भाषा के माध्यम से ही फलता फूलता है, इसलिए अपनी मातृभाषा ही मनुष्य के मौलिक सोच की भाषा मानी जाती है । इस कारण सारे प्रबुद्धजन इसे हृदय से स्वीकारते हैं कि विश्वविद्यालयों में शिक्षा देने का माध्यम ऐसी भाषा होनी चाहिए जिसका पूरा उपयोग पढाई लिखाई के साथ हमारे आन्तरिक सोच को भी एक ऊँचाई दे सके हमारे सोच की भाषा निर्विवाद रूप से हिन्दी है, इसलिए भारत में जितने भी हिन्दीभाषी राज्य है, उनमें शिक्षा का माध्यम निश्चित रूप से हिन्दी ही होनी चाहिए।

इस सोच का साकार रूप देने के लिए भारत सरकार ने 1970 ई० में देश के तत्कालीन अठारह राज्यों में अपनी अपनी क्षेत्रीय भाषाओं मे हिन्दी ग्रन्थ अकादमी और बुक प्रोड्क्शन बोर्ड्स की स्थापना की। इस क्रम में तत्कालीन हिन्दी भाषी राज्यों, यथा बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में हिन्दी ग्रथ अकादमियाँ और शेष अहिन्दी भाषी राज्यों में बुक प्रोड्यान बोर्ड्स की स्थापना हुई तद्नुसार हिन्दी भाषी रक्यों में हिन्दी ग्रथ अकादमियों की स्थापना करत हुए सरकार द्वारा उच्च स्तर के छात्रों के लिए पाठ्य सामग्री और सहायक सदर्भ सामग्री उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हिन्दी में पुस्तकों के प्रकाशन और विक्रय का कार्यारम्भ किया गया ताकि छात्रों में स्वतत्र चिंतन शक्ति का विकास हो सके और अँग्रेजी पर उनकी निर्भरता कम हो सके।

बिहार हिन्दी ग्रथ अकादमी ने अबतक ज्ञान विज्ञान के सत्ताईस विषया में लगभग छह सौ पुस्तक का प्रकाशन किया है।

अकादमी की अनेकानेक पुस्तकें भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम मैं सहायक और सदर्भ ग्रथों के रूप में सस्तुत हैं डॉ० संध्या गुफा। की इस मौलिक कृति काव्य शिला पर विद्यापति और नरसी मेहता को प्रकाशित करते हुए अकादमी प्रसन्नता का अनुभव कर रही है इससे भारत के दो भिन्न भाषा भाषी प्रातों के बीच एकता और सौहार्द की कडियाँ और मजबूत होंगी

आशा है यह पुस्तक विभिन्न विश्वविद्यालय के छात्रों और शोधप्रज्ञा के लिए भी काफी उपयोगी प्रमाणित होगी

प्राक्कथन

काव्य मानव मन मस्तिष्क से उद्भूत वह विभूति है जो मानव मात्र को एक सूत्र में पिरोकर उसे एकात्मकता की अनुभूति कराता है । काव्यकार की साधना वस्तुत मानवता की ही साधना है । विश्व मानव समुदाय आकृति प्रकृति, आचार विचार, धर्म संस्कृति में एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी भाव लोक के मूलभूत धरातल पर ऐकभाव्यता का अनुभव करता है । सृष्टि के विभिन्न मानव समुदाय भिन्न भाषायें बोलते हैं, किन्तु उनके सुख दुख, हास्य रुदन, हर्षोल्लास की भाषा एक सी है । प्रेम और घृणा की अभिव्यक्ति भी एक सी है । हमारा भारतवर्ष भिन्न भाषा, धर्म दर्शन, चिंतन और संस्कृतियों का संगम स्थल रहा है । किन्तु भिन्न भाषाओं के साहित्यों, विभिन्न धर्मो, विचारधाराओं और संस्कृतियों के मंथनोपरांत जो भाव रत्न हमारे हाथ आते हैं, वे समान द्युति युक्त होते हैं । सचमुच इसी ऐकभाव्यता के बलबूते पर ही वसुधैव कटुम्बकम और विश्व बंधुत्व के चिंतन का प्रस्फुटन हुआ होगा ।

बाल्यावस्था में जब मैं अहमदाबाद के गाँधी आश्रम में अपने माता पिता के साथ रहती थी तब अक्सर साबरमती नदी के किनारे, महात्मा गाँधी के निवास स्थल पर स्थित स्मारक भवन के हाते में खेलने जाया करती थी । नदी के किनारे कुछ ऊँचाई पर उनक निवास स्थल के समीप एक वृक्ष के नीचे बड़ा सा चौकोर चबूतरा था जिसमें रेत बिछी हुई थी । वह महात्मा गाँधी का प्रार्थना स्थल था । वहाँ गाँधी आश्रम के छात्रावासों में रहने वाली अध्ययनरत छात्रायें, गुरुजन एवं स्मारक के संरक्षक, कार्यकर्तागण प्रतिदिन सुबह शाम प्रार्थना किया करते थे । उनकी प्रार्थना में महात्मा गाँधी द्वारा प्रतिदिन गाया जाने वाला भजन वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड परायी जाणे रे अवश्य हुआ करता था । मैं खेलना कूदना बंद कर कभी सहेलियों के साथ तो कभी अकेले ही उस प्रार्थना सभा में आँखें मूंद कर चुपचाप बैठ जाया करती थी । चल रही प्रार्थना की पंक्तियों को दोहराते, श्रद्धा भक्ति से शीश झुकाते मैं भावविभोर हो जाया करती थी । महात्मा गाँधी के प्रति श्रद्धा और भक्ति तो मुझे अपने परिवेश, परिवार और विशेष कर कट्टर गाँधीवादी पिता के आदर्शों से मिली थी । किन्तु भक्त नरसिंह मेहता की एक कल्पित प्रतिमूर्ति मेरे मानस में उस भजन के साथ साथ साकार होने लगी थी । ज्यों ज्यों उम्र बढ़ती गयी, बौद्धिक विकास होता गया, त्यों त्यों मेरी चेतना और संस्कारों में महात्मा गाँधी के साथ साथ नरसिंह मेहता गहरे पैठते चले गये । जब सृजन सामर्थ्य विकसित हुआ तब बालमन पर पड़ा नरसिंह मेहता का अमिट प्रभाव उभर कर अपने काव्य मंथन की ओर उत्पेरित करने लगा । नरसिंह मेहता की जीवनी पढ़ने पर उनकी अद्भुत चमत्कारिक जीवन शैली ने इस ओर और अधिक उकसाया । जनमानस को उनकी काव्य साधना एवं जीवन शैली की उदात्तता से अवश्य परिचित कराने की इच्छा बलवती होती गयी ।

स्नातकोत्तर अध्ययन के क्रम में जब कविवर विद्यापति के काव्य जगत् का विशिष्ट परिचय प्राप्त हुआ तब मन ही मन में दोनों कवियों का भाव साम्य उजागर होने लगा । ज्ञान की लिप्सा सहज जिज्ञासा बन कर गवेषणात्मक मंथन करने लगी । आश्चर्यजनक भाव साम्यता पर सुखद आश्चर्य हुआ । दृष्टि मिली । दिशा बोध हुआ । भ्रांतियाँ मिटी । वसुधैव कुटुम्बकम, विश्व बंधुत्व, भावात्मक एकता स्वयं सिद्ध होती चली गई । भाषा और क्षेत्रादि के मतभेदों का खोखलापन अनावरित हो गया और अंतत वह काव्यानुशीलन ग्रंथ प्रणयन में परिणत हो गया ।

काव्य या साहित्य में, धर्म, दर्शन या सस्कृति में ऐक भाव्यता अथवा भाव साम्यता के दर्शन की अनिवार्य शर्त है, तुलनात्मक मंथन । सन् 1907 में श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने विश्व साहित्य का उल्लेख करते हुए साहित्य के अध्ययन में तुलनात्मक दृष्टि की आवश्यकता पर जोर दिया था । मानव के सांस्कृतिक इतिहास की सहज धारा या प्रतिकूल धारा के आश्रय से ही उन्होंने तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन पर बल दिया था । इसके एक वर्ष बाद सन् 1908 में तिरुवाचकम् तथा नलादीय के अनुवाद की भूमिका में जी, यू पोप ने तमिल भाषा भाषी विद्वानों से यह आग्रह किया कि तमिल के इन ग्रंथों के वास्तविक आस्वाद के लिये अंग्रेजी में लिखित धार्मिक कविताओं से परिचित होना जरूरी है क्योंकि कोई भी साहित्य अपने आप अलग अस्तित्व बनाकर टिक नहीं सकता । वस्तुत इस शताब्दी के पहले दशक में कही गई इस प्रकार की उक्तियों से ही भारतीय तुलनात्मक साहित्य की बुनियाद तैयार हुई थी । इस बीच भारतीय विश्वविद्यालयों की स्थापना के साथ साथ इस शताब्दी के तीसरे दशक से भारतीय भाषाओं के साहित्य से सम्बद्ध शोध कार्य में तुलनात्मक साहित्य पद्धति की ओर भारतीय विद्वानों का ध्यान आकर्षित हुआ । आज हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन को एक व्यापक आयाम प्रदान करने के लिये यह जरूरी है कि हिन्दी को केन्द्र में रख कर भारत की विभिन्न भाषाओं में रचित साहित्यों का अध्ययन किया जाये जिससे कि हिन्दी सही मायने में भारत की सामासिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर सके और भाषिक कुंठाओं से मुक्त करके हर भाषा के वैविध्य तथा एकता के तत्वों से हमें परिचित करा सके । गुजराती और हिन्दी साहित्यों के तुलनात्मक अध्ययन अत्यन्त कम हुए हैं । लेकिन विद्वानों का ध्यान इस ओर अब आकृष्ट हो रहा है । श्री कुंज बिहारी वार्ष्णेय ने अपना शोध प्रबंध हिन्दी गुजराती संतों की ज्ञानाश्रयी धारा का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर बम्बई विश्वविद्यालय से पी एच. डी. उपाधि प्राप्त की है । गुजरात के संतों की हिन्दी साहित्य को देन डॉ० रामकुमार गुप्त ने इस विषय पर शोध प्रबंध प्रस्तुत किया है ।

डॉ० ललित कुमार पारिख ने सूरदास और नरसिंह मेहता तुलनात्मक अध्ययन विषय पर शोध प्रस्तुत किया है । गुजराती और हिन्दी साहित्यों के तुलनात्मक आयाम बहुत अधिक हैं । नरसिंह मेहता पर तो हिन्दी में बहुत कम लिखा गया है ।

हिन्दी का कृष्ण काव्य जिस प्रकार मैथिल कोकिल विद्यापति के मृदु, सरल और सुन्दर पदों से सम्पन्न बना है उसी प्रकार गुजराती का कृष्ण काव्य भी नरसिंह के प्रेम और भक्ति के रस से सिंचित होकर अत्यधिक सुरभित हुआ है । इन दोनों भक्त कवियों का स्थान भारतीय साहित्य में अत्यन्त ऊँचा है । इन्हें कृष्ण भक्ति एवं कृष्ण काव्य को लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुँचाने का श्रेय प्राप्त है । आज भी इनके पद प्रेम, श्रद्धा और भक्तिपूर्वक गाये और सुने जाते हैं । विद्यापति और नरसिंह मेहता पर भारतीय साहित्य को गर्व है । इन दोनों काव्य प्रणेताओं के काव्यों का तुलनात्मक अध्ययन एक ओर जहाँ दिव्य आनंद की सृष्टि करता है वहीं दूसरी ओर दो प्रान्तीय भाषा साहित्य व संस्कृति के प्रति पारस्परिक आत्मीयता स्थापित करने में सहयोग देता है ।

इस कृति में मैंने सर्वप्रथम विद्यापति व नरसिंह मेहता के परिचय, जीवन वृत, व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर अलग अलग प्रकाश डाला है । तत्पश्चात् दोनों कवियों के काव्य में उपलब्ध भक्ति एवं श्रृंगार भावना, लोक चेतना, वात्सल्य वर्णन, दर्शन आदि का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए इनकी काव्यगत व्यापकता का परिचय दिया है । भाव पक्ष के तुलनात्मक विश्लेषण के पश्चात मैंने इनके कला पक्ष का भी तुलनात्मक अनुशीलन प्रस्तुत किया है जिसमें प्रमुखत रस विवेचन, गेयता भाषा, शब्द शक्ति, गुण, रीति शैली आदि का उद्धरण सहित निरूपण किया गया है । अंतत विद्यापति तथा नरसिंह मेहता का काव्येतिहास में महत्व और स्थान पर वैचारिक मंथन करते हुए कुछ अन्य कवियों के साथ भी इनका संक्षिप्त तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है ।

काव्य शिला पर विद्यापति और नरसिंह मेहता जैसी बीहड़ ग्रंथ रचना सतत मनोयोग अथक परिश्रम, अंत बाह्य प्रेरणा प्रोत्साहन, प्रत्यक्ष परोक्ष सहयोग एवं अनुग्रह के फलस्वरूप ही संभव हो पायी है । इसके बिना यह परिकल्पना कभी मूर्त रूप ग्रहण नहीं कर पाती । इसके लिये मैं सर्वप्रथम विद्यापति और नरसिंह मेहता इन दोनों महाकवियों की वंदना करती हूँ जिनकी अमृत काव्य वाणी में अवगाहन कर मैंने इस ग्रंथ के उन्नयन का संकल्प लिया । तत्पश्चात् हिन्दी, अँग्रेजी, गुजराती और संस्कृत के उन सभी विद्वानों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करती हूँ जिनकी अमूल्य पुस्तकों, लेखों, विचारों आदि के अध्ययन अनुशीलन एवं मंथन से मैंने इस महती लक्ष्य में सफलता प्राप्त की । इस ग्रंथ का प्रकाशन कई वर्षों पूर्व ( 90 दशक के प्रारम्भ में) ही हो जाना था । किन्तु हिन्दी जगत् में पुस्तक प्रकाशन कितना कठिन है, इस तथ्य से इसके भुक्तभोगी भलिभांति अवगत हैं । ऐसी स्थिति में बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी, पटना ने इसका प्रकाशन कर अत्यन्त श्लाघनीय एवं अनुकरणीय कार्य किया है । इसके लिये मैं अकादमी एवं इसके कुशल निदेशक प्रखर विद्वान् महामना, काव्य मर्मज्ञ डॉ० अमर कुमार सिंह की हृदय से आभारी हूँ ।

मुझे इस बात का अपार दु:ख है कि इसका प्रकाशन ज्ञान के आगार, लोक सेवा व्रती साधु पुरुष परम पूज्य पिता स्व० श्री श्रीकृष्ण प्रसाद के जीवन काल में न हो सका । इसी बीच परम मेधावी एवं अति संभावनाशील प्रियवर अनुज, स्व० आनंद गुप्ता के असयम बिछोह का वज्राघात भी अभिव्यक्ति से परे है । मैं कर बद्ध, नतमस्तक अपनी सम्पूर्ण संवेदना, प्रेम, श्रद्धा एवं भक्ति इन्हें ससम्मान अर्पित करती हूँ । इनकी पावन अक्षय स्मृति मेरे जीवन का सम्बल है । पूजनीया माता श्रीमती प्रेमादेवी, विद्वान भ्राता डॉ० कमलाकांत गुप्ता एवं सहृदय पति श्री इन्द्रदयाल साह, अनन्य मित्र श्री प्रकाश मंगतानी, पुत्र पीयूष एवं पुत्री प्रज्ञा रश्मि का नाना प्रकारेण सहयोग मेरे अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने के बावजूद मेरे लिये नमनीय है । इनका स्नेह, आशीष एवं शुभकामनायें मेरी अंत शक्ति रही हैं। ग्रंथ मुद्रण में योगदान के लिए मैं विजय श्री प्रेस एवं श्री विजय कुमार गुप्ता के प्रति भी आभार प्रकट करती हूँ ।

 

विषय सूची

प्राक्कथन

1

विद्यापति परिचय एवं जीवन वृत्त, व्यक्तित्व, कृतित्व ।

1

2

नरसिंह मेहता परिचय एवं जीवन वृत्त, व्यक्तित्व, कृतित्व ।

32

3

तुलनात्मक काव्यानुशीलन

(अ) भावपक्ष

1

विद्यापति और नरसिंह मेहता की भक्ति भावना

69

2

विद्यापति और नरसिंह मेहता का श्रृंगार वर्णन

134

3

दर्शन ज्ञान की तीन कोटियाँ

245

4

लोकचेतना राजश्रित होते हुए भी जनकवि

275

5

वात्सल्य वर्णन देवकी की वात्सल्य पीड़ा

293

(ब) कलापक्ष

1

रस विवेचन रस सिद्धान्त की महत्ता

305

2

गेयता गीतिकाव्य, गीतिकाव्य परम्परा के प्रर्वतक विद्यापति और नरसिंह मेहता ।

324

3

भाषा शब्द शक्ति ।

349

4

अलंकार काव्य में अलंकार का महत्त्व, शब्दालंकार अनुप्रास, वक्रोक्ति, यमक, श्लेष ।

361

6

गुण विवेचन गुण दोनों कवियों के काव्य में गुण की स्थिति, माधुर्य गुण, ओज गुण, प्रसाद गुण ।

372

7

रीति विवेचन रीति, रीति की संख्या, विद्यापति तथा नरसिंह के काव्य में रीति, वैदर्भी, गौड़ी, पाँचाली, लाटी ।

379

परिशिष्ट

421

सहायक ग्रंथ सूची

423

 

काव्यशिला पर विद्यापति और नरसिंह मेहता: (Narsi Mehta and Vidhyapati on Kavyashila)

Item Code:
HAA284
Cover:
Paperback
Edition:
2008
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
448
Other Details:
Weight of the Book: 390 gms
Price:
$17.00   Shipping Free
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काव्यशिला पर विद्यापति और नरसिंह मेहता: (Narsi Mehta and Vidhyapati on Kavyashila)

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लेखक परिचय

नाम: डॉ० संध्या गुप्ता

पदनाम: अध्यक्ष, स्नातकोत्तर, हिन्दी विभाग,

सि० का० मु० विश्वविद्यालय, दुमका

पिता: स्व० श्री श्रीकृष्ण प्रसाद

प्रमुख स्वतत्रता सेनानी, लेखकसम्पादक (प्रताप, वीरभारत, गाँधीमार्ग गाँधी संदेश, आज, अमृत प्रभात नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, अम्बर इत्यादि से सम्बद्ध)

कार्यक्षेत्र मुख्यत बिहार झारखंड, उतर प्रदेश, गुजरात ।

माता श्रीमती प्रेमा देवी

प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी, समाज सेविका

कार्यक्षेत्र मुख्यत. बिहार झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, गुजरात जन्म 28 जनवरी, सताल परगना स्थित गाँव मोहनपुर (देवघर) शिक्षादीक्षा और निर्माण अहमदाबाद (गुजरात)

पति श्री इन्द्र दयाल साह, विज्ञान शिक्षक, पर्यावरणविद्

संतान

पुत्र कुमार पीयूष

पुत्री प्रज्ञा रश्मि

शैक्षणिक योग्यता बी० ए० ऑनर्स (हिन्दी)

एम० ए० हिन्दी, एम० ए० अँग्रेजी, पी एच०डी० सृजन हंस, पहल, आजकल, समकालीन भारतीय साहित्य, वागथ साक्षात्कार, शीराजा वर्तमान साहित्य, वसुधा, अतएव आकंठ काव्यम् उद्भावना, उत्तर प्रदेश नयी धारा, साक्ष्य, दोआबा, नया ज्ञानोदय, सापेक्ष, जनसत्ता, हिन्दुस्तान, आज, आर्यावर्त, पुनर्नवा (दैनिक जागरण), प्रभात खबर , अमर उजाला आदि प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में रचनायें

कृतियाँ

1 स्वातत्र्य चेतना और संताल परगना में स्वतत्रता संग्राम (इतिहास ग्रंथ)

2 भारतीय वाङ्मय संवेदना के मूल स्वर (आलेख संग्रह)

3 सुनो! जवाब दो न! (कहानी सग्रह)

4 कोहरे का भोर (कविता सग्रह)

5 बना लिया मैंने भी घोसला (कविता सग्रह)

6 झुमकी का ब्रह्माण्ड (कविता संग्रह)

तानाशाही के खिलाफ, तानाशाही के पक्ष में गहरे मानवीय सरोकारों से जुड़ी सतत संघर्षशील

 

प्रकाशकीय

मनुष्य का सामाजिक आचार व्यवहार और सम्पूर्ण कार्य कलाप अपनी भाषा के माध्यम से ही फलता फूलता है, इसलिए अपनी मातृभाषा ही मनुष्य के मौलिक सोच की भाषा मानी जाती है । इस कारण सारे प्रबुद्धजन इसे हृदय से स्वीकारते हैं कि विश्वविद्यालयों में शिक्षा देने का माध्यम ऐसी भाषा होनी चाहिए जिसका पूरा उपयोग पढाई लिखाई के साथ हमारे आन्तरिक सोच को भी एक ऊँचाई दे सके हमारे सोच की भाषा निर्विवाद रूप से हिन्दी है, इसलिए भारत में जितने भी हिन्दीभाषी राज्य है, उनमें शिक्षा का माध्यम निश्चित रूप से हिन्दी ही होनी चाहिए।

इस सोच का साकार रूप देने के लिए भारत सरकार ने 1970 ई० में देश के तत्कालीन अठारह राज्यों में अपनी अपनी क्षेत्रीय भाषाओं मे हिन्दी ग्रन्थ अकादमी और बुक प्रोड्क्शन बोर्ड्स की स्थापना की। इस क्रम में तत्कालीन हिन्दी भाषी राज्यों, यथा बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में हिन्दी ग्रथ अकादमियाँ और शेष अहिन्दी भाषी राज्यों में बुक प्रोड्यान बोर्ड्स की स्थापना हुई तद्नुसार हिन्दी भाषी रक्यों में हिन्दी ग्रथ अकादमियों की स्थापना करत हुए सरकार द्वारा उच्च स्तर के छात्रों के लिए पाठ्य सामग्री और सहायक सदर्भ सामग्री उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हिन्दी में पुस्तकों के प्रकाशन और विक्रय का कार्यारम्भ किया गया ताकि छात्रों में स्वतत्र चिंतन शक्ति का विकास हो सके और अँग्रेजी पर उनकी निर्भरता कम हो सके।

बिहार हिन्दी ग्रथ अकादमी ने अबतक ज्ञान विज्ञान के सत्ताईस विषया में लगभग छह सौ पुस्तक का प्रकाशन किया है।

अकादमी की अनेकानेक पुस्तकें भारत के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम मैं सहायक और सदर्भ ग्रथों के रूप में सस्तुत हैं डॉ० संध्या गुफा। की इस मौलिक कृति काव्य शिला पर विद्यापति और नरसी मेहता को प्रकाशित करते हुए अकादमी प्रसन्नता का अनुभव कर रही है इससे भारत के दो भिन्न भाषा भाषी प्रातों के बीच एकता और सौहार्द की कडियाँ और मजबूत होंगी

आशा है यह पुस्तक विभिन्न विश्वविद्यालय के छात्रों और शोधप्रज्ञा के लिए भी काफी उपयोगी प्रमाणित होगी

प्राक्कथन

काव्य मानव मन मस्तिष्क से उद्भूत वह विभूति है जो मानव मात्र को एक सूत्र में पिरोकर उसे एकात्मकता की अनुभूति कराता है । काव्यकार की साधना वस्तुत मानवता की ही साधना है । विश्व मानव समुदाय आकृति प्रकृति, आचार विचार, धर्म संस्कृति में एक दूसरे से भिन्न होते हुए भी भाव लोक के मूलभूत धरातल पर ऐकभाव्यता का अनुभव करता है । सृष्टि के विभिन्न मानव समुदाय भिन्न भाषायें बोलते हैं, किन्तु उनके सुख दुख, हास्य रुदन, हर्षोल्लास की भाषा एक सी है । प्रेम और घृणा की अभिव्यक्ति भी एक सी है । हमारा भारतवर्ष भिन्न भाषा, धर्म दर्शन, चिंतन और संस्कृतियों का संगम स्थल रहा है । किन्तु भिन्न भाषाओं के साहित्यों, विभिन्न धर्मो, विचारधाराओं और संस्कृतियों के मंथनोपरांत जो भाव रत्न हमारे हाथ आते हैं, वे समान द्युति युक्त होते हैं । सचमुच इसी ऐकभाव्यता के बलबूते पर ही वसुधैव कटुम्बकम और विश्व बंधुत्व के चिंतन का प्रस्फुटन हुआ होगा ।

बाल्यावस्था में जब मैं अहमदाबाद के गाँधी आश्रम में अपने माता पिता के साथ रहती थी तब अक्सर साबरमती नदी के किनारे, महात्मा गाँधी के निवास स्थल पर स्थित स्मारक भवन के हाते में खेलने जाया करती थी । नदी के किनारे कुछ ऊँचाई पर उनक निवास स्थल के समीप एक वृक्ष के नीचे बड़ा सा चौकोर चबूतरा था जिसमें रेत बिछी हुई थी । वह महात्मा गाँधी का प्रार्थना स्थल था । वहाँ गाँधी आश्रम के छात्रावासों में रहने वाली अध्ययनरत छात्रायें, गुरुजन एवं स्मारक के संरक्षक, कार्यकर्तागण प्रतिदिन सुबह शाम प्रार्थना किया करते थे । उनकी प्रार्थना में महात्मा गाँधी द्वारा प्रतिदिन गाया जाने वाला भजन वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीड परायी जाणे रे अवश्य हुआ करता था । मैं खेलना कूदना बंद कर कभी सहेलियों के साथ तो कभी अकेले ही उस प्रार्थना सभा में आँखें मूंद कर चुपचाप बैठ जाया करती थी । चल रही प्रार्थना की पंक्तियों को दोहराते, श्रद्धा भक्ति से शीश झुकाते मैं भावविभोर हो जाया करती थी । महात्मा गाँधी के प्रति श्रद्धा और भक्ति तो मुझे अपने परिवेश, परिवार और विशेष कर कट्टर गाँधीवादी पिता के आदर्शों से मिली थी । किन्तु भक्त नरसिंह मेहता की एक कल्पित प्रतिमूर्ति मेरे मानस में उस भजन के साथ साथ साकार होने लगी थी । ज्यों ज्यों उम्र बढ़ती गयी, बौद्धिक विकास होता गया, त्यों त्यों मेरी चेतना और संस्कारों में महात्मा गाँधी के साथ साथ नरसिंह मेहता गहरे पैठते चले गये । जब सृजन सामर्थ्य विकसित हुआ तब बालमन पर पड़ा नरसिंह मेहता का अमिट प्रभाव उभर कर अपने काव्य मंथन की ओर उत्पेरित करने लगा । नरसिंह मेहता की जीवनी पढ़ने पर उनकी अद्भुत चमत्कारिक जीवन शैली ने इस ओर और अधिक उकसाया । जनमानस को उनकी काव्य साधना एवं जीवन शैली की उदात्तता से अवश्य परिचित कराने की इच्छा बलवती होती गयी ।

स्नातकोत्तर अध्ययन के क्रम में जब कविवर विद्यापति के काव्य जगत् का विशिष्ट परिचय प्राप्त हुआ तब मन ही मन में दोनों कवियों का भाव साम्य उजागर होने लगा । ज्ञान की लिप्सा सहज जिज्ञासा बन कर गवेषणात्मक मंथन करने लगी । आश्चर्यजनक भाव साम्यता पर सुखद आश्चर्य हुआ । दृष्टि मिली । दिशा बोध हुआ । भ्रांतियाँ मिटी । वसुधैव कुटुम्बकम, विश्व बंधुत्व, भावात्मक एकता स्वयं सिद्ध होती चली गई । भाषा और क्षेत्रादि के मतभेदों का खोखलापन अनावरित हो गया और अंतत वह काव्यानुशीलन ग्रंथ प्रणयन में परिणत हो गया ।

काव्य या साहित्य में, धर्म, दर्शन या सस्कृति में ऐक भाव्यता अथवा भाव साम्यता के दर्शन की अनिवार्य शर्त है, तुलनात्मक मंथन । सन् 1907 में श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने विश्व साहित्य का उल्लेख करते हुए साहित्य के अध्ययन में तुलनात्मक दृष्टि की आवश्यकता पर जोर दिया था । मानव के सांस्कृतिक इतिहास की सहज धारा या प्रतिकूल धारा के आश्रय से ही उन्होंने तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन पर बल दिया था । इसके एक वर्ष बाद सन् 1908 में तिरुवाचकम् तथा नलादीय के अनुवाद की भूमिका में जी, यू पोप ने तमिल भाषा भाषी विद्वानों से यह आग्रह किया कि तमिल के इन ग्रंथों के वास्तविक आस्वाद के लिये अंग्रेजी में लिखित धार्मिक कविताओं से परिचित होना जरूरी है क्योंकि कोई भी साहित्य अपने आप अलग अस्तित्व बनाकर टिक नहीं सकता । वस्तुत इस शताब्दी के पहले दशक में कही गई इस प्रकार की उक्तियों से ही भारतीय तुलनात्मक साहित्य की बुनियाद तैयार हुई थी । इस बीच भारतीय विश्वविद्यालयों की स्थापना के साथ साथ इस शताब्दी के तीसरे दशक से भारतीय भाषाओं के साहित्य से सम्बद्ध शोध कार्य में तुलनात्मक साहित्य पद्धति की ओर भारतीय विद्वानों का ध्यान आकर्षित हुआ । आज हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन को एक व्यापक आयाम प्रदान करने के लिये यह जरूरी है कि हिन्दी को केन्द्र में रख कर भारत की विभिन्न भाषाओं में रचित साहित्यों का अध्ययन किया जाये जिससे कि हिन्दी सही मायने में भारत की सामासिक संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर सके और भाषिक कुंठाओं से मुक्त करके हर भाषा के वैविध्य तथा एकता के तत्वों से हमें परिचित करा सके । गुजराती और हिन्दी साहित्यों के तुलनात्मक अध्ययन अत्यन्त कम हुए हैं । लेकिन विद्वानों का ध्यान इस ओर अब आकृष्ट हो रहा है । श्री कुंज बिहारी वार्ष्णेय ने अपना शोध प्रबंध हिन्दी गुजराती संतों की ज्ञानाश्रयी धारा का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत कर बम्बई विश्वविद्यालय से पी एच. डी. उपाधि प्राप्त की है । गुजरात के संतों की हिन्दी साहित्य को देन डॉ० रामकुमार गुप्त ने इस विषय पर शोध प्रबंध प्रस्तुत किया है ।

डॉ० ललित कुमार पारिख ने सूरदास और नरसिंह मेहता तुलनात्मक अध्ययन विषय पर शोध प्रस्तुत किया है । गुजराती और हिन्दी साहित्यों के तुलनात्मक आयाम बहुत अधिक हैं । नरसिंह मेहता पर तो हिन्दी में बहुत कम लिखा गया है ।

हिन्दी का कृष्ण काव्य जिस प्रकार मैथिल कोकिल विद्यापति के मृदु, सरल और सुन्दर पदों से सम्पन्न बना है उसी प्रकार गुजराती का कृष्ण काव्य भी नरसिंह के प्रेम और भक्ति के रस से सिंचित होकर अत्यधिक सुरभित हुआ है । इन दोनों भक्त कवियों का स्थान भारतीय साहित्य में अत्यन्त ऊँचा है । इन्हें कृष्ण भक्ति एवं कृष्ण काव्य को लोकप्रियता के चरम शिखर पर पहुँचाने का श्रेय प्राप्त है । आज भी इनके पद प्रेम, श्रद्धा और भक्तिपूर्वक गाये और सुने जाते हैं । विद्यापति और नरसिंह मेहता पर भारतीय साहित्य को गर्व है । इन दोनों काव्य प्रणेताओं के काव्यों का तुलनात्मक अध्ययन एक ओर जहाँ दिव्य आनंद की सृष्टि करता है वहीं दूसरी ओर दो प्रान्तीय भाषा साहित्य व संस्कृति के प्रति पारस्परिक आत्मीयता स्थापित करने में सहयोग देता है ।

इस कृति में मैंने सर्वप्रथम विद्यापति व नरसिंह मेहता के परिचय, जीवन वृत, व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर अलग अलग प्रकाश डाला है । तत्पश्चात् दोनों कवियों के काव्य में उपलब्ध भक्ति एवं श्रृंगार भावना, लोक चेतना, वात्सल्य वर्णन, दर्शन आदि का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए इनकी काव्यगत व्यापकता का परिचय दिया है । भाव पक्ष के तुलनात्मक विश्लेषण के पश्चात मैंने इनके कला पक्ष का भी तुलनात्मक अनुशीलन प्रस्तुत किया है जिसमें प्रमुखत रस विवेचन, गेयता भाषा, शब्द शक्ति, गुण, रीति शैली आदि का उद्धरण सहित निरूपण किया गया है । अंतत विद्यापति तथा नरसिंह मेहता का काव्येतिहास में महत्व और स्थान पर वैचारिक मंथन करते हुए कुछ अन्य कवियों के साथ भी इनका संक्षिप्त तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है ।

काव्य शिला पर विद्यापति और नरसिंह मेहता जैसी बीहड़ ग्रंथ रचना सतत मनोयोग अथक परिश्रम, अंत बाह्य प्रेरणा प्रोत्साहन, प्रत्यक्ष परोक्ष सहयोग एवं अनुग्रह के फलस्वरूप ही संभव हो पायी है । इसके बिना यह परिकल्पना कभी मूर्त रूप ग्रहण नहीं कर पाती । इसके लिये मैं सर्वप्रथम विद्यापति और नरसिंह मेहता इन दोनों महाकवियों की वंदना करती हूँ जिनकी अमृत काव्य वाणी में अवगाहन कर मैंने इस ग्रंथ के उन्नयन का संकल्प लिया । तत्पश्चात् हिन्दी, अँग्रेजी, गुजराती और संस्कृत के उन सभी विद्वानों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करती हूँ जिनकी अमूल्य पुस्तकों, लेखों, विचारों आदि के अध्ययन अनुशीलन एवं मंथन से मैंने इस महती लक्ष्य में सफलता प्राप्त की । इस ग्रंथ का प्रकाशन कई वर्षों पूर्व ( 90 दशक के प्रारम्भ में) ही हो जाना था । किन्तु हिन्दी जगत् में पुस्तक प्रकाशन कितना कठिन है, इस तथ्य से इसके भुक्तभोगी भलिभांति अवगत हैं । ऐसी स्थिति में बिहार हिन्दी ग्रंथ अकादमी, पटना ने इसका प्रकाशन कर अत्यन्त श्लाघनीय एवं अनुकरणीय कार्य किया है । इसके लिये मैं अकादमी एवं इसके कुशल निदेशक प्रखर विद्वान् महामना, काव्य मर्मज्ञ डॉ० अमर कुमार सिंह की हृदय से आभारी हूँ ।

मुझे इस बात का अपार दु:ख है कि इसका प्रकाशन ज्ञान के आगार, लोक सेवा व्रती साधु पुरुष परम पूज्य पिता स्व० श्री श्रीकृष्ण प्रसाद के जीवन काल में न हो सका । इसी बीच परम मेधावी एवं अति संभावनाशील प्रियवर अनुज, स्व० आनंद गुप्ता के असयम बिछोह का वज्राघात भी अभिव्यक्ति से परे है । मैं कर बद्ध, नतमस्तक अपनी सम्पूर्ण संवेदना, प्रेम, श्रद्धा एवं भक्ति इन्हें ससम्मान अर्पित करती हूँ । इनकी पावन अक्षय स्मृति मेरे जीवन का सम्बल है । पूजनीया माता श्रीमती प्रेमादेवी, विद्वान भ्राता डॉ० कमलाकांत गुप्ता एवं सहृदय पति श्री इन्द्रदयाल साह, अनन्य मित्र श्री प्रकाश मंगतानी, पुत्र पीयूष एवं पुत्री प्रज्ञा रश्मि का नाना प्रकारेण सहयोग मेरे अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने के बावजूद मेरे लिये नमनीय है । इनका स्नेह, आशीष एवं शुभकामनायें मेरी अंत शक्ति रही हैं। ग्रंथ मुद्रण में योगदान के लिए मैं विजय श्री प्रेस एवं श्री विजय कुमार गुप्ता के प्रति भी आभार प्रकट करती हूँ ।

 

विषय सूची

प्राक्कथन

1

विद्यापति परिचय एवं जीवन वृत्त, व्यक्तित्व, कृतित्व ।

1

2

नरसिंह मेहता परिचय एवं जीवन वृत्त, व्यक्तित्व, कृतित्व ।

32

3

तुलनात्मक काव्यानुशीलन

(अ) भावपक्ष

1

विद्यापति और नरसिंह मेहता की भक्ति भावना

69

2

विद्यापति और नरसिंह मेहता का श्रृंगार वर्णन

134

3

दर्शन ज्ञान की तीन कोटियाँ

245

4

लोकचेतना राजश्रित होते हुए भी जनकवि

275

5

वात्सल्य वर्णन देवकी की वात्सल्य पीड़ा

293

(ब) कलापक्ष

1

रस विवेचन रस सिद्धान्त की महत्ता

305

2

गेयता गीतिकाव्य, गीतिकाव्य परम्परा के प्रर्वतक विद्यापति और नरसिंह मेहता ।

324

3

भाषा शब्द शक्ति ।

349

4

अलंकार काव्य में अलंकार का महत्त्व, शब्दालंकार अनुप्रास, वक्रोक्ति, यमक, श्लेष ।

361

6

गुण विवेचन गुण दोनों कवियों के काव्य में गुण की स्थिति, माधुर्य गुण, ओज गुण, प्रसाद गुण ।

372

7

रीति विवेचन रीति, रीति की संख्या, विद्यापति तथा नरसिंह के काव्य में रीति, वैदर्भी, गौड़ी, पाँचाली, लाटी ।

379

परिशिष्ट

421

सहायक ग्रंथ सूची

423

 

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