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Books > Hindu > हिन्दी > स्वामी विज्ञानानन्द के प्रेरक प्रसंग: Inspriring Incidents from the Life of Swami Vijnananda
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स्वामी विज्ञानानन्द के प्रेरक प्रसंग: Inspriring Incidents from the Life of Swami Vijnananda
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स्वामी विज्ञानानन्द के प्रेरक प्रसंग: Inspriring Incidents from the Life of Swami Vijnananda
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Description

प्रकाशकीय

'स्वामी विज्ञानानन्द के प्रेरक प्रसंग' पाठको के सामने प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष का अनुभव हो रहा है। यह मूल बंगला ग्रन्थ 'सत्यसंगे स्वामी विज्ञानानन्द' का हिन्दी अनुवाद है, जिसके दो संस्करण रामकृष्ण मठ, इलाहाबाद से प्रकाशित हुए थे । मूल पन्थ के संकलक स्वामी अपूर्वानन्द जी ने तथ्यों का संग्रह पूज्यपाद स्वामी विज्ञानानन्दजी महाराज के सेवक-वृन्द तथा भक्तों से किया था।

रामकृष्ण मठ तथा रामकृष्ण मिशन के सप्तम अध्यक्ष, श्रीमत् स्वामी शंकरानन्द जी महाराज ने पुस्तक की सारगर्भित भूमिका प्रस्तुत करते हुए स्वामी विज्ञानानन्द जी के जीवन के विशिष्ट पहलुओं पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है।

हम श्रीमती मधूलिका श्रीवास्तव के आभारी हैं जिन्होंने मूल बंगला यन्त्र का अनुवाद बड़ी निष्ठा के साथ किया है। इसके सम्पादन तथा प्रूफ-संशोधन में श्रीमती मधु दर और श्रीमती रंजना खन्ना का विशेष सहयोग मिला है। पुस्तक के मुखपृष्ठ का डिज़ाइन श्री शुभव्रत चन्द्र ने किया है। रामकृष्ण मठ, इलाहाबाद के अध्यक्ष स्वामी निखिलात्मानन्द जी के प्रति भी हम कृतज्ञता शापित करते हैं जिन्होंने मूल ग्रन्थ के हिन्दी अनुवाद को प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान की।

यह ग्रन्थ पाठकों में दिव्य आध्यात्मिक चेतना का संचार कर उन्हें भगवतोन्मुखी बनाएगा, ऐसी आशा है।

भूमिका

स्वामी विज्ञानानन्द महाराज का जीवन आद्योपान्त पवित्रता, त्याग, अचलभक्ति, निष्ठा और पूर्ण आत्मनिर्भरता आदि के आदर्शों से महिमामंडित है।

एक दिन स्कूल से घर लौटते समय वे दक्षिणेश्वर में स्थित रानी रासमणि के मन्दिर में, जहाँ परमहंस या 'पगला ब्राह्मण' रहते थे, गए। उनके कमरे के सामने पहुँचते ही परमहंसदेव ने उन्हे प्रेम से अपने पास बुलाया। परमहंसदेव को प्रणाम करने पर उन्होंने पूछा, 'तुम्हारा घर कहाँ है, तुम्हारा नाम क्या है' इत्यादि और बोले, 'तुम तो अपने ही आदमी हो।' बाद में परमहंसदेव उन्हें अपनी विभिन्न प्रकार की साधनाओ और दर्शन आदि की बातें बताने लगे । इसी प्रसंग में उन्होंने कहा, 'माँ' का दर्शन होने के बाद मुझे लगा, माँ ने मुझे सचमुच ही दर्शन दिए है या मुझे झॉसा दिया है? यदि सचमुच दर्शन दिए है तब यह (नौबतखाने के सामने पड़ा हुआ) पत्थर नाचेगा। यह बात मन में उठते ही वह पत्थर नाचने लगा। 'यह सुनकर हरिप्रसन्न मन ही मन सोचने लगा, 'लोग इन्हें जो पागल कहते हैं, वह ठीक ही है। भला पत्थर भी कभी नाचता है?' उसके बाद परमहंसदेव मनुष्य जीवन के उद्देश्य तथा किस प्रकार जीवन परिचालित करने से जन्म सार्थक होता है, इन सब विषयों पर बाते करने लगे। उन्होंने हरिप्रसन्न को विवाह करने से मना किया तथा स्त्रियो के सम्पर्क से दूर रहने को कहा । उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार ध्यान करना चाहिए तथा किस प्रकार अनुभूति और दर्शन होंगे। उन्होंने उसे बालकवत्सरल बनने और वस्त्रविहीन होकर ध्यान- धारणा करने की शिक्षा दी। मुख्य बात यह है कि पहले ही दिन परमहंसदेव ने उसे वह सब कुछ बता दिया जो पूरे जीवन के लिए प्रयोजनीय था ।

इस प्रकार बातचीत में सन्ध्या बीत गई और हरिप्रसन्न भी घर वापस जाने की बात पूरी तरह से भूल गया । काफी देर बाद परमहंसदेव ने पूछा, 'क्यों रे, तुझे भूख लगी है?' हरिप्रसन्न ने सोचा, 'इतनी सुबह खाकर स्कूल गया था, क्या अभी भी भूख नहीं लगेगी?' परमहंसदेव ने रामलाल को बुलाकर कहा, 'अरे, इसे भूख लगी है, चार ही और संदेश खाने को दे । हरिप्रसन्न ने सोचा, 'इससे भला मेंरा क्या होगा?' कुछ देर बाद परमहंसदेव बोले, 'हाँ रे, देख रहा हूं तुझे नीद आ रही है।' कहकर उन्होंने जमीन पर एक चटाई बिछा दी और कहा, 'इस पर सो जा । ' उन्होंने एक छोटा तकिया भी दिया । हरिप्रसन्न की आँखें मुँदी जा रही थी; वे सो गए । बाद में परमहंसदेव ने स्वयं एक मसहरी लाकर लगा दी तथा मसहरी के चारों तरफ कई बार घूम-घूमकर अस्फुट स्वर में न जाने क्या-क्या कहने लगे । निद्रा से आछन्न हरिप्रसन्न उन्हें देखकर मन ही मन सोचने लगा, 'ये सचमुच ही पागल हैं । ' इसके बाद वह सो गया । बड़ी देर बाद किसी के जोर से बोलने की आवाज से उसकी नींद कई बार टूटी । उस प्रकार की तन्द्राछन्न अवस्था में उसने सुना कि ठाकुर किसी से कह रहे थे, 'तो फिर मुझे बकलमा दे दो । 'उस रात राम बाबू और सुरेश बाबू के साथ गिरीश बाबू भी आए थे । वे लोग कब चले गए हरिप्रसन्न यह जान नहीं पाया ।

अगले दिन प्रात: उसके उठते ही ठाकुर ने उससे कहा, 'कल रात तुझे ठीक से नींद नहीं आई । गिरीश आदि सब आए थे, और जिस प्रकार जोर-ज़ोर से सारी बाते हो रही थी उसमें नीद भला कैसे आती?' उत्तर में हरिप्रसन्न ने कहा, 'मुझे अच्छी नीद आई। अब घर जाऊँगा।'सुबह घर लौटते ही उसकी माँ ने मानों रणचंडी का रूप धारण कर कठोर स्वर में कहा, 'कल कहाँ रह गया था?' उत्तर में हरिप्रसन्न ने कहा, 'दक्षिणेश्वर में एक परमहंस हैं, उनकी बातें सुनते-सुनते रात हो गई और मैं वहीं रह गया। ' इस पर माँ ने कहा, 'अच्छा, उसी पगले ब्राह्मण के पास?' उसने कहा, 'वे पागल तो नहीं हैं। वे तो बहुत अच्छी-अच्छी बातें करते हैं। ' तभी उसकी छोटी बहन वहाँ आकर जोर से बोली, 'भैया, तुम भी उसी पगले ब्राह्मण के पास गए थे? उसने दो सौ लड़कों का दिमाग खराब कर दिया है। ' हरिप्रसन्न ने कहा, 'परमहंस तो पागल नहीं हैं।' उसके उत्तर में बहन ने कहा, 'भैया, देख रही हूँ उसने तुम्हारा भी दिमाग खराब कर दिया है।' बाद में एक दिन जब हरिप्रसन्न दक्षिणेश्वर गया तब ठाकुर ताल ठोककर कुश्ती लड़ने की मुद्रा में उसकी ओर बढ़े। उसने भी अपने कुर्ते की बहि ऊपर चढ़ाकर हाथ बढ़ाया। ठाकुर के ठेलते ही उसने भी ठाकुर को ठेल दिया और दीवार से टिका दिया। पर स्वयं को अवश महसूस करने पर वह सोचने लगा, 'लगता है मेंरी ही हार हुई है । 'ठाकुर ने कहा, 'पहले मुझमें भी बहुत ताकत थी पर अब पेट की बीमारी के कारण दुर्बल हो गया हूँ । 'इस प्रकार कई बार ठाकुर से उसकी मुलाकात हुई । लेकिन पहले दिन की भांति फिर कभी विशेष बातचीत का अवसर नहीं मिला, क्योंकि पढ़ाई के कारण उसे अन्यत्र जाना पड़ा था ।

छात्रावास में रहते हुए जब हरिप्रसन्न बी.. की पढ़ाई कर रहे थे, तभी ठाकुर का देहान्त हुआ। बाद में उन्होंने पूना इंजीनियरिंग कॉलेज से पास कर सरकारी नौकरी की और विभिन्न स्थानों में जिला इंजीनियर के रूप में कार्य किया। कामकाज के सिलसिले में गाज़ीपुर में भी रहे और उसी समय गुरुभाइयों में से एक से मुलाक़ात होने पर उन्हें पता चला कि श्री ठाकुर का मठ बन गया है और तब से वे प्रत्येक महीने मठ में कुछ-कुछ सहायतार्थ भेजने लगे । बाद में स्वामीजी केआह्वान पर वे नौकरी छोड्कर आलमबाज़ार मठ में चले आए । मठ में गुरुभाइयों के साथ मिलकर वे अत्यन्त आनन्दित हुए और कहा, 'ऐसा मालूम होता तो क्या मैं नौकरी में इतने वर्ष नष्ट करता?' उसी समय बेक्टू में गंगा किनारे मठ के निर्माण के लिए जमीन खरीदी गई तथा आलमबाज़ार से सभी लोग बेक्टू के नीलाम्बर मुखर्जी के मकान में आ गए । यहाँ विज्ञानानन्द महाराज की देख-रेख में मठ भवन, पुराना ठाकुर मन्दिर तथा मठ भवन के सामने गंगा में पुश्ते का कुछ अंश निर्मित हुआ। मठ भवन तैयार होने के बाद एक दिन स्वामीजी ने सभी गुरुभाइयों और साधु-ब्रह्मचारियों की सभा बुलाई और उन्हें विशेष धन्यवाद दिया। उसी समय स्वामीजी ने विज्ञानानन्द जी को ठाकुर के एक विशाल मन्दिर के निर्माण की परिकल्पना भलीभाँति समझाई। उन्होंने श्री गुईथार नामक एक अँग्रेज़ स्थापत्य विशेषज्ञ के साथ विचार-विमर्श किया और वर्तमान मन्दिर का नक्शा बनाया । उसके बाद बंगाल में स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण वे इलाहाबाद स्थित ब्रह्मवादिन क्लब में आकर रहने लगे ।

ब्रह्मवादिन क्लब में सड़क के किनारे दो मंजिले मकान में 8 x 8 और 8 x 12 के केवल दो छोटे-छोटे कमरे थे। सड़क की तरफ केवल दो फुट का सकरा खुला बरामदा था । मकान के बाँयी तरफ ऊपर जाने के लिए ऊँची-ऊँची अढ़ाई फुट चौड़ी खड़ी सीढ़ियाँ थीं । वह सीढ़ियाँ ऊपर छत तक चली गई थी। छत पर पुराने ढंग का गुसलखाना था। स्वामी विज्ञानानन्द जी दीर्घकाल तक यहीं पर रहे। मिट्टी के तेल का स्टोव जलाकर चावल और केवल एक सब्जी बनाकर खाते थे। प्रतिदिन वे मेंजर वी.डी. बसु के घर जाकर उनके भाई श्रीश बसु के साथ बातचीत करते। उनके पाणिनी आफिस से कई पुस्तकें छपवाने की व्यवस्था की गई थी। बाकी समय वे स्वाध्याय और ध्यान-धारणा में डूबे रहते थे। यहीं दो मंजिले के ऊपर उन्होंने माँ दुर्गा तथा माँ काली की प्रतिमा में पूजा भी की थी।मुट्ठीगंज में वर्तमान मठ भवन जब खरीदा गया था तब दो मंजिला था । लेकिन पहली वर्षा ऋतु के बाद देखा गया कि उसमें बहुत से स्थानों पर दरारे पड़ गई हैं, अत: ऊपर की मंजिल तोड़ डाली गई । तभी से यह भवन एक मंजिला ही है । विज्ञानानन्द जी ने बगल की और सामने की जमीन खरीदकर कार्यक्षेत्र बढाया और तभी से उनके सहयोगी के रूप में एक व्यक्ति वहाँ रहने लगे । बाद में ध्यान- धारणा में असुविधा होते देख वे रात में मठभवन में किसी को भी ठहरने नहीं देते थे ।

संघनायक बनने के बाद एक दिन मुट्ठीगंज मठ के बारे में बातचीत करते हुए विज्ञानानन्द जी ने कहा, 'यहाँ मैने इतने दिन बिताए है लेकिन कभी कोई स्त्री चौखट के इस पार नहीं आ पाई। अब दीक्षा आदि देनी पड़ती है अत: वह स्थिति नहीं रही। 'इसी सिलसिले में उन्होंने कहा, 'ब्रह्मवादिन क्लब में प्रत्येक सुबह एक जमादार आकर शौचालय साफ करता था। एक दिन मैने देखा कि एक युवती ऊपर गई और शौचालय साफ करके उतरते समय मेंरी तरफ देखकर हँसती हुई चली गई। मैंने दरवाजे के सामने खड़े होकर सड़क की ओर मुँह करके जोरो से कहा, ''कल से सफाई करने आने की जरूरत नहीं। अब कोई इधर न आए । '' उस दिन शाम से पहले ही इस खबर को सुनकर जमादार घबड़ाया हुआ उनके पास आकर बोला, 'बाबा, एक जरूरी काम आ जाने से मुझे जाना पड़ा इसीलिए अपनी बेटी को यहाँ काम करने के लिए कह गया था । अपराध क्षमा कीजिए!' उन्होंने जमादार से कहा, 'कल से किसी को नहीं आना होगा। मैं सरकारी शौचालाय में जाऊँगा ।' बाद में जमादार के बहुत अनुनय-विनय करने पर उन्होने कहा, 'तुम स्वयं आ सको तो आना। दूसरे किसी को मत भेजना । 'कुछ देर बाद उन्होने कहा, 'इस संसार में माँ का राज्य है। माताएँ ही इस संसार को चला रही हैं।' एक बार उन्होंने ईसा मसीह के शिष्यों का चित्र देखने की विशेष इच्छा प्रकट की। बहुत खोजने के बाद उसे पाकर आनन्दित होते हुए उन्होने कहा था, 'हाँ, ठीक ही तो है । 'सम्भवत: उन्होंने भाव नेत्रों से जो देखा था वह भी ठीक इसी के अनुरूप था।

श्री रामचन्द्र के वनगमन के पथ का उन्होने आदि से अन्त तक वर्णन किया था तथा उसका एक नक्शा भी बनवाकर रखा था जिसे अपने रामायण के अँग्रेज़ी अनुवाद में छपवाने की उनकी इच्छा थी । स्वामीजी द्वारा परिकल्पित श्री ठाकुर मन्दिर का निर्माण कार्य 1938 . में पूर्ण हुआ तो ठाकुर को नए मन्दिर में स्थापित कर उन्होंने मानों अपने जीवन के अन्तिम कर्तव्य का पालन किया। इसके पूर्व स्वामीजी द्वारा अनुमोदित मन्दिर का जो नक्शा बना था वही मन्दिर विज्ञान महाराज के सामने ही बना और उनके द्वारा ही श्री ठाकुर ने नए मन्दिर में प्रतिष्ठित होकर सभी के हृदय में शान्ति और आनन्द की धारा प्रवाहित की। इस आनन्ददायक चिन्तन से ही उन्होंने अपने जीवन के सभी दायित्वों की परिसमप्ति कर ली ।

स्वामी विज्ञानानन्द के प्रेरक प्रसंग: Inspriring Incidents from the Life of Swami Vijnananda

Deal 20% Off
Item Code:
NZA948
Cover:
Paperback
Edition:
2012
ISBN:
9788175053700
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
172
Other Details:
Weight of the Book: 200 gms
Price:
$10.00
Discounted:
$6.00   Shipping Free
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प्रकाशकीय

'स्वामी विज्ञानानन्द के प्रेरक प्रसंग' पाठको के सामने प्रस्तुत करते हुए हमें अत्यन्त हर्ष का अनुभव हो रहा है। यह मूल बंगला ग्रन्थ 'सत्यसंगे स्वामी विज्ञानानन्द' का हिन्दी अनुवाद है, जिसके दो संस्करण रामकृष्ण मठ, इलाहाबाद से प्रकाशित हुए थे । मूल पन्थ के संकलक स्वामी अपूर्वानन्द जी ने तथ्यों का संग्रह पूज्यपाद स्वामी विज्ञानानन्दजी महाराज के सेवक-वृन्द तथा भक्तों से किया था।

रामकृष्ण मठ तथा रामकृष्ण मिशन के सप्तम अध्यक्ष, श्रीमत् स्वामी शंकरानन्द जी महाराज ने पुस्तक की सारगर्भित भूमिका प्रस्तुत करते हुए स्वामी विज्ञानानन्द जी के जीवन के विशिष्ट पहलुओं पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है।

हम श्रीमती मधूलिका श्रीवास्तव के आभारी हैं जिन्होंने मूल बंगला यन्त्र का अनुवाद बड़ी निष्ठा के साथ किया है। इसके सम्पादन तथा प्रूफ-संशोधन में श्रीमती मधु दर और श्रीमती रंजना खन्ना का विशेष सहयोग मिला है। पुस्तक के मुखपृष्ठ का डिज़ाइन श्री शुभव्रत चन्द्र ने किया है। रामकृष्ण मठ, इलाहाबाद के अध्यक्ष स्वामी निखिलात्मानन्द जी के प्रति भी हम कृतज्ञता शापित करते हैं जिन्होंने मूल ग्रन्थ के हिन्दी अनुवाद को प्रकाशित करने की अनुमति प्रदान की।

यह ग्रन्थ पाठकों में दिव्य आध्यात्मिक चेतना का संचार कर उन्हें भगवतोन्मुखी बनाएगा, ऐसी आशा है।

भूमिका

स्वामी विज्ञानानन्द महाराज का जीवन आद्योपान्त पवित्रता, त्याग, अचलभक्ति, निष्ठा और पूर्ण आत्मनिर्भरता आदि के आदर्शों से महिमामंडित है।

एक दिन स्कूल से घर लौटते समय वे दक्षिणेश्वर में स्थित रानी रासमणि के मन्दिर में, जहाँ परमहंस या 'पगला ब्राह्मण' रहते थे, गए। उनके कमरे के सामने पहुँचते ही परमहंसदेव ने उन्हे प्रेम से अपने पास बुलाया। परमहंसदेव को प्रणाम करने पर उन्होंने पूछा, 'तुम्हारा घर कहाँ है, तुम्हारा नाम क्या है' इत्यादि और बोले, 'तुम तो अपने ही आदमी हो।' बाद में परमहंसदेव उन्हें अपनी विभिन्न प्रकार की साधनाओ और दर्शन आदि की बातें बताने लगे । इसी प्रसंग में उन्होंने कहा, 'माँ' का दर्शन होने के बाद मुझे लगा, माँ ने मुझे सचमुच ही दर्शन दिए है या मुझे झॉसा दिया है? यदि सचमुच दर्शन दिए है तब यह (नौबतखाने के सामने पड़ा हुआ) पत्थर नाचेगा। यह बात मन में उठते ही वह पत्थर नाचने लगा। 'यह सुनकर हरिप्रसन्न मन ही मन सोचने लगा, 'लोग इन्हें जो पागल कहते हैं, वह ठीक ही है। भला पत्थर भी कभी नाचता है?' उसके बाद परमहंसदेव मनुष्य जीवन के उद्देश्य तथा किस प्रकार जीवन परिचालित करने से जन्म सार्थक होता है, इन सब विषयों पर बाते करने लगे। उन्होंने हरिप्रसन्न को विवाह करने से मना किया तथा स्त्रियो के सम्पर्क से दूर रहने को कहा । उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार ध्यान करना चाहिए तथा किस प्रकार अनुभूति और दर्शन होंगे। उन्होंने उसे बालकवत्सरल बनने और वस्त्रविहीन होकर ध्यान- धारणा करने की शिक्षा दी। मुख्य बात यह है कि पहले ही दिन परमहंसदेव ने उसे वह सब कुछ बता दिया जो पूरे जीवन के लिए प्रयोजनीय था ।

इस प्रकार बातचीत में सन्ध्या बीत गई और हरिप्रसन्न भी घर वापस जाने की बात पूरी तरह से भूल गया । काफी देर बाद परमहंसदेव ने पूछा, 'क्यों रे, तुझे भूख लगी है?' हरिप्रसन्न ने सोचा, 'इतनी सुबह खाकर स्कूल गया था, क्या अभी भी भूख नहीं लगेगी?' परमहंसदेव ने रामलाल को बुलाकर कहा, 'अरे, इसे भूख लगी है, चार ही और संदेश खाने को दे । हरिप्रसन्न ने सोचा, 'इससे भला मेंरा क्या होगा?' कुछ देर बाद परमहंसदेव बोले, 'हाँ रे, देख रहा हूं तुझे नीद आ रही है।' कहकर उन्होंने जमीन पर एक चटाई बिछा दी और कहा, 'इस पर सो जा । ' उन्होंने एक छोटा तकिया भी दिया । हरिप्रसन्न की आँखें मुँदी जा रही थी; वे सो गए । बाद में परमहंसदेव ने स्वयं एक मसहरी लाकर लगा दी तथा मसहरी के चारों तरफ कई बार घूम-घूमकर अस्फुट स्वर में न जाने क्या-क्या कहने लगे । निद्रा से आछन्न हरिप्रसन्न उन्हें देखकर मन ही मन सोचने लगा, 'ये सचमुच ही पागल हैं । ' इसके बाद वह सो गया । बड़ी देर बाद किसी के जोर से बोलने की आवाज से उसकी नींद कई बार टूटी । उस प्रकार की तन्द्राछन्न अवस्था में उसने सुना कि ठाकुर किसी से कह रहे थे, 'तो फिर मुझे बकलमा दे दो । 'उस रात राम बाबू और सुरेश बाबू के साथ गिरीश बाबू भी आए थे । वे लोग कब चले गए हरिप्रसन्न यह जान नहीं पाया ।

अगले दिन प्रात: उसके उठते ही ठाकुर ने उससे कहा, 'कल रात तुझे ठीक से नींद नहीं आई । गिरीश आदि सब आए थे, और जिस प्रकार जोर-ज़ोर से सारी बाते हो रही थी उसमें नीद भला कैसे आती?' उत्तर में हरिप्रसन्न ने कहा, 'मुझे अच्छी नीद आई। अब घर जाऊँगा।'सुबह घर लौटते ही उसकी माँ ने मानों रणचंडी का रूप धारण कर कठोर स्वर में कहा, 'कल कहाँ रह गया था?' उत्तर में हरिप्रसन्न ने कहा, 'दक्षिणेश्वर में एक परमहंस हैं, उनकी बातें सुनते-सुनते रात हो गई और मैं वहीं रह गया। ' इस पर माँ ने कहा, 'अच्छा, उसी पगले ब्राह्मण के पास?' उसने कहा, 'वे पागल तो नहीं हैं। वे तो बहुत अच्छी-अच्छी बातें करते हैं। ' तभी उसकी छोटी बहन वहाँ आकर जोर से बोली, 'भैया, तुम भी उसी पगले ब्राह्मण के पास गए थे? उसने दो सौ लड़कों का दिमाग खराब कर दिया है। ' हरिप्रसन्न ने कहा, 'परमहंस तो पागल नहीं हैं।' उसके उत्तर में बहन ने कहा, 'भैया, देख रही हूँ उसने तुम्हारा भी दिमाग खराब कर दिया है।' बाद में एक दिन जब हरिप्रसन्न दक्षिणेश्वर गया तब ठाकुर ताल ठोककर कुश्ती लड़ने की मुद्रा में उसकी ओर बढ़े। उसने भी अपने कुर्ते की बहि ऊपर चढ़ाकर हाथ बढ़ाया। ठाकुर के ठेलते ही उसने भी ठाकुर को ठेल दिया और दीवार से टिका दिया। पर स्वयं को अवश महसूस करने पर वह सोचने लगा, 'लगता है मेंरी ही हार हुई है । 'ठाकुर ने कहा, 'पहले मुझमें भी बहुत ताकत थी पर अब पेट की बीमारी के कारण दुर्बल हो गया हूँ । 'इस प्रकार कई बार ठाकुर से उसकी मुलाकात हुई । लेकिन पहले दिन की भांति फिर कभी विशेष बातचीत का अवसर नहीं मिला, क्योंकि पढ़ाई के कारण उसे अन्यत्र जाना पड़ा था ।

छात्रावास में रहते हुए जब हरिप्रसन्न बी.. की पढ़ाई कर रहे थे, तभी ठाकुर का देहान्त हुआ। बाद में उन्होंने पूना इंजीनियरिंग कॉलेज से पास कर सरकारी नौकरी की और विभिन्न स्थानों में जिला इंजीनियर के रूप में कार्य किया। कामकाज के सिलसिले में गाज़ीपुर में भी रहे और उसी समय गुरुभाइयों में से एक से मुलाक़ात होने पर उन्हें पता चला कि श्री ठाकुर का मठ बन गया है और तब से वे प्रत्येक महीने मठ में कुछ-कुछ सहायतार्थ भेजने लगे । बाद में स्वामीजी केआह्वान पर वे नौकरी छोड्कर आलमबाज़ार मठ में चले आए । मठ में गुरुभाइयों के साथ मिलकर वे अत्यन्त आनन्दित हुए और कहा, 'ऐसा मालूम होता तो क्या मैं नौकरी में इतने वर्ष नष्ट करता?' उसी समय बेक्टू में गंगा किनारे मठ के निर्माण के लिए जमीन खरीदी गई तथा आलमबाज़ार से सभी लोग बेक्टू के नीलाम्बर मुखर्जी के मकान में आ गए । यहाँ विज्ञानानन्द महाराज की देख-रेख में मठ भवन, पुराना ठाकुर मन्दिर तथा मठ भवन के सामने गंगा में पुश्ते का कुछ अंश निर्मित हुआ। मठ भवन तैयार होने के बाद एक दिन स्वामीजी ने सभी गुरुभाइयों और साधु-ब्रह्मचारियों की सभा बुलाई और उन्हें विशेष धन्यवाद दिया। उसी समय स्वामीजी ने विज्ञानानन्द जी को ठाकुर के एक विशाल मन्दिर के निर्माण की परिकल्पना भलीभाँति समझाई। उन्होंने श्री गुईथार नामक एक अँग्रेज़ स्थापत्य विशेषज्ञ के साथ विचार-विमर्श किया और वर्तमान मन्दिर का नक्शा बनाया । उसके बाद बंगाल में स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण वे इलाहाबाद स्थित ब्रह्मवादिन क्लब में आकर रहने लगे ।

ब्रह्मवादिन क्लब में सड़क के किनारे दो मंजिले मकान में 8 x 8 और 8 x 12 के केवल दो छोटे-छोटे कमरे थे। सड़क की तरफ केवल दो फुट का सकरा खुला बरामदा था । मकान के बाँयी तरफ ऊपर जाने के लिए ऊँची-ऊँची अढ़ाई फुट चौड़ी खड़ी सीढ़ियाँ थीं । वह सीढ़ियाँ ऊपर छत तक चली गई थी। छत पर पुराने ढंग का गुसलखाना था। स्वामी विज्ञानानन्द जी दीर्घकाल तक यहीं पर रहे। मिट्टी के तेल का स्टोव जलाकर चावल और केवल एक सब्जी बनाकर खाते थे। प्रतिदिन वे मेंजर वी.डी. बसु के घर जाकर उनके भाई श्रीश बसु के साथ बातचीत करते। उनके पाणिनी आफिस से कई पुस्तकें छपवाने की व्यवस्था की गई थी। बाकी समय वे स्वाध्याय और ध्यान-धारणा में डूबे रहते थे। यहीं दो मंजिले के ऊपर उन्होंने माँ दुर्गा तथा माँ काली की प्रतिमा में पूजा भी की थी।मुट्ठीगंज में वर्तमान मठ भवन जब खरीदा गया था तब दो मंजिला था । लेकिन पहली वर्षा ऋतु के बाद देखा गया कि उसमें बहुत से स्थानों पर दरारे पड़ गई हैं, अत: ऊपर की मंजिल तोड़ डाली गई । तभी से यह भवन एक मंजिला ही है । विज्ञानानन्द जी ने बगल की और सामने की जमीन खरीदकर कार्यक्षेत्र बढाया और तभी से उनके सहयोगी के रूप में एक व्यक्ति वहाँ रहने लगे । बाद में ध्यान- धारणा में असुविधा होते देख वे रात में मठभवन में किसी को भी ठहरने नहीं देते थे ।

संघनायक बनने के बाद एक दिन मुट्ठीगंज मठ के बारे में बातचीत करते हुए विज्ञानानन्द जी ने कहा, 'यहाँ मैने इतने दिन बिताए है लेकिन कभी कोई स्त्री चौखट के इस पार नहीं आ पाई। अब दीक्षा आदि देनी पड़ती है अत: वह स्थिति नहीं रही। 'इसी सिलसिले में उन्होंने कहा, 'ब्रह्मवादिन क्लब में प्रत्येक सुबह एक जमादार आकर शौचालय साफ करता था। एक दिन मैने देखा कि एक युवती ऊपर गई और शौचालय साफ करके उतरते समय मेंरी तरफ देखकर हँसती हुई चली गई। मैंने दरवाजे के सामने खड़े होकर सड़क की ओर मुँह करके जोरो से कहा, ''कल से सफाई करने आने की जरूरत नहीं। अब कोई इधर न आए । '' उस दिन शाम से पहले ही इस खबर को सुनकर जमादार घबड़ाया हुआ उनके पास आकर बोला, 'बाबा, एक जरूरी काम आ जाने से मुझे जाना पड़ा इसीलिए अपनी बेटी को यहाँ काम करने के लिए कह गया था । अपराध क्षमा कीजिए!' उन्होंने जमादार से कहा, 'कल से किसी को नहीं आना होगा। मैं सरकारी शौचालाय में जाऊँगा ।' बाद में जमादार के बहुत अनुनय-विनय करने पर उन्होने कहा, 'तुम स्वयं आ सको तो आना। दूसरे किसी को मत भेजना । 'कुछ देर बाद उन्होने कहा, 'इस संसार में माँ का राज्य है। माताएँ ही इस संसार को चला रही हैं।' एक बार उन्होंने ईसा मसीह के शिष्यों का चित्र देखने की विशेष इच्छा प्रकट की। बहुत खोजने के बाद उसे पाकर आनन्दित होते हुए उन्होने कहा था, 'हाँ, ठीक ही तो है । 'सम्भवत: उन्होंने भाव नेत्रों से जो देखा था वह भी ठीक इसी के अनुरूप था।

श्री रामचन्द्र के वनगमन के पथ का उन्होने आदि से अन्त तक वर्णन किया था तथा उसका एक नक्शा भी बनवाकर रखा था जिसे अपने रामायण के अँग्रेज़ी अनुवाद में छपवाने की उनकी इच्छा थी । स्वामीजी द्वारा परिकल्पित श्री ठाकुर मन्दिर का निर्माण कार्य 1938 . में पूर्ण हुआ तो ठाकुर को नए मन्दिर में स्थापित कर उन्होंने मानों अपने जीवन के अन्तिम कर्तव्य का पालन किया। इसके पूर्व स्वामीजी द्वारा अनुमोदित मन्दिर का जो नक्शा बना था वही मन्दिर विज्ञान महाराज के सामने ही बना और उनके द्वारा ही श्री ठाकुर ने नए मन्दिर में प्रतिष्ठित होकर सभी के हृदय में शान्ति और आनन्द की धारा प्रवाहित की। इस आनन्ददायक चिन्तन से ही उन्होंने अपने जीवन के सभी दायित्वों की परिसमप्ति कर ली ।

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विवेकानन्दस्य वीरवाणी: A Collection of Inspirational Quotes of Swami Vivekaananda (Sanskrit Only)
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Paperback (Edition: 2013)
Samskrita Bharati
Item Code: NZF518
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Testimonials
Nice collections. Prompt service.
Kris, USA
Thank-you for the increased discounts this holiday season. I wanted to take a moment to let you know you have a phenomenal collection of books on Indian Philosophy, Tantra and Yoga and commend you and the entire staff at Exotic India for showcasing the best of what our ancient civilization has to offer to the world.
Praveen
I don't know how Exotic India does it but they are amazing. Whenever I need a book this is the first place I shop. The best part is they are quick with the shipping. As always thank you!!!
Shyam Maharaj
Great selection. Thank you.
William, USA
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Mohan, USA
Both Om bracelets are amazing. Thanks again !!!
Fotis, Greece
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Jan, USA
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Sunil, UAE
Thank you so much, I'm honoured and grateful to receive such a beautiful piece of art of Lakshmi. Please congratulate the artist for his incredible artwork. Looking forward to receiving her on Haida Gwaii, Canada. I live on an island, surrounded by water, and feel Lakshmi's present all around me.
Kiki, Canada
Nice package, same as in Picture very clean written and understandable, I just want to say Thank you Exotic India Jai Hind.
Jeewan, USA
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