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प्रेरक प्रसंग (मानव-वाटिका के सुरभित पुष्प): Inspiring Episodes

प्रेरक प्रसंग (मानव-वाटिका के सुरभित पुष्प):  Inspiring Episodes
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प्रेरक प्रसंग (मानव-वाटिका के सुरभित पुष्प): Inspiring Episodes

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Item Code: NZA946
Author: शरद् चन्द्र पेंढारकर (Shard Chandra Pendharkar)
Publisher: Advaita Ashram
Language: Hindi
Edition: 2012
ISBN: 9788175053243
Pages: 316
Cover: Paperback
Other Details: 8.5 inch X 5.5 inch
weight of the book:300 gms
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प्रकाशकीय

रामकृष्ण मिशन विवेकानन्द आश्रम, रायपुर (छत्तीसगढ़) से प्रकाशित होने वाली हिन्दी त्रैमासिक (अब मासिक) पत्रिका 'विवेक-ज्योति' में विभिन्न धर्मों के सन्तों तथा अनेक महापुरुषो कै जीवन की प्रेरक घटनाएँ 'मानव-वाटिका के सुरभित पुष्प' शीर्षक के साथ अनेक वर्षो तक धारावाहिक रूप से प्रकाशित होती थी । श्री शरद चन्द्र पेढारकर की कुशल लेखनी से सजकर ये प्रेरक-प्रसंग सचमुच ही मानव-वाटिका के ऐसे महकते फूल बन गये है, जिनका सौरभ प्रत्येक मानव के जीवन को सुवासित कर उसे उदात्त बना सकता है।

पाठको ने इस लेखमाला को बहुत पसन्द किया और बहुतो की माँग थी कि इसे पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाय, ताकि अधिकाधिक लोग इसका लाभ उठा सकें । इन्दौर के एक भक्त श्री अरविन्द कुमार गुप्ता के आर्थिक सहयोग से 1987 . में इन्हे 'मानव-वाटिका के सुरभित पुष्प' नाम से तीन गुच्छों के रूप में रायपुर आश्रम से प्रकाशित किया गया था, जिनमें क्रमश: 164, 131 तथा 121 प्रसंग लिये गये थे । 1915 . में उन्ही की सलाह तथा सहयोग से 16 और भी प्रसंग जोड़कर उन्हें 'प्रेरक-प्रसंग' नाम से अखण्ड संस्करण के रूप में निकाला गया । इनमें में कुछ पुनरुक्तियों को निकाल दिया गया था।

तब से अब तक इसके कुल नौ संस्करणों के माध्यम से इसकी कुल 57,000 प्रतियाँ मुद्रित हो चुकी है । यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि पाठको ने इस ग्रन्थ को किस प्रकार हाथो-हाथ अपनाया है। पुस्तक का सम्पादन कार्य ब्रह्मलीन स्वामी आत्मानन्दजी तथा 'विवेक-ज्योति' पत्रिका के वर्तमान सम्पादक स्वामी विदेहात्मानन्दजी द्वारा हुआ है।

इसे और भी अधिक लोकप्रिय बनाने हेतु अब इसे अद्वैत आश्रम से प्रकाशित करते हुए हमें विशेष प्रसन्नता हो रही है । प्रकाशनार्थ अनुमति प्रदान करने के लिए हम रायपुर आश्रम के सचिव स्वामी सत्यरूपानन्दजी के विशेष आभारी है । मानव-वाटिका के ये सुरभित पुष्प अपनी गमकती महक से मनुष्य की धर्मान्धता और मतान्धता की उबकाई लानेवाले दुर्गन्ध से रक्षा करके उसे सही अर्थो में 'मनुष्य' बना दे, यही इस प्रकाशन के पीछे हमारा उद्देश्य है। यदि थोड़ी-सी भी मात्रा में हमारा यह उद्देश्य सध सका, तो हम अपना श्रम सार्थक मानेंगे ।

 

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