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Books > Hindu > हिन्दी > गुरु नानक देव: Guru Nanak Dev
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गुरु नानक देव: Guru Nanak Dev
गुरु नानक देव: Guru Nanak Dev
Description

प्राक्कथन

 

मध्यकालीन भारत में भक्ति-आन्दोलन के कर्णधारों में गुरु नानकदेव का आगमन केवल एक प्रमुख सन्त के रूप में ही नहीं हुआ था, वरन् वे अपनी सहज विचारधारा और नव-चिन्तन के बल पर देश में एक अलग मानववादी पंथ खड़ा करने वाले महापुरुष भी कहलाए । पंजाब की धरती से मानवता की जो आवाज़ उठी, उसने एक ओर तत्कालीन मुस्लिम बादशाह और नवाबों की ऐय्याशी और जन-साधारण के अमानवीय शोषण को चुनौती दी, तो दूसरी ओर पतनोन्मुखी मानवीय संवेदनाओं को पुनर्सजग करने के भरपूर प्रयास किए । गुरुदेव ने सहज विवेक से, जन पर होने वाले सामाजिक, प्रशासकीय एवं सजातीय अत्याचारों के विराध में शंखनाद किया और अपनी-अपनी जातीय सीमाओं के कष्ट में पनपती आम आदमी की जिंदगी को सहज-सरल बनाने एवं उन्हें परम शक्ति के संरक्षण का विश्वास दिलाने का महत् कर्म किया । जिज्ञासुओं को अध्यात्म के धरातल पर सत्य का पथ प्रदान किया, और श्रद्धालुओं को सत्याचरण का संदेश देकर प्रभु की शरण में समर्पित होने को प्रोत्साहित किया । गुरुदेव ने नये पंथ का बीज बोया और धीरे-धीरे पनपता हुआ वह एक विश्वव्यापी और सशक्त मानवीय स्वर बना ।

ऐसे महामानव का जीवन, उनसे सम्बद्ध घटनाएं, उनके सार्थक कर्म, लोक-चेतना को जगाने वाली लम्बी यात्राएं, विनम्र और सुदृढ़ व्यक्तित्व, जिसके सजग और सुविज्ञ तर्कों से अनगिनत विकट स्थितियों का सुलझना, इन सबसे ऊपर उनका आत्मानुभूत 'सत्य' जिसने आध्यात्मिकता की परिभाषा को कर्मकाण्ड की कारा से निकालकर जीवात्मा के अनुभूत यथार्थ की सुखद संवेदना में स्थापित किया-आदि तथ्य, भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरक अनुकरणीय और सदैव उत्साह वर्द्धक हैं । वर्तमान को उस अतीत का दर्शन करवाने, सत्पथ की प्रेरणा देने और गुरु के वास्तविक मिशन को जन-जन तक पहुँचाने की सहज श्रृंखला में एक कड़ी के रूप में प्रस्तुत है यह लघु पुस्तक ।

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ की प्रेरणा से यह पुस्तक तैयार की गई है । इसकी विशिष्टता यह है कि हमने इसमें गागर में सागर भरने का विनम्र प्रयास किया है । गुरुनानक देव का समूचा जीवन शिक्षाप्रद एवं प्रेरक घटनाओं से भरपूर है, इसलिए हमने उसमें की अतीव महत्वपूर्ण घटनाओं एवं उनके विश्लेषण-मूल्यांकन को काल-क्रम में प्रस्तुत किया है । विश्लेषण करने से हमारा उद्देश्य है जन-साधारण को घटना का प्रतीक अर्थ समझाना और सत्य की खोज में खुली आँखों को जगाने का प्रयास । गुरुनानक द्वारा दूर-दूर तक की गई यात्राओं को इसीलिए हमने 'लोक-चेतना यात्राओं' का नाम दिया है । यात्राओं के विवरण में कुछ लेखकों ने अप्रमाणिक जन्मसाखियों के आधार पर गुरुजी को ऐसे देशों में भी टहलते दिखाया है, जिसका आज तक कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हो पाया । हमने यात्रा-विवरण में उन सम्भावनाओं से परहेज किया है । जिन गाँवों, कस्बों, नगरों, प्रदेशों, देशों की चर्चा हमने की है, उनका चयन हमने अनेक अधिकारी विद्वानों की पुस्तकों से किया है । 'क्रान्तिकारी महामानव गुरुनानक देव' जिसके लेखक भाई जसबीर सिंघ हैं, ऐसी ही विशिष्ट पुस्तक है । डॉ० रत्न सिंह जग्गी, डॉ० गुरचरण सिंह पदम्, डी. त्रिलोचन सिंह, डॉ० फौज सिंह तथा ज्ञान सिंह की रचनाएं भी हमारी दिशा-निर्देशिका बनी हैं । हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि हमने गुरुजी की लोक-चेतना-यात्राओं को प्रस्तुत करते हुए श्रद्धा और विवेक, दोनों का सहारा लिया है ।

जीवन-चक्र के उपरान्त गुरुदेव के व्यक्तित्व को उजागर करने का हमारा प्रयास इसलिए सार्थक है, कि हम गुरुजी को वीतरागी, संसार-त्यागी न दिखाकर समाज और सामाजिकों के बीच एक सक्रिय घटक दिखाना चाहते हैं । महामानव नानक लोगों के मात्र परित्राणार्थ ही नहीं, बल्कि सुखद सामाजिक जीवन जीने के लिए सत्याचरण की शिक्षा देने के लिए आए थे । समाज में रहकर उन्होंने परिस्थितिजन्य टीस स्वयं महसूस की थी और फिर उसी स्वानुभव के बूते गुरुदेव ने समाज-सुधार की आवाज उठाई थी । निश्चय ही वे जाति, वर्ण, पर आधृत समाज को स्वीकृति नहीं दे पाए थे, तथापि उन्होनें गृहस्थाश्रम में रहकर प्रभु-प्राप्ति का महत् संदेश तो दिया ही था । उनके लिए समस्त मनुष्य क्योंकि एक पिता की सन्तान थे, इसलिए समान थे । फिर न कोई हिन्दू था, न मुसलमान! वे मनुष्यों को मानवीय धरातल पर नैतिक साँचे में ढला देखना चाहते थे । और इसके लिए वे भाषण में नहीं, कर्म में विश्वास रखते थे । इसी में उनका पावन व्यक्तित्व उभरता है।

गुरुनानकदेव भले विद्यालय में जाकर पुरोहितों-मौलवियों की शिष्यता में अधिक लिखे-पढ़े न थे, तथापि मानवीय संवेदनाएं और काव्य-प्रतिभा उनमें खूब थी । उसी आधार पर आपने अनेक काव्य-रचनाओं को आकार दिया, जो गुरु ग्रंथ साहिब में 'महला-' की बाणी के अन्तर्गत संकलित हैं । हमने इस छोटी-सी रचना में भी गुरुजी की सभी गुरु-लघु रचनाओं का परिचयात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है । हम जानते हैं कि गुरुदेव की समृद्ध काव्य-कला एवं अभिव्यंजना-कौशल को जानने के लिए विस्तार और गहनता अपेक्षित है, किन्तु हमारी कलेवर-सीमाएं इसमें बाधक थीं । तथापि गुरुजी की समूची बाणी का दिग्दर्शन तो यहाँ करवाया ही गया गुरुनानक देव जी के 'जीवन-दर्शन' की अनुपस्थिति में यह लघु कृति अधूरी ही रह जाती, इसलिए हमने गुरुजी की सोच, नवचेतना के सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पक्षों को शाब्दिक भूमि प्रदान की है । गुरुजी महामानव होने के साथ-साथ लोक-नायक भी थे । उन्होंने अपने ही जीवन की प्रामाणिकता के माध्यम से लोक के लिए वे उच्च स्तरीय महान निधियाँ प्रादान की हैं, जो मनुष्यों को परमात्मा बना देने में सहयोगी हैं । गुरुदेव धरती पर स्वर्ग का संदेश लेकर नहीं आए थे, उनका लक्ष्य तो धरती को ही स्वर्ग बना देने का था । इसके लिए उन्होंने मात्र दो पहलुओं का प्रचार-प्रसार किया और 'गुरु की शरण' एवं 'प्रभु-नाम-सिमरण' के दो अमोघ शस्त्रों से संसार-समाज की समूची विकटता, मलिनता और मायावी-तन्त्र के साथ भिड़ जाने का संदर्भ पेश किया । यही उन्हें पुरुष से पुरुषोत्तम बना देने में समर्थ है । अन्त में 'समापन' सन्दर्भ में हमने गुरुजी की बाणी को आधार बनाकर उनके जीवन-दर्शन एवं व्यक्तित्व का उपसंहार प्रस्तुत किया है ।

इस प्रकार यह लघु रचना गुरुदेव के समूचे मानवीय सरोकारों को पाठक के सम्मुख विश्लेषण एवं मूल्यांकन के माध्यम से पेश करती है । हमारा विश्वास है कि सीमित कलेवर में गुरुनानकदेव के सम्बन्ध में यथासम्भव हमने चर्चा-योग्य बिन्दुओं और मुद्दों को अध्ययन-विषय बना लिया है । तथापि यदि कोई पहलू छूट गया हो, तो विद्वन्मण्डल हमारी सीमाओं का ध्यान रखते हुए हमें क्षमा-दान दे।

इस पुस्तक पर कार्य करते हुए सचमुच मैनें कईओं के अधिकारों का उातिक्रमण किया है, किन्तु स्नेहवश उन्होंने मेरी धृष्टता की उपेक्षा कर दी है । मैं उनका हार्दिक आभारी हूँ । उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ के प्रति भी मैं आभार लापित करता हूँ जिन्होनें मुझे इस रचना की प्रेरणा दी और स्वयं इसे प्रकाशित करने का दायित्व निभाया ।

विषय सूची

1

पृष्ठभूमि : युग-युग सम्भव

1

2

आरम्भिक जीवन-चरित

7

जन्म, बाल्यावस्था और विद्याध्ययन, यज्ञोपवीत संस्कार तथा अन्य छिटपुट घटनाएं ।

तलवंडी से बाहर: सुल्तानपुर में (दिनचर्या, विवाह, सन्तान, बेई नदी प्रसंग, यात्राओं की तैयारी)

3

गुरु नानकदेव की प्रथम लोक-चेतना यात्रा

27

4

गुरु नाननदेव की द्वितीय लोक-चेतना यात्रा

66

5

गुरु नानकदेव की तृतीय लोक चेतना यात्रा

81

6

गुरु नानकदेव की चौथी लोक चेतना यात्रा

93

7

गुरु नानकदेव का करतारपुर निवास

102

भाई लहणा क्त आश्रम में आगमन, उत्तराधिकारी के चुनाव

के लिए परीक्षा, उत्तराधिकारी की घोषणा, ज्योति जोति समाना

8

गुरु नानकदेव का व्यक्तित्व

113

9

गुरु नानकदेव की रचनाएं

122

लम्बी रचनाएं, वारें, वर्णमालाषारित कृतियां,

कालपरक संज्ञात्मक कृतियां, फुटकर पद ।

10

गुरु नानकदेव का जीवन-दर्शन :

141

सामाजिक चिन्तन, धार्मिक चिन्तन,

राजनीतिक राष्ट्रीय चिन्तन, दार्शनिक चिन्तन

11

समापन

173

 

गुरु नानक देव: Guru Nanak Dev

Item Code:
NZA501
Cover:
Paperback
Edition:
2009
ISBN:
9788189989286
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
189
Other Details:
Weight of the Book:250 gms
Price:
$10.00
Discounted:
$7.50   Shipping Free
You Save:
$2.50 (25%)
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प्राक्कथन

 

मध्यकालीन भारत में भक्ति-आन्दोलन के कर्णधारों में गुरु नानकदेव का आगमन केवल एक प्रमुख सन्त के रूप में ही नहीं हुआ था, वरन् वे अपनी सहज विचारधारा और नव-चिन्तन के बल पर देश में एक अलग मानववादी पंथ खड़ा करने वाले महापुरुष भी कहलाए । पंजाब की धरती से मानवता की जो आवाज़ उठी, उसने एक ओर तत्कालीन मुस्लिम बादशाह और नवाबों की ऐय्याशी और जन-साधारण के अमानवीय शोषण को चुनौती दी, तो दूसरी ओर पतनोन्मुखी मानवीय संवेदनाओं को पुनर्सजग करने के भरपूर प्रयास किए । गुरुदेव ने सहज विवेक से, जन पर होने वाले सामाजिक, प्रशासकीय एवं सजातीय अत्याचारों के विराध में शंखनाद किया और अपनी-अपनी जातीय सीमाओं के कष्ट में पनपती आम आदमी की जिंदगी को सहज-सरल बनाने एवं उन्हें परम शक्ति के संरक्षण का विश्वास दिलाने का महत् कर्म किया । जिज्ञासुओं को अध्यात्म के धरातल पर सत्य का पथ प्रदान किया, और श्रद्धालुओं को सत्याचरण का संदेश देकर प्रभु की शरण में समर्पित होने को प्रोत्साहित किया । गुरुदेव ने नये पंथ का बीज बोया और धीरे-धीरे पनपता हुआ वह एक विश्वव्यापी और सशक्त मानवीय स्वर बना ।

ऐसे महामानव का जीवन, उनसे सम्बद्ध घटनाएं, उनके सार्थक कर्म, लोक-चेतना को जगाने वाली लम्बी यात्राएं, विनम्र और सुदृढ़ व्यक्तित्व, जिसके सजग और सुविज्ञ तर्कों से अनगिनत विकट स्थितियों का सुलझना, इन सबसे ऊपर उनका आत्मानुभूत 'सत्य' जिसने आध्यात्मिकता की परिभाषा को कर्मकाण्ड की कारा से निकालकर जीवात्मा के अनुभूत यथार्थ की सुखद संवेदना में स्थापित किया-आदि तथ्य, भावी पीढ़ियों के लिए प्रेरक अनुकरणीय और सदैव उत्साह वर्द्धक हैं । वर्तमान को उस अतीत का दर्शन करवाने, सत्पथ की प्रेरणा देने और गुरु के वास्तविक मिशन को जन-जन तक पहुँचाने की सहज श्रृंखला में एक कड़ी के रूप में प्रस्तुत है यह लघु पुस्तक ।

उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ की प्रेरणा से यह पुस्तक तैयार की गई है । इसकी विशिष्टता यह है कि हमने इसमें गागर में सागर भरने का विनम्र प्रयास किया है । गुरुनानक देव का समूचा जीवन शिक्षाप्रद एवं प्रेरक घटनाओं से भरपूर है, इसलिए हमने उसमें की अतीव महत्वपूर्ण घटनाओं एवं उनके विश्लेषण-मूल्यांकन को काल-क्रम में प्रस्तुत किया है । विश्लेषण करने से हमारा उद्देश्य है जन-साधारण को घटना का प्रतीक अर्थ समझाना और सत्य की खोज में खुली आँखों को जगाने का प्रयास । गुरुनानक द्वारा दूर-दूर तक की गई यात्राओं को इसीलिए हमने 'लोक-चेतना यात्राओं' का नाम दिया है । यात्राओं के विवरण में कुछ लेखकों ने अप्रमाणिक जन्मसाखियों के आधार पर गुरुजी को ऐसे देशों में भी टहलते दिखाया है, जिसका आज तक कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं हो पाया । हमने यात्रा-विवरण में उन सम्भावनाओं से परहेज किया है । जिन गाँवों, कस्बों, नगरों, प्रदेशों, देशों की चर्चा हमने की है, उनका चयन हमने अनेक अधिकारी विद्वानों की पुस्तकों से किया है । 'क्रान्तिकारी महामानव गुरुनानक देव' जिसके लेखक भाई जसबीर सिंघ हैं, ऐसी ही विशिष्ट पुस्तक है । डॉ० रत्न सिंह जग्गी, डॉ० गुरचरण सिंह पदम्, डी. त्रिलोचन सिंह, डॉ० फौज सिंह तथा ज्ञान सिंह की रचनाएं भी हमारी दिशा-निर्देशिका बनी हैं । हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि हमने गुरुजी की लोक-चेतना-यात्राओं को प्रस्तुत करते हुए श्रद्धा और विवेक, दोनों का सहारा लिया है ।

जीवन-चक्र के उपरान्त गुरुदेव के व्यक्तित्व को उजागर करने का हमारा प्रयास इसलिए सार्थक है, कि हम गुरुजी को वीतरागी, संसार-त्यागी न दिखाकर समाज और सामाजिकों के बीच एक सक्रिय घटक दिखाना चाहते हैं । महामानव नानक लोगों के मात्र परित्राणार्थ ही नहीं, बल्कि सुखद सामाजिक जीवन जीने के लिए सत्याचरण की शिक्षा देने के लिए आए थे । समाज में रहकर उन्होंने परिस्थितिजन्य टीस स्वयं महसूस की थी और फिर उसी स्वानुभव के बूते गुरुदेव ने समाज-सुधार की आवाज उठाई थी । निश्चय ही वे जाति, वर्ण, पर आधृत समाज को स्वीकृति नहीं दे पाए थे, तथापि उन्होनें गृहस्थाश्रम में रहकर प्रभु-प्राप्ति का महत् संदेश तो दिया ही था । उनके लिए समस्त मनुष्य क्योंकि एक पिता की सन्तान थे, इसलिए समान थे । फिर न कोई हिन्दू था, न मुसलमान! वे मनुष्यों को मानवीय धरातल पर नैतिक साँचे में ढला देखना चाहते थे । और इसके लिए वे भाषण में नहीं, कर्म में विश्वास रखते थे । इसी में उनका पावन व्यक्तित्व उभरता है।

गुरुनानकदेव भले विद्यालय में जाकर पुरोहितों-मौलवियों की शिष्यता में अधिक लिखे-पढ़े न थे, तथापि मानवीय संवेदनाएं और काव्य-प्रतिभा उनमें खूब थी । उसी आधार पर आपने अनेक काव्य-रचनाओं को आकार दिया, जो गुरु ग्रंथ साहिब में 'महला-' की बाणी के अन्तर्गत संकलित हैं । हमने इस छोटी-सी रचना में भी गुरुजी की सभी गुरु-लघु रचनाओं का परिचयात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया है । हम जानते हैं कि गुरुदेव की समृद्ध काव्य-कला एवं अभिव्यंजना-कौशल को जानने के लिए विस्तार और गहनता अपेक्षित है, किन्तु हमारी कलेवर-सीमाएं इसमें बाधक थीं । तथापि गुरुजी की समूची बाणी का दिग्दर्शन तो यहाँ करवाया ही गया गुरुनानक देव जी के 'जीवन-दर्शन' की अनुपस्थिति में यह लघु कृति अधूरी ही रह जाती, इसलिए हमने गुरुजी की सोच, नवचेतना के सामाजिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पक्षों को शाब्दिक भूमि प्रदान की है । गुरुजी महामानव होने के साथ-साथ लोक-नायक भी थे । उन्होंने अपने ही जीवन की प्रामाणिकता के माध्यम से लोक के लिए वे उच्च स्तरीय महान निधियाँ प्रादान की हैं, जो मनुष्यों को परमात्मा बना देने में सहयोगी हैं । गुरुदेव धरती पर स्वर्ग का संदेश लेकर नहीं आए थे, उनका लक्ष्य तो धरती को ही स्वर्ग बना देने का था । इसके लिए उन्होंने मात्र दो पहलुओं का प्रचार-प्रसार किया और 'गुरु की शरण' एवं 'प्रभु-नाम-सिमरण' के दो अमोघ शस्त्रों से संसार-समाज की समूची विकटता, मलिनता और मायावी-तन्त्र के साथ भिड़ जाने का संदर्भ पेश किया । यही उन्हें पुरुष से पुरुषोत्तम बना देने में समर्थ है । अन्त में 'समापन' सन्दर्भ में हमने गुरुजी की बाणी को आधार बनाकर उनके जीवन-दर्शन एवं व्यक्तित्व का उपसंहार प्रस्तुत किया है ।

इस प्रकार यह लघु रचना गुरुदेव के समूचे मानवीय सरोकारों को पाठक के सम्मुख विश्लेषण एवं मूल्यांकन के माध्यम से पेश करती है । हमारा विश्वास है कि सीमित कलेवर में गुरुनानकदेव के सम्बन्ध में यथासम्भव हमने चर्चा-योग्य बिन्दुओं और मुद्दों को अध्ययन-विषय बना लिया है । तथापि यदि कोई पहलू छूट गया हो, तो विद्वन्मण्डल हमारी सीमाओं का ध्यान रखते हुए हमें क्षमा-दान दे।

इस पुस्तक पर कार्य करते हुए सचमुच मैनें कईओं के अधिकारों का उातिक्रमण किया है, किन्तु स्नेहवश उन्होंने मेरी धृष्टता की उपेक्षा कर दी है । मैं उनका हार्दिक आभारी हूँ । उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ के प्रति भी मैं आभार लापित करता हूँ जिन्होनें मुझे इस रचना की प्रेरणा दी और स्वयं इसे प्रकाशित करने का दायित्व निभाया ।

विषय सूची

1

पृष्ठभूमि : युग-युग सम्भव

1

2

आरम्भिक जीवन-चरित

7

जन्म, बाल्यावस्था और विद्याध्ययन, यज्ञोपवीत संस्कार तथा अन्य छिटपुट घटनाएं ।

तलवंडी से बाहर: सुल्तानपुर में (दिनचर्या, विवाह, सन्तान, बेई नदी प्रसंग, यात्राओं की तैयारी)

3

गुरु नानकदेव की प्रथम लोक-चेतना यात्रा

27

4

गुरु नाननदेव की द्वितीय लोक-चेतना यात्रा

66

5

गुरु नानकदेव की तृतीय लोक चेतना यात्रा

81

6

गुरु नानकदेव की चौथी लोक चेतना यात्रा

93

7

गुरु नानकदेव का करतारपुर निवास

102

भाई लहणा क्त आश्रम में आगमन, उत्तराधिकारी के चुनाव

के लिए परीक्षा, उत्तराधिकारी की घोषणा, ज्योति जोति समाना

8

गुरु नानकदेव का व्यक्तित्व

113

9

गुरु नानकदेव की रचनाएं

122

लम्बी रचनाएं, वारें, वर्णमालाषारित कृतियां,

कालपरक संज्ञात्मक कृतियां, फुटकर पद ।

10

गुरु नानकदेव का जीवन-दर्शन :

141

सामाजिक चिन्तन, धार्मिक चिन्तन,

राजनीतिक राष्ट्रीय चिन्तन, दार्शनिक चिन्तन

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