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Books > Language and Literature > हिन्दी साहित्य > प्रतिनिधि कविताएँ: Partinidhi Kavitayin
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प्रतिनिधि कविताएँ: Partinidhi Kavitayin
प्रतिनिधि कविताएँ: Partinidhi Kavitayin
Description

पुस्तक के विषय में

केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में प्रकृति और नारी का सौन्दर्य क्षत चित्रित है वे जीवन रस का छककर पान करनेवाले कवि हैं सुख, सौन्दर्य,श्रम- ये केदारनाथ अग्रवाल के जीवन एवं काव्य-मूल्य के ढाँचे के विभिन्न अवयव हैं। निस्सन्देह इनका स्रोत समाजवादी विचारधारा है। यह सुखसामाजिकता से अलग या उसका विरोधी नहीं बस, इसका अनुभव निजीहै वह अनावश्यक संचय से, निष्क्रियता से, दूसरों का हक मार लेने से नहीं मिलता सुख केदारनाथ अग्रवाल के लिए मानवता का स्वाद है, अस्तित्व का रस है उनका जीवन-आचरण और कविता भी उसी प्राप्ति के लिए अनुशासित और अनुकूलित थी प्रेम हो तो साधना भी सिद्धि का आनन्द छु देती है केदारनाथ अग्रवाल प्रकृति और मनुष्य को श्रम संस्कृति की दृष्टि और विचारधारा से चित्रित करते हैं। उनके यहाँ प्रकृति और मनुष्य का तादात्म्य है। केदारनाथ अग्रवाल की कविता ने नई प्रकृति, नया समुद्र, नये हू धन-जन, नया नारी सौन्दर्य गढ़ा है वे श्रम संस्कृति के सौन्दर्य निर्माता कवि हैं। उन्होंने प्रगतिशील कविता-हिन्दी कविता को कालजयी गरिमा दी है केदारनाथ अग्रवाल बुन्देलखंड की प्रकृति, वहाँ के जन-जीवन से ही नहीं, वहाँ के लोकगान, वहाँ की लय, वहाँ की भाषा और तान से जुड़े हैं। उनकी रचना-धर्मिता में बुन्देलखंड अपनी समग्रता में रचा-बसा है । यह सारा रचाव-बसाव कवि के हृदय में है और अभिव्यक्ति में भी

प्रतिनिधि कविताएँ

केदारनाथ अग्रवाल

जन्म: 1 अप्रैल, 1911; पिता : श्री हनुमानप्रसाद अग्रवाल जो 'प्रेमयोगी मान' उपनाम से कविताऍ लिखते थे; 'मधुरिमा' शीर्षक से उनका एक संकलन भी प्रकाशित हुआ है;

माँ : श्रीमती घसिट्टो देवी;

जन्म-स्थान: कमासिन, बाँदा (उत्तरप्रदेश);

शिक्षा: बी.. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, एल .एल .बी., डी..वी. कॉलेज, कानपुर।

कृतियाँ: अनुवाद सहित 29 कृतियाँ प्रकाशित

काव्य-संग्रह: 1 युग की गंगा (1947), 2. नींद के बादल (1947), 3. लोक और आलोक (1957), 4. फूल नहीं रंग बोलते हैं (1965), 5. आग का आईना (1970), 6.गुलमेंहदी (1978), 7. आधुनिक कवि- 16 (1978), 8. पंख और पतवार ( 1980), 9. हे मेरी तुम (1981), 10.मार प्यार की थापें (1981), 11 बम्बई का रक्त-स्नान (1981), 12. कहें केदार खरी-खरी (1983 सम्पादक- अशोक त्रिपाठी), 13. जमुन जल तुम (1984: सम्पादक-अशोक त्रिपाठी), 14.अपूर्वा (1984), 15. बोले बोल अबोल (1985) 16. जो शिलाएँ तोड़ते हैं (1986: सम्पादक-अशोक त्रिपाठी), 17. आत्म-गंध (1988), 18. अनहारी हरियाली ( 1990), 19. खुलीं आँखें खुले डैने (1993), 20. पुष्प दीप (1984), 21 वसन्त में प्रसन्न हुई पृथ्वी (1996 सम्पादक - अशोक त्रिपाठी), 22. कहुकी कोयल खड़े पेड़ की देह (1997 सम्पादक-अशोक त्रिपाठी), अनुवाद- 23. देश-देश की कविताएँ (1970), निबन्ध-संग्रह : 24. समय-समय पर ( 1970), 25.विचार-बोध (1980), 26. विवेक-विवेचन (1981), उपन्यास : 27. पतिया ( 1985), यात्रा-वृतान्त : 28. बस्ती खिले गुलाबों की (रूस की यात्रा का वृतान्त 1975), पत्र-साहित्य : 29. मित्र-संवाद ( 1991 सम्पादक-रामविलास शर्मा, अशोक त्रिपाठी)

पुरस्कार : 1. सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार ( 1973) 2. उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ 'द्रूारा सेवाओं के लिए 1979-80 का विशिष्ट पुरस्कार 3. 'अपूर्वा' पर 1986 का "साहित्य" अकादमी' सम्मान 4. .प्र. साहित्य परिषद, भोपाल का तुलसी सम्मान (1986)' 5. .प्र. साहित्य परिषद, भोपाल का मैथिलीशरण गुप्त सम्मान ( 1990) मानद उपाधियाँ : 1. हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा 'साहित्य वाचस्पति' उपाधि (1989) 2.बुन्देलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा डी. लिट्. उपाधि (1995)

निधन: 22 जून, 2000

आवरण: राजकमल स्टूडियो

 

अनुक्रम

1

सम्पादकीय

7

2

दोपहरी में नौका-विहार

23

3

प्रभात

24

4

बाप बेटा बेचता है

24

5

आजाद खून के दौरे से

25

6

जनता

26

7

एका का बल

27

8

न मारी नजरिया

27

9

क्या लाये

28

10

घन-जन

29

11

धरती

29

12

कटुई का गीत

31

13

डाँगर

14

चित्रकूट के बौड़म यात्री

32

15

दीन कुनबा

33

16

बुंदेलखंड के आदमी

34

17

पैतृक संपत्ति

34

18

मैं घूमूँगा केन किनारे

34

19

बैठा हूँ इस केन किनारे

35

20

चंद्रगहना से लौटती बेर

36

21

हम उजाला जगमगाना चाहते हैं

36

22

माँझी! न बजाओ वंशी

39

23

बसंती हवा

40

24

कानपुर

42

25

तेज धार का कर्मठ पानी

43

26

वीरांगना

43

27

धीरे उठाओ मेरी पालकी

43

28

नाव मेरी पुरइन के पात की

44

29

टूटें न तार तने जीवन-सितार के

45

30

खेत का दृश्य

45

31

धूप का गीत

46

32

मिल मालिक

46

33

खेतिहर

47

34

कमकर

47

35

शपथ

49

36

गेहूँ

50

37

गुम्मा ईट

51

38

गर्रा नाला

51

39

स्टैचू

52

40

यदि आयेगा डालर

53

41

नेता

54

42

जो शिलाएँ तोड़ते हैं

54

43

मोरचे पर

55

44

जिंदगी

57

45

आग लगे इस राम-राज में

61

46

चुनाव मोरचे की अंत्याक्षरी

61

47

रोटी

62

48

मुक्त युवती

62

49

साथी

63

50

अभिशाप जग का

63

51

आँख दुखों से आँज रही है

64

52

घर का अनुभव

64

53

वास्तव में

65

54

मजदूर का जन्म

65

55

कंचन किरणें

66

56

मानव के अग्रज

66

57

वे किशोर नयन

67

58

आँखों देखा

67

59

बालक ने

68

60

फूल सी कोमल उँगलियाँ

68

61

एक खिले फूल नै

68

62

जब तब

68

63

हथौड़े का गीत

69

64

पूरा हिंदुस्तान मिलेगा

70

65

झंडा ऊपर नहीं उठा है

71

66

दोषी हाथ

71

67

वह जन मारे नहीं मरेगा

72

68

छोटे हाथ

72

69

पूँजीपति और श्रमजीवी

74

70

किसान से

76

71

110 का अभियुक्त

77

72

गाँव का महाजन

60

73

लेखकों से

80

74

लौह का घन गल, रहा है

81

75

हारा हूँ सौ बार गुनाहों से

 

76

लड़-लड़ कर

82

77

शक्ति मेरी बाहु में है

82

78

नागार्जुन के बाँदा आने पर

83

79

हम

88

80

हम न रहेंगे

89

81

आज नदी बिलकुल उदास थी

89

82

बच्चे की आँखों का काजल

90

83

लिपट गयी जो धूल पाँव से

90

84

ककरीला मैदान

90

85

धूप नहीं, यह

91

86

यह जो नाग

91

87

सुआपंखी दाम पहने पेडू वन के

91

88

जब तुम अपने केश खोल कर

92

89

दीप की लौ-से दिन

92

90

और शीशा मुस्कुराया

93

91

बच्चे और मैं

93

92

वह चिड़िया जो

93

93

रेत मैं हूँ जमुन जल तुम

94

94

सारंगी सुनकर

95

95

धूप

95

96

मेरे देश, तुम्हारी छाती की

 

97

न्यू मैं हो जाऊँगा

96

98

किसान स्तवन

96

99

बसंत आया

97

100

हो, न हो तुम्हें

98

101

दिन अब भी गरम और

98

102

होता है

 

103

तुम मुझे कुछ न दो

99

104

शब्दों की कतार के पीछे99

99

105

सबसे आगे

100

106

केन किनारे पत्थी मारे

100

107

नदी एक नौजवान ढीठ लडुर्ख

101

108

इकला चाँद

101

109

अकथ्थ को हमने कहा नहीं

102

110

दल-बँधा मधुकोष-गंधी फूल

102

111

अमृता शेरगिल के चित्र को देखकर

102

112

नदी

103

113

रथ दौड़ते हैं रंगीन फूलों के

103

114

आस्था का शिलालेख

103

115

दिन है कि हंस हलाहल पर

104

116

दिन अच्छा है

104

117

रची उषा ने ऋचा दिवा की

104

118

निर्बल और बलीन

105

119

देर लगा दिये हैं हमने

105

120

न टूटो तुम

105

121

तड़पती केन

105

122

हल चलते हैं फिर खेतों में

106

123

जवान दिन

106

124

हम जियें न जियें दोस्त

106

125

वरदवीणा हुई दीना

107

126

चोली फटी

107

127

सुभटकाय मेघों का संघट

108

128

ओ पिकासो की पुत्रियो

108

129

धूप पिये पानी लेटा है

108

130

चली गयी है कोई श्यामा

108

131

जल रहा है

109

132

हरी घास का बल्लम

109

133

मजदूरिन

109

134

अपन मन की बात

110

135

चम्मचों से नहीं

111

136

मैं उसे खोजता हूँ

111

137

पेड़ का हाथ

112

138

एक बच्चा हँसा

112

139

डा. रामविलास शर्मा के बाँदा

 

140

आने पर

113

141

झूठ मरे तो कैसे

114

142

खफ्त में आदमी होले का

115

143

बजी रूप रूप को शहनाई

115

144

मिट मिट कर मैं सीख रहा हूँ

116

145

सच

117

146

कनबहरे

117

147

जी के काम किये जीने में

117

148

हम और लोग

118

149

मीना कुमारी की मुत्यु पर

118

150

अहिंसा

119

151

चिड़ीमार ने चिड़िया मारी

119

152

काल कलूटा बड़ा क्रूर है

120

153

अपनी बात

121

154

चढ़ी जवानी

121

155

सब चलता है लोकतन्त्र में

121

156

देश की राजनीति

122

157

महँगाई

122

158

धूप की तलवार

123

159

दिन, नदी और आदमी

124

160

और का, और मेरा दिन

124

161

लोगों का जीवन

125

162

वसंत में

125

163

देश में लगी आग को

126

164

सूरज जनमा

126

165

आयोग

126

166

लड़ गये

127

167

पानी

132

168

हम मिलते हैं बिना मिले ही

133

169

आयें दिन

133

170

भीतर की लौ साधे

134

171

दहका खड़ा है सेमल का पुरनिया पेड़

134

172

पछाड़ते-पछाड़ते

135

173

मुझे न मारो मान-पान से

135

174

वाक्य पूरा कर रहा हूँ

136

175

गठरी चोरों की दुनिया में137

137

176

मैं समय की धार में धँस कर

 

177

खड़ा हूँ

137

178

गुलाब

137

179

खड़ा पहाड़ चढ़ा मैं अपने बल पर

138

180

मैंने आँख लड़ाई गगन विराजे

 

181

राजे रवि से

138

182

फटा अँधेरा फूहड़ फैला

139

183

मेरे मन की नदी

139

184

देश के भीतर

140

185

आये हो तो

140

186

मेरी कविताऍ गायेगी जनता

 

187

सस्वर

140

188

छोड़ो परम अलौकिक छोड़ो

141

189

दुख ने मुझको जब जब तोड़ा

142

190

मौन पड़ी हैं प्रिया प्रियंबद

142

191

खंभ फाड़कर जीना है

142

192

मैं समय को साधता हूँ

143

193

आई माँ की याद

144

194

जाओ लेकिन आत्मगंध दे जाओ

145

195

चिता जली तो मैंने देखा

145

196

चेतना मेरी जिलाये है तुम्हें

146

197

उनको महल मकानी

147

198

आदमी की चाँदमारी

147

199

फूलों की होती

148

200

बागी घोड़ा

148

201

आँख खुली, कर उठा

149

202

मैं गया हूँ डूब

150

203

कल कमीज में बटन नहीं थे

150

204

उदास दिन

151

205

रात

151

प्रतिनिधि कविताएँ: Partinidhi Kavitayin

Item Code:
NZA820
Cover:
Paperback
Edition:
2013
ISBN:
9788126719495
Language:
Hindi
Size:
7.0 inch X5.0 inch
Pages:
151
Other Details:
Weight of the Book: 120 gms
Price:
$10.00   Shipping Free
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प्रतिनिधि कविताएँ: Partinidhi Kavitayin

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पुस्तक के विषय में

केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं में प्रकृति और नारी का सौन्दर्य क्षत चित्रित है वे जीवन रस का छककर पान करनेवाले कवि हैं सुख, सौन्दर्य,श्रम- ये केदारनाथ अग्रवाल के जीवन एवं काव्य-मूल्य के ढाँचे के विभिन्न अवयव हैं। निस्सन्देह इनका स्रोत समाजवादी विचारधारा है। यह सुखसामाजिकता से अलग या उसका विरोधी नहीं बस, इसका अनुभव निजीहै वह अनावश्यक संचय से, निष्क्रियता से, दूसरों का हक मार लेने से नहीं मिलता सुख केदारनाथ अग्रवाल के लिए मानवता का स्वाद है, अस्तित्व का रस है उनका जीवन-आचरण और कविता भी उसी प्राप्ति के लिए अनुशासित और अनुकूलित थी प्रेम हो तो साधना भी सिद्धि का आनन्द छु देती है केदारनाथ अग्रवाल प्रकृति और मनुष्य को श्रम संस्कृति की दृष्टि और विचारधारा से चित्रित करते हैं। उनके यहाँ प्रकृति और मनुष्य का तादात्म्य है। केदारनाथ अग्रवाल की कविता ने नई प्रकृति, नया समुद्र, नये हू धन-जन, नया नारी सौन्दर्य गढ़ा है वे श्रम संस्कृति के सौन्दर्य निर्माता कवि हैं। उन्होंने प्रगतिशील कविता-हिन्दी कविता को कालजयी गरिमा दी है केदारनाथ अग्रवाल बुन्देलखंड की प्रकृति, वहाँ के जन-जीवन से ही नहीं, वहाँ के लोकगान, वहाँ की लय, वहाँ की भाषा और तान से जुड़े हैं। उनकी रचना-धर्मिता में बुन्देलखंड अपनी समग्रता में रचा-बसा है । यह सारा रचाव-बसाव कवि के हृदय में है और अभिव्यक्ति में भी

प्रतिनिधि कविताएँ

केदारनाथ अग्रवाल

जन्म: 1 अप्रैल, 1911; पिता : श्री हनुमानप्रसाद अग्रवाल जो 'प्रेमयोगी मान' उपनाम से कविताऍ लिखते थे; 'मधुरिमा' शीर्षक से उनका एक संकलन भी प्रकाशित हुआ है;

माँ : श्रीमती घसिट्टो देवी;

जन्म-स्थान: कमासिन, बाँदा (उत्तरप्रदेश);

शिक्षा: बी.. इलाहाबाद विश्वविद्यालय, एल .एल .बी., डी..वी. कॉलेज, कानपुर।

कृतियाँ: अनुवाद सहित 29 कृतियाँ प्रकाशित

काव्य-संग्रह: 1 युग की गंगा (1947), 2. नींद के बादल (1947), 3. लोक और आलोक (1957), 4. फूल नहीं रंग बोलते हैं (1965), 5. आग का आईना (1970), 6.गुलमेंहदी (1978), 7. आधुनिक कवि- 16 (1978), 8. पंख और पतवार ( 1980), 9. हे मेरी तुम (1981), 10.मार प्यार की थापें (1981), 11 बम्बई का रक्त-स्नान (1981), 12. कहें केदार खरी-खरी (1983 सम्पादक- अशोक त्रिपाठी), 13. जमुन जल तुम (1984: सम्पादक-अशोक त्रिपाठी), 14.अपूर्वा (1984), 15. बोले बोल अबोल (1985) 16. जो शिलाएँ तोड़ते हैं (1986: सम्पादक-अशोक त्रिपाठी), 17. आत्म-गंध (1988), 18. अनहारी हरियाली ( 1990), 19. खुलीं आँखें खुले डैने (1993), 20. पुष्प दीप (1984), 21 वसन्त में प्रसन्न हुई पृथ्वी (1996 सम्पादक - अशोक त्रिपाठी), 22. कहुकी कोयल खड़े पेड़ की देह (1997 सम्पादक-अशोक त्रिपाठी), अनुवाद- 23. देश-देश की कविताएँ (1970), निबन्ध-संग्रह : 24. समय-समय पर ( 1970), 25.विचार-बोध (1980), 26. विवेक-विवेचन (1981), उपन्यास : 27. पतिया ( 1985), यात्रा-वृतान्त : 28. बस्ती खिले गुलाबों की (रूस की यात्रा का वृतान्त 1975), पत्र-साहित्य : 29. मित्र-संवाद ( 1991 सम्पादक-रामविलास शर्मा, अशोक त्रिपाठी)

पुरस्कार : 1. सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार ( 1973) 2. उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान लखनऊ 'द्रूारा सेवाओं के लिए 1979-80 का विशिष्ट पुरस्कार 3. 'अपूर्वा' पर 1986 का "साहित्य" अकादमी' सम्मान 4. .प्र. साहित्य परिषद, भोपाल का तुलसी सम्मान (1986)' 5. .प्र. साहित्य परिषद, भोपाल का मैथिलीशरण गुप्त सम्मान ( 1990) मानद उपाधियाँ : 1. हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग द्वारा 'साहित्य वाचस्पति' उपाधि (1989) 2.बुन्देलखंड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा डी. लिट्. उपाधि (1995)

निधन: 22 जून, 2000

आवरण: राजकमल स्टूडियो

 

अनुक्रम

1

सम्पादकीय

7

2

दोपहरी में नौका-विहार

23

3

प्रभात

24

4

बाप बेटा बेचता है

24

5

आजाद खून के दौरे से

25

6

जनता

26

7

एका का बल

27

8

न मारी नजरिया

27

9

क्या लाये

28

10

घन-जन

29

11

धरती

29

12

कटुई का गीत

31

13

डाँगर

14

चित्रकूट के बौड़म यात्री

32

15

दीन कुनबा

33

16

बुंदेलखंड के आदमी

34

17

पैतृक संपत्ति

34

18

मैं घूमूँगा केन किनारे

34

19

बैठा हूँ इस केन किनारे

35

20

चंद्रगहना से लौटती बेर

36

21

हम उजाला जगमगाना चाहते हैं

36

22

माँझी! न बजाओ वंशी

39

23

बसंती हवा

40

24

कानपुर

42

25

तेज धार का कर्मठ पानी

43

26

वीरांगना

43

27

धीरे उठाओ मेरी पालकी

43

28

नाव मेरी पुरइन के पात की

44

29

टूटें न तार तने जीवन-सितार के

45

30

खेत का दृश्य

45

31

धूप का गीत

46

32

मिल मालिक

46

33

खेतिहर

47

34

कमकर

47

35

शपथ

49

36

गेहूँ

50

37

गुम्मा ईट

51

38

गर्रा नाला

51

39

स्टैचू

52

40

यदि आयेगा डालर

53

41

नेता

54

42

जो शिलाएँ तोड़ते हैं

54

43

मोरचे पर

55

44

जिंदगी

57

45

आग लगे इस राम-राज में

61

46

चुनाव मोरचे की अंत्याक्षरी

61

47

रोटी

62

48

मुक्त युवती

62

49

साथी

63

50

अभिशाप जग का

63

51

आँख दुखों से आँज रही है

64

52

घर का अनुभव

64

53

वास्तव में

65

54

मजदूर का जन्म

65

55

कंचन किरणें

66

56

मानव के अग्रज

66

57

वे किशोर नयन

67

58

आँखों देखा

67

59

बालक ने

68

60

फूल सी कोमल उँगलियाँ

68

61

एक खिले फूल नै

68

62

जब तब

68

63

हथौड़े का गीत

69

64

पूरा हिंदुस्तान मिलेगा

70

65

झंडा ऊपर नहीं उठा है

71

66

दोषी हाथ

71

67

वह जन मारे नहीं मरेगा

72

68

छोटे हाथ

72

69

पूँजीपति और श्रमजीवी

74

70

किसान से

76

71

110 का अभियुक्त

77

72

गाँव का महाजन

60

73

लेखकों से

80

74

लौह का घन गल, रहा है

81

75

हारा हूँ सौ बार गुनाहों से

 

76

लड़-लड़ कर

82

77

शक्ति मेरी बाहु में है

82

78

नागार्जुन के बाँदा आने पर

83

79

हम

88

80

हम न रहेंगे

89

81

आज नदी बिलकुल उदास थी

89

82

बच्चे की आँखों का काजल

90

83

लिपट गयी जो धूल पाँव से

90

84

ककरीला मैदान

90

85

धूप नहीं, यह

91

86

यह जो नाग

91

87

सुआपंखी दाम पहने पेडू वन के

91

88

जब तुम अपने केश खोल कर

92

89

दीप की लौ-से दिन

92

90

और शीशा मुस्कुराया

93

91

बच्चे और मैं

93

92

वह चिड़िया जो

93

93

रेत मैं हूँ जमुन जल तुम

94

94

सारंगी सुनकर

95

95

धूप

95

96

मेरे देश, तुम्हारी छाती की

 

97

न्यू मैं हो जाऊँगा

96

98

किसान स्तवन

96

99

बसंत आया

97

100

हो, न हो तुम्हें

98

101

दिन अब भी गरम और

98

102

होता है

 

103

तुम मुझे कुछ न दो

99

104

शब्दों की कतार के पीछे99

99

105

सबसे आगे

100

106

केन किनारे पत्थी मारे

100

107

नदी एक नौजवान ढीठ लडुर्ख

101

108

इकला चाँद

101

109

अकथ्थ को हमने कहा नहीं

102

110

दल-बँधा मधुकोष-गंधी फूल

102

111

अमृता शेरगिल के चित्र को देखकर

102

112

नदी

103

113

रथ दौड़ते हैं रंगीन फूलों के

103

114

आस्था का शिलालेख

103

115

दिन है कि हंस हलाहल पर

104

116

दिन अच्छा है

104

117

रची उषा ने ऋचा दिवा की

104

118

निर्बल और बलीन

105

119

देर लगा दिये हैं हमने

105

120

न टूटो तुम

105

121

तड़पती केन

105

122

हल चलते हैं फिर खेतों में

106

123

जवान दिन

106

124

हम जियें न जियें दोस्त

106

125

वरदवीणा हुई दीना

107

126

चोली फटी

107

127

सुभटकाय मेघों का संघट

108

128

ओ पिकासो की पुत्रियो

108

129

धूप पिये पानी लेटा है

108

130

चली गयी है कोई श्यामा

108

131

जल रहा है

109

132

हरी घास का बल्लम

109

133

मजदूरिन

109

134

अपन मन की बात

110

135

चम्मचों से नहीं

111

136

मैं उसे खोजता हूँ

111

137

पेड़ का हाथ

112

138

एक बच्चा हँसा

112

139

डा. रामविलास शर्मा के बाँदा

 

140

आने पर

113

141

झूठ मरे तो कैसे

114

142

खफ्त में आदमी होले का

115

143

बजी रूप रूप को शहनाई

115

144

मिट मिट कर मैं सीख रहा हूँ

116

145

सच

117

146

कनबहरे

117

147

जी के काम किये जीने में

117

148

हम और लोग

118

149

मीना कुमारी की मुत्यु पर

118

150

अहिंसा

119

151

चिड़ीमार ने चिड़िया मारी

119

152

काल कलूटा बड़ा क्रूर है

120

153

अपनी बात

121

154

चढ़ी जवानी

121

155

सब चलता है लोकतन्त्र में

121

156

देश की राजनीति

122

157

महँगाई

122

158

धूप की तलवार

123

159

दिन, नदी और आदमी

124

160

और का, और मेरा दिन

124

161

लोगों का जीवन

125

162

वसंत में

125

163

देश में लगी आग को

126

164

सूरज जनमा

126

165

आयोग

126

166

लड़ गये

127

167

पानी

132

168

हम मिलते हैं बिना मिले ही

133

169

आयें दिन

133

170

भीतर की लौ साधे

134

171

दहका खड़ा है सेमल का पुरनिया पेड़

134

172

पछाड़ते-पछाड़ते

135

173

मुझे न मारो मान-पान से

135

174

वाक्य पूरा कर रहा हूँ

136

175

गठरी चोरों की दुनिया में137

137

176

मैं समय की धार में धँस कर

 

177

खड़ा हूँ

137

178

गुलाब

137

179

खड़ा पहाड़ चढ़ा मैं अपने बल पर

138

180

मैंने आँख लड़ाई गगन विराजे

 

181

राजे रवि से

138

182

फटा अँधेरा फूहड़ फैला

139

183

मेरे मन की नदी

139

184

देश के भीतर

140

185

आये हो तो

140

186

मेरी कविताऍ गायेगी जनता

 

187

सस्वर

140

188

छोड़ो परम अलौकिक छोड़ो

141

189

दुख ने मुझको जब जब तोड़ा

142

190

मौन पड़ी हैं प्रिया प्रियंबद

142

191

खंभ फाड़कर जीना है

142

192

मैं समय को साधता हूँ

143

193

आई माँ की याद

144

194

जाओ लेकिन आत्मगंध दे जाओ

145

195

चिता जली तो मैंने देखा

145

196

चेतना मेरी जिलाये है तुम्हें

146

197

उनको महल मकानी

147

198

आदमी की चाँदमारी

147

199

फूलों की होती

148

200

बागी घोड़ा

148

201

आँख खुली, कर उठा

149

202

मैं गया हूँ डूब

150

203

कल कमीज में बटन नहीं थे

150

204

उदास दिन

151

205

रात

151

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Kailash Raj’s art, as always, is marvelous. We are so grateful to you for allowing your team to do these special canvases for us. Rarely do we see this caliber of art in modern times. Kailash Ji has taken the Swaminaryan monks’ suggestions to heart and executed each one with accuracy and a spiritual touch.
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