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Books > Language and Literature > हिन्दी साहित्य > महावीर प्रसाद द्विवेदी (प्रतिनिधि संकलन): Mahavir Prasad Dwivedi ( A Representative Selection)
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महावीर प्रसाद द्विवेदी (प्रतिनिधि संकलन): Mahavir Prasad Dwivedi ( A Representative Selection)
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महावीर प्रसाद द्विवेदी (प्रतिनिधि संकलन): Mahavir Prasad Dwivedi ( A Representative Selection)
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Description

पुस्तक के विषय में

'सरस्वती' के यशस्वी संपादक, महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी नवजागरण के शलाका पुरुष और युग-निर्माता साहित्यकार थे । उन्होंने बीसवीं शताब्दी मे भारतेन्दु द्वारा प्रवर्तित नवजागरण की चेतना को व्यापकता और गहराई दी । एक ओर उन्होंने आधुनिक विज्ञान विषयक अनेक लेख लिखकर हिंदी जाति में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार किया तो दूसरी और 'संपत्ति शास्त्र' जैसा विशाल ग्रंथ लिखकर अंग्रेजी राज के आर्थिक शोषण के प्रति सामान्य जनता को सचेत किया । काव्य के क्षेत्र में पुराने रीतिवाद का उन्मूलन तथा ब्रज भाषा के स्थान पर गद्य की तरह ही खडी बोली का प्रचलन द्विवेदी जी के ही प्रयास का परिणाम है । उन्होंने हिंदी भाषा का संस्कार करके उसका एक मानक रूप स्थिर किया । 'सरस्वती' के माध्यम से उन्होंने हिंदी लेखकों का ऐसा व्यापक वर्ग तैयार किया जिससे ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में लेखन-कार्य संभव हो सका । इसीलिए बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य के आरंभिक दो दशकों को 'द्विवेदी युग' के नाम से याद किया जाता है ।

संपादक, रामबक्ष (जन्म : 1951) जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं । इनकी कुछ चर्चित पुस्तकें-'प्रेमचंद', 'प्रेमचंद और भारतीय किसान', 'द्रादूदयाल', 'समकालीन हिंदी आलोचक और आलोचना' हैं ।

इस पुस्तकमाला के प्रधान संपादक, नामवर सिंह (जन्म : 1927) हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष हैं । वे लगभग दो दशकों तक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मे हिंदी के प्रोफेसर रहे और पच्चीस वर्षों तक उन्होंने 'आलोचना' पत्रिका का संपादन किया । प्रकाशित पुस्तकें एक दर्जन से ऊपर हैं, जिनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं: 'इतिहास और आलोचना', 'कविता के नये प्रतिमान', 'छायावाद', 'कहानी नई कहानी' और 'दूसरी परम्परा की खोज'

भूमिका

आधुनिक हिंदी भाषा और साहित्य के निर्माताओं में आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है । बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दो दशकों के साहित्य के निर्माण में उनकी भूमिका सवोंपरि है । आचार्य द्विवेदी के गौरव का मूलाधार ''सरस्वती'' पत्रिका का संपादन है । जनवरी 1900 . में काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अनुमोदन से इंडियन प्रेस प्रयाग द्वारा इस पत्रिका का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ । इसका संपादन कार्य एक '' संपादन समिति '' को सौंपा गया,जिसमें बाच कार्तिकप्रसाद खत्री ,पं० किशोरीलाल गोस्वामी, बा. जगत्राथदास बी..बा. राधाकृष्णदास और बद श्यामसुन्दर दास बी.. शामिल थे । एक वर्ष तक इस समिति ने 'सरस्वती '' का संपादन किया । अगले दो वर्षों तक अकेले बाबू श्यामसुन्दर दास बी० ए० ने संपादन कार्य किया । जनवरी 1903 से आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी इस गौरवशाली पत्रिका के संपादक नियुक्त हुए ।

दस पत्रिका के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए प्रवेशांक में घोषित किया गया था कि, 'इस पत्रिका में कौन-कौन से विषय रहेंगे,यह केवल इसी से अनुमान करना चाहिए कि इसका नाम सरस्वती है । इसमें गद्य, पद्य, काव्य, नाटक, उपन्यास, चम्पू इतिहास, जीवनचरित्र, पंच, हास्य, परिहास कौतुक, पुरावृत्त विज्ञान, शिल्प, कला-कौशल आदि साहित्य के मानवीय विषयों का यथावकाश समावेश रहेगा और आगत ग्रंथादिकों की यथोचित समालोचना की जायेगी । यह हम निज मुख से नहीं कह सकते कि भाषा में यह पत्रिका अपने ढंग की प्रथम होगी । ' दरअसल आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की लगन और अथक प्रयासों से यह पत्रिका '' अपने ढंग की प्रथम' तथा हिंदी की प्रतिनिधि पत्रिका बन गयी थी; इसमें कोई सन्देह नहीं ।

''सरस्वती '' पत्रिका के द्वारा द्विवेदीजी ने काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली को प्रतिष्ठित किया । भारतेंदु युग के लेखक गद्य खड़ी बोली में तथा कविताएं ब्रजभाषा में लिखा करते थे । इस द्वैत को उन्होंने स्वीकार कर लिया था । द्विदीजी ने सैद्धांतिक रूप से इस द्वैत का खंडन किया तथा खड़ी बोली में कविता लिखने को प्रोत्साहन देकर व्यावहारिक रूप में इस द्वैत को मिटाया ।

इस पत्रिका के द्रारा उन्होंने हिंदी भाषा का परिष्कार किया तथा उसके व्याकरण सम्मत रूप को स्थिर किया । यहां तक कि अनेक लेखकों ने द्विवेदीजी से भाषा लिखनी सीखी । उस युग के अनेक लेखकों ने लिखित रूप में द्विवेदीजी के इस ऋण को स्वीकार किया है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने '' हिंदी साहित्य का इतिहास'' में द्विवेदीजी के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा है, ''यदि द्विवेदीजी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरण विरुद्ध और ऊटपटांग भाषा चारों ओर दिखायी पड़ती थी, उसकी परंपरा जल्दी न रुकती । उनके प्रभाव से लेखक सावधान हो गये और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया । '' (हिंदी साहित्य का इतिहास, पू० 528)

फिर सरस्वती पत्रिका के द्वारा उन्होंने हिंदी को अनेक लेखक, कवि, आलोचक और अनुवादक दिये । कई नये लेखकों की आरंभिक रचनाओं को प्रकाशित करने का श्रेय ''सरस्वती'' पत्रिका को है । मैथिलीशरण गुप्त, बदरीनाथ भट्ट, कामताप्रसाद गुरु, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, प्रेमचंद, लोचनप्रसाद पाण्डेय आदि लेखक '' सरस्वती'' पत्रिका के द्वारा हिंदी संसार से परिचित हुए । मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं की मुख्य विषय-वस्तु की प्रेरणा द्विवेदीजी दिया करते थे । किसी भी संपादक के लिए यह कम गौरव की बात नहीं है ।

आचार्य द्विवेदी ने हिंदी में मौलिक रचनाओं को तो प्रोत्साहित किया ही था, परंतु वे लेखकों को मौलिक रचनाओं के साथ साथ अनुवाद के लिए भी प्रेरित करते थे । '' सरस्वती'' में उन्होंने अनूदित रचनाओं को भी बहुत सम्मानपूर्वक प्रकाशित किया । अनुवाद के द्वारा वे अपने पाठकों को अन्य भाषाओं के साहित्य औरचिंतन से परिचित करवाना चाहते थे । अपनी संपादकीय टिप्पणियों में उन्होंने अन्य भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री का भी बेहिचक सार-संक्षेप प्रस्तुत किया है । स्वयं द्विवेदीजी ने ''बेकन विचार रत्नावली'' (बेकन), "स्वाधीनता'' (जान स्तुअर्ट मिल), शिक्षा (हर्बर्ट स्पेससे आदि अंग्रेजी पुस्तकों के साथ साथ कई संस्कृत और मराठी रचनाओं के अनुवाद किये । दरअसल द्विवेदीजी हिंदी को सिर्फ हिंदी भाषी प्रांतों तक सीमित नहीं रखना चाहते थे, वे उसका अखिल भारतीय स्वरूप विकसित करना चाहते थे । इसके लिए अनुवाद सबसे उपयोगी माध्यम हो सकता है । हिंदी के विकास में अनुवादों की भूमिका को आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने संभवतया पहली बार पहचाना । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी साहित्य को मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे । उन्होंने साहित्य और साहित्यकार के सामने उच्चतर आदर्श रखा । वे ज्ञान के प्रचार-प्रसारको साहित्य का मुख्य कर्म मानते थे । इसी उद्देश्य के लिए ''सरस्वती'' का प्रकाशन हुआ था । इस उद्देश्य से द्विवेदीजी सहमत थे । इसलिए उन्होंने इसमें शुद्ध साहित्य के प्रकाशन के साथ साथ अपने समय की गंभीर समस्याओं से संबंधित मौलिक सामग्री को भी प्रकाशित किया । उसमें इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र धर्म पुराण विज्ञान आदि से संबंधित सामग्री की भरमार रहती थी । डा० रामविलास शर्मा ने ठीक ही लिखा है कि ''सरस्वती'' ''ज्ञान की पत्रिका'' थी । स्वयं द्विवेदीजी ने साहित्यिक लेखों के अलावा ''संपत्तिशास्त्र'' जैसे विषय पर मौलिक पुस्तक लिखने का बीड़ा उठाया । द्विवेदीजी मानते थे कि साहित्यकारों में इस संसारको जानने की जिज्ञासा रहनी चाहिए, इसलिए वे नये नये विषयों पर खोजपूर्ण निबंध लिखने की प्रेरणा दिया करते थे । यदि किसी अन्य भाषा में नवीन जानकारियों से भरी हुई खोज प्रकाशित होती थी तो द्विवेदीजी उसे ससम्मान ''सरस्वती'' में भी उद्धृत करते थे । उनकी सामाजिक दृष्टि की टकराहट आगे चलकर छायावादी कविता से हुई । उनको लगने लगा कि वर्तमान (छायावादी) कविता अपने इस उद्देश्य से भटक गयी है ।

द्विवेदीजी का लेखन औरउनका रचनाकाल 1920 . से पूर्व का रहा है । हालांकि उन्होंने बाद में भी कुछ छिटपुट लेखन किया है, परंतु उनकी दृष्टि इससे पूर्व स्थिर हो गयी लगती है । उनकी रचनात्मक ऊर्जा का सर्वश्रेष्ठ रूप तक अभिव्यक्त हो चुका था । 1920 . हिंदी साहित्य के इतिहास में निर्णायक मो़ड़ लाने वाला वर्ष है । इसके महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, ''सन् 1920 . भारतवर्ष के लिए युगांतरले आने वाला वर्ष है । इस वर्ष भारतवर्षका चित्र पुराने संस्कारों को झाड़कर नवीन मार्ग के अनुसम्गन में प्रवृत्त हुआ था । नवीन आशा और नवीन आकांक्षा के प्रति जैसा अडिग विश्वास इस समय दिखायी दिया, वह शताब्दियों से अपिरिचित-सा हो गया था । ' इस वर्ष के बाद स्वाधीनता आदोलन नये चरण में प्रवेश करता है । इसके बाद स्वाधीनता आदोलन के केंद्र हिंदी भाषी प्रांत बन गये । महात्मा गां धी के नेतृत्व में चलने वाले असहयोग आदोलन के प्रभाव से बुद्धिजीवी इस निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचे कि बिना अंगेजों के यहां से निकाले हम देशोद्धार नहीं कर सकते । इसलिए हमारा मुख्य उद्देश्य देशोद्धार नहीं,वरन् देशमुक्ति का होना चाहिए । देशमुक्ति की यह आवाज राजनीतिक क्षेत्र के साथ साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी सुनायी देने लगी । देश की अंग्रेजों से मुक्ति के साथ साथ समाज की रूढ़ियों से मुक्ति, व्यक्ति की धर्म के बंधन से मुक्ति, नारी की पुरुष से मुक्ति, कविता से छंद की मुक्ति की धारणा भी आयी । परंतु यह सब बाद में हुआ । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के रचनाकाल के बाद यह सब घटित हुआ ।

दरअसल आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की पत्रिका में जिस 'शिक्षित वर्ग'' की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हुई उस वर्ग की आरंभ में ब्रिटिश सिंह से कोई शिकायत नहीं थी । यह वर्ग तो ब्रिटिश सामाज्य की न्यायप्रियता और प्रजापालकता का गहरा हामी थी । इसलिए इस वर्ग की मान्यता थी कि ''अंग्रेजी अमलदारी में रहते हुए देशोद्धार की संभावनाएं सर्वाधिक है । जनवरी 1950 . की ''सरस्वती में नागरी प्रचारिणी सभा के क्रियाकलापों की आलोचना करते हुए द्विवेदीजी ने अंग्रेजी सरकारका आदर्श सामने रखा-'अंग्रेजी गवर्नमेंट विदेशी है । पर उसने भी अपने कायों की आलोचना करने का द्वार खोल रखा है । खुले-खजाने लोग वाइसराय और प्राइम मिनिस्टर तक दो कामों का खंडन-मंडन करते है । इससे गवर्नमेंट की उदारता और न्यायनिष्ठा जाहिर होती है ।'' 1905 . तक द्विवेदीजी ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले राजाओं, नवाबों और क्रांतिकारियों की आलोचना की । जनवरी 1904 . की ' सरस्वती' में द्विदीजी ने पं० दत्तात्रेय बलवंत पारसनीय के आधार पर रानी लस्मीबाई के जीवन पर लेख लिखकर सिद्ध किया कि '' 1857 ई० के बलवे में अंग्रेजों का जो वध झांसी में हुआ था ,उससे रानी लक्ष्मीबाई का भी संबंध न था ।'' अप्रैल 1904 के एक लेख में उन्होंने शिवाजी को अंग्रेजों का परम मित्र और हितैषी बताया । अक्तूबर 1904 के एक लेख में कानपुर में हुए सन् 57 के ''बलवे'' का जिक्र है । इसमें उन्होंने तात्या टोपे और नाना शाहब को 'नृशंस हत्यारा' तक कहा ।

ब्रिटिश सरकारकी न्यायप्रियता और प्रजापालकता के हिमायती होते हुए भी द्विवेदीजी में देश भक्ति का अभाव नहीं था । देश प्रेम उनमें तब भी था । 1906 . के बाद द्विवेदीजी ने अपनी इन गलतियों को सुधारा । इसके बाद उन्होंने अंग्रेज सरकारकी तारीफ करना कम कर दिया । यहां तक कि, बाद में उन्होंने आवश्यकता एड्ने पर अंग्रेजों की आलोचना भी की । दिसंबर 1906 ई० में ''मुर्शिदाबाद'' पर लिखते हुए उन्होंने लिखा, '' अंग्रेज और कुछ हिंदुस्तानी लेखकों ने भी सिराजुद्दौला को काम-कर्दम का कीड़ा, निर्दयता का समुद्र, दुर्व्यसनों का शिरोमणि, अर्थ-लोलुप और नरपिशाच आदि मधुरिमामय विशेषणों से विभूषित किया है । पर बाबू अक्षय कुमार मैत्रेय ने बंगला में सिराजुद्दौला का जीवनचरित लिखकर उसकी इस कलंक-कालिमा को धोकर प्राय: बिल्कुल साफ कर दिया है । इस किताब को पढ़ने से यह धारणा होती है कि सिराजुद्दौला के समान सहनशील, राजनीतिज्ञ, बात का सच्चा, निर्भय, शांतिप्रिय और रक्तपात द्वैषी शायद ही और कोई राजा या बादशाह हुआ हो । प्राय: सब कहीं अंग्रेजों ही के लोभ, प्रतिज्ञा-भंजन, अन्यायपरक, प्रतिहिंसक स्वभाव, अनाचार, विश्वासघात आदि का परिचय मिलता है । इस पुस्तक में यह सब बात खूब दृढ़ता से साबित की गयी है कि कलकत्ते के अंधकूप अर्थात् कालकोठरी या ब्लैक होल की हत्या की कहानी बे-सिर-पैर का एक औपन्यासिक गठन मात्र है । ''ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कि स्वयं द्विवेदीजी ने कलकत्ता की कालकोठरी की कथा को प्रामाणिक मानते हुए ''सरस्वती'' में प्रकाशित किया था ।

1906 ई० में परिलक्षित जीवन-दृष्टि संबंधी परिवर्तन के बावजूद द्विवेदीजी इस मत के कायल नहीं थे कि देश प्रेम का अर्थ अंगेजी राज का विरोध करना होता है । उन्होंने हमेशा यह दृष्टिकोण सामने रखा कि अंगेजी राज की बिना चिंता किये हुए,उसके बारे में अपनी राय भीतर रखते हुए, जहां तक संभव हो, बिना अंगेजी सरकार से टकराये हुए अपना विकास करना चाहिए। हमें अपने देश व समाज की कमियों को दूर करना चाहिए-इस तरह सामाजिक उद्धार का कार्य करना चाहिए । इसलिए मुख्य समस्या यह नहीं है कि ब्रिटिश सरकार क्या कर रही है? वरन् यह है कि हम देशवासी स्वयं अपनी भलाई के लिए क्या कर रहे हैं? यदि हम अपना काम-देश सेवा-ठीक से कर रहे हैं, तो यह पर्याप्त है । अग्रेजों की जो बातें हमारे पक्ष में जाती हों, उनको उद्धृत करना चाहिए, उन बातों की तारीफ करनी चाहिए । जो बातें हमारे प्रतिकूल है, उनकी चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है । उन बातों में अपने दिमाग को उलझा देना समय और श्रम का अपव्यय है । इससे हमारी सक्रियता बाधित हो सकती है । अपने समय की राजनीति की चर्चा करते समय मूलतया उनका यह दृष्टिकोण रहा है । प्राच्य विद्याविद् अग्रेजों के कार्यों की द्विवेदीजी ने हमेशा तारीफ की है । आलोचनाओं के बिंदुयों की ओर संकेत करते हुए भी उन्होंने गीता प्रेम के कारण वारेन हेस्टिंग्स की तारीफ की । यहां तक कि ''शासन-सुधारों की रिपोर्ट'' की आलोचना भी द्विवेदीजी ने इसी भाव में की है 'आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ''संपत्तिशास्त्र'' पर पुस्तक लिखकर प्रकारांतर से अंग्रेजों के शोषण की आलोचना की । इसमें उन्होंने बताया कि ''गवर्नमेंट ही गोया जमींदार है।'' इस तरह खेती की यह आय ही अंग्रेजों के शोषण का मुख्य आधार है । शेष आय तो इसमें जोड़ती है । इस पुस्तक में द्विवेदीजी ने किसानों और जमींदारों के परस्पर हित-विरोध की चर्चा नहीं की ,वरन् इस बात पर बल दिया कि जमींदारों को शिक्षित और उदार होना चाहिए, ताकि देश में खेती का विकास हो सके । वे जमींदारी प्रथाके भीतर ही खेती में औद्योगिक उन्नति से लाभ उठा लेने के पक्षपाती थे ।

आचार्य द्विवेदी ने प्राचीन इतिहास ,पुराण ,वेद-शास्त्र ,सामाजिक रूढ़ियों और परंपराओ का गहन अध्ययन किया । साथ ही विज्ञान, राजनीति, अर्थशास्त्र, उद्योग-धन्धों की जानकारी उपलब्ध करने-करवाने में भी रुचि दिखायी । प्राचीन भारतीय परंपरा और आधुनिक यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान का तालमेल बिठाने की भी उन्होंने कोशिश की । इन सब चीजों के मूल में देश-दशा के ज्ञान की लालसा काम कर रही थी । इसलिए उन्होंने अपने लेखन को ''विविध विषयों'' की ओर मोड़ा ।

यदि उनके रचना-कर्म के केंद्र बिंदु को खोजा जाय तो कहा जा सकता है कि समकालीन भारत के अधःपतन की चेतना से उत्पन्न पीड़ाबोध उनकी रचनाओं का मर्म है । इस देश में हो रही'' अस्वाभाविक लीला ''देखकर उन्हे'' आश्चर्य भी होता है और दु:ख भी ।'' अपने ही देश के सुशिक्षित कहे जाने वाले लोग यदि कोई ऐसा कार्य करते हैं, तब उन्हें बहुत पीड़ा होती है ।'' आदर पात्रों के नाम का निरादर' शीर्षक टिप्पणी में उन्होंने पीड़ा भरी बेचैनी से ऐसे लोगों को फटकारते हुए लिखा है, ''इसी तरह कुछ लोग कांग्रेस को न तो कांग्रेस ही कहते हैं ,न जातीय महासभा ही कहते हैं । वे उसे कंगरस कहते हैं । कंगरस ही नहीं, ''बाबुओं की कंगरस'' । जैसे बाबू लोग कोई बहुत ही तुच्छ, नीच, अधम या पतित पदार्थ हों । ये लोग, नहीं सोचते कि आखिर इस ''बाबू" शब्द के अंतर्गत हमारा भी तो समावेश होता है । आपको कोई महामहिम, परम-माहेश्वर, पतितपावन आदि विशेषणों से तो याद करता ही नहीं । आप भी तो बाबू ही कहाते हैं । फिर आप कांगेस को बाबुओं की कांग्रेस क्यों कहते हैं? आप भी तो बाबू है । फिर क्या कंगरस या कांग्रेस आपकी न हुई । बाबू कहाने वाले सुरेन्द्रनाथ, भूपेन्द्रनाथ,बैकुण्ठनाथ और मोतीलाल आदि क्या आपके बराबर भी सम्मान-पात्र नहीं? औरक्या कांग्रेस में केवल बाबू ही बाबू शामिल होते हैं । तिलक ,मालवीय ,गोखले ,गांधी ,लाजपतराय ,श्रीनिवास शासी, आलार, आयंगर-क्या ये सभी बाबू कहाते हैं? फिर बाबुओं की कांग्रेस कैसे हुई । कंगरस यदि लडकों का खेल है और यदि उससे कुछ भी लाभ नहीं हुआ तो कृपा करके बताइये आप ही ने भारत का कितना उद्धारकर दिखाया । ''यह पीड़ा भरा स्वर उनके लगभग प्रत्येक निबंध या टिप्पणी में पाया जाता है ।

महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोरको नोबेल पुरस्कार मिला । द्विवेदी इससे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने ''सरस्वती'' में टिप्पणी लिखी । इस टिप्पणी को लिखते लिखते उनकी पीड़ा फिर जाग्रत हो गयी। '' इन्हीं लोकोत्तर कवि और अद्वितीय साहित्य-सेवी रवीन्द्रनाथ के देशबन्धु कनाडा में धंसने नहीं पाते और पशुवत तुच्छ समझे जाकर नटाल औरट्रांसवाल के जेलों में हूंसे और हंटरों से पीटे जा रहे है ।'' जाहिर है कि यह ''पीड़ा'' देश प्रेम की गहन भावना के बिना संभव नहीं है। स्रियों की दशा, धार्मिक उन्माद, सामाजिक कुरीतियां, अशिक्षा-अज्ञान, जनता का शोषण व अपमान के दृश्यों को देखकर उनका यह पीड़ा-बोध अत्यंत विचलित हो उठता है। ''सरस्वती'' की संपादकीय टिप्पणियों में इस स्वर को बखूबी पहचाना जा सकता है।

 

विषय-सूची

 

संपादकीय वक्तव्य

नौ

 

भूमिका

बारह

1

मेरी जीवन-रेखा

1

2

मौलिकता का मूल्य

10

3

साहित्य

12

4

पुस्तक प्रकाशन

15

5

कापीराइट ऐक्ट

22

6

नया कापीराइट ऐक्ट

25

7

वेद

28

8

वैदिक रचना करने वाली स्रियां

35

9

ब्राह्मण-मन्त्र

36

10

बौद्धाचार्य शीलभद्र

38

11

भगवदगीता-रहस्य

41

12

गीता में अन्य शास्त्रों के सिद्धान्तों का समन्वय

46

13

ब्राह्मणों की समुद्र यात्रा

49

14

धर्म्मान्ध्य

51

15

आर्यसमाज का कोप

56

16

पड़े लिखो का पाण्डित्य

61

17

सम्पत्तिशास्र की भूमिका

66

18

सम्पत्ति का वितरण

73

19

देश की बात

79

20

मिस्टर गांधी का आत्म-गौरव और स्वदेशाभिमान

83

21

आदरपात्रों के नाम का निरादर

85

22

निष्क्रिय प्रतिरोध का परिणाम

87

23

शासन-सुधारों के विषय में रिपोर्ट

92

24

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

99

25

बाबू अरविन्द घोष

104

26

भारतवर्ष ही योरप का शिक्षक है

107

27

एक मुसलमान विद्वान का संस्कृत-प्रेम

108

28

सर विलियम जोन्स ने कैसे संस्कृत सीखी

109

29

बनारस के संस्कृत-कालेज की कुछ पुरानी बातें

113

30

पुराने अंगरेज अधिकारियों के संस्कृत पढ़ने का फल

115

31

वारेन हेस्टिंग्स और श्रीमद्भगवद्गीता

120

32

भारतवर्ष का कर्ज

121

33

टिकस पर टीका

122

34

उदारता में उफान

124

35

सरकार की पसन्द के पत्र

126

36

गवर्नमेन्ट की की हुई साहित्य-समालोचना

128

37

सरस्वती और सरकारी गजट

130

38

शिक्षा और सरकार

134

39

प्राथमिक शिक्षा के विस्तार की आयोजना

135

40

शिक्षा प्रचार के लिए गवर्नमेन्ट का खर्च

136

41

रेलों का खर्च और शिक्षा प्रचार

137

42

पुलिस और शिक्षा का खर्च

138

43

पुलिस में कुत्तों की भरती

139

44

देशी भाषाओं के द्वारा शिक्षा

140

45

भारत में रोमन-लिपि के प्रचारका प्रयत्न

142

46

आयुर्वेदिक चिकित्सा और गवर्नमेन्ट

144

47

हाईकोर्ट के जजों की तनख्वाहें

146

48

विलायत और भारत के बड़े राज-कर्मचारियों का वेतन

147

49

विज्ञानाचार्य वसु का विज्ञान मन्दिर

149

50

विज्ञानाचार्य वसु की नई खोज

152

51

कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर को एक लाख बीस हजार का इनाम

153

52

कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर

154

53

समाचार-पत्रों का विराट रूप

157

54

साहबी-हिन्दी

160

55

कौंसिल में हिन्दी

167

56

युद्ध, बीमारी और प्राकृतिक दुर्घटनाओं से नर-संहार

178

57

प्लेग से नर-नाश

180

58

प्लेग निवारण की योजना

181

59

कुनैन

183

60

भारतवर्ष में अन्धों के लिए स्कूल

184

61

भारत कला-परिषद्

186

62

सर भाण्डारकर का विद्यालय

187

63

पूने की गवेषणा-शाला

189

64

उस्मानिया विश्वविद्यालय

190

65

बनारस का हिन्दू-विश्वविद्यालय-एक

191

66

बनारस का हिन्दू-विश्वविद्यालय-दो

193

67

बनारस के हिन्दू-विश्वविद्यालय का जमा-खर्च

194

68

हिन्दू-विश्वविद्यालय और हिन्दी

195

69

खुदाबख्श लाइब्रेरी

196

70

संसार के कुछ पुराने पुस्तकालय

199

71

दुनिया में सबसे बड़ा कोश

201

72

स्मिथ साहब का भारतीय इतिहास

203

73

महाभारत का नया संस्करण

205

74

दैनिक प्रताप

206

75

पुस्तकों और पत्रों का वार्षिक विवरण

207

76

बंगाल और बिहार की भाषा

208

77

लेखकों को पेन्शन

210

78

तुलस्तुयी

211

79

''दृश्य-दर्शन' की भूमिका

212

80

एक नई किताब की भूमिका

213

81

बोल-चाल की हिन्दी में कविता

216

82

हिन्दी-साहित्य में डाकेज़नी

218

83

रोजगारी स्रियां

220

84

स्रियों के राजनैतिक अधिकार

221

85

बाइबल का प्रचार

222

86

अंगूठे के चिहों के प्रथम प्रयोक्ता

223

87

पुस्तकों का समर्पण

224

88

तारीख से दिन निकालने की रीति

225

 

परिशिष्ट-एक

227

 

परिशिष्ट-दो

228

Sample Page

महावीर प्रसाद द्विवेदी (प्रतिनिधि संकलन): Mahavir Prasad Dwivedi ( A Representative Selection)

Item Code:
NZD043
Cover:
Paperback
Edition:
2012
Publisher:
ISBN:
8123716745
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
246
Other Details:
Weight of the Book: 240 gms
Price:
$21.00   Shipping Free
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महावीर प्रसाद द्विवेदी (प्रतिनिधि संकलन): Mahavir Prasad Dwivedi ( A Representative Selection)
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पुस्तक के विषय में

'सरस्वती' के यशस्वी संपादक, महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी नवजागरण के शलाका पुरुष और युग-निर्माता साहित्यकार थे । उन्होंने बीसवीं शताब्दी मे भारतेन्दु द्वारा प्रवर्तित नवजागरण की चेतना को व्यापकता और गहराई दी । एक ओर उन्होंने आधुनिक विज्ञान विषयक अनेक लेख लिखकर हिंदी जाति में वैज्ञानिक चेतना का प्रसार किया तो दूसरी और 'संपत्ति शास्त्र' जैसा विशाल ग्रंथ लिखकर अंग्रेजी राज के आर्थिक शोषण के प्रति सामान्य जनता को सचेत किया । काव्य के क्षेत्र में पुराने रीतिवाद का उन्मूलन तथा ब्रज भाषा के स्थान पर गद्य की तरह ही खडी बोली का प्रचलन द्विवेदी जी के ही प्रयास का परिणाम है । उन्होंने हिंदी भाषा का संस्कार करके उसका एक मानक रूप स्थिर किया । 'सरस्वती' के माध्यम से उन्होंने हिंदी लेखकों का ऐसा व्यापक वर्ग तैयार किया जिससे ज्ञान-विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में लेखन-कार्य संभव हो सका । इसीलिए बीसवीं शताब्दी के हिंदी साहित्य के आरंभिक दो दशकों को 'द्विवेदी युग' के नाम से याद किया जाता है ।

संपादक, रामबक्ष (जन्म : 1951) जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं । इनकी कुछ चर्चित पुस्तकें-'प्रेमचंद', 'प्रेमचंद और भारतीय किसान', 'द्रादूदयाल', 'समकालीन हिंदी आलोचक और आलोचना' हैं ।

इस पुस्तकमाला के प्रधान संपादक, नामवर सिंह (जन्म : 1927) हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष हैं । वे लगभग दो दशकों तक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मे हिंदी के प्रोफेसर रहे और पच्चीस वर्षों तक उन्होंने 'आलोचना' पत्रिका का संपादन किया । प्रकाशित पुस्तकें एक दर्जन से ऊपर हैं, जिनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं: 'इतिहास और आलोचना', 'कविता के नये प्रतिमान', 'छायावाद', 'कहानी नई कहानी' और 'दूसरी परम्परा की खोज'

भूमिका

आधुनिक हिंदी भाषा और साहित्य के निर्माताओं में आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी का नाम बहुत सम्मान के साथ लिया जाता है । बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दो दशकों के साहित्य के निर्माण में उनकी भूमिका सवोंपरि है । आचार्य द्विवेदी के गौरव का मूलाधार ''सरस्वती'' पत्रिका का संपादन है । जनवरी 1900 . में काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अनुमोदन से इंडियन प्रेस प्रयाग द्वारा इस पत्रिका का प्रथम अंक प्रकाशित हुआ । इसका संपादन कार्य एक '' संपादन समिति '' को सौंपा गया,जिसमें बाच कार्तिकप्रसाद खत्री ,पं० किशोरीलाल गोस्वामी, बा. जगत्राथदास बी..बा. राधाकृष्णदास और बद श्यामसुन्दर दास बी.. शामिल थे । एक वर्ष तक इस समिति ने 'सरस्वती '' का संपादन किया । अगले दो वर्षों तक अकेले बाबू श्यामसुन्दर दास बी० ए० ने संपादन कार्य किया । जनवरी 1903 से आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी इस गौरवशाली पत्रिका के संपादक नियुक्त हुए ।

दस पत्रिका के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए प्रवेशांक में घोषित किया गया था कि, 'इस पत्रिका में कौन-कौन से विषय रहेंगे,यह केवल इसी से अनुमान करना चाहिए कि इसका नाम सरस्वती है । इसमें गद्य, पद्य, काव्य, नाटक, उपन्यास, चम्पू इतिहास, जीवनचरित्र, पंच, हास्य, परिहास कौतुक, पुरावृत्त विज्ञान, शिल्प, कला-कौशल आदि साहित्य के मानवीय विषयों का यथावकाश समावेश रहेगा और आगत ग्रंथादिकों की यथोचित समालोचना की जायेगी । यह हम निज मुख से नहीं कह सकते कि भाषा में यह पत्रिका अपने ढंग की प्रथम होगी । ' दरअसल आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की लगन और अथक प्रयासों से यह पत्रिका '' अपने ढंग की प्रथम' तथा हिंदी की प्रतिनिधि पत्रिका बन गयी थी; इसमें कोई सन्देह नहीं ।

''सरस्वती '' पत्रिका के द्वारा द्विवेदीजी ने काव्य भाषा के रूप में खड़ी बोली को प्रतिष्ठित किया । भारतेंदु युग के लेखक गद्य खड़ी बोली में तथा कविताएं ब्रजभाषा में लिखा करते थे । इस द्वैत को उन्होंने स्वीकार कर लिया था । द्विदीजी ने सैद्धांतिक रूप से इस द्वैत का खंडन किया तथा खड़ी बोली में कविता लिखने को प्रोत्साहन देकर व्यावहारिक रूप में इस द्वैत को मिटाया ।

इस पत्रिका के द्रारा उन्होंने हिंदी भाषा का परिष्कार किया तथा उसके व्याकरण सम्मत रूप को स्थिर किया । यहां तक कि अनेक लेखकों ने द्विवेदीजी से भाषा लिखनी सीखी । उस युग के अनेक लेखकों ने लिखित रूप में द्विवेदीजी के इस ऋण को स्वीकार किया है । आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने '' हिंदी साहित्य का इतिहास'' में द्विवेदीजी के महत्व को रेखांकित करते हुए लिखा है, ''यदि द्विवेदीजी न उठ खड़े होते तो जैसी अव्यवस्थित, व्याकरण विरुद्ध और ऊटपटांग भाषा चारों ओर दिखायी पड़ती थी, उसकी परंपरा जल्दी न रुकती । उनके प्रभाव से लेखक सावधान हो गये और जिनमें भाषा की समझ और योग्यता थी उन्होंने अपना सुधार किया । '' (हिंदी साहित्य का इतिहास, पू० 528)

फिर सरस्वती पत्रिका के द्वारा उन्होंने हिंदी को अनेक लेखक, कवि, आलोचक और अनुवादक दिये । कई नये लेखकों की आरंभिक रचनाओं को प्रकाशित करने का श्रेय ''सरस्वती'' पत्रिका को है । मैथिलीशरण गुप्त, बदरीनाथ भट्ट, कामताप्रसाद गुरु, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, प्रेमचंद, लोचनप्रसाद पाण्डेय आदि लेखक '' सरस्वती'' पत्रिका के द्वारा हिंदी संसार से परिचित हुए । मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं की मुख्य विषय-वस्तु की प्रेरणा द्विवेदीजी दिया करते थे । किसी भी संपादक के लिए यह कम गौरव की बात नहीं है ।

आचार्य द्विवेदी ने हिंदी में मौलिक रचनाओं को तो प्रोत्साहित किया ही था, परंतु वे लेखकों को मौलिक रचनाओं के साथ साथ अनुवाद के लिए भी प्रेरित करते थे । '' सरस्वती'' में उन्होंने अनूदित रचनाओं को भी बहुत सम्मानपूर्वक प्रकाशित किया । अनुवाद के द्वारा वे अपने पाठकों को अन्य भाषाओं के साहित्य औरचिंतन से परिचित करवाना चाहते थे । अपनी संपादकीय टिप्पणियों में उन्होंने अन्य भाषाओं की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री का भी बेहिचक सार-संक्षेप प्रस्तुत किया है । स्वयं द्विवेदीजी ने ''बेकन विचार रत्नावली'' (बेकन), "स्वाधीनता'' (जान स्तुअर्ट मिल), शिक्षा (हर्बर्ट स्पेससे आदि अंग्रेजी पुस्तकों के साथ साथ कई संस्कृत और मराठी रचनाओं के अनुवाद किये । दरअसल द्विवेदीजी हिंदी को सिर्फ हिंदी भाषी प्रांतों तक सीमित नहीं रखना चाहते थे, वे उसका अखिल भारतीय स्वरूप विकसित करना चाहते थे । इसके लिए अनुवाद सबसे उपयोगी माध्यम हो सकता है । हिंदी के विकास में अनुवादों की भूमिका को आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने संभवतया पहली बार पहचाना । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी साहित्य को मनोरंजन का साधन नहीं मानते थे । उन्होंने साहित्य और साहित्यकार के सामने उच्चतर आदर्श रखा । वे ज्ञान के प्रचार-प्रसारको साहित्य का मुख्य कर्म मानते थे । इसी उद्देश्य के लिए ''सरस्वती'' का प्रकाशन हुआ था । इस उद्देश्य से द्विवेदीजी सहमत थे । इसलिए उन्होंने इसमें शुद्ध साहित्य के प्रकाशन के साथ साथ अपने समय की गंभीर समस्याओं से संबंधित मौलिक सामग्री को भी प्रकाशित किया । उसमें इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र धर्म पुराण विज्ञान आदि से संबंधित सामग्री की भरमार रहती थी । डा० रामविलास शर्मा ने ठीक ही लिखा है कि ''सरस्वती'' ''ज्ञान की पत्रिका'' थी । स्वयं द्विवेदीजी ने साहित्यिक लेखों के अलावा ''संपत्तिशास्त्र'' जैसे विषय पर मौलिक पुस्तक लिखने का बीड़ा उठाया । द्विवेदीजी मानते थे कि साहित्यकारों में इस संसारको जानने की जिज्ञासा रहनी चाहिए, इसलिए वे नये नये विषयों पर खोजपूर्ण निबंध लिखने की प्रेरणा दिया करते थे । यदि किसी अन्य भाषा में नवीन जानकारियों से भरी हुई खोज प्रकाशित होती थी तो द्विवेदीजी उसे ससम्मान ''सरस्वती'' में भी उद्धृत करते थे । उनकी सामाजिक दृष्टि की टकराहट आगे चलकर छायावादी कविता से हुई । उनको लगने लगा कि वर्तमान (छायावादी) कविता अपने इस उद्देश्य से भटक गयी है ।

द्विवेदीजी का लेखन औरउनका रचनाकाल 1920 . से पूर्व का रहा है । हालांकि उन्होंने बाद में भी कुछ छिटपुट लेखन किया है, परंतु उनकी दृष्टि इससे पूर्व स्थिर हो गयी लगती है । उनकी रचनात्मक ऊर्जा का सर्वश्रेष्ठ रूप तक अभिव्यक्त हो चुका था । 1920 . हिंदी साहित्य के इतिहास में निर्णायक मो़ड़ लाने वाला वर्ष है । इसके महत्व पर प्रकाश डालते हुए आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है, ''सन् 1920 . भारतवर्ष के लिए युगांतरले आने वाला वर्ष है । इस वर्ष भारतवर्षका चित्र पुराने संस्कारों को झाड़कर नवीन मार्ग के अनुसम्गन में प्रवृत्त हुआ था । नवीन आशा और नवीन आकांक्षा के प्रति जैसा अडिग विश्वास इस समय दिखायी दिया, वह शताब्दियों से अपिरिचित-सा हो गया था । ' इस वर्ष के बाद स्वाधीनता आदोलन नये चरण में प्रवेश करता है । इसके बाद स्वाधीनता आदोलन के केंद्र हिंदी भाषी प्रांत बन गये । महात्मा गां धी के नेतृत्व में चलने वाले असहयोग आदोलन के प्रभाव से बुद्धिजीवी इस निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचे कि बिना अंगेजों के यहां से निकाले हम देशोद्धार नहीं कर सकते । इसलिए हमारा मुख्य उद्देश्य देशोद्धार नहीं,वरन् देशमुक्ति का होना चाहिए । देशमुक्ति की यह आवाज राजनीतिक क्षेत्र के साथ साथ सांस्कृतिक क्षेत्र में भी सुनायी देने लगी । देश की अंग्रेजों से मुक्ति के साथ साथ समाज की रूढ़ियों से मुक्ति, व्यक्ति की धर्म के बंधन से मुक्ति, नारी की पुरुष से मुक्ति, कविता से छंद की मुक्ति की धारणा भी आयी । परंतु यह सब बाद में हुआ । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के रचनाकाल के बाद यह सब घटित हुआ ।

दरअसल आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की पत्रिका में जिस 'शिक्षित वर्ग'' की आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति हुई उस वर्ग की आरंभ में ब्रिटिश सिंह से कोई शिकायत नहीं थी । यह वर्ग तो ब्रिटिश सामाज्य की न्यायप्रियता और प्रजापालकता का गहरा हामी थी । इसलिए इस वर्ग की मान्यता थी कि ''अंग्रेजी अमलदारी में रहते हुए देशोद्धार की संभावनाएं सर्वाधिक है । जनवरी 1950 . की ''सरस्वती में नागरी प्रचारिणी सभा के क्रियाकलापों की आलोचना करते हुए द्विवेदीजी ने अंग्रेजी सरकारका आदर्श सामने रखा-'अंग्रेजी गवर्नमेंट विदेशी है । पर उसने भी अपने कायों की आलोचना करने का द्वार खोल रखा है । खुले-खजाने लोग वाइसराय और प्राइम मिनिस्टर तक दो कामों का खंडन-मंडन करते है । इससे गवर्नमेंट की उदारता और न्यायनिष्ठा जाहिर होती है ।'' 1905 . तक द्विवेदीजी ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले राजाओं, नवाबों और क्रांतिकारियों की आलोचना की । जनवरी 1904 . की ' सरस्वती' में द्विदीजी ने पं० दत्तात्रेय बलवंत पारसनीय के आधार पर रानी लस्मीबाई के जीवन पर लेख लिखकर सिद्ध किया कि '' 1857 ई० के बलवे में अंग्रेजों का जो वध झांसी में हुआ था ,उससे रानी लक्ष्मीबाई का भी संबंध न था ।'' अप्रैल 1904 के एक लेख में उन्होंने शिवाजी को अंग्रेजों का परम मित्र और हितैषी बताया । अक्तूबर 1904 के एक लेख में कानपुर में हुए सन् 57 के ''बलवे'' का जिक्र है । इसमें उन्होंने तात्या टोपे और नाना शाहब को 'नृशंस हत्यारा' तक कहा ।

ब्रिटिश सरकारकी न्यायप्रियता और प्रजापालकता के हिमायती होते हुए भी द्विवेदीजी में देश भक्ति का अभाव नहीं था । देश प्रेम उनमें तब भी था । 1906 . के बाद द्विवेदीजी ने अपनी इन गलतियों को सुधारा । इसके बाद उन्होंने अंग्रेज सरकारकी तारीफ करना कम कर दिया । यहां तक कि, बाद में उन्होंने आवश्यकता एड्ने पर अंग्रेजों की आलोचना भी की । दिसंबर 1906 ई० में ''मुर्शिदाबाद'' पर लिखते हुए उन्होंने लिखा, '' अंग्रेज और कुछ हिंदुस्तानी लेखकों ने भी सिराजुद्दौला को काम-कर्दम का कीड़ा, निर्दयता का समुद्र, दुर्व्यसनों का शिरोमणि, अर्थ-लोलुप और नरपिशाच आदि मधुरिमामय विशेषणों से विभूषित किया है । पर बाबू अक्षय कुमार मैत्रेय ने बंगला में सिराजुद्दौला का जीवनचरित लिखकर उसकी इस कलंक-कालिमा को धोकर प्राय: बिल्कुल साफ कर दिया है । इस किताब को पढ़ने से यह धारणा होती है कि सिराजुद्दौला के समान सहनशील, राजनीतिज्ञ, बात का सच्चा, निर्भय, शांतिप्रिय और रक्तपात द्वैषी शायद ही और कोई राजा या बादशाह हुआ हो । प्राय: सब कहीं अंग्रेजों ही के लोभ, प्रतिज्ञा-भंजन, अन्यायपरक, प्रतिहिंसक स्वभाव, अनाचार, विश्वासघात आदि का परिचय मिलता है । इस पुस्तक में यह सब बात खूब दृढ़ता से साबित की गयी है कि कलकत्ते के अंधकूप अर्थात् कालकोठरी या ब्लैक होल की हत्या की कहानी बे-सिर-पैर का एक औपन्यासिक गठन मात्र है । ''ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कि स्वयं द्विवेदीजी ने कलकत्ता की कालकोठरी की कथा को प्रामाणिक मानते हुए ''सरस्वती'' में प्रकाशित किया था ।

1906 ई० में परिलक्षित जीवन-दृष्टि संबंधी परिवर्तन के बावजूद द्विवेदीजी इस मत के कायल नहीं थे कि देश प्रेम का अर्थ अंगेजी राज का विरोध करना होता है । उन्होंने हमेशा यह दृष्टिकोण सामने रखा कि अंगेजी राज की बिना चिंता किये हुए,उसके बारे में अपनी राय भीतर रखते हुए, जहां तक संभव हो, बिना अंगेजी सरकार से टकराये हुए अपना विकास करना चाहिए। हमें अपने देश व समाज की कमियों को दूर करना चाहिए-इस तरह सामाजिक उद्धार का कार्य करना चाहिए । इसलिए मुख्य समस्या यह नहीं है कि ब्रिटिश सरकार क्या कर रही है? वरन् यह है कि हम देशवासी स्वयं अपनी भलाई के लिए क्या कर रहे हैं? यदि हम अपना काम-देश सेवा-ठीक से कर रहे हैं, तो यह पर्याप्त है । अग्रेजों की जो बातें हमारे पक्ष में जाती हों, उनको उद्धृत करना चाहिए, उन बातों की तारीफ करनी चाहिए । जो बातें हमारे प्रतिकूल है, उनकी चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है । उन बातों में अपने दिमाग को उलझा देना समय और श्रम का अपव्यय है । इससे हमारी सक्रियता बाधित हो सकती है । अपने समय की राजनीति की चर्चा करते समय मूलतया उनका यह दृष्टिकोण रहा है । प्राच्य विद्याविद् अग्रेजों के कार्यों की द्विवेदीजी ने हमेशा तारीफ की है । आलोचनाओं के बिंदुयों की ओर संकेत करते हुए भी उन्होंने गीता प्रेम के कारण वारेन हेस्टिंग्स की तारीफ की । यहां तक कि ''शासन-सुधारों की रिपोर्ट'' की आलोचना भी द्विवेदीजी ने इसी भाव में की है 'आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने ''संपत्तिशास्त्र'' पर पुस्तक लिखकर प्रकारांतर से अंग्रेजों के शोषण की आलोचना की । इसमें उन्होंने बताया कि ''गवर्नमेंट ही गोया जमींदार है।'' इस तरह खेती की यह आय ही अंग्रेजों के शोषण का मुख्य आधार है । शेष आय तो इसमें जोड़ती है । इस पुस्तक में द्विवेदीजी ने किसानों और जमींदारों के परस्पर हित-विरोध की चर्चा नहीं की ,वरन् इस बात पर बल दिया कि जमींदारों को शिक्षित और उदार होना चाहिए, ताकि देश में खेती का विकास हो सके । वे जमींदारी प्रथाके भीतर ही खेती में औद्योगिक उन्नति से लाभ उठा लेने के पक्षपाती थे ।

आचार्य द्विवेदी ने प्राचीन इतिहास ,पुराण ,वेद-शास्त्र ,सामाजिक रूढ़ियों और परंपराओ का गहन अध्ययन किया । साथ ही विज्ञान, राजनीति, अर्थशास्त्र, उद्योग-धन्धों की जानकारी उपलब्ध करने-करवाने में भी रुचि दिखायी । प्राचीन भारतीय परंपरा और आधुनिक यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान का तालमेल बिठाने की भी उन्होंने कोशिश की । इन सब चीजों के मूल में देश-दशा के ज्ञान की लालसा काम कर रही थी । इसलिए उन्होंने अपने लेखन को ''विविध विषयों'' की ओर मोड़ा ।

यदि उनके रचना-कर्म के केंद्र बिंदु को खोजा जाय तो कहा जा सकता है कि समकालीन भारत के अधःपतन की चेतना से उत्पन्न पीड़ाबोध उनकी रचनाओं का मर्म है । इस देश में हो रही'' अस्वाभाविक लीला ''देखकर उन्हे'' आश्चर्य भी होता है और दु:ख भी ।'' अपने ही देश के सुशिक्षित कहे जाने वाले लोग यदि कोई ऐसा कार्य करते हैं, तब उन्हें बहुत पीड़ा होती है ।'' आदर पात्रों के नाम का निरादर' शीर्षक टिप्पणी में उन्होंने पीड़ा भरी बेचैनी से ऐसे लोगों को फटकारते हुए लिखा है, ''इसी तरह कुछ लोग कांग्रेस को न तो कांग्रेस ही कहते हैं ,न जातीय महासभा ही कहते हैं । वे उसे कंगरस कहते हैं । कंगरस ही नहीं, ''बाबुओं की कंगरस'' । जैसे बाबू लोग कोई बहुत ही तुच्छ, नीच, अधम या पतित पदार्थ हों । ये लोग, नहीं सोचते कि आखिर इस ''बाबू" शब्द के अंतर्गत हमारा भी तो समावेश होता है । आपको कोई महामहिम, परम-माहेश्वर, पतितपावन आदि विशेषणों से तो याद करता ही नहीं । आप भी तो बाबू ही कहाते हैं । फिर आप कांगेस को बाबुओं की कांग्रेस क्यों कहते हैं? आप भी तो बाबू है । फिर क्या कंगरस या कांग्रेस आपकी न हुई । बाबू कहाने वाले सुरेन्द्रनाथ, भूपेन्द्रनाथ,बैकुण्ठनाथ और मोतीलाल आदि क्या आपके बराबर भी सम्मान-पात्र नहीं? औरक्या कांग्रेस में केवल बाबू ही बाबू शामिल होते हैं । तिलक ,मालवीय ,गोखले ,गांधी ,लाजपतराय ,श्रीनिवास शासी, आलार, आयंगर-क्या ये सभी बाबू कहाते हैं? फिर बाबुओं की कांग्रेस कैसे हुई । कंगरस यदि लडकों का खेल है और यदि उससे कुछ भी लाभ नहीं हुआ तो कृपा करके बताइये आप ही ने भारत का कितना उद्धारकर दिखाया । ''यह पीड़ा भरा स्वर उनके लगभग प्रत्येक निबंध या टिप्पणी में पाया जाता है ।

महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोरको नोबेल पुरस्कार मिला । द्विवेदी इससे अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने ''सरस्वती'' में टिप्पणी लिखी । इस टिप्पणी को लिखते लिखते उनकी पीड़ा फिर जाग्रत हो गयी। '' इन्हीं लोकोत्तर कवि और अद्वितीय साहित्य-सेवी रवीन्द्रनाथ के देशबन्धु कनाडा में धंसने नहीं पाते और पशुवत तुच्छ समझे जाकर नटाल औरट्रांसवाल के जेलों में हूंसे और हंटरों से पीटे जा रहे है ।'' जाहिर है कि यह ''पीड़ा'' देश प्रेम की गहन भावना के बिना संभव नहीं है। स्रियों की दशा, धार्मिक उन्माद, सामाजिक कुरीतियां, अशिक्षा-अज्ञान, जनता का शोषण व अपमान के दृश्यों को देखकर उनका यह पीड़ा-बोध अत्यंत विचलित हो उठता है। ''सरस्वती'' की संपादकीय टिप्पणियों में इस स्वर को बखूबी पहचाना जा सकता है।

 

विषय-सूची

 

संपादकीय वक्तव्य

नौ

 

भूमिका

बारह

1

मेरी जीवन-रेखा

1

2

मौलिकता का मूल्य

10

3

साहित्य

12

4

पुस्तक प्रकाशन

15

5

कापीराइट ऐक्ट

22

6

नया कापीराइट ऐक्ट

25

7

वेद

28

8

वैदिक रचना करने वाली स्रियां

35

9

ब्राह्मण-मन्त्र

36

10

बौद्धाचार्य शीलभद्र

38

11

भगवदगीता-रहस्य

41

12

गीता में अन्य शास्त्रों के सिद्धान्तों का समन्वय

46

13

ब्राह्मणों की समुद्र यात्रा

49

14

धर्म्मान्ध्य

51

15

आर्यसमाज का कोप

56

16

पड़े लिखो का पाण्डित्य

61

17

सम्पत्तिशास्र की भूमिका

66

18

सम्पत्ति का वितरण

73

19

देश की बात

79

20

मिस्टर गांधी का आत्म-गौरव और स्वदेशाभिमान

83

21

आदरपात्रों के नाम का निरादर

85

22

निष्क्रिय प्रतिरोध का परिणाम

87

23

शासन-सुधारों के विषय में रिपोर्ट

92

24

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

99

25

बाबू अरविन्द घोष

104

26

भारतवर्ष ही योरप का शिक्षक है

107

27

एक मुसलमान विद्वान का संस्कृत-प्रेम

108

28

सर विलियम जोन्स ने कैसे संस्कृत सीखी

109

29

बनारस के संस्कृत-कालेज की कुछ पुरानी बातें

113

30

पुराने अंगरेज अधिकारियों के संस्कृत पढ़ने का फल

115

31

वारेन हेस्टिंग्स और श्रीमद्भगवद्गीता

120

32

भारतवर्ष का कर्ज

121

33

टिकस पर टीका

122

34

उदारता में उफान

124

35

सरकार की पसन्द के पत्र

126

36

गवर्नमेन्ट की की हुई साहित्य-समालोचना

128

37

सरस्वती और सरकारी गजट

130

38

शिक्षा और सरकार

134

39

प्राथमिक शिक्षा के विस्तार की आयोजना

135

40

शिक्षा प्रचार के लिए गवर्नमेन्ट का खर्च

136

41

रेलों का खर्च और शिक्षा प्रचार

137

42

पुलिस और शिक्षा का खर्च

138

43

पुलिस में कुत्तों की भरती

139

44

देशी भाषाओं के द्वारा शिक्षा

140

45

भारत में रोमन-लिपि के प्रचारका प्रयत्न

142

46

आयुर्वेदिक चिकित्सा और गवर्नमेन्ट

144

47

हाईकोर्ट के जजों की तनख्वाहें

146

48

विलायत और भारत के बड़े राज-कर्मचारियों का वेतन

147

49

विज्ञानाचार्य वसु का विज्ञान मन्दिर

149

50

विज्ञानाचार्य वसु की नई खोज

152

51

कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर को एक लाख बीस हजार का इनाम

153

52

कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर

154

53

समाचार-पत्रों का विराट रूप

157

54

साहबी-हिन्दी

160

55

कौंसिल में हिन्दी

167

56

युद्ध, बीमारी और प्राकृतिक दुर्घटनाओं से नर-संहार

178

57

प्लेग से नर-नाश

180

58

प्लेग निवारण की योजना

181

59

कुनैन

183

60

भारतवर्ष में अन्धों के लिए स्कूल

184

61

भारत कला-परिषद्

186

62

सर भाण्डारकर का विद्यालय

187

63

पूने की गवेषणा-शाला

189

64

उस्मानिया विश्वविद्यालय

190

65

बनारस का हिन्दू-विश्वविद्यालय-एक

191

66

बनारस का हिन्दू-विश्वविद्यालय-दो

193

67

बनारस के हिन्दू-विश्वविद्यालय का जमा-खर्च

194

68

हिन्दू-विश्वविद्यालय और हिन्दी

195

69

खुदाबख्श लाइब्रेरी

196

70

संसार के कुछ पुराने पुस्तकालय

199

71

दुनिया में सबसे बड़ा कोश

201

72

स्मिथ साहब का भारतीय इतिहास

203

73

महाभारत का नया संस्करण

205

74

दैनिक प्रताप

206

75

पुस्तकों और पत्रों का वार्षिक विवरण

207

76

बंगाल और बिहार की भाषा

208

77

लेखकों को पेन्शन

210

78

तुलस्तुयी

211

79

''दृश्य-दर्शन' की भूमिका

212

80

एक नई किताब की भूमिका

213

81

बोल-चाल की हिन्दी में कविता

216

82

हिन्दी-साहित्य में डाकेज़नी

218

83

रोजगारी स्रियां

220

84

स्रियों के राजनैतिक अधिकार

221

85

बाइबल का प्रचार

222

86

अंगूठे के चिहों के प्रथम प्रयोक्ता

223

87

पुस्तकों का समर्पण

224

88

तारीख से दिन निकालने की रीति

225

 

परिशिष्ट-एक

227

 

परिशिष्ट-दो

228

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Paperback (Edition: 2011)
Gita Press, Gorakhpur
Item Code: NAC770
$29.00
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Testimonials
Your books arrived in good order and I am very pleased.
Christine, the Netherlands
Thank you very much for the Shri Yantra with Navaratna which has arrived here safely. I noticed that you seem to have had some difficulty in posting it so thank you...Posting anything these days is difficult because the ordinary postal services are either closed or functioning weakly.   I wish the best to Exotic India which is an excellent company...
Mary, Australia
Love your website and the emails
John, USA
I love antique brass pieces and your site is the best. Not only can I browse through it but can purchase very easily.
Indira, USA
Je vis à La Martinique dans les Caraïbes. J'ai bien reçu votre envoi 'The ten great cosmic Powers' et Je vous remercie pour la qualité de votre service. Ce livre est une clé pour l’accès à la Connaissance de certains aspects de la Mère. A bientôt
GABRIEL-FREDERIC Daniel
Namaskar. I am writing to thank Exotic India Arts for shipping the books I had ordered in the past few months. As I had mentioned earlier, I was eagerly awaiting the 'Braj Sahityik Kosh' (3 volumes). I am happy to say that all the three volumes of it eventually arrived a couple of days ago in good condition. The delay is understandable in view of the COVID19 conditions and I want to thank you for procuring the books despite challenges. My best wishes for wellness for everyone in India,
Prof Madhulika, USA
Love your collection of books! I have purchased many throughout the years. I love you guys!
Stevie, USA
Love your products!
Jason, USA
Excellent quality and service, best wishes to you all.
James, UK
Thank you so much for your wonderful store and wonderful service. A Naga Kanya stat arrived yesterday. The sculpture was very well packaged, and it is very beautiful. I am very very happy with the statue and very grateful to your company for providing access to such lovely works of art. Thank you for providing truly beautiful objects and for providing great service. All the very best to you,
Jigme, Canada
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