Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Your Cart (0)
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Hindi > विध्दशालभञ्जिका (संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद) - Viddhasalabhanjika of Rajasekhara
Displaying 1271 of 11129         Previous  |  NextSubscribe to our newsletter and discounts
विध्दशालभञ्जिका (संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद) -  Viddhasalabhanjika of  Rajasekhara
Pages from the book
विध्दशालभञ्जिका (संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद) - Viddhasalabhanjika of Rajasekhara
Look Inside the Book
Description

भूमिका

काव्य दृश्य एवं श्रव्य

संस्कृत अलंकारशास्त्रियों में वामन सर्वप्रथम एवं अग्रगण्य है जिन्होंने अन्थ-रचना में रूपक (दृश्यकाव्य) को श्रेष्ठ माना है। अपने में पूर्ण होने से चित्र की तरह रूपक आश्रर्यजनक होता है। चित्रवत्ता के कारण ही दृश्यकाव्य श्रेष्ठ है। यह रूपक ही है जिससे कथा, अख्यायिका एवं महाकाव्य आदि नियत है'

रूपक अपने में पूर्ण है, आख्यायिका और महाकाव्य आदि इसी के रूप परिवर्तन हैं । रूपकों को अधिक श्रेय देने का वामन ने एक ही कारण दिया है । रूपक प्रत्येक वस्तु में वर्तमान रहने से पूर्ण है, अत: रूपक चित्र के समान विचित्र है । परन्तु रूपक का चित्र के साथ तुलना करने में क्या महत्त्व है? विशेष साकल्य का क्या अर्थ है? इसको वामन ने समझाने का प्रयत्न नहीं किया है। वे विशेषताएँ क्या है, जो महाकाव्य एवं आख्यायिका आदि में नहीं प्राप्त होतीं, परन्तु जो रूपक में वर्तमान हैं, इन सब प्रश्नों कों वामन ने विस्तृत रूप में समझाने का अल्प प्रयास भी नहीं किया है।

वामन के मत का अनुसरण करते हुए सस्कृत साहित्य एवं दर्शन के प्रौढ़ विद्वान एवं आलोचक अभिनवगुप्ता ने नाटक को रसास्वाद की दृष्टि से अन्य की अपेक्षा पूर्ण माना है । अभिनवगुप्त का कथन है कि जहां तक रस के आनन्द कार-रसास्वाद का-सम्बन्ध है, मुक्तक में उतना आनन्द नहीं आता हे, क्योंकि विभाव एवं अनुभाव आदि का वर्णन इसमें नहीं होता है । अत: एक पूर्ण प्रबन्ध में ही सम्यक् रूप से रसास्वाद की प्राप्ति सम्भव है । ब्रह्मानन्द स्वाद सहोदर रस का आनन्द प्रबन्ध काव्य की अपेक्षा नाटक से ही होता है, वह चम मज पर प्रस्तुत किया जाता है'। वेष-भूषा, चाल-ढाल और प्रवृत्ति आदि का काव्य मे, केबल वर्णन मात्र होता है। परन्तु नाटक में सामाजिक प्रत्यक्ष रूप से इन सबको चक्षु इन्द्रियों से देखता है। अत: रसास्वाद का अन्तिम उत्कर्ष नाटक से ही प्राप्त होता है । नाटक की अपेक्षा कम रसास्वाद महान काव्य से प्राप्त होता है । सबसे कम रसास्वाद मुक्तक से होता हैं।

यद्यपि अभिनवगुप्त ने भाषा, वेष आदि की प्रत्यक्षता के कारण दृश्य का अविलम्ब प्रभाव स्वीकार किया है, फिर भी श्रव्यकाव्य में इसकी योजना का अभाव प्रमाणित नहीं होता है । अभिनवगुप्त ने स्पष्टरूप से इस बात का उल्लेख किया है कि काव्यानुभूति सहृदय से सम्बन्धित है। सहृदय ने यदि काव्य का अनुशीलन कर लिया है, जिसके कुछ प्राक्तन संस्कार है तो भाव आदि के उन्मीलन के द्वारा काव्य के विषय का साक्षात्कार किया जा सकता है । इने का सारांश यह है कि यदि दृश्यकाव्य समस्त बातों को प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित कर देता है तो श्रकाव्य में इसकी उपस्थिति के लिए सहृदय की कल्पना अपेक्षित है।

अभिनवगुप्त के बाद 'श्रृंगार प्रकाश' और 'सरस्वतीकण्ठाभरण' के रचयिता भोज ने कवि और काव्य को नट और अभिनय की अपेक्षा उच्च स्थान प्रदान किया है । भोज ने अपने ग्रन्थ के प्रारम्भ से ही इस बात का उल्लेख किया है कि रसास्वादन सामाजिक व श्रोतागण के द्वारा तभी किया जाता है, जब वहएक प्रवीण नट के द्वारा अभिनीत होता है या प्रबन्ध काव्य में महाकवि के द्वारा वर्णित होता है । किसी पदार्थ के श्रवण मात्र से जितना आनन्द आता है, उतना उस पदार्थ के साक्षात्कार करने पर नहीं । इसीलिये भोज ने कवि को नट की अपेक्षा उच्च स्थान प्रदान किया है एवं काव्य को अभिनय की अपेक्षा 'अधिक महत्व दिया है'

संस्कृत अलंकारशास्त्र में नाटककार के लिए अन्य शब्द नहीं प्रयुक्त होता। है। नाटककार को भी कवि ही कहा जाता है। नाटक को भी 'काव्य' ही नाम से सम्बोधित करते हैं। भोज का यहाँ यह कथन कि कवि और काव्य को नट एवं अभिनय की अपेक्षा अधिक महत्त्व देना चाहिए, अभिनवगुप्त के मत से सूक्ष्म विरोध प्रकट करता है । भोज के अनुसार नाटयकार कवि का, जिसने रस के आनन्द के लिए काव्य लिखा है-जिसमें आनन्द प्राप्त करने के लिए नट के योग की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती, नट की अपेक्षा विशेष महत्व है-जो (नट) रङ्गमत्र पर सामाजिक के समक्ष अभिनयों के द्वारा उसे अभिनीत करता है । यहाँ काव्य का तात्पर्य नाटय की पाम पुस्तक से है। नाटक को दृश्य काव्य की भी संज्ञा दी गई है । नाटक का जब तक रंगमंच पर प्रदर्शन नहीं किया जाता है-जब नाटक के अध्ययन से ही आनन्द की प्राप्ति होती है, तब न नाटक काव्य ही कहा जाया करता है । भोज ने कवि और काव्य का जो प्रयोग किया है, वह नाटककार और उसके 'नाटक' के लिए ही है । भोज इन्हीं को नट और उसके अभिनयों की अपेक्षा विशेष महत्व देते हैं।

Sample Page


विध्दशालभञ्जिका (संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद) - Viddhasalabhanjika of Rajasekhara

Item Code:
NZB170
Cover:
Paperback
Edition:
1991
Language:
Sanskrit Text with Hindi Translation
Size:
7.0 inch X 5.0 inch
Pages:
132
Other Details:
Weight of the Book: 100 gms
Price:
$10.00   Shipping Free
Look Inside the Book
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
विध्दशालभञ्जिका (संस्कृत एवं हिंदी अनुवाद) -  Viddhasalabhanjika of  Rajasekhara

Verify the characters on the left

From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 1660 times since 1st Mar, 2017

भूमिका

काव्य दृश्य एवं श्रव्य

संस्कृत अलंकारशास्त्रियों में वामन सर्वप्रथम एवं अग्रगण्य है जिन्होंने अन्थ-रचना में रूपक (दृश्यकाव्य) को श्रेष्ठ माना है। अपने में पूर्ण होने से चित्र की तरह रूपक आश्रर्यजनक होता है। चित्रवत्ता के कारण ही दृश्यकाव्य श्रेष्ठ है। यह रूपक ही है जिससे कथा, अख्यायिका एवं महाकाव्य आदि नियत है'

रूपक अपने में पूर्ण है, आख्यायिका और महाकाव्य आदि इसी के रूप परिवर्तन हैं । रूपकों को अधिक श्रेय देने का वामन ने एक ही कारण दिया है । रूपक प्रत्येक वस्तु में वर्तमान रहने से पूर्ण है, अत: रूपक चित्र के समान विचित्र है । परन्तु रूपक का चित्र के साथ तुलना करने में क्या महत्त्व है? विशेष साकल्य का क्या अर्थ है? इसको वामन ने समझाने का प्रयत्न नहीं किया है। वे विशेषताएँ क्या है, जो महाकाव्य एवं आख्यायिका आदि में नहीं प्राप्त होतीं, परन्तु जो रूपक में वर्तमान हैं, इन सब प्रश्नों कों वामन ने विस्तृत रूप में समझाने का अल्प प्रयास भी नहीं किया है।

वामन के मत का अनुसरण करते हुए सस्कृत साहित्य एवं दर्शन के प्रौढ़ विद्वान एवं आलोचक अभिनवगुप्ता ने नाटक को रसास्वाद की दृष्टि से अन्य की अपेक्षा पूर्ण माना है । अभिनवगुप्त का कथन है कि जहां तक रस के आनन्द कार-रसास्वाद का-सम्बन्ध है, मुक्तक में उतना आनन्द नहीं आता हे, क्योंकि विभाव एवं अनुभाव आदि का वर्णन इसमें नहीं होता है । अत: एक पूर्ण प्रबन्ध में ही सम्यक् रूप से रसास्वाद की प्राप्ति सम्भव है । ब्रह्मानन्द स्वाद सहोदर रस का आनन्द प्रबन्ध काव्य की अपेक्षा नाटक से ही होता है, वह चम मज पर प्रस्तुत किया जाता है'। वेष-भूषा, चाल-ढाल और प्रवृत्ति आदि का काव्य मे, केबल वर्णन मात्र होता है। परन्तु नाटक में सामाजिक प्रत्यक्ष रूप से इन सबको चक्षु इन्द्रियों से देखता है। अत: रसास्वाद का अन्तिम उत्कर्ष नाटक से ही प्राप्त होता है । नाटक की अपेक्षा कम रसास्वाद महान काव्य से प्राप्त होता है । सबसे कम रसास्वाद मुक्तक से होता हैं।

यद्यपि अभिनवगुप्त ने भाषा, वेष आदि की प्रत्यक्षता के कारण दृश्य का अविलम्ब प्रभाव स्वीकार किया है, फिर भी श्रव्यकाव्य में इसकी योजना का अभाव प्रमाणित नहीं होता है । अभिनवगुप्त ने स्पष्टरूप से इस बात का उल्लेख किया है कि काव्यानुभूति सहृदय से सम्बन्धित है। सहृदय ने यदि काव्य का अनुशीलन कर लिया है, जिसके कुछ प्राक्तन संस्कार है तो भाव आदि के उन्मीलन के द्वारा काव्य के विषय का साक्षात्कार किया जा सकता है । इने का सारांश यह है कि यदि दृश्यकाव्य समस्त बातों को प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित कर देता है तो श्रकाव्य में इसकी उपस्थिति के लिए सहृदय की कल्पना अपेक्षित है।

अभिनवगुप्त के बाद 'श्रृंगार प्रकाश' और 'सरस्वतीकण्ठाभरण' के रचयिता भोज ने कवि और काव्य को नट और अभिनय की अपेक्षा उच्च स्थान प्रदान किया है । भोज ने अपने ग्रन्थ के प्रारम्भ से ही इस बात का उल्लेख किया है कि रसास्वादन सामाजिक व श्रोतागण के द्वारा तभी किया जाता है, जब वहएक प्रवीण नट के द्वारा अभिनीत होता है या प्रबन्ध काव्य में महाकवि के द्वारा वर्णित होता है । किसी पदार्थ के श्रवण मात्र से जितना आनन्द आता है, उतना उस पदार्थ के साक्षात्कार करने पर नहीं । इसीलिये भोज ने कवि को नट की अपेक्षा उच्च स्थान प्रदान किया है एवं काव्य को अभिनय की अपेक्षा 'अधिक महत्व दिया है'

संस्कृत अलंकारशास्त्र में नाटककार के लिए अन्य शब्द नहीं प्रयुक्त होता। है। नाटककार को भी कवि ही कहा जाता है। नाटक को भी 'काव्य' ही नाम से सम्बोधित करते हैं। भोज का यहाँ यह कथन कि कवि और काव्य को नट एवं अभिनय की अपेक्षा अधिक महत्त्व देना चाहिए, अभिनवगुप्त के मत से सूक्ष्म विरोध प्रकट करता है । भोज के अनुसार नाटयकार कवि का, जिसने रस के आनन्द के लिए काव्य लिखा है-जिसमें आनन्द प्राप्त करने के लिए नट के योग की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती, नट की अपेक्षा विशेष महत्व है-जो (नट) रङ्गमत्र पर सामाजिक के समक्ष अभिनयों के द्वारा उसे अभिनीत करता है । यहाँ काव्य का तात्पर्य नाटय की पाम पुस्तक से है। नाटक को दृश्य काव्य की भी संज्ञा दी गई है । नाटक का जब तक रंगमंच पर प्रदर्शन नहीं किया जाता है-जब नाटक के अध्ययन से ही आनन्द की प्राप्ति होती है, तब न नाटक काव्य ही कहा जाया करता है । भोज ने कवि और काव्य का जो प्रयोग किया है, वह नाटककार और उसके 'नाटक' के लिए ही है । भोज इन्हीं को नट और उसके अभिनयों की अपेक्षा विशेष महत्व देते हैं।

Sample Page


Post a Comment
 
Post Review
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy

Related Items

The Chalukyas of Badami
by Dr. S. Rajasekhara
Hardcover (Edition: 2016)
Aryan Books International
Item Code: NAM617
$40.00
Add to Cart
Buy Now

Testimonials

Thank you very much for keeping such an exotic collection of Books. Keep going strong Exotic India!!!
Shweta, Germany
I am very thankful to you for keeping such rare and quality books, DVDs, and CDs of classical music and even Dhrupad which is almost unbelievable. I hope you continue to be this good in your helpfulness. I have found books about rare cultural heritage such as Kodava samaj, Dhrupad and other DVDs and CDs in addition to the beautiful sarees I have from your business, actually business is not the right word, but for lack of a word I am using this.
Prashanti, USA
Shiva Shankar brass statue arrived yesterday. It´s very perfect and beautiful and it was very carefully packed. THANK YOU!!! OM NAMAH SHIVAYA
Mª Rosário Costa, Portugal
I have purchased many books from your company. Your packaging is excellent, service is great and attention is prompt. Please maintain this quality for this order also!
Raghavan, USA
My order arrived today with plenty of time to spare. Everything is gorgeous, packing excellent.
Vana, Australia
I was pleased to chance upon your site last year though the name threw me at first! I have ordered several books on Indian theatre and performance, which I haven't found elsewhere (including Amazon) or were unbelievably exorbitantly priced first editions etc. I appreciate how well you pack the books in your distinctive protective packaging for international and domestic mailing (for I order books for India delivery as well) and the speed with which my order is delivered, well within the indicated time. Good work!
Chitra, United Kingdom
The statue has arrived today. It so beautiful, lots of details. I am very happy and will order from you shop again.
Ekaterina, Canada.
I love your company and have been buying a variety of wonderful items from you for many years! Keep up the good work!
Phyllis, USA
The Lakshmi statue arrived today and it is beautiful. Thank you so much for all of your help. I am thrilled and she is an amazing statue for my living room.
Susanna, West Hollywood, CA.
I received my ordered items in good condition. I appreciate your excellent service that includes a very good collection of items and prompt delivery service arrangements upon receiving the order.
Ram, USA
TRUSTe
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2017 © Exotic India