Please Wait...

भारतीय दंतकथाए: Indian Folktales

पुस्तक के विषय में

उसने जब अपने पिता को वह बाल दिखायाऔर उस बाल के मालिक से विवाह करने अपनी इच्छा जताई तो राजा ने उस व्यक्ति को खोजने में अपना पूरा जोर लगा दियां अंतत: उसके सैनिकों ने चरवाहे को खोज निकाला और उसे राजा के महल में चलने को कहा। उसे कहा, "मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगा।"

उन्होंने उसे खींचने का प्रयास किया, परंतु उसने अपनी बाँसुरी बजाई और सभी गायें भागती हुई आईं। उन्होंने सैनिकों पर आक्रमण कर दिया और उन्हें खदेड़कर भगा दिया।

जब उन्होंने राजा को यह बाताया कि वहाँ क्या हुआ था तो राजा ने अपने पालतू कौओं को बाँसुरी लाने के लिए भेजा। वे आए और वटवृक्ष पर अड्डा जमा लिया। वे बहुत शोर मचाने लगे। चरवाहे ने उन पर पत्थर फेंका परंतु उन्हें वहाँ से दूर नहीं भगा सका। अंतत: वह इतना क्रोधित हो गया कि उसने बाँसुरी उन फेंक दी। उनमें से एक कौए ने उसे सावधानी से अपनी चोंच से पकड़ा और उड़ गया।

लेखक के विषय में

रस्किन बॉण्ड मसूरी में रहनेवाले जाने-माने लेखक और विख्यात कहानीकार हैं। पिछले पचास वर्षों से वे उपन्यास, कविता, निबंध व लघुकथाएँ लिख रहे हैं।

उनकी 'टेल्स एंड लेजेंड्स फ्रॉम', 'एंग्री रिवर', 'स्ट्रेंज मेन स्ट्रेंज प्लेसेज', 'दि ब्ल्यू अंब्रेला', 'ए लाँग वाक फ्राँर बीना' और 'हनुमान टु दि रेस्क्यू', भी रूपा पेपरबैक में उपलब्ध हैं।

रस्किन बॉण्ड की पुस्तक 'चिल्ड्रंस ओमनीबस' को अनेक वर्षों से बच्चों ने बहुत पसंद किया। 'घोस्ट स्टोरीर फ्रॉम दि राज', 'दि रूपा बुक ऑफ ग्रेट एनीमल स्टोरीज', 'दि रूपा बुक ऑफ ट्रू टेल्स ऑफ मिस्ट्री एंड एडवेंचर', 'दि रूपा बुक ऑफ रस्किन बॉण्ड्स हिमालयन टेल्स', 'दि रूपा बुक ऑफ ग्रेट सस्पेंस स्टोरीज', 'दि रूपा लाफ्टर ओमनीबस', 'दि रूपा बुक ऑफ स्केरी स्टोरीज', 'दि रूपा बुक ऑफ हॉन्टेड हाउजिज', 'दि रूपा बुक ऑफ ट्रेवलर्स टेल्स', आदि रूपा से प्रकाशित उनके संकलन हैं।

अपने असाधारण साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें 1957 में जॉन लीवेलियन राइस मेमोरियल पुरस्कार 1992 में साहित्य अकादमी अवार्ड (भारत में अंग्रेजी भाषा में लेखन के लिए) और 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

प्रस्तावना

शहरजाद, जिसका जीवन अरेबियन रातों में एक के बाद दूसरी कहानी सुनाने की उसकी योग्यता पर निर्भर था । निश्चित ही मैंने भी अपना अधिकतर जीवन किस्सागोई को समर्पित किया है । यद्यपि मुझे समय पर कुछ पूरा न कर पाने से दंड का भय नहीं था, परंतु मेरा जीवन हर तरह से मेरी किस्सागोई पर निर्भर करती है । यही एक बेहतर और अकेला रास्ता था जिससे मैं अपनी जीविका अर्जित कर सकता था और मैंने अपने कार्य के लिए हिमालय की तराई स्थित अपने निवास स्थान को चुना।

पच्चीस वर्षों से ज्यादा समय से, जब मैं छोटा था और शिमला के विद्यालय से निकला था, तब से मैं एक व्यावसायिक कथावाचक रहा हूँ- लघुकथाएँ लंबी कथाएँ लोक कथाएँ सत्य कथाएँ खत्म न होनेवाली कथाएँ आदि...मैं अब भी शहरजाद की एक हजार एक कहानियों से बहुत दूर हूँ । फिर भी मेरे ऊपर किसी जल्लाद की जहरबुझी कुल्हाड़ी नहीं थी । मेरी प्रेरणा थी : कि मैं किराया चुका सकूँ, पुस्तकें खरीद सकूँ और रात के खाने में कभी-कभी मुर्गी का मांस खा सकूँ जिसे प्रेम सिंह ने पकाया हो । मेरी कहानी लिखने से वह मुर्गी का मांस बनाता है । प्रेम और उसका परिवार मेरे साथ रहता है और यह उसके बच्चे ही हैं जो बराबर कहानियों की माँग करते रहते हैं और मुझे नई कहानियों को ढूँढने अथवा पुरानी कहानियों को फिर से निकालने को प्रोत्साहित करते हैं, जैसे इस संग्रह में है।मेरी पुरानी कहानियाँ तब की लिखी हुई हैं जब मैं बीस साल का था। वे कहानियाँ भारत में मेरे बचपन और कुछ उन लोगों के बारे में हैं जिन्हें मैंने बड़ा होते हुए जाना था। उसके बाद उम्र के तीसवें साल में मैंने दूसरे भारतीय बच्चों के बारे में लिखा। उनमें से कुछ 'बाजार की सड़क' (The Road to Bazaar) में हैं जिसे जूलिया मैक्रै (Julia Macrae) ने भी प्रकाशित किया । अब अपने चालीस पार की उम्र में मैं स्वयं को बहुत पीछे जाता हुआ पाता हूँ एक ऐसे समय में जहाँ मिथक, दंतकथाओं और लोककथाओं के नौजवान नायक और नायिकाएँ हैं, देव और दानव हैं । यद्यपि मेरे पिता एक अंग्रेज थे परंतु मैं एक भारतीय की तरह बड़ा हुआ और सदा पूर्व और पश्चिम दोनों के साहित्य का आनंद लिया। यहाँ निष्ठा का विभाजन नहीं है; केवल एक दोहरा उत्तराधिकार है।

लोककथा में मेरी रुचि का श्रेय कुछ हद तक मेरे मित्र अनिल सिंह की माता को जाता है जिनका पुश्तैनी घर आगरा के पास एक गाँव में है । हिमालय की वादियों में रहने से कई साल पहले मैंने अपने मित्र के मैदानी गाँव में एक जाड़ा बिताया था (जातक की लोकोक्तियों पर काम करने के दौरान)। वहाँ जल्द ही मुझे पता चला कि उसकी माता जी के पास लोककथाओं का अपार भंडार है। उन्हें शाम की गोधूलि बेला में मुझे कहानियाँ सुनाने से अधिक अच्छा कुछ नहीं लगता था। भारतीय संदर्भ में गोधूली बेला का मतलब उस समय से है जब गायें चरकर लौटती हैं और आसमान उनके पैरों से उड़ाई गई धूल के कारण धुँधला हो जाता है-यह उनके हमारे खातिर रात का खाना पकाने के लिए उनके अंदर (रसोई मे) जाने से पहले का समय होता था। वह आँगन में एक तारवाली खटिया पर लेटती थी, हुक्का गुड़गुड़ाती थी और भूतों, परियों और अन्य परिचितों की पुरानी कहानियाँ याद करती थीं। उनमें से दो अथवा तीन कथाएँ इस संग्रह में हैं। वहाँ और कई कथाएँ थीं परंतु एक व्यापक संग्रह के लिए जगह बनाना था-ऐसी कथाएँ जो देश के विभिन्न जगहों का प्रतिनिधित्व करती हो, जो विभिन्न मतों का प्रतिनिधित्व करती हों, जो आदिवासियों, राजाओं और आम लोगों का प्रतिनिधित्व करती हों । मैंने महान हिंदू धार्मिक महाकाव्य 'महाभारत' का गहन अध्ययन कियाहै जिसमें मोहित कर देनेवाली कई कथाएँ मिलती हैं। मैंने जातक की बौद्ध- कथाएँ और भारतीय तथा ब्रिटिशों द्वारा किए गए लोककथाओं के शुरुआती अनुवादों का गहन अध्ययन किया है। टिप्पणी खंड को भी मैंने उतनी ही सावधानी से एकत्रित किया है जितनी कहानियों के पुनर्लेखन में ध्यान रखा है, एकत्रित किया है जैसा मैंने दुबारा कहानियाँ सुनाई हैं। मैंने कथाओं की पृष्ठभूमि और स्रोत दिया है।

मैं सौभाग्यशाली हूँ कि पहाड़ों में रहता और कार्य करता हूँ। हिमालय की बर्फ से ढँकी महिमामयी चोटियों को देखते हुए-उन्हीं चोटियों को जिसमें हिंदू पौराणिक कथाओं के देव और देवियाँ निवास करते थे। मैं और अधिक सौभाग्यशाली हूँ कि पहाड़ों में रहते हुए भारत के मैदानों को देख पाने में समर्थ हूँ; यह विशिष्ट लक्षणवाले व्यक्तियों के समुदाय और धर्मों का एक बदलाव है, जहाँ बहुत कुछ घटित हुआ है और अब भी होता है जिससे मन और दिमाग, दोनों उत्साहित होते हैं । भारत एक भूभाग से कहीं ज्यादा एक वातावरण है। इस पुस्तक का उद्देश्य पाठक को भारत का अनुभव कराना और इसके पुराने जादू को पुन: उपलब्ध कराना है।

 

अनुक्रम

 

1

प्रस्तावना

11

2

महाकाव्यों की कथाएँ

15-53