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Books > Hindi > योग > ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति - (Dhyanyoga Partham aur Antim Mukti)
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ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति - (Dhyanyoga Partham aur Antim Mukti)
ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति - (Dhyanyoga Partham aur Antim Mukti)
Description

पुस्तक के बारे में

 

इक्कीसवीं सदी का जीवन जितनी तेज गति से भाग रहा है उतनी ही तेज गति से व्यक्ति के लिए तनाव बढ़ता जा रहा है । शांत बैठकर ध्यान में उतर जाना अब उतना सरल नहीं है जितना कि बुद्ध के समय में था ।

ध्यानयोग : प्रथम और अंतिम मुक्ति ओशो द्वारा सृजित अनेक ध्यान विधियों का विस्तृत व प्रायोगिक विवरण है, विशेषत ओशो सक्रिय ध्यान विधियों व ओशो मेंडिटेटिव थेरेपीज़ का, जो कि आधुनिक जीवन के तनावों से सीधे निपटती हैं व हमें ताजा व ऊर्जावान कर जाती हैं । ओशो बहुत सी प्राचीन विधियों की भी चर्चा करते हैं : विपस्सना व झाझेन, केंद्रीकरण की विधियां, प्रकाश व अंधकार पर

ध्यान, हृदय के विकास की विधियां ।

साथ ही ओशो ध्यान संबंधी प्रश्नों के उत्तर भी देते है व हमें बताते हैं कि ध्यान क्या है, कैसे ध्यान करना शुरू करें । और कैसे अपनी अंतर-यात्रा को निर्बाध रूप से जारी रख सकें ।

भूमिका

 

विज्ञान और तकनीक, जिसने हमारे बाह्य जीवन को आमूल बदल कर रख दिया है, मूलत पश्चिम में फलित हुए है उसी प्रकार पूरब ने ऐसे विज्ञान का स्रोत दिया है जो हमारे आंतरिक जीवन को कुल सकता है।

आज बिजली के शाल्व की तरह ही ध्यान भी एक जागतिक तथ्य है-एक बाहर के जगत को प्रकाशित करता है, और दूसरा भीतर के जगत को लेकिन जागतिक हाने की प्रक्रिया में ध्यान के गिर्द बहुत सी गलत धारणाए खडी हा गई हैं कि ध्यान कोई बहुत 'धार्मिक' चीज है, कि लगन का अर्थ कठिन मुद्राओं में बैठना है, जैसे ,कि टांग को गर्दन पर लपेट कर बैठना और साथ ही साथ अपनी तकलीफ को छिपाने के लिए चेहरे पर बडे दिव्य हाव-भाव बनाए रखना या फिर ओम का गुजार या किसी मंत्र का उच्चार करना अगर आपको यह सब आकर्षित नही करता ता यह पुस्तक आपके लिए है

इस पुस्तक में ध्यान को समसामयिक जीवन का एक सहज, सामान्य व प्राकृतिक अग बनाया गया है-एक प्रमुख अंग। मूल रूप से ध्यान है जागरूक होने की कला आपके भीतर या बाहर जो कुछ भी हो रहा है उस सबक प्रति जागरूक होने की कला जब कि अपने आप में ध्यान कोई विधि नही है, लेकिन फिर भी यहा बहुत सी विधिया दी गई है जो इस होश को सीखने में आपकी सहयोगी हो सके और एक बार आपको यह कला आ जाए तो फिर आप जहा जाए वहा यत् आपके साथ चलेगी-चाहे कार्य हो, कि मनोरंजन या कुछ भी ।

हममें से अधिकाश को यही सिखाया गया है कि जीवन में सफल होने के लिए हमें संघर्ष की लड़ने की एकाग्रचित्त होने की जरूरत है इस दृष्टिकोण की समस्या यह है कि हम जितना संघर्ष करते है, उतने ही तनाव से भरते चले जाने है और जितने तनाव से हम भरते हैं, उतने ही हमारे प्रयास निष्फल होते हैं।

ध्यानपूर्ण दृष्टिकोण यह समझ देता है कि अपनी ओर से श्रेष्ठ कर पाने के लिए, हर क्षण को अपना श्रेष्ठ दे पान और हर क्षण से श्रेष्ठ ले पाने के लिए चाहिए कि हम जितने होशपूर्ण हा सके, हो । ओर होशपूर्ण हाने के लिए चाहिए विश्रांत होना।

साधारणत हम सोचते है कि विश्रांत लाने के लिए हमें बाहर गाने की जरूरत हैं ध्यान एक दूसरी सभावना देता है विश्रांत होने के लिए भीतर जाना ।

आधुनिक जीवन के दबाव ऐसे है कि इतना अशांत संसार आज तक कभी हुआ ही नहीं । लोग कभी इतने तनावग्रस्त नहीं हुए । ये विधियां आधुनिक मन के लिए ही बनाई गई है-समसामयिक लोगों के लिए समसामयिक दृष्टिकोण ।

यदि आप उच्च ऊर्जावान व्यक्ति है, यानी आपके लिए 'केवल बैठना' असंभव है तो ओशो द्वारा बनाई सक्रिय ध्यान विधियों (ओशो एक्टिव मेंडिटेशंस) को करके देखिए : जैसे कि ओशो डायनेमिक ध्यान, ओशो कुंडलिनी ध्यान । इन विधियों में आप चरम बिंदु तक स्वयं को थका देते है और फिर विश्रांति अपने आप उतर आती हैं । शायद आपके दबाए गए मनोभाव आपको शीत बैठने नहीं देते? या फिर बैठे हुए आप इतनी थकान व सुस्ती महसूस करते हैं कि जागे नहीं रह पाते? या फिर केवल आप अपने शरीर को हिलाना चाहते हैं । इन सब स्थितियों में भी ये गतिशील विधियां आपके लिए कारगर होंगी ।

अपने व्यस्ततम दिन में भी विश्रांत रह पाने की क्षमता को ही 'अप्रयास जागरूकता' कहा गया है, जो कि ध्यान का अनिवार्य अनुभव है । तो यदि आपको निश्चित रूप से लगता है कि ध्यान के लिए अलग से आप कोई समय नही निकाल पाएंगे, तो भी इस पुस्तक में बहुत सी विधियां है जिन्हे आप अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना सकते हैं ।

ध्यान एक सहज समझ पर आधारित है कि बजाय अंधकार से लड़ने के-जो कि वैसे भी असंभव है-प्रकाश को जला लो । बजाय स्वयं से लड़ने के, स्वयं को सुधारने के, दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीने के, जरूरत यह है कि हम जैसे अभी है वैसे ही अपने आप को स्वीकारें ।

ओशो अक्सर स्मरण दिलाते हैं कि यदि अस्तित्व ने हमें यहा होने के लिए आमंत्रित किया है तो जैसे हम हैं, हमें स्वयं को वैसा ही स्वीकार करने के लिए किसकी अनुमति चाहिए? एक बार हम इस स्वीकार में विश्राम पा लें, एक बार हम जैसे है उससे अन्यथा होने का ढोंग छोड़ दें, एक बार हम दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश बंद कर दे -जो कि हमको प्रभावित करने के लिए उतनी ही कोशिश कर रहे हैं-एक बार हम स्वयं को बचाने की, स्वयं को सही सिद्ध करने की कोशिश बंद कर दें एक बार हम अपने घावों को जिन्हें हम अपने आप से भी छिपा रहे है, छिपाने की कोशिश बंद करके उन्हें खुली हवा और प्रकाश में ले आएं, तो उनके भरने की प्रक्रिया अपने आप शुरू हो जाती है ।

इस पुस्तक में आप पढेंगे मन को विश्रांत करने के बारे में, और कि कैसे इस अमूल्य जैविक कंप्यूटर को आप अपना परम मित्र बना सकते हैं, और कैसे वह बटन ढूंढ सकते हैं जिससे आप जब चाहे मन का चलना बंद कर सकें । जब आपको मन की जरूरत हो आप उसका उपयोग कर सकते है, और जब आपको उसकी जरूरत न हो आप उसे चुपचाप आराम करने दे सकते है ताकि अपने अंतहीन प्रलाप से मुक्त होकर वह ऊर्जाशील बना रहे औंर जब जरूरत हो तब बेहतर ढंग से आपका सहयोगी हो । कोई आपका अपमान करता है । जरा कल्पना करिए कि आपके पास यह चुनाव करने की क्षमता हो कि आपको कब और कैसा प्रत्युत्तर देना है... न कि साधारणत: जैसे हम तत्क्षण पलट कर जवाब देते है और उन दुष्चक्रों का निर्माण करते है जिनमें कि हमारे संबंध धीरे-धीरे डूब जाते है।

और स्वतंत्रता? इससे बड़ी स्वतंत्रता और कोई नहीं है कि हम वही हो जाएं जो हमें होना है । दूसरों की अपेक्षाओं से मुक्त हो जाने से बड़ी और कोई स्वतंत्रता नहीं हैं । इससे बड़ी कोई स्वतंत्रता नहीं है कि हम अपना जीवन सहजता व होश में जी सके ।

और ध्यान का परम विरोधाभास यही है कि अंतत: जब हम स्वयं को प्रेम करना सीख जाते है, वास्तव में जब हम स्वयं को प्रेम करना सीख जाते हैं केवल तभी हम अपना प्रेम औरों के साथ बांट सकते हैं । लेकिन शुरुआत हमें स्वयं से करनी होती है ।

इस पुस्तक में बहुत सी विधिया हैं, दृष्टिकोण है, अंतर्दृष्टियां है जो उस यात्रा के लिए हमारी मदद कर सकती हैं । हम सभी वैयक्तिक है और हर व्यक्ति के लिए अलग विधि कारगर होती है । यहां हर प्रकार के आधुनिक मन के लिए कोई न कोई विधि है, जो आज के व्यस्त जीवन के लिए विशेष रूप से तैयार की गई हैं । ओशो कहते हैं

योग की प्राचीन विधियां अब ससार के काम नही आएगी, अब लोगो के पास दिन तो छोडो घंटे भी नही है अब हमें ऐसी विधियां चाहिए जिनके परिणाम तुरंत आ सके ।

यदि कोई सात दिन का निश्चय लेता है तो सात दिन के अंत में उसे लगने लगना चाहिए कि उसे कुछ हुआ है। सात दिनों में वह एक अलग व्यक्ति हो जाना चाहिए।

तो में कहता हूं आज ध्यान करो और परिणाम को तुरत अनुभव करो । अब जेट- युग है, अब ध्यान धीमी गति से नही चल सकता । अब ध्यान को भी गति पकड़नी होगी ।

 

भमिका

xi

पाठकों के लिए सुझाव

xiv

पहला खंड ध्यान के विषय में

ध्यान क्या है?

2

साक्षी है ध्यान की आत्मा

2

ध्यान की खिलावट

6

गहन मौन

6

संवेदनशीलता का विकास

7

प्रेम-ध्यान की सुवास

7

करुणा

8

अकारण सतत आनंद

8

प्रतिभा प्रत्युत्तर की क्षमता

8

एकाकीपन तुम्हारा स्वभाव है

9

तुम्हारा सच्चा स्वरूप

10

दूसरा खंड विज्ञान

विधियां और ध्यान

12

विधिया सहयोगी है

12

प्रयास से शुरू करो

13

ये विधियां सरल है

13

पहले विधि को समझ लो

14

सम्यक विधि का बोध

15

कब विधि को छोड़ना

15

कल्पना तुम्हारे लिए कार्य कर सकती है

16

साधकों के लिए प्रारंभिक सुझाव ध्यान का समय

18

ध्यान का समय

18

उपयुक्त स्थान

18

सुखपूर्वक होओ

19

रेचन से प्रारंभ करों

19

ध्यान का विज्ञान

मुक्ति हेतु दिशा-निर्देश

24

तीन अनिवार्यताएं

24

खेलपूर्ण रहो

24

धैर्य रखो

24

परिणाम मत खोजो

25

बेहोशी का भी सम्मान करो

25

यंत्र मदद देते हे परतु ध्यान निर्मित नही करते

26

तुम अनुभव नहीं हो

27

द्रष्टा साक्षी नहीं है

29

ध्यान एक गर है, एक 'नैक' है

30

तीसरा खंड ध्यान की विधियां

ओशो सक्रिय ध्यान

35

सक्रिय ध्यान क्यो

35

ओशो डाइनैमिक ध्यान रेचन और उत्सव

39

ओशो कुंडलिनी ध्यान

46

ओशो नटराज ध्यान

48

ओशो नादब्रह्म ध्यान

50

ओशो ध्यान थेरेपी

53

ओशो मिस्टिक रोज ध्यान थेरेपी

55

नो-माइंड ध्यान थेरेपी

58

ओशो बॉर्न ध्यान थेरेपी

60

ओशो रिमाइंडिंग योरसेल्फ ऑफ दि फॉरगॉटन लैग्वेज ऑफ टॉकिग टु योर बॉडी माइंड

63

सुनने की कला

66

ध्यान की विधियां

कुछ भी ध्यान बन सकता है

71

दौड़ना, जॉगिग और तैरना

73

हंसना अपान

75

हंसते हुए बुद्ध

76

धूम्रपान ध्यान

77

जिबरिश ध्यान

79

श्वास : एक सेतु - ध्यान तक

81

ओशो विपस्सना ध्यान

83

विपस्सना ध्यान के लिए निर्देश

85

श्वासों के बीच के अंतराल को देखना

86

बाजार में अंतराल को देखना

88

स्वप्न पर स्वामित्व

90

मनोदशाओं को बाहर फेंकना

92

चक्र संबंधित ध्यान-विधियां

93

ओशो चक्रा ब्रीदिंग ध्यान

95

ओशो चक्रा साउंड ध्यान

97

हृदय को खोलना

99

बुद्धि से हृदय की ओर

101

ओशो प्रार्थना ध्यान

104

शांत हृदय

106

हृदय का केंद्रीकरण

110

अतीशा की हृदय विधि

112

स्वयं से शुरू करो

113

आंतरिक केंद्रीकरण

115

ओशो व्हिरलिंग लगन

117

ध्यान की विधियां

ओशो नो-डाइमेंन्शंस ध्यान

119

अब्दुल्लाह

121

वास्तविक स्रोत की खोज

122

झंझावात का केंद्र

124

अनुभव करो''मैं हूं"

129

मैं कौन हूं ?

131

स्व-सजा के केंद्र की ओर

132

भीतर देखना

135

अंतर्दर्शन ध्यान

137

समग्रता को देखना

139

ऊर्जा का अंतर्वृत्त

141

प्रकाश पर खान

143

स्वर्णिम प्रकाश ध्यान

145

प्रकाश का हृदय

147

मध्य शरीर को देखना

149

आलोकमयी उपस्थिति

151

अंधकार पर ध्यान

153

आंतरिक अंधकार

155

आंतरिक अंधकार को बाहर लाओ

159

ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी करना

161

जीवन ऊर्जा का आरोहण- 1

163

जीवन ऊर्जा का आरोहण-2

169

ध्वनिरहित नाद का श्रवण

171

ओम् ॐ

173

ओशो देववाणी ध्यान

176

देववाणी ध्यान के लिए निर्दश

177

सगीत एक ध्यान

178

ध्वनि का केद्र

180

ध्वनि का आरंभ और अत

183

अंतस आकाश को खोज लेना

185

रिक्त आकाश में प्रवेश करो

187

सबको समाविष्ट करो

190

जेट-सेट के लिए एक ध्यान

192

विषयों की अनुपस्थिति को अनुभव करो

193

बांस की पोली पोंगरी

196

मृत्यु में प्रवेश

197

मृत्यु में प्रवेश

199

मृत्यु का उत्सव मनाना

203

तृतीय नेत्र से देखना

205

आशा गौरीशंकर ध्यान

207

ओशो मडल ध्यान

209

साक्षी को खोजना

210

पंख की भांति छूना

213

नासाग्र को देखना

216

मात्र बैठना

221

झाझेन

223

झेन की हंसी

225

प्रेम में ऊपर उठना ध्यान में एक साझेदारी

229

प्रेम का वर्तुल

233

संभोग में कंपना

235

प्रेम का आत्म-वर्तुल

237

चौथा खंड ध्यान में बाधाएं

दो कठिनाइयां

241

अहंकार

241

वाचाल मन

246

झूठी विधियां

250

ध्यान एकाग्रता नहीं है

250

ध्यान आत्मपरीक्षण नहीं है

252

मन की चालबाजियां

254

अनुभूतियो के द्वारा मत ठगे जाओ

254

मन पुन प्रवेश कर सकता है

254

मन तुम्हे छल सकता है

255

पांचवां खंड ओशो से ध्यान संबंधी

केवल साक्षी ही वास्तव में नृत्य कर सकता है

258

प्रश्नोत्तर

स्वीकार और साक्षी से मन का अतिक्रमण

262

शिखर पर खड़ा द्रष्टा

265

मन को भटकने दो तुम बस देखो

268

द्वद्वो का निर्द्वद्व साक्षी

272

सब मार्ग पर्वत शिखर पर मिल जाते है

274

रेचन के बाद सहज मौन और सृजन

276

सक्रमणकालीन अनिश्चितता और असुरक्षा

281

होश के क्षणों का संबल

284

द्रष्टा को स्थूल से सूक्ष्म की ओर गहराओ

288

साक्षित्व के बीज और अ-मन के फूल

291

साक्षित्व पर्याप्त है

295

 

ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति - (Dhyanyoga Partham aur Antim Mukti)

Item Code:
NZA650
Cover:
Hardcover
Edition:
2013
ISBN:
9788172610296
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 8.5 inch
Pages:
336
Other Details:
Weight of the Books: 780 gms
Price:
$30.00   Shipping Free
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पुस्तक के बारे में

 

इक्कीसवीं सदी का जीवन जितनी तेज गति से भाग रहा है उतनी ही तेज गति से व्यक्ति के लिए तनाव बढ़ता जा रहा है । शांत बैठकर ध्यान में उतर जाना अब उतना सरल नहीं है जितना कि बुद्ध के समय में था ।

ध्यानयोग : प्रथम और अंतिम मुक्ति ओशो द्वारा सृजित अनेक ध्यान विधियों का विस्तृत व प्रायोगिक विवरण है, विशेषत ओशो सक्रिय ध्यान विधियों व ओशो मेंडिटेटिव थेरेपीज़ का, जो कि आधुनिक जीवन के तनावों से सीधे निपटती हैं व हमें ताजा व ऊर्जावान कर जाती हैं । ओशो बहुत सी प्राचीन विधियों की भी चर्चा करते हैं : विपस्सना व झाझेन, केंद्रीकरण की विधियां, प्रकाश व अंधकार पर

ध्यान, हृदय के विकास की विधियां ।

साथ ही ओशो ध्यान संबंधी प्रश्नों के उत्तर भी देते है व हमें बताते हैं कि ध्यान क्या है, कैसे ध्यान करना शुरू करें । और कैसे अपनी अंतर-यात्रा को निर्बाध रूप से जारी रख सकें ।

भूमिका

 

विज्ञान और तकनीक, जिसने हमारे बाह्य जीवन को आमूल बदल कर रख दिया है, मूलत पश्चिम में फलित हुए है उसी प्रकार पूरब ने ऐसे विज्ञान का स्रोत दिया है जो हमारे आंतरिक जीवन को कुल सकता है।

आज बिजली के शाल्व की तरह ही ध्यान भी एक जागतिक तथ्य है-एक बाहर के जगत को प्रकाशित करता है, और दूसरा भीतर के जगत को लेकिन जागतिक हाने की प्रक्रिया में ध्यान के गिर्द बहुत सी गलत धारणाए खडी हा गई हैं कि ध्यान कोई बहुत 'धार्मिक' चीज है, कि लगन का अर्थ कठिन मुद्राओं में बैठना है, जैसे ,कि टांग को गर्दन पर लपेट कर बैठना और साथ ही साथ अपनी तकलीफ को छिपाने के लिए चेहरे पर बडे दिव्य हाव-भाव बनाए रखना या फिर ओम का गुजार या किसी मंत्र का उच्चार करना अगर आपको यह सब आकर्षित नही करता ता यह पुस्तक आपके लिए है

इस पुस्तक में ध्यान को समसामयिक जीवन का एक सहज, सामान्य व प्राकृतिक अग बनाया गया है-एक प्रमुख अंग। मूल रूप से ध्यान है जागरूक होने की कला आपके भीतर या बाहर जो कुछ भी हो रहा है उस सबक प्रति जागरूक होने की कला जब कि अपने आप में ध्यान कोई विधि नही है, लेकिन फिर भी यहा बहुत सी विधिया दी गई है जो इस होश को सीखने में आपकी सहयोगी हो सके और एक बार आपको यह कला आ जाए तो फिर आप जहा जाए वहा यत् आपके साथ चलेगी-चाहे कार्य हो, कि मनोरंजन या कुछ भी ।

हममें से अधिकाश को यही सिखाया गया है कि जीवन में सफल होने के लिए हमें संघर्ष की लड़ने की एकाग्रचित्त होने की जरूरत है इस दृष्टिकोण की समस्या यह है कि हम जितना संघर्ष करते है, उतने ही तनाव से भरते चले जाने है और जितने तनाव से हम भरते हैं, उतने ही हमारे प्रयास निष्फल होते हैं।

ध्यानपूर्ण दृष्टिकोण यह समझ देता है कि अपनी ओर से श्रेष्ठ कर पाने के लिए, हर क्षण को अपना श्रेष्ठ दे पान और हर क्षण से श्रेष्ठ ले पाने के लिए चाहिए कि हम जितने होशपूर्ण हा सके, हो । ओर होशपूर्ण हाने के लिए चाहिए विश्रांत होना।

साधारणत हम सोचते है कि विश्रांत लाने के लिए हमें बाहर गाने की जरूरत हैं ध्यान एक दूसरी सभावना देता है विश्रांत होने के लिए भीतर जाना ।

आधुनिक जीवन के दबाव ऐसे है कि इतना अशांत संसार आज तक कभी हुआ ही नहीं । लोग कभी इतने तनावग्रस्त नहीं हुए । ये विधियां आधुनिक मन के लिए ही बनाई गई है-समसामयिक लोगों के लिए समसामयिक दृष्टिकोण ।

यदि आप उच्च ऊर्जावान व्यक्ति है, यानी आपके लिए 'केवल बैठना' असंभव है तो ओशो द्वारा बनाई सक्रिय ध्यान विधियों (ओशो एक्टिव मेंडिटेशंस) को करके देखिए : जैसे कि ओशो डायनेमिक ध्यान, ओशो कुंडलिनी ध्यान । इन विधियों में आप चरम बिंदु तक स्वयं को थका देते है और फिर विश्रांति अपने आप उतर आती हैं । शायद आपके दबाए गए मनोभाव आपको शीत बैठने नहीं देते? या फिर बैठे हुए आप इतनी थकान व सुस्ती महसूस करते हैं कि जागे नहीं रह पाते? या फिर केवल आप अपने शरीर को हिलाना चाहते हैं । इन सब स्थितियों में भी ये गतिशील विधियां आपके लिए कारगर होंगी ।

अपने व्यस्ततम दिन में भी विश्रांत रह पाने की क्षमता को ही 'अप्रयास जागरूकता' कहा गया है, जो कि ध्यान का अनिवार्य अनुभव है । तो यदि आपको निश्चित रूप से लगता है कि ध्यान के लिए अलग से आप कोई समय नही निकाल पाएंगे, तो भी इस पुस्तक में बहुत सी विधियां है जिन्हे आप अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना सकते हैं ।

ध्यान एक सहज समझ पर आधारित है कि बजाय अंधकार से लड़ने के-जो कि वैसे भी असंभव है-प्रकाश को जला लो । बजाय स्वयं से लड़ने के, स्वयं को सुधारने के, दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीने के, जरूरत यह है कि हम जैसे अभी है वैसे ही अपने आप को स्वीकारें ।

ओशो अक्सर स्मरण दिलाते हैं कि यदि अस्तित्व ने हमें यहा होने के लिए आमंत्रित किया है तो जैसे हम हैं, हमें स्वयं को वैसा ही स्वीकार करने के लिए किसकी अनुमति चाहिए? एक बार हम इस स्वीकार में विश्राम पा लें, एक बार हम जैसे है उससे अन्यथा होने का ढोंग छोड़ दें, एक बार हम दूसरों को प्रभावित करने की कोशिश बंद कर दे -जो कि हमको प्रभावित करने के लिए उतनी ही कोशिश कर रहे हैं-एक बार हम स्वयं को बचाने की, स्वयं को सही सिद्ध करने की कोशिश बंद कर दें एक बार हम अपने घावों को जिन्हें हम अपने आप से भी छिपा रहे है, छिपाने की कोशिश बंद करके उन्हें खुली हवा और प्रकाश में ले आएं, तो उनके भरने की प्रक्रिया अपने आप शुरू हो जाती है ।

इस पुस्तक में आप पढेंगे मन को विश्रांत करने के बारे में, और कि कैसे इस अमूल्य जैविक कंप्यूटर को आप अपना परम मित्र बना सकते हैं, और कैसे वह बटन ढूंढ सकते हैं जिससे आप जब चाहे मन का चलना बंद कर सकें । जब आपको मन की जरूरत हो आप उसका उपयोग कर सकते है, और जब आपको उसकी जरूरत न हो आप उसे चुपचाप आराम करने दे सकते है ताकि अपने अंतहीन प्रलाप से मुक्त होकर वह ऊर्जाशील बना रहे औंर जब जरूरत हो तब बेहतर ढंग से आपका सहयोगी हो । कोई आपका अपमान करता है । जरा कल्पना करिए कि आपके पास यह चुनाव करने की क्षमता हो कि आपको कब और कैसा प्रत्युत्तर देना है... न कि साधारणत: जैसे हम तत्क्षण पलट कर जवाब देते है और उन दुष्चक्रों का निर्माण करते है जिनमें कि हमारे संबंध धीरे-धीरे डूब जाते है।

और स्वतंत्रता? इससे बड़ी स्वतंत्रता और कोई नहीं है कि हम वही हो जाएं जो हमें होना है । दूसरों की अपेक्षाओं से मुक्त हो जाने से बड़ी और कोई स्वतंत्रता नहीं हैं । इससे बड़ी कोई स्वतंत्रता नहीं है कि हम अपना जीवन सहजता व होश में जी सके ।

और ध्यान का परम विरोधाभास यही है कि अंतत: जब हम स्वयं को प्रेम करना सीख जाते है, वास्तव में जब हम स्वयं को प्रेम करना सीख जाते हैं केवल तभी हम अपना प्रेम औरों के साथ बांट सकते हैं । लेकिन शुरुआत हमें स्वयं से करनी होती है ।

इस पुस्तक में बहुत सी विधिया हैं, दृष्टिकोण है, अंतर्दृष्टियां है जो उस यात्रा के लिए हमारी मदद कर सकती हैं । हम सभी वैयक्तिक है और हर व्यक्ति के लिए अलग विधि कारगर होती है । यहां हर प्रकार के आधुनिक मन के लिए कोई न कोई विधि है, जो आज के व्यस्त जीवन के लिए विशेष रूप से तैयार की गई हैं । ओशो कहते हैं

योग की प्राचीन विधियां अब ससार के काम नही आएगी, अब लोगो के पास दिन तो छोडो घंटे भी नही है अब हमें ऐसी विधियां चाहिए जिनके परिणाम तुरंत आ सके ।

यदि कोई सात दिन का निश्चय लेता है तो सात दिन के अंत में उसे लगने लगना चाहिए कि उसे कुछ हुआ है। सात दिनों में वह एक अलग व्यक्ति हो जाना चाहिए।

तो में कहता हूं आज ध्यान करो और परिणाम को तुरत अनुभव करो । अब जेट- युग है, अब ध्यान धीमी गति से नही चल सकता । अब ध्यान को भी गति पकड़नी होगी ।

 

भमिका

xi

पाठकों के लिए सुझाव

xiv

पहला खंड ध्यान के विषय में

ध्यान क्या है?

2

साक्षी है ध्यान की आत्मा

2

ध्यान की खिलावट

6

गहन मौन

6

संवेदनशीलता का विकास

7

प्रेम-ध्यान की सुवास

7

करुणा

8

अकारण सतत आनंद

8

प्रतिभा प्रत्युत्तर की क्षमता

8

एकाकीपन तुम्हारा स्वभाव है

9

तुम्हारा सच्चा स्वरूप

10

दूसरा खंड विज्ञान

विधियां और ध्यान

12

विधिया सहयोगी है

12

प्रयास से शुरू करो

13

ये विधियां सरल है

13

पहले विधि को समझ लो

14

सम्यक विधि का बोध

15

कब विधि को छोड़ना

15

कल्पना तुम्हारे लिए कार्य कर सकती है

16

साधकों के लिए प्रारंभिक सुझाव ध्यान का समय

18

ध्यान का समय

18

उपयुक्त स्थान

18

सुखपूर्वक होओ

19

रेचन से प्रारंभ करों

19

ध्यान का विज्ञान

मुक्ति हेतु दिशा-निर्देश

24

तीन अनिवार्यताएं

24

खेलपूर्ण रहो

24

धैर्य रखो

24

परिणाम मत खोजो

25

बेहोशी का भी सम्मान करो

25

यंत्र मदद देते हे परतु ध्यान निर्मित नही करते

26

तुम अनुभव नहीं हो

27

द्रष्टा साक्षी नहीं है

29

ध्यान एक गर है, एक 'नैक' है

30

तीसरा खंड ध्यान की विधियां

ओशो सक्रिय ध्यान

35

सक्रिय ध्यान क्यो

35

ओशो डाइनैमिक ध्यान रेचन और उत्सव

39

ओशो कुंडलिनी ध्यान

46

ओशो नटराज ध्यान

48

ओशो नादब्रह्म ध्यान

50

ओशो ध्यान थेरेपी

53

ओशो मिस्टिक रोज ध्यान थेरेपी

55

नो-माइंड ध्यान थेरेपी

58

ओशो बॉर्न ध्यान थेरेपी

60

ओशो रिमाइंडिंग योरसेल्फ ऑफ दि फॉरगॉटन लैग्वेज ऑफ टॉकिग टु योर बॉडी माइंड

63

सुनने की कला

66

ध्यान की विधियां

कुछ भी ध्यान बन सकता है

71

दौड़ना, जॉगिग और तैरना

73

हंसना अपान

75

हंसते हुए बुद्ध

76

धूम्रपान ध्यान

77

जिबरिश ध्यान

79

श्वास : एक सेतु - ध्यान तक

81

ओशो विपस्सना ध्यान

83

विपस्सना ध्यान के लिए निर्देश

85

श्वासों के बीच के अंतराल को देखना

86

बाजार में अंतराल को देखना

88

स्वप्न पर स्वामित्व

90

मनोदशाओं को बाहर फेंकना

92

चक्र संबंधित ध्यान-विधियां

93

ओशो चक्रा ब्रीदिंग ध्यान

95

ओशो चक्रा साउंड ध्यान

97

हृदय को खोलना

99

बुद्धि से हृदय की ओर

101

ओशो प्रार्थना ध्यान

104

शांत हृदय

106

हृदय का केंद्रीकरण

110

अतीशा की हृदय विधि

112

स्वयं से शुरू करो

113

आंतरिक केंद्रीकरण

115

ओशो व्हिरलिंग लगन

117

ध्यान की विधियां

ओशो नो-डाइमेंन्शंस ध्यान

119

अब्दुल्लाह

121

वास्तविक स्रोत की खोज

122

झंझावात का केंद्र

124

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129

मैं कौन हूं ?

131

स्व-सजा के केंद्र की ओर

132

भीतर देखना

135

अंतर्दर्शन ध्यान

137

समग्रता को देखना

139

ऊर्जा का अंतर्वृत्त

141

प्रकाश पर खान

143

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145

प्रकाश का हृदय

147

मध्य शरीर को देखना

149

आलोकमयी उपस्थिति

151

अंधकार पर ध्यान

153

आंतरिक अंधकार

155

आंतरिक अंधकार को बाहर लाओ

159

ऊर्जा को ऊर्ध्वगामी करना

161

जीवन ऊर्जा का आरोहण- 1

163

जीवन ऊर्जा का आरोहण-2

169

ध्वनिरहित नाद का श्रवण

171

ओम् ॐ

173

ओशो देववाणी ध्यान

176

देववाणी ध्यान के लिए निर्दश

177

सगीत एक ध्यान

178

ध्वनि का केद्र

180

ध्वनि का आरंभ और अत

183

अंतस आकाश को खोज लेना

185

रिक्त आकाश में प्रवेश करो

187

सबको समाविष्ट करो

190

जेट-सेट के लिए एक ध्यान

192

विषयों की अनुपस्थिति को अनुभव करो

193

बांस की पोली पोंगरी

196

मृत्यु में प्रवेश

197

मृत्यु में प्रवेश

199

मृत्यु का उत्सव मनाना

203

तृतीय नेत्र से देखना

205

आशा गौरीशंकर ध्यान

207

ओशो मडल ध्यान

209

साक्षी को खोजना

210

पंख की भांति छूना

213

नासाग्र को देखना

216

मात्र बैठना

221

झाझेन

223

झेन की हंसी

225

प्रेम में ऊपर उठना ध्यान में एक साझेदारी

229

प्रेम का वर्तुल

233

संभोग में कंपना

235

प्रेम का आत्म-वर्तुल

237

चौथा खंड ध्यान में बाधाएं

दो कठिनाइयां

241

अहंकार

241

वाचाल मन

246

झूठी विधियां

250

ध्यान एकाग्रता नहीं है

250

ध्यान आत्मपरीक्षण नहीं है

252

मन की चालबाजियां

254

अनुभूतियो के द्वारा मत ठगे जाओ

254

मन पुन प्रवेश कर सकता है

254

मन तुम्हे छल सकता है

255

पांचवां खंड ओशो से ध्यान संबंधी

केवल साक्षी ही वास्तव में नृत्य कर सकता है

258

प्रश्नोत्तर

स्वीकार और साक्षी से मन का अतिक्रमण

262

शिखर पर खड़ा द्रष्टा

265

मन को भटकने दो तुम बस देखो

268

द्वद्वो का निर्द्वद्व साक्षी

272

सब मार्ग पर्वत शिखर पर मिल जाते है

274

रेचन के बाद सहज मौन और सृजन

276

सक्रमणकालीन अनिश्चितता और असुरक्षा

281

होश के क्षणों का संबल

284

द्रष्टा को स्थूल से सूक्ष्म की ओर गहराओ

288

साक्षित्व के बीज और अ-मन के फूल

291

साक्षित्व पर्याप्त है

295

 

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