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Books > Hindu > हिन्दी > अष्टछाप के कवि परमानंद दास: Ashtachhap Poet Parmanand Das
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अष्टछाप के कवि परमानंद दास: Ashtachhap Poet Parmanand Das
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अष्टछाप के कवि परमानंद दास: Ashtachhap Poet Parmanand Das
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Description

पुस्तक के विषय में

भारतीय संस्कृति और साहित्य में कृष्ण-भक्ति केंद्रीय प्रवृतियों में है। श्री वल्लभाचार्य द्वारा प्रेरित मार्ग का इसमें महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी शिष्य-परंपरा के अष्टछाप के कवियों ने भावित और प्रेम की उत्कृष्ट काव्य रचना की। प्रकाशन विभाग ने इन कवियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर श्रंखला प्रकाशित कर मध्ययुगीन कृष्ण-भक्ति साहित्य के इस महत्वपूर्ण अध्याय को सुनियोजित और सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है।

अष्टछाप के कवियों में परमानंद दास का महत्वपूर्ण स्थान है। तो वे समर्थ कवि, भावप्रवण कीर्तनकार और कुशल संगीतज्ञ थे। उनकी भाव-व्यंजना का प्रमुख माध्यम संगीत रहा। हर प्रसंग की अनुभूति को उन्होंने विभिन्न राग-रागिनयों के स्वरूप में दक्षता में ढाला। उनकी भक्ति में गोपियों के प्रेम जैसी भाव-विह्वलता है।

लेखक डॉ. हरगुलाल मध्ययुगीत हिंदी कृष्ण-काव्य तथा ब्रजभाषा के विज्ञान है।

भूमिका

परमानंददास अष्टछाप के कवियों में विरह-गान में सर्व श्रेष्ठ स्वीकार किये जाते हैं । वह अपने समय के प्रख्यात कीर्तनकार थे और पुष्टिमार्गीय सिद्धांतों के अनुरूप अपने गायन के पदों का निर्माण स्वयं ही करते थे । श्रीनाथजी परमानंद दास के प्राणाधार थे और उन्हीं के सेवा-कीर्तन में उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित कर आजीवन उनकी लीला गाई । उनकी भक्ति बाल, कांता और दासभाव की थी । उनकी भक्ति और आस्था आचार्य और आराध्य दोनों में एक समान थी । भगवान कृष्ण की हृदयग्राही लीलाओं के चित्रण में यों तो उनके गेय पद हर रूप में अवर्णनीय हैं, फिर भी उनकी मुक्तक शैली भावों की सहजता, वर्णन की संक्षिप्तता, संगीत की मधुरता, मार्मिकता एवं भावपूर्ण प्रसंगों की अभिव्यंजना के कारण नितांत स्तुत्य है । भाव, भाषा और शैली की दृष्टि से सूर के उपरांत अष्ट छाप के कवियों में यदि किसी को महत्ता दी जा सकती है तो वे केवल परमानंददास हैं । उनके सात ग्रं थों में से परमानंदासजी कौ पद तथा परमानंदसागर दो ग्रंथ ही प्रामाणिक माने जाते हैं । परमानंददासजी कौ पद एक तरह से परमानंद सागर का ही संक्षिप्त रूप है । परमानंद सागर के अनेक पद दीर्घकाल तक मौखिक कीर्तन- परंपरा में आबद्ध रहे, बाद में भक्तों और गायकों के कंठ से निसृत इन पदों को लिपिबद्ध कर लिया गया । उच्च कोटि की रस व्यंजना के कारण परमानंददास का नाम महानतम संत कवियों में परिगणित किया जाता है । वे एक साथ ही जाने -माने कीर्तनकार, भक्त, संत तथा कवि थे।

संत का सच्चा स्वरूप है अपने परमाराध्य में खो जाना । भगवान के सतस्वरूप की विशेष उपाधि को ही 'संत' शब्द की संज्ञा दी जाती है और इस दृष्टि से परमानंददास सारे जागतिक संबंधों से विरत अपने मनोराज्य में श्रीनाथजी का हर समय साथ चाहने वाले महान संगीतज्ञ कवि थे। संसार में दिखावे के लिये अपने परमाराध्य का यहीचिन्मयस्वरूप था उनका और इसी में समा गए उनके रात-दिन; भजन- कीर्तन और मन के सभी कोण । समय-समय पर गाए गए उनके भावाकुल गीतों को इस संग्रह में समेटने की चेष्टा की गई है और इस रूप में 'कीर्तन सुधाकर' ग्रंथ ने मेरे कार्य को काफी सहज बना दिया है । वर्तमान युग में अपने-पराए के भेद से ऊपर उठकर सर्वात्मवाद की खोज में लगे अष्टछापी इस विरागी संत की विप्रलंभ शृंगार में लिपटी मधुर भक्ति की कोमल भावनाएं सर्वसाधारण के लिए उपयोगी होंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार का आभार किन शब्दों में व्यक्त किया जाय, जिसने अष्टछाप के कवियों के प्रकाशन का बीड़ा उठाया है और पाठकों को पठनीय सामग्री उपलब्ध कराई है । ध्रुपद, धमार और हवेली संगीत के सुप्रसिद्ध गायक डॉ. ब्रजभूषण गोस्वामी ने परमानंदजी का आवरण चित्र उपलब्ध कराकर मुझे सहयोग दिया है। अंत में अपनी सारी सीमाएं ध्यान में रखते हुए परमानंददास के जीवन, साहित्य और उनके प्राप्य महत्वपूर्ण पदों का यह संग्रह सुधी पाठकों के हाथों में सौंपता हूं।

 

अनुक्रम

व्यक्तित्व और कृतित्व

1

प्रारंभिक जीवन

3

2

रचनाएं और विषय-विस्तार

8

3

भक्ति-भावना तथा दार्शनिकता

11

4

कविता का कला पक्ष

14

5

सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना

21

काव्य-वैभव

6

नित्य लीला के पद

37

7

वर्षोत्सव के पद

70

8

प्रकीर्ण पद

110

Sample Page

अष्टछाप के कवि परमानंद दास: Ashtachhap Poet Parmanand Das

Item Code:
NZD029
Cover:
Paperback
Edition:
2008
ISBN:
9788123015231
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
124
Other Details:
Weight of the Book: 150 gms
Price:
$15.00   Shipping Free
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अष्टछाप के कवि परमानंद दास: Ashtachhap Poet Parmanand Das

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पुस्तक के विषय में

भारतीय संस्कृति और साहित्य में कृष्ण-भक्ति केंद्रीय प्रवृतियों में है। श्री वल्लभाचार्य द्वारा प्रेरित मार्ग का इसमें महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी शिष्य-परंपरा के अष्टछाप के कवियों ने भावित और प्रेम की उत्कृष्ट काव्य रचना की। प्रकाशन विभाग ने इन कवियों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर श्रंखला प्रकाशित कर मध्ययुगीन कृष्ण-भक्ति साहित्य के इस महत्वपूर्ण अध्याय को सुनियोजित और सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है।

अष्टछाप के कवियों में परमानंद दास का महत्वपूर्ण स्थान है। तो वे समर्थ कवि, भावप्रवण कीर्तनकार और कुशल संगीतज्ञ थे। उनकी भाव-व्यंजना का प्रमुख माध्यम संगीत रहा। हर प्रसंग की अनुभूति को उन्होंने विभिन्न राग-रागिनयों के स्वरूप में दक्षता में ढाला। उनकी भक्ति में गोपियों के प्रेम जैसी भाव-विह्वलता है।

लेखक डॉ. हरगुलाल मध्ययुगीत हिंदी कृष्ण-काव्य तथा ब्रजभाषा के विज्ञान है।

भूमिका

परमानंददास अष्टछाप के कवियों में विरह-गान में सर्व श्रेष्ठ स्वीकार किये जाते हैं । वह अपने समय के प्रख्यात कीर्तनकार थे और पुष्टिमार्गीय सिद्धांतों के अनुरूप अपने गायन के पदों का निर्माण स्वयं ही करते थे । श्रीनाथजी परमानंद दास के प्राणाधार थे और उन्हीं के सेवा-कीर्तन में उन्होंने अपना सर्वस्व समर्पित कर आजीवन उनकी लीला गाई । उनकी भक्ति बाल, कांता और दासभाव की थी । उनकी भक्ति और आस्था आचार्य और आराध्य दोनों में एक समान थी । भगवान कृष्ण की हृदयग्राही लीलाओं के चित्रण में यों तो उनके गेय पद हर रूप में अवर्णनीय हैं, फिर भी उनकी मुक्तक शैली भावों की सहजता, वर्णन की संक्षिप्तता, संगीत की मधुरता, मार्मिकता एवं भावपूर्ण प्रसंगों की अभिव्यंजना के कारण नितांत स्तुत्य है । भाव, भाषा और शैली की दृष्टि से सूर के उपरांत अष्ट छाप के कवियों में यदि किसी को महत्ता दी जा सकती है तो वे केवल परमानंददास हैं । उनके सात ग्रं थों में से परमानंदासजी कौ पद तथा परमानंदसागर दो ग्रंथ ही प्रामाणिक माने जाते हैं । परमानंददासजी कौ पद एक तरह से परमानंद सागर का ही संक्षिप्त रूप है । परमानंद सागर के अनेक पद दीर्घकाल तक मौखिक कीर्तन- परंपरा में आबद्ध रहे, बाद में भक्तों और गायकों के कंठ से निसृत इन पदों को लिपिबद्ध कर लिया गया । उच्च कोटि की रस व्यंजना के कारण परमानंददास का नाम महानतम संत कवियों में परिगणित किया जाता है । वे एक साथ ही जाने -माने कीर्तनकार, भक्त, संत तथा कवि थे।

संत का सच्चा स्वरूप है अपने परमाराध्य में खो जाना । भगवान के सतस्वरूप की विशेष उपाधि को ही 'संत' शब्द की संज्ञा दी जाती है और इस दृष्टि से परमानंददास सारे जागतिक संबंधों से विरत अपने मनोराज्य में श्रीनाथजी का हर समय साथ चाहने वाले महान संगीतज्ञ कवि थे। संसार में दिखावे के लिये अपने परमाराध्य का यहीचिन्मयस्वरूप था उनका और इसी में समा गए उनके रात-दिन; भजन- कीर्तन और मन के सभी कोण । समय-समय पर गाए गए उनके भावाकुल गीतों को इस संग्रह में समेटने की चेष्टा की गई है और इस रूप में 'कीर्तन सुधाकर' ग्रंथ ने मेरे कार्य को काफी सहज बना दिया है । वर्तमान युग में अपने-पराए के भेद से ऊपर उठकर सर्वात्मवाद की खोज में लगे अष्टछापी इस विरागी संत की विप्रलंभ शृंगार में लिपटी मधुर भक्ति की कोमल भावनाएं सर्वसाधारण के लिए उपयोगी होंगी, ऐसा मेरा विश्वास है।

प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार का आभार किन शब्दों में व्यक्त किया जाय, जिसने अष्टछाप के कवियों के प्रकाशन का बीड़ा उठाया है और पाठकों को पठनीय सामग्री उपलब्ध कराई है । ध्रुपद, धमार और हवेली संगीत के सुप्रसिद्ध गायक डॉ. ब्रजभूषण गोस्वामी ने परमानंदजी का आवरण चित्र उपलब्ध कराकर मुझे सहयोग दिया है। अंत में अपनी सारी सीमाएं ध्यान में रखते हुए परमानंददास के जीवन, साहित्य और उनके प्राप्य महत्वपूर्ण पदों का यह संग्रह सुधी पाठकों के हाथों में सौंपता हूं।

 

अनुक्रम

व्यक्तित्व और कृतित्व

1

प्रारंभिक जीवन

3

2

रचनाएं और विषय-विस्तार

8

3

भक्ति-भावना तथा दार्शनिकता

11

4

कविता का कला पक्ष

14

5

सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना

21

काव्य-वैभव

6

नित्य लीला के पद

37

7

वर्षोत्सव के पद

70

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