Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Sign In  |  Sign up
Your Cart (0)
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Performing Arts > Notations > आलाप तान अंक: Aalap Tana Anka (With Notation)
Displaying 241 of 1291         Previous  |  NextSubscribe to our newsletter and discounts
आलाप तान अंक: Aalap Tana Anka (With Notation)
Pages from the book
आलाप तान अंक: Aalap Tana Anka (With Notation)
Look Inside the Book
Description

सम्पादकीय

इस समय इस तानबाजी कें शैतान ने हमारे संगीत में प्रविष्ट होकर बहुत कुछ नाश कर दिया है । निरक्षर और जड़ बुद्धि के गायकों की दया पर निर्भर रहना हमारे सुशिक्षित वर्ग को अब पसंद नहीं । केवल तानों की कवायद देखकर अब हम आश्चर्यान्वित होना छोड़ चुके हैं । भातखंडे संगीत शास्त्र , प्रथम भाग, पू० २४२ २४४) यह बात भातखंडे जी नै कम से कम साठ वर्ष पहले तो कही ही होगी । पता नहीं, उन्हें कैसे विश्वास हो गया कि तानों की कसरत देख अब हम आश्चर्यान्वित होना छोड़ चके हैं? हमें तो लगभग अर्द्धशताब्दी बीत जाने के बाद आज भी तानबाजी के प्रशंसक सहृदय ही सर्वत्र दिखाई देते हैं । यहां तक कि सुशिक्षित समझे जानेवाले संगीत के आलोचक भी गायक की असाधारण तैयारी की प्रशंसा ही पत्र पत्रिकाओं में छपवाते हैं और स्वयं को जबरन् मर्मज्ञ आलोचक मान भ्रम रस में डुबकियां लगा पुण्य कमाते हैं । हमारी बात पर किसी को विश्वास न हो तो गुर्जरी तोड़ी के संदर्भ में पं० ओम् रनाथ ठाकुर का यह प्रमाण हमें मजबूरन् पेश करना पड़ेगा आजकल सामान्य परिपाटी ऐसी बन गई है कि प्रत्येक राग में तैयारी दिखाने के लिए तान प्रयोग आवश्यक सा माना जाता है । इसलिए इसमें (गुर्ज़री तोड़ी में) भी खूब तानें ली जाती हें । इसका आरोह अवरोह सीधा होने के .कारण इसमें तान का विस्तार सरल रहता है इसलिए भी प्राय सभी इसमें कसकर तानें लेते रहते हैं । हमें भी लेनी पड़ती हैं । किंतु हमारे मत से इस करूण रस वाहिनी रागिनी में तानें न लेना हो समुचित है । ( संगीतांजलि , षष्ठ भाग, पू० ३२)

यह है हमारा वर्तमान शास्त्रीय संगीत! अगर आज स्व० भातखंडे होते तो पंडित जी की उक्त व्यावहारिक विवशता देख निश्चय ही अपने मत में परिवर्तन कर लेते ।

तानों की अंधाधुधी के लिए हमारी मुगल कालीन सामाजिक व्यवस्था मूल रूप से उत्तरदायी रही है । सामंतीय वातावरण और उसके अंधकारमय भविष्य नें उस जमाने के राजाओं को जरूरत से ज्यादा विलासप्रिय बना दिया था । देश विदेश कै विद्वानों को आमंत्रित कर कोरे तर्कवाद पर आधारित शास्त्रार्थ कराने में भारतीय सामंतों को परंपरा बहुत पहले से ही आनंद लेती रही है । मुगल काल में संगीत कला ने भी राजा की बौद्धिक संतुष्टि हेतु स्वयं को अखाड़े में ला पटका । प्रतिद्वंद्विता की इस रणभूमि में भाव और रस का क्या काम? दूसरे को पछाड़ने कें लिए गवैये गले से अजीबो गरीब आवाजें निकालकर अपनी कलाकारी का प्रदर्शन करने लगे । इस उखाड़ पछाड़ में तान सबसे ज्यादा काम आई । आवाजों के अजायबघर गले में सर्राटेदार तैयारीसंयोग से हाथीचिंघाड़ तान और शेरदहाड़ तान जैसी तानों का निर्माण होने लगा । धकेल तान, धक्का तान और गोरखधंधा तान दे संगीत को गोरखधंधा बनाकर ही दम लिया । आज भी दिल्ली घराने के उत्तराधिकारियों को बड़े गौरव के साथ ऐसी हो न जाने कितनी तानों की बानगी देते हुए देखा जा सकता है ।

यह तो थी हमारे संगीत के अशिक्षित पंडितों और उस्तादोंकी कहानी)। सवाल है, आज जो शिक्षित होने का दावा करनेवाले कलाकार हैं, उनके विवेक को क्या हुआ? आज जो संगीतज्ञ सबसे ज्यादा रस रस की रट लगाते हैं, उनके और उनके शिष्यों के गायन वादन में उतनी ही अधिक नीरसता दृष्टिगत होती है । यह सत्य है । एकाध अपवाद को छोड़ देना चाहिए । इसके मूल में शास्त्रीय संगीत की जड परंपरा के प्रति संगीतज्ञों का प्रगाढ़ अन्धविश्वास है, जो सड़े गले को छोड़ने नहीं देता और श्रेयस्कर को अपनाने नहीं देता । संगीत ग्रंथ लिखनेवाले और भी उत्तरदायी हैं । वे प्राय इस ओर प्रयत्नशील ही नहीं होते कि संगीत परम्परा में जो कुछ संगीत का शत्रु है उसे उजागर कर उस पर प्रहार करें । अगर आज ख्याल में तानें लगाई जाती हैं तो वे भी बेधड़क लिख देते हैं कि ख्याल गायन में तान बहुत महत्वपूर्ण है और खंडमेरु का गणित खोलने लगते हैं । संगीत का विद्यार्थी व्यवहार और सिद्धांत, दोनों में ही जब तान की अपूर्व महिमा का बखान देखता है तो जाने अनजाने आजकल की बेसिर पैर की तानबाजी की नकल करने में ही अपने कलाकार भविष्य को देखता है और जीवन गँवा बैठता है । उसे कोई बतानेवाला नहीं कि तान का असली अर्थ क्या है । यह भातखंडे के यहां पढ़ता है, तानों का मुख्य प्रयोजन गायन का वैचित्र्य अधिकाधिक बढ़ाना ही है । और सुरी बेसुरी तानों की सरहिट से गायन को विचित्र बनाने में जुट जाता है । उसने पढ़ा है तान शब्द तन् धातु से बना है, जिसका अर्थ तानना है । बस, वह भी तानों से राग को तानने लगता है और इतना तानता है कि राग ही फूलकर फट जाता है ।

प्रचलित आलाप गायन के बारे में तो संगीत ग्रन्थों में प्राय भातखंडे जी की हू ब हू नकल ही दिखाई देती है । यह कोई नहीं सोचता कि भातखंडे के जमाने में खयाल गायन से पूर्व स्थायी, अन्तरा, संचारी, आभोग के क्रम में जो आलाप किया जाता था, वह आजकल प्रचार में है ही नहीं । उसके दर्शन थोड़े बहुत गतकारी धक् के वादन में भले ही हो जाएँ ।

आलाप और तान सम्बन्धो वैचारिक सामग्री की इस दशा को देखकर ही हमने संगीत का जनवरी फ़रवरी, १९७७ का विशेषांक आलाप तान अंक के रूप में निकालने का निश्चय किया था । इसका अर्थ यह नहीं कि हम दावा कर रहे हैं कि इस अंक में जो लेख हैं, ये सभी पूर्णत मौलिक और आलाप तान के बारे में सही विचारधारा देने वाले हैं । हां, ऐसे लेखों व विचारों का भी इसमें समावेश हो गया है, बस इतना ही कथनीय है ।

प्रस्तुत विशेषांक की संगीत के व्यावहारिक पक्ष की दृष्टि से भी उपादेयता है । एम० ए० स्तर के रागों के आलाप और सुन्दर तानों की एक ही जिल्द में आवश्यकता प्राय विद्यार्थियों को रही है । इस महत्वपूर्ण अभाव की पूर्ति भी बहुत हद तरु इसके द्वारा हो सकेगी, ऐसी आशा है ।

 

अनुक्रम  
संपादकीय डॉ० मुकेश गर्ग 3
ग्राम मूर्च्छना पद्धति में तान डॉ० इद्राणी चक्रवर्ती 5
भारतीय संगीत की अनमोल सपदा तान गुलाम रसूल 14
भारतीय संगीत में आलाप श्रीमती महारानी शर्मा 21
राग का सौंदर्य आधार आलाप कु० नदिता भट्टाचार्य 24
रससृष्टि में आलाप और तान की भूमिका श्रीमती उमा गर्ग 29
आलाप डॉ० विश्वभरनाथ भट्ट 34
तान और आलाप विद्यालय से महफ़िल तक कन्हैयालाल मधुकर 41
तान डॉ० विश्वभरनाथ भट्ट 45
लयबद्ध तानों के निर्माण की विधि (गौड़सारग के माध्यम से) श्रीमती सुमिंत्राकुमारी 57
कर्नाटक संगीत में राग,आलापना और तानम् विद्वान् के० नारायणन् 70
गाइए, कुश्ती मत लड़िए प्यारेलाल श्रीमाल सरस पंडित 76
आलाप और तान आचार्य बृहस्पति 78
अनिबद्ध अर्थात् आलप्ति डॉ सुभद्रा चौधरी 86
तानसेन की दृष्टि में तान प्रभुदयाल सीतल 102

 

Sample Pages








आलाप तान अंक: Aalap Tana Anka (With Notation)

Item Code:
HAA264
Cover:
Paperback
Edition:
1977
Language:
Hindi
Size:
9.0 inch X 6.0 inch
Pages:
229
Other Details:
Weight of the Book: 250 gms
Price:
$30.00
Discounted:
$24.00   Shipping Free
You Save:
$6.00 (20%)
Look Inside the Book
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
आलाप तान अंक: Aalap Tana Anka (With Notation)

Verify the characters on the left

From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 4342 times since 7th Jun, 2017

सम्पादकीय

इस समय इस तानबाजी कें शैतान ने हमारे संगीत में प्रविष्ट होकर बहुत कुछ नाश कर दिया है । निरक्षर और जड़ बुद्धि के गायकों की दया पर निर्भर रहना हमारे सुशिक्षित वर्ग को अब पसंद नहीं । केवल तानों की कवायद देखकर अब हम आश्चर्यान्वित होना छोड़ चुके हैं । भातखंडे संगीत शास्त्र , प्रथम भाग, पू० २४२ २४४) यह बात भातखंडे जी नै कम से कम साठ वर्ष पहले तो कही ही होगी । पता नहीं, उन्हें कैसे विश्वास हो गया कि तानों की कसरत देख अब हम आश्चर्यान्वित होना छोड़ चके हैं? हमें तो लगभग अर्द्धशताब्दी बीत जाने के बाद आज भी तानबाजी के प्रशंसक सहृदय ही सर्वत्र दिखाई देते हैं । यहां तक कि सुशिक्षित समझे जानेवाले संगीत के आलोचक भी गायक की असाधारण तैयारी की प्रशंसा ही पत्र पत्रिकाओं में छपवाते हैं और स्वयं को जबरन् मर्मज्ञ आलोचक मान भ्रम रस में डुबकियां लगा पुण्य कमाते हैं । हमारी बात पर किसी को विश्वास न हो तो गुर्जरी तोड़ी के संदर्भ में पं० ओम् रनाथ ठाकुर का यह प्रमाण हमें मजबूरन् पेश करना पड़ेगा आजकल सामान्य परिपाटी ऐसी बन गई है कि प्रत्येक राग में तैयारी दिखाने के लिए तान प्रयोग आवश्यक सा माना जाता है । इसलिए इसमें (गुर्ज़री तोड़ी में) भी खूब तानें ली जाती हें । इसका आरोह अवरोह सीधा होने के .कारण इसमें तान का विस्तार सरल रहता है इसलिए भी प्राय सभी इसमें कसकर तानें लेते रहते हैं । हमें भी लेनी पड़ती हैं । किंतु हमारे मत से इस करूण रस वाहिनी रागिनी में तानें न लेना हो समुचित है । ( संगीतांजलि , षष्ठ भाग, पू० ३२)

यह है हमारा वर्तमान शास्त्रीय संगीत! अगर आज स्व० भातखंडे होते तो पंडित जी की उक्त व्यावहारिक विवशता देख निश्चय ही अपने मत में परिवर्तन कर लेते ।

तानों की अंधाधुधी के लिए हमारी मुगल कालीन सामाजिक व्यवस्था मूल रूप से उत्तरदायी रही है । सामंतीय वातावरण और उसके अंधकारमय भविष्य नें उस जमाने के राजाओं को जरूरत से ज्यादा विलासप्रिय बना दिया था । देश विदेश कै विद्वानों को आमंत्रित कर कोरे तर्कवाद पर आधारित शास्त्रार्थ कराने में भारतीय सामंतों को परंपरा बहुत पहले से ही आनंद लेती रही है । मुगल काल में संगीत कला ने भी राजा की बौद्धिक संतुष्टि हेतु स्वयं को अखाड़े में ला पटका । प्रतिद्वंद्विता की इस रणभूमि में भाव और रस का क्या काम? दूसरे को पछाड़ने कें लिए गवैये गले से अजीबो गरीब आवाजें निकालकर अपनी कलाकारी का प्रदर्शन करने लगे । इस उखाड़ पछाड़ में तान सबसे ज्यादा काम आई । आवाजों के अजायबघर गले में सर्राटेदार तैयारीसंयोग से हाथीचिंघाड़ तान और शेरदहाड़ तान जैसी तानों का निर्माण होने लगा । धकेल तान, धक्का तान और गोरखधंधा तान दे संगीत को गोरखधंधा बनाकर ही दम लिया । आज भी दिल्ली घराने के उत्तराधिकारियों को बड़े गौरव के साथ ऐसी हो न जाने कितनी तानों की बानगी देते हुए देखा जा सकता है ।

यह तो थी हमारे संगीत के अशिक्षित पंडितों और उस्तादोंकी कहानी)। सवाल है, आज जो शिक्षित होने का दावा करनेवाले कलाकार हैं, उनके विवेक को क्या हुआ? आज जो संगीतज्ञ सबसे ज्यादा रस रस की रट लगाते हैं, उनके और उनके शिष्यों के गायन वादन में उतनी ही अधिक नीरसता दृष्टिगत होती है । यह सत्य है । एकाध अपवाद को छोड़ देना चाहिए । इसके मूल में शास्त्रीय संगीत की जड परंपरा के प्रति संगीतज्ञों का प्रगाढ़ अन्धविश्वास है, जो सड़े गले को छोड़ने नहीं देता और श्रेयस्कर को अपनाने नहीं देता । संगीत ग्रंथ लिखनेवाले और भी उत्तरदायी हैं । वे प्राय इस ओर प्रयत्नशील ही नहीं होते कि संगीत परम्परा में जो कुछ संगीत का शत्रु है उसे उजागर कर उस पर प्रहार करें । अगर आज ख्याल में तानें लगाई जाती हैं तो वे भी बेधड़क लिख देते हैं कि ख्याल गायन में तान बहुत महत्वपूर्ण है और खंडमेरु का गणित खोलने लगते हैं । संगीत का विद्यार्थी व्यवहार और सिद्धांत, दोनों में ही जब तान की अपूर्व महिमा का बखान देखता है तो जाने अनजाने आजकल की बेसिर पैर की तानबाजी की नकल करने में ही अपने कलाकार भविष्य को देखता है और जीवन गँवा बैठता है । उसे कोई बतानेवाला नहीं कि तान का असली अर्थ क्या है । यह भातखंडे के यहां पढ़ता है, तानों का मुख्य प्रयोजन गायन का वैचित्र्य अधिकाधिक बढ़ाना ही है । और सुरी बेसुरी तानों की सरहिट से गायन को विचित्र बनाने में जुट जाता है । उसने पढ़ा है तान शब्द तन् धातु से बना है, जिसका अर्थ तानना है । बस, वह भी तानों से राग को तानने लगता है और इतना तानता है कि राग ही फूलकर फट जाता है ।

प्रचलित आलाप गायन के बारे में तो संगीत ग्रन्थों में प्राय भातखंडे जी की हू ब हू नकल ही दिखाई देती है । यह कोई नहीं सोचता कि भातखंडे के जमाने में खयाल गायन से पूर्व स्थायी, अन्तरा, संचारी, आभोग के क्रम में जो आलाप किया जाता था, वह आजकल प्रचार में है ही नहीं । उसके दर्शन थोड़े बहुत गतकारी धक् के वादन में भले ही हो जाएँ ।

आलाप और तान सम्बन्धो वैचारिक सामग्री की इस दशा को देखकर ही हमने संगीत का जनवरी फ़रवरी, १९७७ का विशेषांक आलाप तान अंक के रूप में निकालने का निश्चय किया था । इसका अर्थ यह नहीं कि हम दावा कर रहे हैं कि इस अंक में जो लेख हैं, ये सभी पूर्णत मौलिक और आलाप तान के बारे में सही विचारधारा देने वाले हैं । हां, ऐसे लेखों व विचारों का भी इसमें समावेश हो गया है, बस इतना ही कथनीय है ।

प्रस्तुत विशेषांक की संगीत के व्यावहारिक पक्ष की दृष्टि से भी उपादेयता है । एम० ए० स्तर के रागों के आलाप और सुन्दर तानों की एक ही जिल्द में आवश्यकता प्राय विद्यार्थियों को रही है । इस महत्वपूर्ण अभाव की पूर्ति भी बहुत हद तरु इसके द्वारा हो सकेगी, ऐसी आशा है ।

 

अनुक्रम  
संपादकीय डॉ० मुकेश गर्ग 3
ग्राम मूर्च्छना पद्धति में तान डॉ० इद्राणी चक्रवर्ती 5
भारतीय संगीत की अनमोल सपदा तान गुलाम रसूल 14
भारतीय संगीत में आलाप श्रीमती महारानी शर्मा 21
राग का सौंदर्य आधार आलाप कु० नदिता भट्टाचार्य 24
रससृष्टि में आलाप और तान की भूमिका श्रीमती उमा गर्ग 29
आलाप डॉ० विश्वभरनाथ भट्ट 34
तान और आलाप विद्यालय से महफ़िल तक कन्हैयालाल मधुकर 41
तान डॉ० विश्वभरनाथ भट्ट 45
लयबद्ध तानों के निर्माण की विधि (गौड़सारग के माध्यम से) श्रीमती सुमिंत्राकुमारी 57
कर्नाटक संगीत में राग,आलापना और तानम् विद्वान् के० नारायणन् 70
गाइए, कुश्ती मत लड़िए प्यारेलाल श्रीमाल सरस पंडित 76
आलाप और तान आचार्य बृहस्पति 78
अनिबद्ध अर्थात् आलप्ति डॉ सुभद्रा चौधरी 86
तानसेन की दृष्टि में तान प्रभुदयाल सीतल 102

 

Sample Pages








Post a Comment
 
Post Review
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy

Based on your browsing history

Loading... Please wait

Related Items

Tabla: तबला (With Notation)
Item Code: NZL715
$55.00$44.00
You save: $11.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
ताल प्रसून: Tala Prasun (With Notation)
Item Code: NZI480
$35.00$28.00
You save: $7.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
ताल प्रकाश: Light On Tala (With Notation)
Item Code: NZA271
$30.00$24.00
You save: $6.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now

Testimonials

Excellent e-commerce website with the most exceptional, rare and sought after authentic India items. Thank you!
Cabot, USA
Excellent service and fast shipping. An excellent supplier of Indian philosophical texts
Libero, Italy.
I am your old customer. You have got a wonderful collection of all products, books etc.... I am very happy to shop from you.
Usha, UK
I appreciate the books offered by your website, dealing with Shiva sutra theme.
Antonio, Brazil
I love Exotic India!
Jai, USA
Superzoom delivery and beautiful packaging! Thanks! Very impressed.
Susana
Great service. Keep on helping the people
Armando, Australia
I bought DVs supposed to receive 55 in the set instead got 48 and was in bad condition appears used and dusty. I contacted the seller to return the product and the gave 100% credit with apologies. I am very grateful because I had bought and will continue to buy products here and have never received defective product until now. I bought paintings saris..etc and always pleased with my purchase until now. But I want to say a public thank you to whom it may concern for giving me the credit. Thank you. Navieta.
Navieta N Bhudu
I have no words to thank you and your company. I received the Saundarananda Maha Kavya that I have ordered from you few weeks ago. I hope to order any more books, if I will have a need. Thank you
Ven. Bopeththe, Sri Lanka
Thank you so much just received my order. Very very happy with the blouse and fast delivery also bindi was so pretty. I will sure order from you again.
Aneeta, Canada
TRUSTe
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2018 © Exotic India