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Books > Language and Literature > हिन्दी साहित्य > सोने की ढाल: The Gold Shield
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सोने की ढाल: The Gold Shield
सोने की ढाल: The Gold Shield
Description

प्राक्कथन

1923 से 35 ईसवी मै दो र्क मुझ हजारीबाग ज्ये मैँ रहना पड़ा था । उस समय स्वान्त सुखाय मैं कुछ काम करता था । उसी में तीन अग्रेजी उपन्यासों के अनुवाद का कान भी था । शैतान की आँख , अब निराले हीरे की खोज और विस्मृति के गर्भ में कुछ मास पहिले छप गए । अब जादू का स्म और सोने की ढाल पाठकों के सामने जा रहे है । पुणे अफसोस है, जिन ग्रन्थों के पिछले अनुवाद है, उस्का और उनके कर्ताओं का नाम मैंने नोट नहीं कर रखा, दूसरी तरफ से भी प्रयत्न करने पर मुझे नाम नही मालूम हो सके । अनुवाद में बहुत अधिक स्वतन्त्रा से काम गया है । अनुवाद सौर तिथि 16 4 1981 ई० को शुरू हुआ और 25 4 1981 ई० को समाप्त हुआ ।

 

प्रकाशकीय

हिन्दी साहित्य में महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम इतिहास प्रसिद्ध और अमर विभूतियों में गिना जाता है । राहुल जी की जन्मतिथि 9 अप्रैल, 1893 और मृत्युतिथि 14 अप्रैल, 1963 है । राहुल जी का बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डे था । बौद्ध दर्शन से इतना प्रभावित हुए कि स्वय बौद्ध हो गये । राहुल नाम तो बाद मैं पड़ा बौद्ध हो जाने के बाद । साकत्य गोत्रीय होने के कारण उन्हें राहुल सास्मायन कहा जाने लगा ।

राहुल जी का समूचा जीवन घूमक्कड़ी का था । भिन्न भिन्न भाषा साहित्य एव प्राचीन संस्कृत पाली प्राकृत अपभ्रंश आदि भाषाओं का अनवरत अध्ययन मनन करने का अपूर्व वैशिष्ट्य उनमें था । प्राचीन और नवीन साहित्य दृष्टि की जितनी पकड और गहरी पैठ राहुल जी की थी ऐसा योग कम ही देखने को मिलता है । घुमक्कड जीवन के मूल में अध्ययन की प्रवृत्ति ही सर्वोपरि रही । राहुल जी के साहित्यिक जीवन की शुरुआत सन् 1927 में होती है । वास्तविक्ता यह है कि जिस प्रकार उनके पाँव नही रुके, उसी प्रकार उनकी लेखनी भी निरन्तर चलती रही । विभिन्न विषयों पर उन्होने 150 से अधिक ग्रंथों का प्रणयन किया हैं । अब तक उनक 130 से भी अधिक ग्रंथ प्रकाशित हौ चुके है । लेखा, निबन्धों एव भाषणों की गणना एक मुश्किल काम है ।

राहुल जी के साहित्य के विविध पक्षी का देखने से ज्ञात होता है कि उनकी पैठ न केवल प्राचीन नवीन भारतीय साहित्य में थी, अपितु तिब्बती, सिंहली, अग्रेजी, चीनी, रूसी, जापानी आदि भाषाओं की जानकारी करते हुए तत्तत् साहित्य को भी उन्होंने मथ डाला। राहुल जी जब जिसके सम्पर्क मे गये, उसकी पूरी जानकारी हासिल की । जब वे साम्यवाद के क्षेत्र में गये, तो कार्ल मार्क्स लेनिन, स्तालिन आदि के राजनातिक दर्शन की पूरी जानकारी प्राप्त की । यही कारण है कि उनके साहित्य में जनता, जनता का राज्य और मेहनतकश मजदूरों का स्वर प्रबल और प्रधान है।

राहुल जी बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न विचारक हैं । धर्म, दर्शन, लोकसाहित्य, यात्रासाहित्य इतिहास, राजनीति, जीवनी, कोश, प्राचीन तालपोथियो का सम्पादन आदि विविध सत्रों मे स्तुत्य कार्य किया है। राहुल जी ने प्राचीन के खण्डहरों गे गणतंत्रीय प्रणाली की खोज की । सिंह सेनापति जैसी कुछ कृतियों मैं उनकी यह अन्वेषी वृत्ति देखी जा सकती है । उनकी रचनाओं मे प्राचीन के प्रति आस्था, इतिहास के प्रति गौरव और वर्तमान के प्रति सधी हुई दृष्टि का समन्वय देखने को मिलता है । यह केवल राहुल जी जिहोंने प्राचीन और वर्तमान भारतीय साहित्य चिन्तन को समग्रत आत्मसात् कर हमे मौलिक दृष्टि देने का निरन्तर प्रयास किया है । चाहे साम्यवादी साहित्य हो या बौद्ध दर्शन, इतिहास सम्मत उपन्यास हो या वोल्गा से गंगा की कहानियाँ हर जगह राहुल जा की चिन्तक वृत्ति और अन्वेषी सूक्ष्म दृष्टि का प्रमाण गिनता जाता है । उनके उपन्यास और कहानियाँ बिलकुल एक नये दृष्टिकोण को हमारे सामने रखते हैं।

समग्रत यह कहा जा सक्ता है कि राहुल जी न केवल हिन्दी साहित्य अपितु समूल भारतीय वाङमय के एक ऐसे महारथी है जिन्होंने प्राचीन और नवीन, पौर्वात्य एवं पाश्चात्य, दर्शन स्वं राजनीति और जीवन के उन अछूते तथ्यों पर प्रकाश डाला है जिन पर साधारणत लोगों की दृष्टि नहीं गई थी । सर्वहारा के प्रति विशेष मोह होने के कारण अपनी साम्यवादी कृतियों में किसानों, मजदूरों और मेहनतकश लोगों की बराबर हिमायत करते दीखते है ।

विषय के अनुसार राहुल जी की भाषा शैली अपना स्वरुप निधारित करती है । उन्होंने सामान्यत सीधी सादी सरल शैली का ही सहारा लिया है जिससे उनका सम्पूर्ण साहित्य विशेषकर कथा साहित्य साधारण पाठकों के लिए भी पठनीय और सुबोध है।

प्रस्तुत पुस्तक सोने की ढाल, वैचारिक धरातल पर राहुल जी का एकदम नया प्रयोग है । हिन्दी के प्रारम्भिक काल में बाबू देवकीनन्दन खत्री ने तिलस्मी और जासूसी उपन्यासो की बुनियाद डाली थी यह उसी हटी धारा को जोड्ने का ख्य सफल प्रयास है जो लेखक के बहु आयामी कर्तृव्य को प्रकट करता है । राहुल जी ने विविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है, किन्तु इस पुस्तक की विषय सामग्री काल्पनिक और रहस्य भरी है । इसके पात्र कई देशों, क्या भारत, अरब, रूस आदि के है, लेकिन उल्टे क्य के प्रति समान सोच, ईमादारी और विश्वास का भाव निहित है ।

 

विषय सूची

बेड़ा

9

सिमियन बिन इजा

15

खण्डित बाल

21

प्रोफेसर

227

नाथन की कहानी

33

बंक वाला सेठ

39

जालिया भण्डारी

45

मूसा

51

वायुयानों का अड्डा

57

नाथन गायब

63

सम्मति

69

तहखाना

74

आधी यात्रा

80

उलुवा बन

86

बन्दी घर

92

सेठ जी का मकान

97

दर्शना

102

नाथन की उन्नीसवीं जन्म तिथि

107

चर्मपत्र और ढाल

113

नाथन का काम

118

चढ़ाई

123

अड्डा

128

पेट्रा

133

ढाल की नाभि

137

उपसंहार

141

 

सोने की ढाल: The Gold Shield

Item Code:
HAA193
Cover:
Paperback
Edition:
2012
Publisher:
ISBN:
812250406x
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
143
Other Details:
Weight of the Book: 130 gms
Price:
$7.00   Shipping Free
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सोने की ढाल: The Gold Shield

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प्राक्कथन

1923 से 35 ईसवी मै दो र्क मुझ हजारीबाग ज्ये मैँ रहना पड़ा था । उस समय स्वान्त सुखाय मैं कुछ काम करता था । उसी में तीन अग्रेजी उपन्यासों के अनुवाद का कान भी था । शैतान की आँख , अब निराले हीरे की खोज और विस्मृति के गर्भ में कुछ मास पहिले छप गए । अब जादू का स्म और सोने की ढाल पाठकों के सामने जा रहे है । पुणे अफसोस है, जिन ग्रन्थों के पिछले अनुवाद है, उस्का और उनके कर्ताओं का नाम मैंने नोट नहीं कर रखा, दूसरी तरफ से भी प्रयत्न करने पर मुझे नाम नही मालूम हो सके । अनुवाद में बहुत अधिक स्वतन्त्रा से काम गया है । अनुवाद सौर तिथि 16 4 1981 ई० को शुरू हुआ और 25 4 1981 ई० को समाप्त हुआ ।

 

प्रकाशकीय

हिन्दी साहित्य में महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम इतिहास प्रसिद्ध और अमर विभूतियों में गिना जाता है । राहुल जी की जन्मतिथि 9 अप्रैल, 1893 और मृत्युतिथि 14 अप्रैल, 1963 है । राहुल जी का बचपन का नाम केदारनाथ पाण्डे था । बौद्ध दर्शन से इतना प्रभावित हुए कि स्वय बौद्ध हो गये । राहुल नाम तो बाद मैं पड़ा बौद्ध हो जाने के बाद । साकत्य गोत्रीय होने के कारण उन्हें राहुल सास्मायन कहा जाने लगा ।

राहुल जी का समूचा जीवन घूमक्कड़ी का था । भिन्न भिन्न भाषा साहित्य एव प्राचीन संस्कृत पाली प्राकृत अपभ्रंश आदि भाषाओं का अनवरत अध्ययन मनन करने का अपूर्व वैशिष्ट्य उनमें था । प्राचीन और नवीन साहित्य दृष्टि की जितनी पकड और गहरी पैठ राहुल जी की थी ऐसा योग कम ही देखने को मिलता है । घुमक्कड जीवन के मूल में अध्ययन की प्रवृत्ति ही सर्वोपरि रही । राहुल जी के साहित्यिक जीवन की शुरुआत सन् 1927 में होती है । वास्तविक्ता यह है कि जिस प्रकार उनके पाँव नही रुके, उसी प्रकार उनकी लेखनी भी निरन्तर चलती रही । विभिन्न विषयों पर उन्होने 150 से अधिक ग्रंथों का प्रणयन किया हैं । अब तक उनक 130 से भी अधिक ग्रंथ प्रकाशित हौ चुके है । लेखा, निबन्धों एव भाषणों की गणना एक मुश्किल काम है ।

राहुल जी के साहित्य के विविध पक्षी का देखने से ज्ञात होता है कि उनकी पैठ न केवल प्राचीन नवीन भारतीय साहित्य में थी, अपितु तिब्बती, सिंहली, अग्रेजी, चीनी, रूसी, जापानी आदि भाषाओं की जानकारी करते हुए तत्तत् साहित्य को भी उन्होंने मथ डाला। राहुल जी जब जिसके सम्पर्क मे गये, उसकी पूरी जानकारी हासिल की । जब वे साम्यवाद के क्षेत्र में गये, तो कार्ल मार्क्स लेनिन, स्तालिन आदि के राजनातिक दर्शन की पूरी जानकारी प्राप्त की । यही कारण है कि उनके साहित्य में जनता, जनता का राज्य और मेहनतकश मजदूरों का स्वर प्रबल और प्रधान है।

राहुल जी बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न विचारक हैं । धर्म, दर्शन, लोकसाहित्य, यात्रासाहित्य इतिहास, राजनीति, जीवनी, कोश, प्राचीन तालपोथियो का सम्पादन आदि विविध सत्रों मे स्तुत्य कार्य किया है। राहुल जी ने प्राचीन के खण्डहरों गे गणतंत्रीय प्रणाली की खोज की । सिंह सेनापति जैसी कुछ कृतियों मैं उनकी यह अन्वेषी वृत्ति देखी जा सकती है । उनकी रचनाओं मे प्राचीन के प्रति आस्था, इतिहास के प्रति गौरव और वर्तमान के प्रति सधी हुई दृष्टि का समन्वय देखने को मिलता है । यह केवल राहुल जी जिहोंने प्राचीन और वर्तमान भारतीय साहित्य चिन्तन को समग्रत आत्मसात् कर हमे मौलिक दृष्टि देने का निरन्तर प्रयास किया है । चाहे साम्यवादी साहित्य हो या बौद्ध दर्शन, इतिहास सम्मत उपन्यास हो या वोल्गा से गंगा की कहानियाँ हर जगह राहुल जा की चिन्तक वृत्ति और अन्वेषी सूक्ष्म दृष्टि का प्रमाण गिनता जाता है । उनके उपन्यास और कहानियाँ बिलकुल एक नये दृष्टिकोण को हमारे सामने रखते हैं।

समग्रत यह कहा जा सक्ता है कि राहुल जी न केवल हिन्दी साहित्य अपितु समूल भारतीय वाङमय के एक ऐसे महारथी है जिन्होंने प्राचीन और नवीन, पौर्वात्य एवं पाश्चात्य, दर्शन स्वं राजनीति और जीवन के उन अछूते तथ्यों पर प्रकाश डाला है जिन पर साधारणत लोगों की दृष्टि नहीं गई थी । सर्वहारा के प्रति विशेष मोह होने के कारण अपनी साम्यवादी कृतियों में किसानों, मजदूरों और मेहनतकश लोगों की बराबर हिमायत करते दीखते है ।

विषय के अनुसार राहुल जी की भाषा शैली अपना स्वरुप निधारित करती है । उन्होंने सामान्यत सीधी सादी सरल शैली का ही सहारा लिया है जिससे उनका सम्पूर्ण साहित्य विशेषकर कथा साहित्य साधारण पाठकों के लिए भी पठनीय और सुबोध है।

प्रस्तुत पुस्तक सोने की ढाल, वैचारिक धरातल पर राहुल जी का एकदम नया प्रयोग है । हिन्दी के प्रारम्भिक काल में बाबू देवकीनन्दन खत्री ने तिलस्मी और जासूसी उपन्यासो की बुनियाद डाली थी यह उसी हटी धारा को जोड्ने का ख्य सफल प्रयास है जो लेखक के बहु आयामी कर्तृव्य को प्रकट करता है । राहुल जी ने विविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है, किन्तु इस पुस्तक की विषय सामग्री काल्पनिक और रहस्य भरी है । इसके पात्र कई देशों, क्या भारत, अरब, रूस आदि के है, लेकिन उल्टे क्य के प्रति समान सोच, ईमादारी और विश्वास का भाव निहित है ।

 

विषय सूची

बेड़ा

9

सिमियन बिन इजा

15

खण्डित बाल

21

प्रोफेसर

227

नाथन की कहानी

33

बंक वाला सेठ

39

जालिया भण्डारी

45

मूसा

51

वायुयानों का अड्डा

57

नाथन गायब

63

सम्मति

69

तहखाना

74

आधी यात्रा

80

उलुवा बन

86

बन्दी घर

92

सेठ जी का मकान

97

दर्शना

102

नाथन की उन्नीसवीं जन्म तिथि

107

चर्मपत्र और ढाल

113

नाथन का काम

118

चढ़ाई

123

अड्डा

128

पेट्रा

133

ढाल की नाभि

137

उपसंहार

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