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Books > Hindi > वैद्द सहचर: Vaidya Sahchar
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वैद्द सहचर: Vaidya Sahchar
वैद्द सहचर: Vaidya Sahchar
Description

भूमिका

आयुर्वेद औषधियों का भंडार है, इसमें-''जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ'' के अनुसार जो चिकित्सक प्रयत्न करते है वे इसके मर्म का अन्वेषण कर पाते हैं और जो हाथ पर हाथ रखे हुये केवल नुस्खे टटोलते है, वै अकृतकार्य होते हैं।

आज का युग अन्वेषण का युग है। यदि हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें और अपनी-प्राचीनता के गीत गाते रहें तो हम भविष्य की उत्रत पथावलम्बिनी मार्ग-श्रेणी से विरत रह जायेगें। हमारी प्रतिस्पर्धिनी चिकित्सा पद्धतियाँ जैसे आज अतुल परिश्रम धन व्यय द्वारा अध्यवसाय करके आगे बढ़ रही है, उनके सामने हमारी चिरकालिक उन्नत आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली घुडदौड़ में पीछे पड़ जायेंगी और सदियों तक के लिये आज की तरह का रोना ही हाथ रह जायगा। अस्तु तरुण वैद्य समाज के सामने यह प्रश्न स्वयं उठ खड़ा होता है कि अब भी निद्रा त्याग करना, मोहावेश में पड़ा रहना उचित है? कदापि नहीं। चिकित्सा-कार्य में प्रतिपद जिस कठिनाई का सामना करना पड़ता है, इसे चिकित्सक समुदाय भली-भाँति जानता है। हमारी औषधियाँ विश्व में ख्याति लाभ करके भी हमें वह सम्मति और सहयोग नहीं दे पातीं जो उनकी गुणावली में वर्णित है। इसका कारण यह नहीं कि उनकी गुणावली अतिशयोक्तिपूर्ण हैं वरन् यह हमारी अल्पज्ञता का सूचक है कि हम उनकी प्रयोग विधि का समुचित परिमार्जन करके निराश हो उठते हैं। हमारी अनुभव प्रणाली ने यह सन्देह किया है कि अत्युक्तिपूर्वक बल, काल, दोष, दूष्य और प्रकृति आदि बिना ध्यान दिये बड़ी-से-बड़ी औषधि का प्रयोग करने पर ब्रह्मास्र की भाँति अव्यर्थ सिद्ध होगी। अत: यह आवश्यक है कि इसका अनुकरण किया जावे।

आज का वैद्य-समाज कुप्रवृत्तियों का समूह वन गया है। कोई अल्पज्ञान प्राप्त कर वैद्य बन जाता है। तो कोई कुछ शीशियाँ रख कर अपने को चिकित्सक कहने लगता है। यदि पन्सारी अत्तारी काम करते है तो फिर अपने को वैद्य कहना स्वायत्त अधिकार समझते है और यदि प्रार्थना करके किसी गजटेड् ऑफिसर का प्रशंसापत्र पाकर रजिस्टर्ड हो गये तो अपने को प्राणाचार्य से कम नहीं समझते। दूसरी ओर विद्वान अनुभवी वैद्य अपने अनुभव भंडार का एक दाना भी देना हानिकारक समझते हैं। परिणाम यह होता है कि आज आयुर्वेद पर आक्षेप और नये-नये दोषारोपण किये जा रहे है। तथा हमारा वैद्य-समाज कर्णरन्ध्र बन्द करके यह सब चुपचाप सहन कर रहा है, किन्तु अब चुप रहने का अवसर समाप्त हो गया है हम विद्वान तथा कर्मशील तरुण वैद्य समाज का आवाहन करना कर्त्तव्य समझते हैं। जो आज अपने को वैद्य कहते हैं और वास्तव में वैद्य नहीं है, हम उन्हें वैद्य-समाज से पृथक करके वास्तव में समुचित वैद्य बनाने के पक्षपाती हैं यही नही, हमारी धारणा है कि यदि प्रयत्न किया जाय तो सारे संसार को वैद्य बनाया जा सकता है यह कठिन खर्य नहीं वरन् परिश्रम-साध्य हैं।

इसका एक ही मार्ग है और वह है चिकित्साशास्त्र के योगों पर पुन: नये सिरे से अन्वेषण कर उन्हें इस रूप में रख देना कि प्रत्येक साक्षर पुरुष उनको एक निश्चित रूप मे प्रयोग क्य समुचित लाभ उठा सके और आयुर्वेद फिर अपनी अतीत प्रतिभा को प्राप्त कर आगे बढ़ जाय तथा अन्य पंथियाँ पीछे रह जावें।

वैद्य बंधुओं! इसी उद्देश्य से आयुर्वेदिक औषधियों की आनुभविक प्रणाली को जो अब तक की चिकित्सा-साधना से प्राप्त हुई है-निष्कपटता से ''वैद्य सहचर'' के रूप में रखा था, सन्तोष का विषय है कि वैद्य समाज ने उसे अपनाया। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि पुस्तक का प्रथम संस्करण अल्पकाल ही में समाप्त हो गया। इसलिये पुन: मुझे इसका सुसंस्कृत और परिवर्धित संस्करण आपके सामने रखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इसमें पहले की अपेक्षा बहुत से विषय बढ़ाये गये है। रोग का साधारण परिचय, उसकी प्रत्येक अवस्था की अनुभूत चिकित्सा तथा उपद्रवों की समुचित शोधन उन्मूलन-प्रणाली का विवरण स्पष्ट दिया गया है यथा-ज्वर के अधिकार में ज्वर, पुराण ज्वर, विषम ज्वर, सत्रिपात ज्वर, आन्त्रज्वरादि की चिकित्सा तथा ज्वर में कास, श्वास, प्रलाप, अनिद्रा, वमन, हिचकी आदि उपद्रवों की चिकित्सा के क्रमश: अनुभूत योग संग्रह किये गये हैं, जिससे चिकित्सक को कष्ट उठाना पड़े साथ ही एक भी योग ऐसा नहीं है जो कि बिना प्रयोग किये हुए लिखा गया हो और केवल पुस्तक के कलेवर की वृद्धि के लिये प्रयत्न किया गया हो। इसमें जितना अनुभव जिस रोग पर किया गया है, वह उतना ही लिखा भी गया है जो योग सन्तोषप्रद नहीं पाये गये और फिर भी बहुत प्रसिद्ध योग है, उनका उल्लेख नहीं किया गया है।

प्रस्तुत पुस्तक का उद्देश्य साधारण वैद्य को चिकित्सा मार्ग में सफल चिकित्सक बनाना है। यह पुस्तक आयुर्वेदिक सुपरीक्षित योगों और उनके विधानों का संग्रह मात्र है तरुण वैद्य समाज के करों में इसका समर्पण करके हम इसके निमित्त प्रार्थी है कि वे इसका प्रयोग कर शतशः लाभ उठावें और ऐसे ही अनुभूत साहित्य को वैद्य समुदाय के सामने रखें जिससे आयुर्वेद की चिकित्सा- प्रणाली प्रकाशयुक्त होकर सर्वत्र अपनी सर्वतोमुखी प्राचीन ख्याति का लाभ करे

यद्यपि हमारी चिकित्सा पद्धति के त्रिदेव-वात, पित्त और कफ-बड़े ही विभु और अचिन्त्य है फिर भी उनका मनोयोगपूर्वक मनन उनके रहस्य का उद्घाटन करके उनके वास्तविक स्वरूप को बतला देता है इस विषय का वैज्ञानिक अध्ययन आप सरल स्पष्ट हिंदी भाषा में लेखक की ' 'त्रिदोषालोक' ' नामक प्रकाशित पुस्तक में पा सकते हैं चिकित्सा की कुञ्जी यद्यपि बिना अध्ययन और प्रत्यक्ष क्रिया-विज्ञान के समझ में नही प्राप्त होती, किन्तु उसका रहस्य यदि खोल दिया जाय तो समझने में कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता।

''वैद्य सहचर'' ऐसे ही रहस्य का भंडार है। आप इसे अवलोकन करें और प्रयोग करके लाभ उठावें। इसमें श्री ललित हरि आयुर्वेदिक कालेज, पीलीभीत में प्रयुक्त होने वाले ५० वर्षों के सुपरीक्षित और अव्यर्थ योगों का भी संग्रह है, जो शास्रीय होते हुए भी रामबाण की भाँति प्रभाव दिखलाते हैं। आपसे यही प्रार्थना है कि छोटे और साधारण योग देखकर उसे परित्याग करें अथवा एक रोगी पर ही प्रयोग करके उसे प्रसिद्ध समझें यह सहस्रों रोगियों पर प्रयोग करने के बाद का निर्णय है इसका विवरण इतना स्पष्ट है कि किसी उदाहरण की आवश्यकता नहीं जिस औषधि को अधिक मात्रा में प्रयोग करने पर हानि ज्ञात हुई है, उसके दर्पनाशक योगों का भी वर्णन दिया गया है जिसके अज्ञान से प्रयुक्त करके वैद्य किंकर्त्तव्यविमूढ़ होवे।

यह संभव नहीं कि प्रस्तुत पुस्तक में त्रुटियों का अभाव हो अत: अन्त में मैं विद्वान एवं ज्ञानवृद्ध वैद्यों से नम्र निवेदन करता हूँ कि वे इसमें जो त्रुटि पावें, उसके लिये मुझे सूचित करते रहें जिससे अगले संस्करण में उसका संशोधन हो जाय।

अन्त में, मैं अपने प्रिय बन्धु प्रोफेसर पं. देवीशंकर मिश्र ''अमर'' एम.एस-सी., सभापति हिन्दी साहित्य परिषद पीलीभीत को हार्दिक धन्यवाद देना अपना परम कर्त्तव्य समझता हूँ जिनके .' ही उद्योग से वैद्य सहचर का द्वितीय संस्करण इतनी शीघ्रता के साथ पाठकों की सेवा में भेजने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है

चैत्र शुक्ल , १९७८ - विश्वनाथ द्विवेदी चतुर्थ सस्करण की भूमिका

भगवान धन्वन्तरि की असीम कृपा से वैद्य-सहचर का तृतीय संस्करण बिना किसी विज्ञापन के ही हाथों-हाथ बिक गया। इससे पुस्तक की उपादेयता का ज्ञान स्पष्ट मालूम पड़ता है वैद्य समाज ने इसे अपनाया और स्वागत किया, जो लेखक के उत्साह को परिवर्धित करता है इस बार चतुर्थ संस्करण विशेष संशोधन परिवर्धन सहित प्रकाशित किया गया है, कुछ नये रोगों के ऊपर प्रकाश डाला गया है तथा कुछ नये योग सम्मिश्रित किये गये हैं आयुर्वेद के साहित्य में ऐसी पुस्तकों की आवश्यकता हें तथा यह पुस्तक पढ़ने के बाद शेष रोगों पर भी अनुभूत चिकित्सा लिखने की प्रेरणा वैद्य समाज की तरफ से आयी है समय प्राप्त होते ही इसका दूसरा भाग भी प्रकाशित होगा।

आशा है, वैद्य समाज पुन: इसे अपनाकर इसकी उपादेयता का परिचय देगा। -विश्वनाथ द्विवेद- पंचम आवृत्ति की भूमिका आज पाठकों के समक्ष वैद्य सहचर की पंचम आवृत्ति का साहित्य रखते हुए प्रसन्नता होती है। इस आवृत्ति मे कई नवीन विषयों का समावेश किया गया है। इसमें कई वर्ष के अनुभवो का संक्षिप्त विवरण इसमें समाविष्ट है।

यथा-मधुमेह की आनुभविक चिकित्सा और उस पर किये गये अन्वेषणों का, आधुनिक औषधियो में क्लोरोमाइसिन, स्ट्रेप्टोमाइसिन, पेनीसिलीन आदि के दुष्प्रभाव की चिकित्सा का इसमें समावेश है।

बहुत से रोग जो:कि अनुभव की कमी के कारण छूट गये थे। उन सभी का यथा अनुभव इसमे समावेश है। यथा-ज्वर को उतारने के योग, कम तापमान को रोकने के उपाय, अतिसार में ग्राही कर्म अर्थात् मल बाँधने वाले योग, वात व्याधि, आमवात में अनुभव पूर्ण विचार इत्यादि १०० पृष्ठ का सामान-साधन इसमें जुड़ा हुआ है। आजकल नये-नये अन्वेषण हो रहे है। आयुर्वेद में भी केन्द्रीय कौन्सिल ने तथा फार्माकोपिया कमेटी ने कई महत्वपूर्ण अन्वेषण किये हैं, उन पर भी प्रयोग करके योग दिये गये है। मैं बारह वर्ष तक जामनगर के केन्द्रीय अन्वेषणशाला के सपर्क में रहा हूँ, कई वर्ष तक उस संस्था का निर्देशक भी रहा हूँ। इस काल मे अपने आप जो भी सदौषधि योगों का अन्वेषण स्वयं किया है, उनका सारांश भी यहाँ पर दिया गया है।

यह तो निश्चित है कि इसमें की जितनी भी औषधियाँ है कई बार परीक्षा करके तब लिखी गयी है और निश्चित कार्यकर है इसका चतुर्थ संस्करण कुछ वर्ष पूर्व ही समाप्त हो गया था, किन्तु आलस्य और छपाने की असमर्थता के कारण हम इसका अग्रिम संस्करण नहीं निकाल सके। आज हर्षपूर्वक कहा जा सकता है कि बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन के अधिष्ठाता श्री वैद्य रामनारायण' जी के आग्रह से यह कार्य सरल हुआ है। आयुर्वेद के क्षेत्र में बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन का कार्य सदा ही साहाय्यप्रद रहा है। अत: आपने जब इसके योग देखे तो बड़ी प्रसन्नता से इसको छपाने की आज्ञा दे दी। पहले हमने इसे स्वयं ही छपवाया था और बिना किसी विज्ञापन के चार संस्करण प्रसारित हो चुके थे। इसके संबंध की बड़ी माँग थी कि इसका दूसरा भाग भी प्रकाशित हो, किन्तु जिनका प्रयोग हमने स्वयं नही किया है, उनको लेने में विवश था। अंतरात्मा की प्रेरणा होती थी कि इसका कलेवर व्यर्थ बढ़ा दूँ। आयुर्वेद के प्रति अपनी आज तक की सेवा में जो हुआ है, वह आपके सामने है। इसका प्रयोग कीजिए और लाभ उठाइये।

प्रयोग निश्चित है अत: लिखे कम से ही प्रयोग करें सुविधार्थ इसमें का नया अनुभव द्वितीय खण्ड के रूप में पृथक ही दिया जाता है आशा है कि वैद्यजगत् इसका समादर करेगा। वैद्य जी ने यह भी सम्मति दी थी कि एकैक औषधियों के योग अवश्य रखें आज के रोगों का भी परिमार्जन के आनुभविक ज्ञान का समावेश रहना चाहिये, क्योंकि आज औषधियों के मूल्य में भारी वृद्धि हो चुकी है और जनता उसे खरीदने में असमर्थ हो रही है लाभ होने से आयुर्वेद के प्रति और भी निराशा की वृद्धि हो रही है अत: एकैक औषधियों के योग अवश्य ही ऐसे हों जो कि समुचित लाभप्रद हों यथा-गैस बढ़ने की दवा, आध्मान की दवा, पाचन की कमी, मसोस की दवा आदि यह रोग सामयिक है और इनकी वृद्धि दिन--दिन मानव की तृष्णा, आकांक्षा, आधुनिकता की नकल सामाजिक प्राणी बनने की चेष्टा, सामान्य रोग होने पर भी सुई लेना और' रोग की जड़ जमाते जाना और रोग का शिकार होना-यह सब कई कृत्रिम रोग की सृष्टि कर रहे हैं। अत: जनता के रक्षार्थ योगों का समावेश होना चाहिए। इस विषय का निर्वाह यथाक्रम में किया गया है

पाठक स्वयं इसका साहित्य देख कर प्रयोग करके अपना विचार प्रकट करें।

प्रकाशकीय निवेदन

प्रस्तुत पुस्तक ''वैद्य सहचर'' के लेखक श्रीयुत आचार्य विश्वनाथ जी द्विवेदी जामनगर आयुर्वेद शोधसंस्था के सफल संचालक रहे तथा वर्तमान समय में वाराणसी में आयुर्वेदीय शोध कार्यों का संचालन कर रहे हैं। आप औषधि विज्ञान के पूर्ण ज्ञाता और अधिकारी लेखक है। आपका लिखा हुआ प्रसिद्ध ग्रन्थ ''औषधि विज्ञानशास्र'' कुछ ही समय पहले बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन द्वारा प्रकाशित किया गया है आयुर्वेद के चिकित्सकों, औषधि निर्माताओं, विक्रेताओं, अध्यापकों एवं विद्वान् वैद्यों ने इस ग्रन्थ की बहुत प्रशंसा की है।

इन्हीं श्री विश्वनाथ जी द्विवेदी का यह ''वैद्य सहचर'' नामक ग्रन्थ लगभग १० वर्ष से अप्राप्य था। उनकी यह पुस्तक बिना किसी विज्ञापन तथा प्रचार के इतनी लोकप्रिय हुई कि अल्प समय में ही इसके चार संस्करण निकल गये। बाद में यह पुस्तक वैद्यों द्वारा बहुत दिनों से पांगी जा रही थी मैंने आग्रह करके श्री द्विवेदी से इस पुस्तक का संशोधित संस्करण तैयार कराया। श्री द्विवेदी जी ने पिछले १० वर्षों में जो नये अनुभव प्राप्त किये, उन सबको इस पुस्तक में सम्मिलित किया तथा नई विधि से पुस्तक को फिर से लिखा है। अब यह पुस्तक बिस्कुल नये रूप में आप लोगों के सामने प्रस्तुत हैं।

यद्यपि प्रकाशन का खर्च बहुत बढ़ गया है तो भी आयुर्वेद जगत की सेवा की भावना से इस पुस्तक का मूल्य लागत-मात्र रखा गया है। बैद्यनाथ के अन्य सभी प्रकाशन इसी भावना से आयुर्वेद की समृद्धि के लिए कम से कम मूल्य पर प्रकाशित किये गये है।

आशा है वैद्य बन्धु इससे लाभान्वित होंगे तथा यह अनुभव करेंगे कि आचार्य श्री यादवजी महाराज के सिद्धयोग संग्रह की भाँति यह ग्रन्थ भी बहुत मूल्यवान है।

वैद्द सहचर: Vaidya Sahchar

Item Code:
NZA788
Cover:
Paperback
Edition:
2013
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
182
Other Details:
Weight of the Book:170 gms
Price:
$12.00   Shipping Free
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भूमिका

आयुर्वेद औषधियों का भंडार है, इसमें-''जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ'' के अनुसार जो चिकित्सक प्रयत्न करते है वे इसके मर्म का अन्वेषण कर पाते हैं और जो हाथ पर हाथ रखे हुये केवल नुस्खे टटोलते है, वै अकृतकार्य होते हैं।

आज का युग अन्वेषण का युग है। यदि हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें और अपनी-प्राचीनता के गीत गाते रहें तो हम भविष्य की उत्रत पथावलम्बिनी मार्ग-श्रेणी से विरत रह जायेगें। हमारी प्रतिस्पर्धिनी चिकित्सा पद्धतियाँ जैसे आज अतुल परिश्रम धन व्यय द्वारा अध्यवसाय करके आगे बढ़ रही है, उनके सामने हमारी चिरकालिक उन्नत आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली घुडदौड़ में पीछे पड़ जायेंगी और सदियों तक के लिये आज की तरह का रोना ही हाथ रह जायगा। अस्तु तरुण वैद्य समाज के सामने यह प्रश्न स्वयं उठ खड़ा होता है कि अब भी निद्रा त्याग करना, मोहावेश में पड़ा रहना उचित है? कदापि नहीं। चिकित्सा-कार्य में प्रतिपद जिस कठिनाई का सामना करना पड़ता है, इसे चिकित्सक समुदाय भली-भाँति जानता है। हमारी औषधियाँ विश्व में ख्याति लाभ करके भी हमें वह सम्मति और सहयोग नहीं दे पातीं जो उनकी गुणावली में वर्णित है। इसका कारण यह नहीं कि उनकी गुणावली अतिशयोक्तिपूर्ण हैं वरन् यह हमारी अल्पज्ञता का सूचक है कि हम उनकी प्रयोग विधि का समुचित परिमार्जन करके निराश हो उठते हैं। हमारी अनुभव प्रणाली ने यह सन्देह किया है कि अत्युक्तिपूर्वक बल, काल, दोष, दूष्य और प्रकृति आदि बिना ध्यान दिये बड़ी-से-बड़ी औषधि का प्रयोग करने पर ब्रह्मास्र की भाँति अव्यर्थ सिद्ध होगी। अत: यह आवश्यक है कि इसका अनुकरण किया जावे।

आज का वैद्य-समाज कुप्रवृत्तियों का समूह वन गया है। कोई अल्पज्ञान प्राप्त कर वैद्य बन जाता है। तो कोई कुछ शीशियाँ रख कर अपने को चिकित्सक कहने लगता है। यदि पन्सारी अत्तारी काम करते है तो फिर अपने को वैद्य कहना स्वायत्त अधिकार समझते है और यदि प्रार्थना करके किसी गजटेड् ऑफिसर का प्रशंसापत्र पाकर रजिस्टर्ड हो गये तो अपने को प्राणाचार्य से कम नहीं समझते। दूसरी ओर विद्वान अनुभवी वैद्य अपने अनुभव भंडार का एक दाना भी देना हानिकारक समझते हैं। परिणाम यह होता है कि आज आयुर्वेद पर आक्षेप और नये-नये दोषारोपण किये जा रहे है। तथा हमारा वैद्य-समाज कर्णरन्ध्र बन्द करके यह सब चुपचाप सहन कर रहा है, किन्तु अब चुप रहने का अवसर समाप्त हो गया है हम विद्वान तथा कर्मशील तरुण वैद्य समाज का आवाहन करना कर्त्तव्य समझते हैं। जो आज अपने को वैद्य कहते हैं और वास्तव में वैद्य नहीं है, हम उन्हें वैद्य-समाज से पृथक करके वास्तव में समुचित वैद्य बनाने के पक्षपाती हैं यही नही, हमारी धारणा है कि यदि प्रयत्न किया जाय तो सारे संसार को वैद्य बनाया जा सकता है यह कठिन खर्य नहीं वरन् परिश्रम-साध्य हैं।

इसका एक ही मार्ग है और वह है चिकित्साशास्त्र के योगों पर पुन: नये सिरे से अन्वेषण कर उन्हें इस रूप में रख देना कि प्रत्येक साक्षर पुरुष उनको एक निश्चित रूप मे प्रयोग क्य समुचित लाभ उठा सके और आयुर्वेद फिर अपनी अतीत प्रतिभा को प्राप्त कर आगे बढ़ जाय तथा अन्य पंथियाँ पीछे रह जावें।

वैद्य बंधुओं! इसी उद्देश्य से आयुर्वेदिक औषधियों की आनुभविक प्रणाली को जो अब तक की चिकित्सा-साधना से प्राप्त हुई है-निष्कपटता से ''वैद्य सहचर'' के रूप में रखा था, सन्तोष का विषय है कि वैद्य समाज ने उसे अपनाया। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि पुस्तक का प्रथम संस्करण अल्पकाल ही में समाप्त हो गया। इसलिये पुन: मुझे इसका सुसंस्कृत और परिवर्धित संस्करण आपके सामने रखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इसमें पहले की अपेक्षा बहुत से विषय बढ़ाये गये है। रोग का साधारण परिचय, उसकी प्रत्येक अवस्था की अनुभूत चिकित्सा तथा उपद्रवों की समुचित शोधन उन्मूलन-प्रणाली का विवरण स्पष्ट दिया गया है यथा-ज्वर के अधिकार में ज्वर, पुराण ज्वर, विषम ज्वर, सत्रिपात ज्वर, आन्त्रज्वरादि की चिकित्सा तथा ज्वर में कास, श्वास, प्रलाप, अनिद्रा, वमन, हिचकी आदि उपद्रवों की चिकित्सा के क्रमश: अनुभूत योग संग्रह किये गये हैं, जिससे चिकित्सक को कष्ट उठाना पड़े साथ ही एक भी योग ऐसा नहीं है जो कि बिना प्रयोग किये हुए लिखा गया हो और केवल पुस्तक के कलेवर की वृद्धि के लिये प्रयत्न किया गया हो। इसमें जितना अनुभव जिस रोग पर किया गया है, वह उतना ही लिखा भी गया है जो योग सन्तोषप्रद नहीं पाये गये और फिर भी बहुत प्रसिद्ध योग है, उनका उल्लेख नहीं किया गया है।

प्रस्तुत पुस्तक का उद्देश्य साधारण वैद्य को चिकित्सा मार्ग में सफल चिकित्सक बनाना है। यह पुस्तक आयुर्वेदिक सुपरीक्षित योगों और उनके विधानों का संग्रह मात्र है तरुण वैद्य समाज के करों में इसका समर्पण करके हम इसके निमित्त प्रार्थी है कि वे इसका प्रयोग कर शतशः लाभ उठावें और ऐसे ही अनुभूत साहित्य को वैद्य समुदाय के सामने रखें जिससे आयुर्वेद की चिकित्सा- प्रणाली प्रकाशयुक्त होकर सर्वत्र अपनी सर्वतोमुखी प्राचीन ख्याति का लाभ करे

यद्यपि हमारी चिकित्सा पद्धति के त्रिदेव-वात, पित्त और कफ-बड़े ही विभु और अचिन्त्य है फिर भी उनका मनोयोगपूर्वक मनन उनके रहस्य का उद्घाटन करके उनके वास्तविक स्वरूप को बतला देता है इस विषय का वैज्ञानिक अध्ययन आप सरल स्पष्ट हिंदी भाषा में लेखक की ' 'त्रिदोषालोक' ' नामक प्रकाशित पुस्तक में पा सकते हैं चिकित्सा की कुञ्जी यद्यपि बिना अध्ययन और प्रत्यक्ष क्रिया-विज्ञान के समझ में नही प्राप्त होती, किन्तु उसका रहस्य यदि खोल दिया जाय तो समझने में कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता।

''वैद्य सहचर'' ऐसे ही रहस्य का भंडार है। आप इसे अवलोकन करें और प्रयोग करके लाभ उठावें। इसमें श्री ललित हरि आयुर्वेदिक कालेज, पीलीभीत में प्रयुक्त होने वाले ५० वर्षों के सुपरीक्षित और अव्यर्थ योगों का भी संग्रह है, जो शास्रीय होते हुए भी रामबाण की भाँति प्रभाव दिखलाते हैं। आपसे यही प्रार्थना है कि छोटे और साधारण योग देखकर उसे परित्याग करें अथवा एक रोगी पर ही प्रयोग करके उसे प्रसिद्ध समझें यह सहस्रों रोगियों पर प्रयोग करने के बाद का निर्णय है इसका विवरण इतना स्पष्ट है कि किसी उदाहरण की आवश्यकता नहीं जिस औषधि को अधिक मात्रा में प्रयोग करने पर हानि ज्ञात हुई है, उसके दर्पनाशक योगों का भी वर्णन दिया गया है जिसके अज्ञान से प्रयुक्त करके वैद्य किंकर्त्तव्यविमूढ़ होवे।

यह संभव नहीं कि प्रस्तुत पुस्तक में त्रुटियों का अभाव हो अत: अन्त में मैं विद्वान एवं ज्ञानवृद्ध वैद्यों से नम्र निवेदन करता हूँ कि वे इसमें जो त्रुटि पावें, उसके लिये मुझे सूचित करते रहें जिससे अगले संस्करण में उसका संशोधन हो जाय।

अन्त में, मैं अपने प्रिय बन्धु प्रोफेसर पं. देवीशंकर मिश्र ''अमर'' एम.एस-सी., सभापति हिन्दी साहित्य परिषद पीलीभीत को हार्दिक धन्यवाद देना अपना परम कर्त्तव्य समझता हूँ जिनके .' ही उद्योग से वैद्य सहचर का द्वितीय संस्करण इतनी शीघ्रता के साथ पाठकों की सेवा में भेजने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है

चैत्र शुक्ल , १९७८ - विश्वनाथ द्विवेदी चतुर्थ सस्करण की भूमिका

भगवान धन्वन्तरि की असीम कृपा से वैद्य-सहचर का तृतीय संस्करण बिना किसी विज्ञापन के ही हाथों-हाथ बिक गया। इससे पुस्तक की उपादेयता का ज्ञान स्पष्ट मालूम पड़ता है वैद्य समाज ने इसे अपनाया और स्वागत किया, जो लेखक के उत्साह को परिवर्धित करता है इस बार चतुर्थ संस्करण विशेष संशोधन परिवर्धन सहित प्रकाशित किया गया है, कुछ नये रोगों के ऊपर प्रकाश डाला गया है तथा कुछ नये योग सम्मिश्रित किये गये हैं आयुर्वेद के साहित्य में ऐसी पुस्तकों की आवश्यकता हें तथा यह पुस्तक पढ़ने के बाद शेष रोगों पर भी अनुभूत चिकित्सा लिखने की प्रेरणा वैद्य समाज की तरफ से आयी है समय प्राप्त होते ही इसका दूसरा भाग भी प्रकाशित होगा।

आशा है, वैद्य समाज पुन: इसे अपनाकर इसकी उपादेयता का परिचय देगा। -विश्वनाथ द्विवेद- पंचम आवृत्ति की भूमिका आज पाठकों के समक्ष वैद्य सहचर की पंचम आवृत्ति का साहित्य रखते हुए प्रसन्नता होती है। इस आवृत्ति मे कई नवीन विषयों का समावेश किया गया है। इसमें कई वर्ष के अनुभवो का संक्षिप्त विवरण इसमें समाविष्ट है।

यथा-मधुमेह की आनुभविक चिकित्सा और उस पर किये गये अन्वेषणों का, आधुनिक औषधियो में क्लोरोमाइसिन, स्ट्रेप्टोमाइसिन, पेनीसिलीन आदि के दुष्प्रभाव की चिकित्सा का इसमें समावेश है।

बहुत से रोग जो:कि अनुभव की कमी के कारण छूट गये थे। उन सभी का यथा अनुभव इसमे समावेश है। यथा-ज्वर को उतारने के योग, कम तापमान को रोकने के उपाय, अतिसार में ग्राही कर्म अर्थात् मल बाँधने वाले योग, वात व्याधि, आमवात में अनुभव पूर्ण विचार इत्यादि १०० पृष्ठ का सामान-साधन इसमें जुड़ा हुआ है। आजकल नये-नये अन्वेषण हो रहे है। आयुर्वेद में भी केन्द्रीय कौन्सिल ने तथा फार्माकोपिया कमेटी ने कई महत्वपूर्ण अन्वेषण किये हैं, उन पर भी प्रयोग करके योग दिये गये है। मैं बारह वर्ष तक जामनगर के केन्द्रीय अन्वेषणशाला के सपर्क में रहा हूँ, कई वर्ष तक उस संस्था का निर्देशक भी रहा हूँ। इस काल मे अपने आप जो भी सदौषधि योगों का अन्वेषण स्वयं किया है, उनका सारांश भी यहाँ पर दिया गया है।

यह तो निश्चित है कि इसमें की जितनी भी औषधियाँ है कई बार परीक्षा करके तब लिखी गयी है और निश्चित कार्यकर है इसका चतुर्थ संस्करण कुछ वर्ष पूर्व ही समाप्त हो गया था, किन्तु आलस्य और छपाने की असमर्थता के कारण हम इसका अग्रिम संस्करण नहीं निकाल सके। आज हर्षपूर्वक कहा जा सकता है कि बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन के अधिष्ठाता श्री वैद्य रामनारायण' जी के आग्रह से यह कार्य सरल हुआ है। आयुर्वेद के क्षेत्र में बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन का कार्य सदा ही साहाय्यप्रद रहा है। अत: आपने जब इसके योग देखे तो बड़ी प्रसन्नता से इसको छपाने की आज्ञा दे दी। पहले हमने इसे स्वयं ही छपवाया था और बिना किसी विज्ञापन के चार संस्करण प्रसारित हो चुके थे। इसके संबंध की बड़ी माँग थी कि इसका दूसरा भाग भी प्रकाशित हो, किन्तु जिनका प्रयोग हमने स्वयं नही किया है, उनको लेने में विवश था। अंतरात्मा की प्रेरणा होती थी कि इसका कलेवर व्यर्थ बढ़ा दूँ। आयुर्वेद के प्रति अपनी आज तक की सेवा में जो हुआ है, वह आपके सामने है। इसका प्रयोग कीजिए और लाभ उठाइये।

प्रयोग निश्चित है अत: लिखे कम से ही प्रयोग करें सुविधार्थ इसमें का नया अनुभव द्वितीय खण्ड के रूप में पृथक ही दिया जाता है आशा है कि वैद्यजगत् इसका समादर करेगा। वैद्य जी ने यह भी सम्मति दी थी कि एकैक औषधियों के योग अवश्य रखें आज के रोगों का भी परिमार्जन के आनुभविक ज्ञान का समावेश रहना चाहिये, क्योंकि आज औषधियों के मूल्य में भारी वृद्धि हो चुकी है और जनता उसे खरीदने में असमर्थ हो रही है लाभ होने से आयुर्वेद के प्रति और भी निराशा की वृद्धि हो रही है अत: एकैक औषधियों के योग अवश्य ही ऐसे हों जो कि समुचित लाभप्रद हों यथा-गैस बढ़ने की दवा, आध्मान की दवा, पाचन की कमी, मसोस की दवा आदि यह रोग सामयिक है और इनकी वृद्धि दिन--दिन मानव की तृष्णा, आकांक्षा, आधुनिकता की नकल सामाजिक प्राणी बनने की चेष्टा, सामान्य रोग होने पर भी सुई लेना और' रोग की जड़ जमाते जाना और रोग का शिकार होना-यह सब कई कृत्रिम रोग की सृष्टि कर रहे हैं। अत: जनता के रक्षार्थ योगों का समावेश होना चाहिए। इस विषय का निर्वाह यथाक्रम में किया गया है

पाठक स्वयं इसका साहित्य देख कर प्रयोग करके अपना विचार प्रकट करें।

प्रकाशकीय निवेदन

प्रस्तुत पुस्तक ''वैद्य सहचर'' के लेखक श्रीयुत आचार्य विश्वनाथ जी द्विवेदी जामनगर आयुर्वेद शोधसंस्था के सफल संचालक रहे तथा वर्तमान समय में वाराणसी में आयुर्वेदीय शोध कार्यों का संचालन कर रहे हैं। आप औषधि विज्ञान के पूर्ण ज्ञाता और अधिकारी लेखक है। आपका लिखा हुआ प्रसिद्ध ग्रन्थ ''औषधि विज्ञानशास्र'' कुछ ही समय पहले बैद्यनाथ आयुर्वेद भवन द्वारा प्रकाशित किया गया है आयुर्वेद के चिकित्सकों, औषधि निर्माताओं, विक्रेताओं, अध्यापकों एवं विद्वान् वैद्यों ने इस ग्रन्थ की बहुत प्रशंसा की है।

इन्हीं श्री विश्वनाथ जी द्विवेदी का यह ''वैद्य सहचर'' नामक ग्रन्थ लगभग १० वर्ष से अप्राप्य था। उनकी यह पुस्तक बिना किसी विज्ञापन तथा प्रचार के इतनी लोकप्रिय हुई कि अल्प समय में ही इसके चार संस्करण निकल गये। बाद में यह पुस्तक वैद्यों द्वारा बहुत दिनों से पांगी जा रही थी मैंने आग्रह करके श्री द्विवेदी से इस पुस्तक का संशोधित संस्करण तैयार कराया। श्री द्विवेदी जी ने पिछले १० वर्षों में जो नये अनुभव प्राप्त किये, उन सबको इस पुस्तक में सम्मिलित किया तथा नई विधि से पुस्तक को फिर से लिखा है। अब यह पुस्तक बिस्कुल नये रूप में आप लोगों के सामने प्रस्तुत हैं।

यद्यपि प्रकाशन का खर्च बहुत बढ़ गया है तो भी आयुर्वेद जगत की सेवा की भावना से इस पुस्तक का मूल्य लागत-मात्र रखा गया