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रश्मिरथी: Rashmirathi


लेखक के विषय में

रामधारी सिंह दिनकर (1908-1974 .)

जन्म-23 सितंबर 1908 . को बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया घाट नामक गाँव में हुआ था।

शिक्षा : मोकामा घाट के स्कूल तथा पिर पटना कॉलेज में हुई जहाँ सै उन्होंने इतिहास विषय लेकर बी.. (आनर्स) की परीक्षा उत्तीर्ण की ।

गतिविधियाँ : एक स्कूल के प्रधानाचार्य, सब-रजिस्ट्रार, जन-सम्पर्क के उप- निदेशक, भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति, भारत सरकार के हिंदी सलाहकार आदि विभिन्न पदों पर रहकर उन्होंने अपनी प्रशासनिक योग्यता का परिचय दिया । पुरस्कार : साहित्य-सेवाओ के लिए उन्हें विश्वविद्यालय ने डी. लिट्. की मानद उपाधि, विभिन्न संस्थाओं ने उनकी पुस्तकों पर पुरस्कार (साहित्य अकादमी तथा ज्ञानपीठ) और भारत सरकार ने पद्यभूषण की उपाधि प्रदान कर उन्हें सम्मानित किया । निधन : 1974 .

आवरण : पूनम किशोर

जन्म : 4 नवम्बर 1980

शिक्षा : एम.एफ. . क्रिएटिव पेंटिंग कॉलेज ऑफ आर्ट्स लखनऊ, 2007 पुरस्कार : भारत सरकार सूचना प्रसारण मंत्रालय 1998, अग्निपथ अखिल भारतीय कला प्रदर्शनी 2005, नेशनल स्कॉलरशिप 2006, 27वीं वार्षिक कला प्रदर्शनी 2007 स्टेट अवॉर्ड, त्रिवेणी महोत्सव इलाहाबाद।

भूमिका

इस सरल-सीधे काव्य को भी किसी भूमिका की जरूरत है, ऐसा मै नहीं मानता; मगर, कुछ न लिखूँ तो वे पाक जरा उदास हो जाएँगे जो मूल पुस्तक के पढ़ने में हाथ लगाने से पूर्व किसी--किसी पूर्वाभास की खोज करते हैं । वो भी, हर चीज का कुछ--कुछ इतिहास होता है और रश्मिरथी नामक यह विनम्र कृति भी इस नियम का अपवाद नहीं है ।

बात यह है कि कुरुक्षेत्र की रचना कर चुकने के बाद ही मुझमें यह भाव जगा कि मैं कोई ऐसा काव्य भी लिखूँ जिसमें केवल विचारोत्तेजकता ही नहीं, कुछ कथा-संवाद और वर्णन का भी माहात्म्य हो । स्पष्ट ही यह उस मोह का उद्गार था जो मेरे भीतर उस परम्परा के प्रति मौजूद रहा है जिसके सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि राष्ट्रकवि श्री मैथिलीशरण गुप्तजी हैं । इस परम्परा के प्रति मेरे बहुत-से सहधर्मियों के क्या भाव हैं, इससे मैं अपरिचित नहीं हूँ । मुझे यह भी पता है कि जिन देशों अथवा दिशाओं से आज हिन्दी-काव्य की प्ररणा पार्सल से, मोल या उधार, मँगाई जा रही है, वहाँ कथा-काव्य की परम्परा निःशेष हो चुकी है और जो काम पहले प्रवन्ध-काव्य करते थे वही काम अब बड़ मजे में, उपन्यास कर रहे हैं। किन्तु, अन्य बहुत-सी बातों की तरह, में एक इस बात का भी महत्त्व समझता हूँ कि भारतीय जनता के हृदय में प्रबन्ध-काव्य का प्रेम आज भी काफी प्रबल है और तह अच्छे उपन्यासों के साथ-साथ ऐसी कविताओं के लिए भी बहुत ही उत्कंठित रहती है। अगर हम इस सात्तिवक काव-प्रेम की उपेक्षा कर दें तो, मेरी तुच्छ सम्मति में, हिन्दी कविता कै लिए यह कोई बहुत अच्छी बात नहीं होगी । परम्परा केवल वही मुख्य नहीं है जिसकी रचना वाहर हो रही है, कुछ वह भी प्रधान है जो हमें अपने पुरखों से विरासत के रूप में मिली है, जो निखिल भूमंडल के साहित्य के वीच हमारे अपने साहित्य की विशेषता है और जिसके भीतर से हम अपने हृदय को अपनी जाति के हृदय के साथ आसानी से मिला सकते हैं ।

मगर, कलाकारों की रुचि आज जो कथाकाव्य की ओर नली जा रही है, उसका भी कारण है, और वह यह, कि विशिष्टीकरण की प्रक्रिया में लीन होते-होते कविता केवल चित्र, चिन्तन ओर विरल संगीत के धरातल पर जा अटकी और और जहाँ भी स्थूलता एवं वर्णन के संकट में फँसने का भय है, उस ओर कवि-कल्पना जाना नहीं चाहती। लेकिन, स्थूलता और वर्णन के संकट का मुकाबला किए बिना कथा-कात्य लिखनेवाले का काम नहीं चल सकता। कथा कहने में, अक्सर, ऐसी परिस्थितियाँ आकर मौजूद हो जाती हैं जिनका वर्णन करना तो जरूरी होता है, मगर, वर्णन काव्यात्मवत्ता मैं-व्याघात डाले बिना निभ नहीं सकता। रामचरितमानस, साकेत और कामायनी के कमजोर सवाल इस बात के प्रमाण हैं। विशेषत: कामायनी ने शायद इसी प्रकार के संकटों से बचने के लिए कथासूत्र को अत्यन्त विरल कर देने की चेष्टा की थी। किन्तु यह चेष्टा सर्वत्र सफल नहीं हो सकी।

आजकल लोग बाजारों से ओट्स (जई) मँगाकर खाया करते है। आंशिक तुलना में यह गीत और मुक्तक का आनन्द है। मगर, कथा-काव्य का आनन्द खेतों में देशी पद्धति से कई उपजाने के आनन्द के समान है; यानी इस पद्धति से जई के दाने तौ मिलते ही हैं, कुछ घास और भूसा भी हाथ आता है, कुछ लहलहाती हुई हरियाली देखने का भी सुख प्राप्त होता है और' हल चलाने में जो मेहनत करनी पड़ती है, उससे कुछ तन्दुरुस्ती भी बनती है।

फिर भी यह सच है कि कथा-काव्य की रचना, आदि से अन्त तक, केवल दाहिने हाथ के भरोसे नहीं की जा सकती। जब मन ऊबने लगता है और प्रतिभा आगे बढ़ने से इनकार कर देती है, तब हमारा उपेक्षित बायीं हाथ हमारी सहायता को आगे बढ़ता है। मगर, बेचारा बायीं हाथ तो बायाँ ही ठहरा। वह चमत्कार तो क्या 'दिखलाए, कवि की कठिनाइयों का कुछ परदा ही खोल देता है। और इस क्रम में खुलनेवाली कमजोरियों को ढँकने के लिए कवि का नाना कौशलों से काम लेना पड़ता है।

यह तो हुई महाकाव्यों की बात। अगर इस रश्मिरथी काव्य को सामने रखा जाए, तो मेरे जानते इसका आरम्भ ही बायें हाथ से हुआ है और आवश्यकतानुसार अनेक बार कलम बायें से दाहिने और दाहिने से बायें हाथ में आती-जाती रही है। फिर भी, खत्म होने पर चीज मुझे अच्छी लगी। विशेषत: मुझे इस बात का सन्तोष है कि अपने अध्ययन और मनन से मैं कर्ण के चरित को जैसा समझ सका हूं, वह इस काव्य में ठीक से उतर आया है और उसके वर्णन के बहाने मैं अपने समय और समाज के विषय में जो कुछ कहना चाहता था, उसके अवसर भी मुझे यथास्थान मिल गए हैं।

इस काव्य का आरम्भ मैंने 16 फरवरी सन् 1950 . को किया था । उस समय मुझे केल इतना ही पता था कि प्रयाग के यशस्पी साहित्यकार पं. लक्ष्मीनारायण मिश्र कर्ण पर एक महाकाव्य की रचना कर रहे हैं । किन्तु, रश्मिरथी के पूरा होते-होते हिन्दी में कर्णचरित पर कई नूतन और रमणीय काव्य निकल गए । यह युग दलितों और उपेक्षितों के उद्धार का युग है । अतएव, यह बहुत स्वाभाविक है कि राष्ट्र-भारती के जागरूक कवियों का म्यान उस चरित' की ओर जाए जो हजारों वर्षो से हमारे सामने उपेक्षित एवं कलंकित मानवता का मूक प्रतीक बनकर खड़ा रहा है । रश्मिरथी में स्वयं क्या के मुख से निकला है-

मैं उनका आदर्श कहीं जो व्यथा न खोल सकेंगे पूछेगा का किह पिता स्प नाम न बोल सकेंगे; जिनका निखिल विश्व में कोई कहीं न अपना होगा, मन में लिये उमंग जिन्हें चिर-काल- कलपना होगा कर्णचरित के उद्धार की चिन्ता इस बात का प्रमाण है कि हमारे समाज में मानवीय गुणों की पहचान बढ़नेवाली है । कुल और जाति का अहंकार विदा हो रहा है । आगे, मनुष्य केवल उसी पद का अधिकारी होगा जो उसके अपने सामर्थ्य से सूचित होता है, उस पद का नहीं, जो उसके माता-पिता या वंश की देन है । इसी प्रकार, व्यक्ति अपने निजी गुणों के कारण जिस पद का अधिकारी हैँ, वह उसे मिलकर रहेगा, यहाँ तक कि उसके माता-पिता के दोष भी इसमें कोई बाधा नहीं डाल सकेंगे । कर्णचरित का उद्धार एक तरह से, नई मानवता की स्थापना का ही प्रयास है और मुझे सन्ताप है कि इस प्रयास में मैं अकेला नहीं, अपने अनेक. सुयोग्य सहधर्मियों के साथ हूँ । कर्ण का भाग्य, सचमुच, बहुत दिनों के बाद जगा हैं । यह- उसी का परिणाम है कि उसके पार जाने के लिए आज जलयान, पर जलयान तैयार हो रहे हैं । जहाजों के इस बड़े बेड़े में मेरी ओर रो एक छोटी-सी डोंगी ही सही ।

 

 

सर्ग

पृष्ठ

1

प्रथम सर्ग

17-24

2

द्वितीय सर्ग

25-37

3

तृतीय सर्ग

38-60

4

चतुर्थ सर्ग

61-79

5

पंचम सर्ग

80-105

6

षष्ठ सर्ग

106-135

7

सप्तम सर्ग

136-176

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