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Books > Hindu > हिन्दी > जिन खोजा तिन पाइयां (गहरे पानी पैठ) : Jin Khoja Tin Paaiya (Gahre Pani Paith)
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जिन खोजा तिन पाइयां (गहरे पानी पैठ) : Jin Khoja Tin Paaiya (Gahre Pani Paith)
जिन खोजा तिन पाइयां (गहरे पानी पैठ) : Jin Khoja Tin Paaiya (Gahre Pani Paith)
Description

पुस्तक के विषय में

 

ऊर्जा का विस्तार है जगत और ऊर्जा का सघन हो जाना ही जीवन है। जो हमें पदार्थ की भांति दिखाई पड़ता है, जो पत्थर की भांति भी दिखाई पड़ता है, वह भी ऊर्जा, शक्ति है। जो हमें जीवन की भांति दिखाई पड़ता है, जो विचार की भांति अनुभव होता है, जो चेतना की भांति प्रतीत होता है, वह भी उसी ऊर्जा, उसी शक्ति का रुपांतरण है। सारा जगत-चाहे सागर की लहरें, और चाहे सरू के वृक्ष, और चाहे रेत के कण, और चाहे आकाश के तारे, और चाहे हमारे भीतर जो है वह, वह सब एक ही शक्ति का अनंत-अनंत रूपों में प्रगटन है।

कुंडलिनी-यात्रा पर ले चलने वाली

इस अभूतपूर्व पुस्तक के कुछ विषय बिंदु

शरीर में छिपी अनंत ऊर्जाओं को जगाने का एक आह्वान सात चक्रों व सता शरीरों के रहस्यों पर चर्चा आधुनिक मनुष्य के लिए ध्यान की सक्रिय विधियों का जन्म तंत्र के गु्ह्या आयामों से परिचय ।

भूमिका

मनुष्य का विज्ञान

 

सुनता हूं कि मनुष्य का मार्ग खो गया है । यह सत्य है । मनुष्य का मार्ग उसी दिन खो गया, जिस दिन उसने स्वयं को खोजने से भी ज्यादा मूल्यवान किन्हीं और खोजों को मान लिया ।

मनुष्य के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सार्थक वस्तु मनुष्य के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । उसकी पहली खोज वह स्वयं ही हो सकता है । खुद को जाने बिना उसका सारा जानना अंतत: घातक ही होगा । अज्ञान के हाथों में कोई भी ज्ञान सृजनात्मक नहीं हो सकता, और ज्ञान के हाथों में अज्ञान भी सृजनात्मक हो जाता है ।

मनुष्य यदि स्वयं को जाने और जीते, तो उसकी शेष सब जीते उसकी और उसके जीवन की सहयोगी होगी। अन्यथा वह अपने ही हाथों अपनी कब के लिए गड्डा खोदेगा ।

हम ऐसा ही गड्डा खोदने में लगे है । हमारा ही श्रम हमारी मृत्यु बन कर खड़ा हो गया है । पिछली सभ्यताएं बाहर के आक्रमणों और संकटों में नष्ट हुई थीं। हमारी सभ्यता पर बाहर से नहीं, भीतर से संकट है । बीसवीं सदीं का यह समाज यदि नष्ट हुआ तो उसे आत्मघात कहना होगा, और यह हमें ही कहना होगा, क्योंकि बाद में कहने को कोई भी बचने को नहीं है । सभाव्य युद्ध इतिहास में कभी नहीं लिखा जाएगा । यह घटना इतिहास के बाहर घटेगी, क्योंकि उसमें तो समस्त मानवता का अंत होगा ।

पहले के लोगों ने इतिहास बनाया, हम इतिहास मिटाने को तैयार है । और इस आत्मघाती संभावना का कारण एक ही है । वह है, मनुष्य का मनुष्य को ठीक से न जानना । पदार्थ की अनंत शक्ति से हम परिचित है-परिचित ही नहीं, उसके हम विजेता भी है । पर मानवीय हृदय की गहराइयों का हमें कोई पता नहीं । उन गहराइयों में छिपे विष और अमृत का भी कोई ज्ञान नहीं है । पदार्थाणु को हम जानते है, पर आत्माणु को नहीं । यही हमारी विडंबना है । ऐसे शक्ति तो आ गई है, पर शांति नहीं । अशांत और अप्रबुद्ध हाथों में आई हुई शक्ति से ही यह सारा उपद्रव है । अशांत और अप्रबुद्ध का शक्तिहीन होना ही शुभ होता है । शक्ति सदा शुभ नहीं । वह तो शुभ हाथों में ही शुभ होती है। हम शक्ति को खोजते रहे, यही हमारी भूल हुई । अब अपनी ही उपलब्धि से खतरा है । सारे विश्व के विचारकों और वैज्ञानिकों को आगे स्मरण रखना चाहिए कि उनकी खोज मात्र शक्ति के लिए न हो उस तरह की अंधी खोज ने ही हमें इस अंत पर लाकर खड़ा किया है।

शक्ति नही, शांति लक्ष्य बन स्वभावत यदि शांति लक्ष्य होगी, तो खोज का केंद्र प्रकृति नहीं, मनुष्य होगा जड़ की बहुत खोज और शोध हुई, अब मनुष्य का और मन का अन्वेषण करना होगा विजय की पताकाएं पदार्थ पर नही, स्वयं पर गाड़नी होगी भविष्य का विज्ञान पदार्थ का नहीं, मूलत मनुष्य का विज्ञान होगा समय आ गया है कि यह परिवर्तन हो अब इस दिशा में और देर करनी ठीक नहीं है कही ऐसा न हो कि फिर कुछ करने को समय भी शेष न बचे।

जड़ की खोज में जो वैज्ञानिक आज भी लगे है, वे दकियानूसी है, और उनके मस्तिष्क विज्ञान के आलोक से नहीं परंपरा और रूढ़ि के अंधकार में ही डूबे कहे जावेंगे । जिन्हे थोड़ा भी बोध है और जागरूकता है, उनके अन्वेषण की दिशा आमूल बदल जानी चाहिए । हमारी सारी शोध मनुष्य को जानने में लगे, तो कोई भी कारण नहीं है कि यो शक्ति पदार्थ और प्रकृति को जानने और जीतने में इतने अभूतपूर्व रूप से सफल हुई है, वह मनुष्य को जानने में सफल न हो सके।

मनुष्य भी निश्चय ही जाना, जीता और परिवर्तित किया जा सकता है मैं निराश होने का कोई भी कारण नहीं देखता हम स्वयं को जान सकते है और स्वयं के शान पर हमारे जीवन और अत:करण के बिलकुल ही नये आधार रखे जा सकते है। एक बिलकुल ही अभिनव मनुष्य को जन्म दिया जा सकता है।

अतीत में विभिन्न धर्मों ने इस दिशा में बहुत काम किया है, लेकिन वह कार्य अपनी पूर्णता और समग्रता के लिए विज्ञान की प्रतीक्षा कर रहा है धर्मों ने जिसका प्रारभ किया है, विज्ञान उसे पूर्णता तक ले जा सकता है धर्मों ने जिसके बीज बोए है, विज्ञान उसकी फसल काट सकता है।

पदार्थ के संबंध में विज्ञान और धर्म के रास्ते विरोध में पड़ गए थे, उसका कारण दकियानूसी धार्मिक लोग थे वस्तुत धर्म पदार्थ के संबंध में कुछ भी कहने का हकदार नही था । वह उसकी खोज की दिशा ही नही थी । विज्ञान उस संघर्ष में विजय हो गया, यह अच्छा हुआ । लेकिन इस विजय से यह न समझा जाए कि धर्म के पास कुछ कहने को नही है । धर्म के पास कुछ कहने को है, ओंर बहुत मूल्यवान सपत्ति है यदि उस सपत्ति से लाभ नही उठाया गया तो उसका कारण रूढिग्रस्त पुसणपथी वेज्ञानिक होंगे एक दिन एक दिशा में धर्म विज्ञान के समक्ष हार गया था, अब समय है कि उसे दूसरी दिशा में विजय मिले और धर्म आर विशान सम्मिलित हो उनकी सयुक्त साधना ही मनुष्य को उसके स्वयं के हाथों से बचाने में समर्थ हो सकती है।

पदार्थ को जान कर जो मिला है, आत्मज्ञान से जो मिलेगा, उसके समक्ष वह कुछ भी नहीं है धर्मो ने वह संभावना बहुत थोडे लोगों के लिए खोली है । वैज्ञानिक होकर वह द्वार सबके लिए खुल सकेगा । धर्म विशान बने और वितान धर्म बने, इसमें ही मनुष्य का भविष्य और हित है।

मानवीय चित्त में अनंत शक्तियां है, और जितना उनका विकास हुआ है, उससे बहुत ज्यादा विकास की प्रसुप्त संभावनाएं है इन शक्तियों की अव्यवस्था और अराजकता ही हमारे दुख का कारण है। और जब व्यक्ति का चित्त अव्यवस्थित और अराजक होता है तो वह अराजकता समष्टि चित्त तक पहुंचते ही अनंत गुना हो जाती है ।

समाज व्यक्तियो के गुणनफल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । वह हमारे अतर्संबधों का ही फैलाव है व्यक्ति ही फैल कर समाज बन जाना है इसलिए स्मरण रहे कि जो व्यक्ति में घटित होता हे, उसका ही बृहत रूप समाज में प्रतिध्वनित होगा सारे वृद्ध मनुष्य के मन में लड़े गए है और सारी विकृतियों की मूल जड़े मन में ही है।

समाज को बदलना है तो मनुष्य को बदलना होगा, और समष्टि के नये आधार रखने है तो व्यक्ति को नया जीवन देना होगा मनुष्य के भीतर विष और अमृत दोनों हैं । शक्तियों की अराजकता ही विष है और शक्तियों का संयम, सामजस्य और संगीत ही अमृत है। जीवन जिस विधि से सौदर्य और संगीत बन जाता है, उसे ही मैं योग कहता हूं ।

जो विचार, जो भाव और जो कर्म मेंरे अंत:संगीत के विपरीत जाते हों, वे ही पाप हैं -और जो उसे पैदा और समृद्ध करते हों, उन्हें ही मैंने पुण्य जाना है । चित्त की वह अवस्था जहा संगीत शून्य हो जाए और सभी स्वर पूर्ण अराजक हों, नर्क है; और वह अवस्था स्वर्ग है, जहां संगीत पूर्ण हो ।

भीतर जब संगीत पूर्ण होता है तो ऊपर से पूर्ण का संगीत अवतरित होने लगता है । व्यक्ति जब संगीत हो जाता है, तो समस्त विश्व का संगीत उसकी ओर प्रवाहित होने लगता है ।

संगीत से भर जाओ तो संगीत आकृष्ट होता है; विसंगीत विसंगति को आमंत्रित करेगा । हम में जो होता है, वही हम में आने भी लगता है, उसकी ही संग्राहकता और संवेदनशीलता हम में होती है ।

उस विज्ञान को हमें निर्मित करना है जो व्यक्ति के अंतर-जीवन को स्वास्थ्य और संगीत दे सके । यह किसी और प्रभु के राज्य के लिए नहीं, वरन इसी जगत और पृथ्वी के लिए है । यह जीवन ठीक हो तो किसी और जीवन की चिंता अनावश्यक है । इसके ठीक न होने से ही परलोक की चिंता पकड़ती है । जो इस जीवन को सम्यक रूप देने में सफल हो जाता है, वह अनायास ही समस्त भावी जीवनों को सुदृढ़ और शुभ आधार देने में भी समर्थ हो जाता है । वास्तविक धर्म का कोई संबंध परलोक से नहीं है । परलोक तो इस लोक का परिणाम है ।

धर्मों का परलोक की चिंता में होना बहुत घातक और हानिकारक हुआ है । उसके ही कारण हम जीवन को शुभ और सुंदर नहीं बना सके । धर्म परलोक के लिए रहे और विज्ञान पदार्थ के लिए-इस भांति मनुष्य और उसका जीवन उपेक्षित हो गया । परलोक पर शास्त्र और दर्शन निर्मित हुए और पदार्थ की शक्तियों पर विजय पाई गई । किंतु जिस मनुष्य के लिए यह सब हुआ, उसे हम भूल गए ।

अब मनुष्य को सर्वप्रथम रखना होगा । विज्ञान और धर्म दोनों का केंद्र मनुष्य बनना चाहिए । इसके लिए जरूरी है कि विज्ञान पदार्थ का मोह छोड़े और धर्म परलोक का । उन दोनों का यह मोह-त्याग ही उनके सम्मिलन की भूमि बन सकेगा ।

धर्म और विज्ञान का मिलन और सहयोग मनुष्य के इतिहास में सबसे बड़ी घटना होगी । इससे बहुत सृजनात्मक ऊर्जा का जन्म होगा । वह समन्वय ही अब सुरक्षा देगा । उसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है । उनके मिलन से पहली बार मनुष्य के विज्ञान की उत्पत्ति होगी और विज्ञान में ही अब मनुष्य का जीवन और भविष्य है ।

 

अनुक्रम

 
   

साधना शिविर

 

1

उदघाटन प्रवचन

यात्रा कुंडलिनी की

1

2

दूसरा प्रवचन व ध्यान प्रयोग

बुंद समानी समुंद्र में

15

3

तीसरा प्रवचन व ध्यान प्रयोग

ध्यान है महामृत्यु

37

4

चौथा प्रवचन

ध्यान पथ ऐसो कठिन

51

5

अतिम ध्यान प्रयोग

कुंडलिनी शक्तिपात व प्रभु प्रसाद

67

6

समापन प्रवचन

गहरे पानी पैठ

75

   

प्रश्नोत्तर चर्चाएं

 

7

पहली प्रश्नोत्तर चर्चा

कुंडलिनी जागरण व शक्तिपात

91

8

दूसरी प्रश्नोत्तर चर्चा

यात्रा दृश्य से अदृश्य की ओर

117

9

तीसरी प्रश्नोत्तर चर्चा

श्वास की कीमियां

135

10

चौथी प्रश्नोत्तर चर्चा

आंतरिक रूपांतरण के तथ्य

149

11

पाचवीं प्रश्नोत्तर चर्चा

मुक्ति सोपान की सीढिया

173

12

वीं प्रश्नोत्तर चर्चा

सतत साधना न कहीं रुकना, न कहीं बंधना

197

13

सातवी प्रश्नोत्तर चर्चा

सात शरीरों से गुजरती कुंडलिनी

217

14

आठवीं प्रश्नोतर चर्चा

सात शरीर और सात चक्र

241

15

नौवीं प्रश्नोत्तर चर्चा

धर्म के असीम रहस्य सागर में

269

16

दसवी प्रश्नोत्तर चर्चा

ओम् साध्य है, साधन नहीं

297

17

ग्यारहवीं प्रश्नोत्तर चर्चा

मनम से महाशून्य तक

315

18

बारहवीं प्रश्नोतर चर्चा

तत्र के गुह्य आयामों में

337

19

तेरहवीं प्रश्नोत्तर चर्चा

अज्ञात, अपरिचित गहराइयो में

359

 

जिन खोजा तिन पाइयां (गहरे पानी पैठ) : Jin Khoja Tin Paaiya (Gahre Pani Paith)

Item Code:
NZA646
Cover:
Hardcover
Edition:
2013
ISBN:
9788172612467
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 6.0 inch
Pages:
151 (1 B/W illustrations)
Other Details:
Weight of the Book: 350 gms
Price:
$35.00   Shipping Free
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जिन खोजा तिन पाइयां (गहरे पानी पैठ) : Jin Khoja Tin Paaiya (Gahre Pani Paith)

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पुस्तक के विषय में

 

ऊर्जा का विस्तार है जगत और ऊर्जा का सघन हो जाना ही जीवन है। जो हमें पदार्थ की भांति दिखाई पड़ता है, जो पत्थर की भांति भी दिखाई पड़ता है, वह भी ऊर्जा, शक्ति है। जो हमें जीवन की भांति दिखाई पड़ता है, जो विचार की भांति अनुभव होता है, जो चेतना की भांति प्रतीत होता है, वह भी उसी ऊर्जा, उसी शक्ति का रुपांतरण है। सारा जगत-चाहे सागर की लहरें, और चाहे सरू के वृक्ष, और चाहे रेत के कण, और चाहे आकाश के तारे, और चाहे हमारे भीतर जो है वह, वह सब एक ही शक्ति का अनंत-अनंत रूपों में प्रगटन है।

कुंडलिनी-यात्रा पर ले चलने वाली

इस अभूतपूर्व पुस्तक के कुछ विषय बिंदु

शरीर में छिपी अनंत ऊर्जाओं को जगाने का एक आह्वान सात चक्रों व सता शरीरों के रहस्यों पर चर्चा आधुनिक मनुष्य के लिए ध्यान की सक्रिय विधियों का जन्म तंत्र के गु्ह्या आयामों से परिचय ।

भूमिका

मनुष्य का विज्ञान

 

सुनता हूं कि मनुष्य का मार्ग खो गया है । यह सत्य है । मनुष्य का मार्ग उसी दिन खो गया, जिस दिन उसने स्वयं को खोजने से भी ज्यादा मूल्यवान किन्हीं और खोजों को मान लिया ।

मनुष्य के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण और सार्थक वस्तु मनुष्य के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । उसकी पहली खोज वह स्वयं ही हो सकता है । खुद को जाने बिना उसका सारा जानना अंतत: घातक ही होगा । अज्ञान के हाथों में कोई भी ज्ञान सृजनात्मक नहीं हो सकता, और ज्ञान के हाथों में अज्ञान भी सृजनात्मक हो जाता है ।

मनुष्य यदि स्वयं को जाने और जीते, तो उसकी शेष सब जीते उसकी और उसके जीवन की सहयोगी होगी। अन्यथा वह अपने ही हाथों अपनी कब के लिए गड्डा खोदेगा ।

हम ऐसा ही गड्डा खोदने में लगे है । हमारा ही श्रम हमारी मृत्यु बन कर खड़ा हो गया है । पिछली सभ्यताएं बाहर के आक्रमणों और संकटों में नष्ट हुई थीं। हमारी सभ्यता पर बाहर से नहीं, भीतर से संकट है । बीसवीं सदीं का यह समाज यदि नष्ट हुआ तो उसे आत्मघात कहना होगा, और यह हमें ही कहना होगा, क्योंकि बाद में कहने को कोई भी बचने को नहीं है । सभाव्य युद्ध इतिहास में कभी नहीं लिखा जाएगा । यह घटना इतिहास के बाहर घटेगी, क्योंकि उसमें तो समस्त मानवता का अंत होगा ।

पहले के लोगों ने इतिहास बनाया, हम इतिहास मिटाने को तैयार है । और इस आत्मघाती संभावना का कारण एक ही है । वह है, मनुष्य का मनुष्य को ठीक से न जानना । पदार्थ की अनंत शक्ति से हम परिचित है-परिचित ही नहीं, उसके हम विजेता भी है । पर मानवीय हृदय की गहराइयों का हमें कोई पता नहीं । उन गहराइयों में छिपे विष और अमृत का भी कोई ज्ञान नहीं है । पदार्थाणु को हम जानते है, पर आत्माणु को नहीं । यही हमारी विडंबना है । ऐसे शक्ति तो आ गई है, पर शांति नहीं । अशांत और अप्रबुद्ध हाथों में आई हुई शक्ति से ही यह सारा उपद्रव है । अशांत और अप्रबुद्ध का शक्तिहीन होना ही शुभ होता है । शक्ति सदा शुभ नहीं । वह तो शुभ हाथों में ही शुभ होती है। हम शक्ति को खोजते रहे, यही हमारी भूल हुई । अब अपनी ही उपलब्धि से खतरा है । सारे विश्व के विचारकों और वैज्ञानिकों को आगे स्मरण रखना चाहिए कि उनकी खोज मात्र शक्ति के लिए न हो उस तरह की अंधी खोज ने ही हमें इस अंत पर लाकर खड़ा किया है।

शक्ति नही, शांति लक्ष्य बन स्वभावत यदि शांति लक्ष्य होगी, तो खोज का केंद्र प्रकृति नहीं, मनुष्य होगा जड़ की बहुत खोज और शोध हुई, अब मनुष्य का और मन का अन्वेषण करना होगा विजय की पताकाएं पदार्थ पर नही, स्वयं पर गाड़नी होगी भविष्य का विज्ञान पदार्थ का नहीं, मूलत मनुष्य का विज्ञान होगा समय आ गया है कि यह परिवर्तन हो अब इस दिशा में और देर करनी ठीक नहीं है कही ऐसा न हो कि फिर कुछ करने को समय भी शेष न बचे।

जड़ की खोज में जो वैज्ञानिक आज भी लगे है, वे दकियानूसी है, और उनके मस्तिष्क विज्ञान के आलोक से नहीं परंपरा और रूढ़ि के अंधकार में ही डूबे कहे जावेंगे । जिन्हे थोड़ा भी बोध है और जागरूकता है, उनके अन्वेषण की दिशा आमूल बदल जानी चाहिए । हमारी सारी शोध मनुष्य को जानने में लगे, तो कोई भी कारण नहीं है कि यो शक्ति पदार्थ और प्रकृति को जानने और जीतने में इतने अभूतपूर्व रूप से सफल हुई है, वह मनुष्य को जानने में सफल न हो सके।

मनुष्य भी निश्चय ही जाना, जीता और परिवर्तित किया जा सकता है मैं निराश होने का कोई भी कारण नहीं देखता हम स्वयं को जान सकते है और स्वयं के शान पर हमारे जीवन और अत:करण के बिलकुल ही नये आधार रखे जा सकते है। एक बिलकुल ही अभिनव मनुष्य को जन्म दिया जा सकता है।

अतीत में विभिन्न धर्मों ने इस दिशा में बहुत काम किया है, लेकिन वह कार्य अपनी पूर्णता और समग्रता के लिए विज्ञान की प्रतीक्षा कर रहा है धर्मों ने जिसका प्रारभ किया है, विज्ञान उसे पूर्णता तक ले जा सकता है धर्मों ने जिसके बीज बोए है, विज्ञान उसकी फसल काट सकता है।

पदार्थ के संबंध में विज्ञान और धर्म के रास्ते विरोध में पड़ गए थे, उसका कारण दकियानूसी धार्मिक लोग थे वस्तुत धर्म पदार्थ के संबंध में कुछ भी कहने का हकदार नही था । वह उसकी खोज की दिशा ही नही थी । विज्ञान उस संघर्ष में विजय हो गया, यह अच्छा हुआ । लेकिन इस विजय से यह न समझा जाए कि धर्म के पास कुछ कहने को नही है । धर्म के पास कुछ कहने को है, ओंर बहुत मूल्यवान सपत्ति है यदि उस सपत्ति से लाभ नही उठाया गया तो उसका कारण रूढिग्रस्त पुसणपथी वेज्ञानिक होंगे एक दिन एक दिशा में धर्म विज्ञान के समक्ष हार गया था, अब समय है कि उसे दूसरी दिशा में विजय मिले और धर्म आर विशान सम्मिलित हो उनकी सयुक्त साधना ही मनुष्य को उसके स्वयं के हाथों से बचाने में समर्थ हो सकती है।

पदार्थ को जान कर जो मिला है, आत्मज्ञान से जो मिलेगा, उसके समक्ष वह कुछ भी नहीं है धर्मो ने वह संभावना बहुत थोडे लोगों के लिए खोली है । वैज्ञानिक होकर वह द्वार सबके लिए खुल सकेगा । धर्म विशान बने और वितान धर्म बने, इसमें ही मनुष्य का भविष्य और हित है।

मानवीय चित्त में अनंत शक्तियां है, और जितना उनका विकास हुआ है, उससे बहुत ज्यादा विकास की प्रसुप्त संभावनाएं है इन शक्तियों की अव्यवस्था और अराजकता ही हमारे दुख का कारण है। और जब व्यक्ति का चित्त अव्यवस्थित और अराजक होता है तो वह अराजकता समष्टि चित्त तक पहुंचते ही अनंत गुना हो जाती है ।

समाज व्यक्तियो के गुणनफल के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । वह हमारे अतर्संबधों का ही फैलाव है व्यक्ति ही फैल कर समाज बन जाना है इसलिए स्मरण रहे कि जो व्यक्ति में घटित होता हे, उसका ही बृहत रूप समाज में प्रतिध्वनित होगा सारे वृद्ध मनुष्य के मन में लड़े गए है और सारी विकृतियों की मूल जड़े मन में ही है।

समाज को बदलना है तो मनुष्य को बदलना होगा, और समष्टि के नये आधार रखने है तो व्यक्ति को नया जीवन देना होगा मनुष्य के भीतर विष और अमृत दोनों हैं । शक्तियों की अराजकता ही विष है और शक्तियों का संयम, सामजस्य और संगीत ही अमृत है। जीवन जिस विधि से सौदर्य और संगीत बन जाता है, उसे ही मैं योग कहता हूं ।

जो विचार, जो भाव और जो कर्म मेंरे अंत:संगीत के विपरीत जाते हों, वे ही पाप हैं -और जो उसे पैदा और समृद्ध करते हों, उन्हें ही मैंने पुण्य जाना है । चित्त की वह अवस्था जहा संगीत शून्य हो जाए और सभी स्वर पूर्ण अराजक हों, नर्क है; और वह अवस्था स्वर्ग है, जहां संगीत पूर्ण हो ।

भीतर जब संगीत पूर्ण होता है तो ऊपर से पूर्ण का संगीत अवतरित होने लगता है । व्यक्ति जब संगीत हो जाता है, तो समस्त विश्व का संगीत उसकी ओर प्रवाहित होने लगता है ।

संगीत से भर जाओ तो संगीत आकृष्ट होता है; विसंगीत विसंगति को आमंत्रित करेगा । हम में जो होता है, वही हम में आने भी लगता है, उसकी ही संग्राहकता और संवेदनशीलता हम में होती है ।

उस विज्ञान को हमें निर्मित करना है जो व्यक्ति के अंतर-जीवन को स्वास्थ्य और संगीत दे सके । यह किसी और प्रभु के राज्य के लिए नहीं, वरन इसी जगत और पृथ्वी के लिए है । यह जीवन ठीक हो तो किसी और जीवन की चिंता अनावश्यक है । इसके ठीक न होने से ही परलोक की चिंता पकड़ती है । जो इस जीवन को सम्यक रूप देने में सफल हो जाता है, वह अनायास ही समस्त भावी जीवनों को सुदृढ़ और शुभ आधार देने में भी समर्थ हो जाता है । वास्तविक धर्म का कोई संबंध परलोक से नहीं है । परलोक तो इस लोक का परिणाम है ।

धर्मों का परलोक की चिंता में होना बहुत घातक और हानिकारक हुआ है । उसके ही कारण हम जीवन को शुभ और सुंदर नहीं बना सके । धर्म परलोक के लिए रहे और विज्ञान पदार्थ के लिए-इस भांति मनुष्य और उसका जीवन उपेक्षित हो गया । परलोक पर शास्त्र और दर्शन निर्मित हुए और पदार्थ की शक्तियों पर विजय पाई गई । किंतु जिस मनुष्य के लिए यह सब हुआ, उसे हम भूल गए ।

अब मनुष्य को सर्वप्रथम रखना होगा । विज्ञान और धर्म दोनों का केंद्र मनुष्य बनना चाहिए । इसके लिए जरूरी है कि विज्ञान पदार्थ का मोह छोड़े और धर्म परलोक का । उन दोनों का यह मोह-त्याग ही उनके सम्मिलन की भूमि बन सकेगा ।

धर्म और विज्ञान का मिलन और सहयोग मनुष्य के इतिहास में सबसे बड़ी घटना होगी । इससे बहुत सृजनात्मक ऊर्जा का जन्म होगा । वह समन्वय ही अब सुरक्षा देगा । उसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है । उनके मिलन से पहली बार मनुष्य के विज्ञान की उत्पत्ति होगी और विज्ञान में ही अब मनुष्य का जीवन और भविष्य है ।

 

अनुक्रम

 
   

साधना शिविर

 

1

उदघाटन प्रवचन

यात्रा कुंडलिनी की

1

2

दूसरा प्रवचन व ध्यान प्रयोग

बुंद समानी समुंद्र में

15

3

तीसरा प्रवचन व ध्यान प्रयोग

ध्यान है महामृत्यु

37

4

चौथा प्रवचन

ध्यान पथ ऐसो कठिन

51

5

अतिम ध्यान प्रयोग

कुंडलिनी शक्तिपात व प्रभु प्रसाद

67

6

समापन प्रवचन

गहरे पानी पैठ

75

   

प्रश्नोत्तर चर्चाएं

 

7

पहली प्रश्नोत्तर चर्चा

कुंडलिनी जागरण व शक्तिपात

91

8

दूसरी प्रश्नोत्तर चर्चा

यात्रा दृश्य से अदृश्य की ओर

117

9

तीसरी प्रश्नोत्तर चर्चा

श्वास की कीमियां

135

10

चौथी प्रश्नोत्तर चर्चा

आंतरिक रूपांतरण के तथ्य

149

11

पाचवीं प्रश्नोत्तर चर्चा

मुक्ति सोपान की सीढिया

173

12

वीं प्रश्नोत्तर चर्चा

सतत साधना न कहीं रुकना, न कहीं बंधना

197

13

सातवी प्रश्नोत्तर चर्चा

सात शरीरों से गुजरती कुंडलिनी

217

14

आठवीं प्रश्नोतर चर्चा

सात शरीर और सात चक्र

241

15

नौवीं प्रश्नोत्तर चर्चा

धर्म के असीम रहस्य सागर में

269

16

दसवी प्रश्नोत्तर चर्चा

ओम् साध्य है, साधन नहीं

297

17

ग्यारहवीं प्रश्नोत्तर चर्चा

मनम से महाशून्य तक

315

18

बारहवीं प्रश्नोतर चर्चा

तत्र के गुह्य आयामों में

337

19

तेरहवीं प्रश्नोत्तर चर्चा

अज्ञात, अपरिचित गहराइयो में

359

 

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Paperback (Edition: 2013)
Full Circle Publishing
Item Code: IDL061
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Dimensions Beyond the Known By Osho
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Hardcover (Edition: 2008)
Rebel Books
Item Code: IHL602
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No Where To Go But In (Unique Answers To Real Question)
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Hardcover (Edition: 2008)
Osho Media International
Item Code: NAE148
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Sermons in Stones
by Osho
Hardcover (Edition: 2016)
Osho Media International
Item Code: NAK291
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Testimonials
Thank you for existing and sharing India's wonderful heritage and legacy to the world.
Angela, UK
Dear sir/sirs, Thanks a million for the two books I ordered on your website. I have got both of them and they are very much helpful for my paper writing.
Sprinna, China
Exotic India has excellent and speedy service.
M Sherman, USA
Your selection of books is impressive and unique in USA. Thank you.
Jaganath, USA
Exotic India has the best selection of Hindu/Buddhist Gods and Goddesses in sculptures and books of anywhere I know.
Michael, USA
Namaste, I received my package today. My compliments for your prompt delivery. The skirts I ordered are absolutely beautiful! Excellent tailoring and the fit is great. I will be ordering from you again. Best Regards.
Eileen
I’ve received the package 2 days ago. The painting is as beautiful as I whished! I’m very interesting in history, art and culture of India and I’m studing his civilization; so I’ve visited Rajasthan, Gujarat, Tamil Nadu and Kerala in theese years. I’m a draftwoman , so I like collect works of extraordinary arts and crafts of villages, that must be protected and helped. In a short time I’ll buy some others folk painting, as Madhubani , Kalamkari and – if it’s possible – Phad. In the meanwhile, I’m very happy to have in my home a work of your great artist. Namaste, Namaskara.
Laura, Italy.
I must compliment you on timely delivery for this order. I was very impressed. Consequently, I have just placed another large order of beads and look forward to receiving these on time as well.
Charis, India
Bonjour, je viens de recevoir ma statue tête de Bouddha en cuivre. elle est magnifique et correspond exactement à la photo. Emballage très épais et protecteur, arrivé intact. Délai de livraison de 8 jours, parfait. Votre service commercial est très réactif et courtois. Je suis donc très satisfait et je tiens à le dire. Merci.
Yves, France
I was thrilled with the Tribal Treasure Box. Your customer service is outstanding. Shopping with you is like being back in India.
Yvonne, USA
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