Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Sign In  |  Sign up
Your Cart (0)
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Hindu > हिन्दी > मिट्टी के दिये (बोध कथाएँ) - Lamps of Clay (Perception Stories)
Displaying 1 of 7448         Previous  |  NextSubscribe to our newsletter and discounts
मिट्टी के दिये (बोध कथाएँ) - Lamps of Clay (Perception Stories)
मिट्टी के दिये (बोध कथाएँ) - Lamps of Clay (Perception Stories)
by Osho
Description

पुस्तक परिचय

कहानिंया सत्य की दूर से आती प्रतिध्वनियां हैं एक सूक्ष्म सा इशारा, एक नाजुक सा धागा। तुम्हें खोजते रहना होगा। तब कहानी धीरे धीरे अपने खजाने तुम्हारे लिए खमलने लगेगी।

यदि तुम कहानी को वैसे ही लो जैसी वह दिखाई देती है, तुम उसके संपूर्ण अर्थ से ही चूक जाओगे। प्रत्यक्ष वास्तविक नहीं है। वास्तविक छिपा है बड़े गहरे में छिपा है जैसे किसी प्याज में कोई हीरा छिपा हो। तुम उघाड़ते जाते हो  प्याज की परतों पर परतें, और तब हीरा उजागर होता है।

 

भूमिका

मनुष्य को परमात्मा तक पहुंचने से कौन रोकता है त्र और मनुष्य को पृथ्वी से कौन बांधे रखता है? वह शक्ति कौन सी है जो उसकी जीवन सरिता को सत्ता के सागर तक नहीं पहुंचने देती है?

मैं कहता हूं   मनुष्य स्वयं । उसके अहंकार का भार ही उसे ऊपर नहीं उठने देता है । पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण नहीं, अहंकार का पाषाणभार ही हमे ऊपर नहीं उठने देता है । हम अपने ही भार से दबे हैं, और गति में असमर्थ हो गए हैँ । पृथ्वी का वश देह के आगे नहीं है । उसका गुरुत्वाकर्षण देह को बांधे हुए है । किंतु अहंकार ने आत्मा को भी पृथ्वी से बांध दिया है । उसका भार ही परमात्मा तक उठने की असमर्थता और अशक्ति बन गया है । देह तो पृथ्वी की है । वह तो उससे ही जन्मी है और उसमें ही उसे लीन हो जाना है । लेकिन आत्मा अहंकार के कारण परमात्मा से वंचित हो, व्यर्थ ही देहानुसरण को विवश हो जाती है ।

और यदि आत्मा परमात्मा तक न पहुंच सके, तो जीवन एक असह्य पीड़ा मे परिणत हो जाता है । परमात्मा ही उसका विकास है । वही उसकी पूर्णतम अभिव्यक्ति है । और जहां विकास में बाधा है, वहीं दुख है । जहां स्वयं की संभावनाओं के सत्य बनने में अवरोध है, वहीं पीड़ा है । क्योंकि स्वयं की पूर्ण अभिव्यक्ति ही आनंद है ।

वह देखते हो ? उस दीये को देखते हो ? मिट्टी का मर्त्य दीया है, लेकिन ज्योति तो अमृत की है । दीया पृथ्वी का ज्योति तो आकाश की है । जो पृथ्वी का है, वह पृथ्वी पर ठहरा है, लेकिन ज्योति तो सतत अज्ञात आकाश की ओर भागी जा रही है । ऐसे ही मिट्टी की देह है मनुष्य की, किंतु आत्मा तो मिट्टी की नहीं है । वह तो मर्त्य दीप नहीं, अमृत ज्योति है । किंतु अहंकार के कारण वह भी पृथ्वी से नहीं उठ पाती है ।

परमात्मा की ओर केवल वे ही गति कर पाते हैं, जो सब भांति स्वयं से निर्भार हो जाते है ।

एक कथा मैने सुनी है

एक अति दुर्गम और ऊंचे पर्वत पर परमात्मा का स्वर्ण मंदिर था । उसका पुजारी बूढ़ा हो गया था और उसने घोषणा की थी कि मनुष्य जाति मे जो सर्वाधिक बलशाली होगा, वही नये पुजारी की जगह नियुक्त हो सकेगा । इस पद से बड़ा और कोई सौभाग्य नहीं था । निश्चित तिथि पर बलशाली उम्मीदवारों ने पर्वतारोहण प्रारंभ किया । जो सबसे पहले पर्वत शिखर पर स्थित मंदिर में पहुंच जाएगा, निश्चय ही वही सर्वाधिक बलशाली सिद्ध हो जाएगा । आरोहण पर निकलते समय प्रत्येक प्रतियोगी ने अपने बल का द्योतक एक एक पत्थर अपने कंधे पर ले रखा था । जो जितना बलशाली स्वयं को समझता था, उसने उतना ही बडा पत्थर अपने कंधे पर उठा रक्खा था । महीनों की अति कठिन चढ़ाई थी । अनेक के प्राणों के जाने का भी भय था । शायद इसलिए आकर्षण भी था और चुनौती भी थी। सैकड़ों लोग अपने अपने भाग्य और पुरुषार्थ की परीक्षा के लिए निकल पड़े थे । जैसे जैसे दिन बीतते गए, अनेक आरोही पिछड़ते गए । कुछ खाई खड्डों में अपने पत्थरों को लिए संसार से कूच कर गए । फिर भी थके और क्लांत जो शेष थे, वे अदम्य लालसा से बड़े जाते थे । जो गिरते जाते थे, उनके संबंध में चलनेवालों को विचार करने के लिए न समय था, न सुविधा थी । लेकिन एक दिन सभी आरोहियो ने आश्चर्य से देखा कि जो व्यक्ति सबसे पीछे रह गया था, वही तेजी से सबके आगे निकलता जा रहा है । उसके कंधे पर बल का द्योतक कोई भार नहीं था । निश्चय ही यही भारहीनता उसकी तीव्र गति बन गई थी । उसने अपने पत्थर को कहीं फेंक दिया था । वे सब उसकी मूढ़ता देख हंसने लगे थे, क्योंकि अपने पौरुषचिन्ह से रहित व्यक्ति के पर्वत शिखर पर पहुंचने का अभिप्राय ही क्या हो सकता था ? फिर जब महीनों की कष्ट साध्य चढ़ाई के बाद धीरे धीरे सभी पर्वतारोही परमात्मा के मंदिर तक पहुंच गए तो उन्हें यह जान कर अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ कि उनका वही स्वल्प सामर्थ्य साथी जो अपना पौरुषभार फेंक कर सबसे पहले मंदिर पर पहुंच गया था, नया पुजारी बना दिया गया है! लेकिन इसके पहले कि वे इस अन्याय की शिकायत करें, पुराने पुजारी ने उन सबका स्वागत करते हुए कहा परमात्मा के मंदिर में प्रवेश का अधिकारी केवल वही है, जो स्वयं के अहंकार के भार से मुक्त हो गया है । इस युवक ने एक सर्वथा नवीन बल का परिचय दिया है । अहंकार का पाषाणभार वास्तविक बल नहीं है । और मै आप सबसे सविनय पूछता हूं कि पर्वतारोहण के पूर्व इन पत्थरों को कंधों पर ढोने की सलाह आपको किसने दी थी और कब दी थी,?

मिट्टी के दिये (बोध कथाएँ) - Lamps of Clay (Perception Stories)

Item Code:
HAA302
Cover:
Hardcover
Edition:
2011
ISBN:
9788172610326
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
203
Other Details:
Weight of the Book: 390 gms
Price:
$30.00
Discounted:
$24.00   Shipping Free
You Save:
$6.00 (20%)
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
मिट्टी के दिये (बोध कथाएँ) - Lamps of Clay (Perception Stories)

Verify the characters on the left

From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 3508 times since 11th Feb, 2014

पुस्तक परिचय

कहानिंया सत्य की दूर से आती प्रतिध्वनियां हैं एक सूक्ष्म सा इशारा, एक नाजुक सा धागा। तुम्हें खोजते रहना होगा। तब कहानी धीरे धीरे अपने खजाने तुम्हारे लिए खमलने लगेगी।

यदि तुम कहानी को वैसे ही लो जैसी वह दिखाई देती है, तुम उसके संपूर्ण अर्थ से ही चूक जाओगे। प्रत्यक्ष वास्तविक नहीं है। वास्तविक छिपा है बड़े गहरे में छिपा है जैसे किसी प्याज में कोई हीरा छिपा हो। तुम उघाड़ते जाते हो  प्याज की परतों पर परतें, और तब हीरा उजागर होता है।

 

भूमिका

मनुष्य को परमात्मा तक पहुंचने से कौन रोकता है त्र और मनुष्य को पृथ्वी से कौन बांधे रखता है? वह शक्ति कौन सी है जो उसकी जीवन सरिता को सत्ता के सागर तक नहीं पहुंचने देती है?

मैं कहता हूं   मनुष्य स्वयं । उसके अहंकार का भार ही उसे ऊपर नहीं उठने देता है । पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण नहीं, अहंकार का पाषाणभार ही हमे ऊपर नहीं उठने देता है । हम अपने ही भार से दबे हैं, और गति में असमर्थ हो गए हैँ । पृथ्वी का वश देह के आगे नहीं है । उसका गुरुत्वाकर्षण देह को बांधे हुए है । किंतु अहंकार ने आत्मा को भी पृथ्वी से बांध दिया है । उसका भार ही परमात्मा तक उठने की असमर्थता और अशक्ति बन गया है । देह तो पृथ्वी की है । वह तो उससे ही जन्मी है और उसमें ही उसे लीन हो जाना है । लेकिन आत्मा अहंकार के कारण परमात्मा से वंचित हो, व्यर्थ ही देहानुसरण को विवश हो जाती है ।

और यदि आत्मा परमात्मा तक न पहुंच सके, तो जीवन एक असह्य पीड़ा मे परिणत हो जाता है । परमात्मा ही उसका विकास है । वही उसकी पूर्णतम अभिव्यक्ति है । और जहां विकास में बाधा है, वहीं दुख है । जहां स्वयं की संभावनाओं के सत्य बनने में अवरोध है, वहीं पीड़ा है । क्योंकि स्वयं की पूर्ण अभिव्यक्ति ही आनंद है ।

वह देखते हो ? उस दीये को देखते हो ? मिट्टी का मर्त्य दीया है, लेकिन ज्योति तो अमृत की है । दीया पृथ्वी का ज्योति तो आकाश की है । जो पृथ्वी का है, वह पृथ्वी पर ठहरा है, लेकिन ज्योति तो सतत अज्ञात आकाश की ओर भागी जा रही है । ऐसे ही मिट्टी की देह है मनुष्य की, किंतु आत्मा तो मिट्टी की नहीं है । वह तो मर्त्य दीप नहीं, अमृत ज्योति है । किंतु अहंकार के कारण वह भी पृथ्वी से नहीं उठ पाती है ।

परमात्मा की ओर केवल वे ही गति कर पाते हैं, जो सब भांति स्वयं से निर्भार हो जाते है ।

एक कथा मैने सुनी है

एक अति दुर्गम और ऊंचे पर्वत पर परमात्मा का स्वर्ण मंदिर था । उसका पुजारी बूढ़ा हो गया था और उसने घोषणा की थी कि मनुष्य जाति मे जो सर्वाधिक बलशाली होगा, वही नये पुजारी की जगह नियुक्त हो सकेगा । इस पद से बड़ा और कोई सौभाग्य नहीं था । निश्चित तिथि पर बलशाली उम्मीदवारों ने पर्वतारोहण प्रारंभ किया । जो सबसे पहले पर्वत शिखर पर स्थित मंदिर में पहुंच जाएगा, निश्चय ही वही सर्वाधिक बलशाली सिद्ध हो जाएगा । आरोहण पर निकलते समय प्रत्येक प्रतियोगी ने अपने बल का द्योतक एक एक पत्थर अपने कंधे पर ले रखा था । जो जितना बलशाली स्वयं को समझता था, उसने उतना ही बडा पत्थर अपने कंधे पर उठा रक्खा था । महीनों की अति कठिन चढ़ाई थी । अनेक के प्राणों के जाने का भी भय था । शायद इसलिए आकर्षण भी था और चुनौती भी थी। सैकड़ों लोग अपने अपने भाग्य और पुरुषार्थ की परीक्षा के लिए निकल पड़े थे । जैसे जैसे दिन बीतते गए, अनेक आरोही पिछड़ते गए । कुछ खाई खड्डों में अपने पत्थरों को लिए संसार से कूच कर गए । फिर भी थके और क्लांत जो शेष थे, वे अदम्य लालसा से बड़े जाते थे । जो गिरते जाते थे, उनके संबंध में चलनेवालों को विचार करने के लिए न समय था, न सुविधा थी । लेकिन एक दिन सभी आरोहियो ने आश्चर्य से देखा कि जो व्यक्ति सबसे पीछे रह गया था, वही तेजी से सबके आगे निकलता जा रहा है । उसके कंधे पर बल का द्योतक कोई भार नहीं था । निश्चय ही यही भारहीनता उसकी तीव्र गति बन गई थी । उसने अपने पत्थर को कहीं फेंक दिया था । वे सब उसकी मूढ़ता देख हंसने लगे थे, क्योंकि अपने पौरुषचिन्ह से रहित व्यक्ति के पर्वत शिखर पर पहुंचने का अभिप्राय ही क्या हो सकता था ? फिर जब महीनों की कष्ट साध्य चढ़ाई के बाद धीरे धीरे सभी पर्वतारोही परमात्मा के मंदिर तक पहुंच गए तो उन्हें यह जान कर अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हुआ कि उनका वही स्वल्प सामर्थ्य साथी जो अपना पौरुषभार फेंक कर सबसे पहले मंदिर पर पहुंच गया था, नया पुजारी बना दिया गया है! लेकिन इसके पहले कि वे इस अन्याय की शिकायत करें, पुराने पुजारी ने उन सबका स्वागत करते हुए कहा परमात्मा के मंदिर में प्रवेश का अधिकारी केवल वही है, जो स्वयं के अहंकार के भार से मुक्त हो गया है । इस युवक ने एक सर्वथा नवीन बल का परिचय दिया है । अहंकार का पाषाणभार वास्तविक बल नहीं है । और मै आप सबसे सविनय पूछता हूं कि पर्वतारोहण के पूर्व इन पत्थरों को कंधों पर ढोने की सलाह आपको किसने दी थी और कब दी थी,?

Post a Comment
 
Post Review
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy

Based on your browsing history

Loading... Please wait

Related Items

अध्यात्म उपनिषद (ओशो): Adhyatma Upanishad (Osho)
by Osho
Hardcover (Edition: 2015)
Osho Media International
Item Code: HAA273
$40.00$32.00
You save: $8.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
मरौ हे जोगी मरौ: Osho on Gorakhnath
by ओशो (Osho)
Hardcover (Edition: 2013)
OSHO Media International
Item Code: NZA633
$40.00$32.00
You save: $8.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
सत भाषै रैदास: Osho on Raidas
Item Code: NZE219
$25.00$20.00
You save: $5.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
ध्यान-सूत्र: Dhyana Sutra by Osho
by ओशो (Osho)
Paperback (Edition: 2012)
Osho Media International
Item Code: NZA890
$20.00$16.00
You save: $4.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
चित चकमल लागै नहीं: Discourses by Osho
by ओशो (Osho)
Paperback (Edition: 2012)
Osho Media International
Item Code: NZA889
$12.00$9.60
You save: $2.40 (20%)
Add to Cart
Buy Now
ज्योतिष विज्ञान: Science of Astrology
by ओशो (Osho)
Hardcover (Edition: 2013)
Osho Media International
Item Code: NZA915
$20.00$16.00
You save: $4.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
गीता दर्शन : Gita Darshan (Set of 8 Volumes)
by ओशो (Osho)
Hardcover (Edition: 2013)
Osho Media International
Item Code: NZB929
$325.00$260.00
You save: $65.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
महावीर या महाविनाश: Its Either Mahavir or Destruction
by ओशो (Osho)
Paperback (Edition: 2016)
Osho Media International
Item Code: NZA917
$30.00$24.00
You save: $6.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
तृषा गई एक बूंद से: My Thirst was Quenched by One Drop
by ओशो (Osho)
Paperback (Edition: 2014)
Osho Media International
Item Code: NZA898
$20.00$16.00
You save: $4.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
क्रांतिबीज: The Seeds of Revolution
by ओशो (Osho)
Paperback (Edition: 2013)
Osho Media International
Item Code: NZA907
$25.00$20.00
You save: $5.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
पिव पिव लागी प्यास: Piv Piv Lagi Pyaas
by ओशो (Osho)
Hardcover (Edition: 2014)
OSHO Media International
Item Code: NZA655
$30.00$24.00
You save: $6.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
क्या मनुष्य एक यंत्र है: Is Man a Machine?
by ओशो (Osho)
Paperback (Edition: 2013)
OSHO Media International
Item Code: NZA626
$20.00$16.00
You save: $4.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now
जीवन रहस्य: Secret of Life
by ओशो (Osho)
Hardcover (Edition: 2013)
OSHO Media International
Item Code: NZA624
$25.00$20.00
You save: $5.00 (20%)
Add to Cart
Buy Now

Testimonials

Fast and reliable service.
Dharma Rao, Canada
You always have a great selection of books on Hindu topics. Thank you!
Gayatri, USA
Excellent e-commerce website with the most exceptional, rare and sought after authentic India items. Thank you!
Cabot, USA
Excellent service and fast shipping. An excellent supplier of Indian philosophical texts
Libero, Italy.
I am your old customer. You have got a wonderful collection of all products, books etc.... I am very happy to shop from you.
Usha, UK
I appreciate the books offered by your website, dealing with Shiva sutra theme.
Antonio, Brazil
I love Exotic India!
Jai, USA
Superzoom delivery and beautiful packaging! Thanks! Very impressed.
Susana
Great service. Keep on helping the people
Armando, Australia
I bought DVs supposed to receive 55 in the set instead got 48 and was in bad condition appears used and dusty. I contacted the seller to return the product and the gave 100% credit with apologies. I am very grateful because I had bought and will continue to buy products here and have never received defective product until now. I bought paintings saris..etc and always pleased with my purchase until now. But I want to say a public thank you to whom it may concern for giving me the credit. Thank you. Navieta.
Navieta N Bhudu
TRUSTe
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2018 © Exotic India