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Books > Hindu > हिन्दी > रति भक्ति - भारत की कथा-परम्परा में: Rati Bhakti in the Indian Tradition
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रति भक्ति - भारत की कथा-परम्परा में: Rati Bhakti in the Indian Tradition
रति भक्ति - भारत की कथा-परम्परा में: Rati Bhakti in the Indian Tradition
Description

पुस्तक के विषय में

भारत की कथा-परम्परा में रति और भक्ति का गहन अन्तर्सम्बन्ध है । रति और भक्ति को एक ही तथ्य के दो रूप मानने की अवधारणा भारतीय ज्ञान-परम्परा मे आरम्भ से ही विद्यमान है। रति-भक्ति की कविताओं-कथाओं में मानवीय प्रेम अलौकिक तथा भागवत् प्रेम लौकिक रूप ले लेता है।

शास्त्र का ज्ञान सबके लिए सुगम न होने के कारण भारत की बौद्धिक परम्परा ने ज्ञान को बाँचने-बाँटने की सर्वग्राह्य विधा कथा को माना है । तत: देश की विद्वत्-परम्परा तथा सभी भाषाओं में कथाओं का असीम भण्डार है । इस कथा-भण्डार में पुरुषार्थ-चतुष्टय से जुड़ी हुई भिन्न-भिन्न विषय-वस्तु हैं । इस पुस्तक में रति-भक्ति की धारा केन्द्र में है । काव्यशास्त्रीय चिंतन में श्रृंगार-रस सर्वोपरि है और भोजराज जैसे चिन्तकों के लिए मूल रस है । श्रृंगार का स्थायी भाव रति किस प्रकार श्रृंगार तथा भक्ति में निष्पन्न होता है -यह शोध-प्रबन्ध इसी का निदर्शन है । शृंगारी कथाओं (जैसे पंजाबी के लोक-किस्से) में कवि 'कथाकार अपने/अपनी रति-आराध्य को भक्ति के साथ भगवद् रूप में देखते हे और भक्ति कथाओं एवं काव्य में कवि-कथाकार अपने भगवान् आराध्य को सखा या मधुर भाव से प्रेमी-प्रेमिका के रूप में देखते/वर्णित करते हैं। यह रति-भक्ति काव्य-परम्परा सातवी शताब्दी में आलवार (तमिल) संत-काव्य में शुरू हुई तथा पंजाबी किस्सों में उन्नीसवीं शताब्दी तक जीवन्त रहीं । तत्पश्चात् पाश्चात्य प्रभाव में प्रेम/रति को भक्ति के स्थान पर एक आवेग माना जाने लगा।

परम्परा, बौद्धिक परम्परा, भारत की बौद्धिक परम्परा, काव्य-कथा का ज्ञान व साधन होना तथा कथा का ज्ञान से सम्बन्ध, काव्य-रस का ज्ञान से सम्बन्ध जैसे विषयों पर इस ग्रन्थ में चिन्तन किया गया है।

आशा की जाती है कि यह पुस्तक दर्शन, भाषाओं और साहित्य के विद्यार्थियों एवम् विद्वानों के साथ-साथ आम पाठकों के लिए भी विचारात्मक तथा रोचक सिद्ध होगी।

प्रो. कपिल कपूर ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंग्रेजी भाषा-साहित्य के प्राध्यापक, भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान के संकायाध्यक्ष एवं विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र के संस्थापक-समन्तर आचार्य के रूप में तदन्तर कुलदेशिक का पदभार वहन करते हुए साहित्य एवं भाषा-शास्त्रीय सिद्धान्त (भारतीय एवं पाश्चात्य ज्ञान-परम्पराओं में) एवं उन्नीसवी सदी के अंग्रेजी साहित्य के क्षेत्र में लगभग पाँच दशकों तक अध्यापन किया है एवं देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में इन ज्ञान-विधाओं में व्याख्यान दिए हैं। प्रो. कपूर ने अनेक आमंत्रित शोध-निबंधों के माध्यम से साहित्य-सिद्धान्त, व्याकरण-सिद्धान्त एवं भारतीय ज्ञान-परम्परा- विषयक ग्रंथों एवं शोध-पत्रिकाओं में अपना सार्थक अवदान दिया है।

वे अनेक प्रसिद्ध ग्रंथों के लेखक-सम्पादक हैं । इनमें से कुछ इस प्रकार हैं - साउथ-इंडियन लव पोयट्री (सम्पादित); टैक्स एंड इंटरप्रैटेशन दी इंडियन ट्रेडिशन; लैंग्वेज, लिंग्विस्टिक्स एंड लिटरेचर दी इंडियन पर्सपेक्टिव; कैनोनिकल टैक्स्ट्स ऑफ इंग्लिश लिटरेरी क्रिटिसिज़्म; इंडियन नॉलेज सिस्टम्स (दो भाग, सम्पादित); डायमेन्शन्स ऑफ पाणिनि ग्रामर, इत्यादि।

प्राक्कथन

कई वर्षों पूर्व मुझे अनुभूति हुई कि भारतीय परम्परा ने आख्यान (या कथा) को ज्ञान बाँचने और बाँटने का मुख्य साधन माना । शास्त्र का शान सर्वग्राह्य नहीं - उसे प्राप्त करने के लिए एक विशिष्ट स्तर का बौद्धिक विकास तथा साधनों की क्षमता चाहिए, साथ ही एकाग्रता भी - यह सामान्य व्यक्ति के गुण नहीं होते। आनन्द-बोधक, रसात्मक काव्य-कथा शास्त्रीय ज्ञान सर्वग्राह्य बना देती है और अभिनवगुप्त के अनुसार यह सारस ज्ञान उसी प्रकार व्यक्ति के मोक्ष का साधन बनता है जैसे दूध में मिलाई गई औषधि व्यक्ति के स्वास्थयवर्धन की । तत: देश की विद्वत् तथा लोक-परम्परा दोनों में और सभी भारतीय भाषाओं में कथाओं/आख्यानों का असीम भण्डार है।

अन्य सांसारिक और आध्यात्मिक चेष्टाओं की तरह, भारत में काव्य/साहित्य भी व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में साधन-मात्र है पुरुषार्थ-चतुष्टय को सिद्ध करने का । विश्वनाथ (चौदहवीं शताब्दी) कहते हैं-

वेद तथा शास्त्रों से, पुरुषार्थ-चतुष्टय की सिद्धि रस-रिक्त होती है। परन्तु काव्य क्योंकि आनन्द-समूह की अभिव्यक्ति है, यह अपरिपक्व तरुणों को भी पुरुषार्थ-चतुष्टय (अपने जीवन में) सिद्ध करने में सक्षम बनाता है। - साहित्यदर्पण 1 महाभारत में भी कहा गया है-वेदों के अर्थ और उनकी सार्थकता (काव्य में) दर्शाए जा सकते हैं।

काव्य. 'साहित्य का हमारे समाज में एक सार्थक स्थान है । और काव्य में कथा मुख्य विधा है। भारत की मौखिक परम्परा में अनेक प्रकार के आख्यान हो सकते थे, और हैं - उपनिषदों के आख्यान, पालि में बौद्धों की जातक कथाएँ, प्राकृत में जैन गाथा, महाभारत के उपाख्यान, पुराण कथाएँ, पंचतन्त्र में निदर्शन कथाओं की माला, कथाओं का ''समुद्र, '' कथासरित्सागर? प्रेम व युद्ध की लोक-कथाओं का भारत की भिन्न भाषाओं में अपार भण्डार । यह एक विशाल कथा-राशि है जिसमें भिन्न-भिन्न विषय-वस्तु, भिन्न-भिन्न रस, भिन्न-भिन्न नायक और नायिका हैं।

इस ''परम्परा'' का कम निश्चित करना कठिन है - इस परम्परा में, प्रत्यक्ष रूप से उपनिषदों की नचिकेता जैसे ज्ञान-समर्पित नायकों वाली ज्ञान-विषयक कथाएँ हैं । उनके उपरान्त कर्म-समर्पित बोधिसत्व नायक वाली पालि भाषा की जातक कथाएँ आती हैं और उनके उपरान्त प्राकृत भाषा की जैन थेर व थेरी गाथाएँ । कहना कठिन है कब से, परन्तु, पुराणों की भक्त नायकों वाली भक्ति कथाएँ तीसरी मार्ग-धारा के रूप में, ऐसा सम्भव है, लगभग साथ-साथ बनती, चलती रहीं।

धर्म यदि प्रथम प्रयोजन है तो प्रश्न भारतीय मानसिकता के सामने यह था कि ''धर्म किसमें है? ''इसका सबसे पहले उत्तर उपनिषदों की कथाओं में है - ''धर्म ज्ञान में है'' । बौद्ध जातकों ने दूसरा उत्तर दिया-''धर्म उस कर्म में है जो दूसरों की भलाई के लिए किया जाए ।'' तीसरा उत्तर पुराणों में है-''धर्म भक्ति में हे''

वैदिक ज्ञान, बौद्ध कर्म तथा पौराणिक भक्ति को एक रस में बाँधा आदि शंकराचार्य ने, जिन्होंने भगवद्गीता के दूसरे अध्याय पर टीका करते हुए निर्णय किया कि ''ज्ञानयुक्त कर्म ही भक्ति है।''

काव्य में इसका प्रभाव कथा-परम्परा में स्पष्ट है। श्रृंगार और भक्ति, इस जगत् तथा पारलौकिक तत्त्व, को एक ही स्थायी भाव रति से निष्पन्न मानकर एक लम्बी कथा-परम्परा का सृजन हुआ जो सातवीं शताब्दी के तमिल आलवार सन्त-कवियों से शुरू हुई तथा गुरु गोविन्द सिंह के काव्य तथा परम्परागत पंजाबी प्रेमलोक-कथाओं में अठारहवीं शताब्दी तक जीवन्त रही ।16 वीं शताब्दी में और उसके बाद पाश्चात्य प्रभाव में आकर भारतीय साहित्य में प्रेम को भक्ति के स्थान पर एक मानसिक/शारीरिक आवेग मान लिया गया ।

प्रेम और भक्ति की कविताओं और कथाओं का बाहुल्य है । इनमें रति और भक्ति एक ही तथ्य के दो रूप माने गए हैं । इन कविता-कथाओं में मानवीय प्रेम भागवत् है तथा प्रेमी-प्रेमिका भगवान् के रूप की तरह वर्णित होते हैं । तथा भागवत् कथाओं में भगवान् प्रेमी 'प्रेमिका का रूप लेते हैं । प्राकृत गाथा सतसई, तमिल की मणिमेंखलई संस्कृत की गीत-गोविन्ह मीरा की वाणी, सूफीशाह हुसैन की वाणी, पंजाबी किस्सा ''सोहनी-महिवाल,'' क्षेत्रैया का तेलुगू काव्य श्रृंगार कीर्तन (सत्रहवीं शताब्दी) तथा कमला दास की अद्भुत कहानी पद्मावती का सच यही है।

इसी लम्बी रति-भक्ति कथा-परम्परा का अध्ययन करने का अवसर मुझे बिरला फाउण्डेशन ने 2007 में दिया । मैं बिड़ला फाउण्डेशन का आभारी हूँ कि उन्होंने एक ऐसे विषय को मान्यता दी जो आजकल के जितने वाद हैं उनसे हटकर है । मैं फाउण्डेशन के तत्कालीन निदेशक श्री बी .एन टंडन जी के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ कि उन्होंने ऐसे विषय को महत्त्व दिया जो कि समसामयिक वैचारिक सन्दर्भ में ''फैशनेबल'' नहीं है।

इस शोध और अध्ययन के क्रम में मुझे भारत की दार्शनिक परम्पराओं तथा भारतीय संस्कृति को समझने का अवसर मिला । इसके फलस्वरूप भारत की सनातन गंगा-प्रवाह-रूपी ज्ञान-परम्परा के प्रति मेरी श्रद्धा अगाध हो गई।

इस पुस्तक का लिखना मेरे और मेरे विस्तृत परिवार के लिए अविस्मरणीय है । मैंने इसे लखनऊ में 15 दिसम्बर 2007 को लिखना प्रारम्भ किया जब मेरी दौहित्री का जन्म होने वाला था । उसका जन्म 27 दिसम्बर को हुआ । आज जब यह छपने जा रही है तो मेरी प्रतिभाशलिा दौहित्री अनन्या ३ वर्ष की हो गई है । इस प्रबन्ध को उसका यह 'नानू' उसी को समर्पित करता है ।

जे.एन .यू- संस्कृत केन्द्र के डी रजनीश मिश्र तथा डी. संतोष शुक्ला ने सामग्री संकलन एवं मूल आलेख को व्यवस्थित करने में अपना अथक सहयोग दिया। एतदर्थ उन्हें साधुवाद एवं आशीर्वाद।

मैं डी.के प्रिण्टवर्ल्ड के श्री सुशील मित्तल के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ । सुशील जी के नाम और व्यक्तित्व में समरसता है और उनका मेरे प्रति विशेष प्रेम है। उन्हीं के कारण यह पुस्तक पाठकों के पास है।

शोध सामग्री की हस्तलिखित पाण्डुलिपि के टंकण में श्री शिव प्रताप यादव ने बहुत परिश्रम किया। अत: उनके प्रति आभार व्यक्त करना मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ।

अन्तत: असमि भगवत्कृपा ने ही यह प्रबन्ध सम्भव किया है । और इस प्रबन्ध में मेरा कुछ भी मौलिक नहीं-जो सब है, जो भी अच्छा है, वह भक्तों, सन्तों, कवियों और आचार्यों का है । जो त्रुटियाँ है-बहुत त्रुटियाँ हैं इसमें वह सब मेरे सीमित ज्ञान के कारण है, और उनके लिए मैं क्षमा-प्रार्थी हूँ।

 

विषयानुक्रम

 
 

प्राक्कथन

vii

 

आभार

xiii

1

परम्परा

1

2

भारत की बौद्धिक परम्परा

5

3

काव्य का बौद्धिक वाङ्मय में स्थान

11

4

काव्य ज्ञान साधन

15

5

भारतीय काव्य-परम्परा में कथा

29

6

काव्य कथा

37

7

कथा-परम्परा

51

8

कथा तथा ज्ञान, कर्म एवं भक्ति

63

9

भक्ति, भगवत्तत्त्व, भक्ति कथाएँ

79

10

प्रेमाभक्ति और भक्ति काव्य

104

11

रस ही काव्यार्थ

112

12

भक्ति रस काव्य

141

13

रस-श्रृंगार से रस-भक्ति यात्रा:श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु

144

14

प्रेमा-भक्ति काव्य-कथा

161

15

मधुर रस-भक्ति काव्य-कथा

170

16

रति-भक्ति काव्य-कथा

208

17

परिशिष्ट

 

1

ब्रज के हिंडोल गाँव में रिकॉर्डिड सख्य-भक्ति का एक लोक आख्यान

241

2

Teluguoriginal Song by Ksatrayya of 17th Century CE

244

 

संदर्भ ग्रन्थ-सूची

249

 

शब्दानुकमणिका

258

                 

 

 

 

 

 

रति भक्ति - भारत की कथा-परम्परा में: Rati Bhakti in the Indian Tradition

Item Code:
NZA729
Cover:
Hardcover
Edition:
2011
ISBN:
9788124605943
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
278
Other Details:
Weight of the Book:520 gms
Price:
$25.00   Shipping Free
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रति भक्ति - भारत की कथा-परम्परा में: Rati Bhakti in the Indian Tradition

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पुस्तक के विषय में

भारत की कथा-परम्परा में रति और भक्ति का गहन अन्तर्सम्बन्ध है । रति और भक्ति को एक ही तथ्य के दो रूप मानने की अवधारणा भारतीय ज्ञान-परम्परा मे आरम्भ से ही विद्यमान है। रति-भक्ति की कविताओं-कथाओं में मानवीय प्रेम अलौकिक तथा भागवत् प्रेम लौकिक रूप ले लेता है।

शास्त्र का ज्ञान सबके लिए सुगम न होने के कारण भारत की बौद्धिक परम्परा ने ज्ञान को बाँचने-बाँटने की सर्वग्राह्य विधा कथा को माना है । तत: देश की विद्वत्-परम्परा तथा सभी भाषाओं में कथाओं का असीम भण्डार है । इस कथा-भण्डार में पुरुषार्थ-चतुष्टय से जुड़ी हुई भिन्न-भिन्न विषय-वस्तु हैं । इस पुस्तक में रति-भक्ति की धारा केन्द्र में है । काव्यशास्त्रीय चिंतन में श्रृंगार-रस सर्वोपरि है और भोजराज जैसे चिन्तकों के लिए मूल रस है । श्रृंगार का स्थायी भाव रति किस प्रकार श्रृंगार तथा भक्ति में निष्पन्न होता है -यह शोध-प्रबन्ध इसी का निदर्शन है । शृंगारी कथाओं (जैसे पंजाबी के लोक-किस्से) में कवि 'कथाकार अपने/अपनी रति-आराध्य को भक्ति के साथ भगवद् रूप में देखते हे और भक्ति कथाओं एवं काव्य में कवि-कथाकार अपने भगवान् आराध्य को सखा या मधुर भाव से प्रेमी-प्रेमिका के रूप में देखते/वर्णित करते हैं। यह रति-भक्ति काव्य-परम्परा सातवी शताब्दी में आलवार (तमिल) संत-काव्य में शुरू हुई तथा पंजाबी किस्सों में उन्नीसवीं शताब्दी तक जीवन्त रहीं । तत्पश्चात् पाश्चात्य प्रभाव में प्रेम/रति को भक्ति के स्थान पर एक आवेग माना जाने लगा।

परम्परा, बौद्धिक परम्परा, भारत की बौद्धिक परम्परा, काव्य-कथा का ज्ञान व साधन होना तथा कथा का ज्ञान से सम्बन्ध, काव्य-रस का ज्ञान से सम्बन्ध जैसे विषयों पर इस ग्रन्थ में चिन्तन किया गया है।

आशा की जाती है कि यह पुस्तक दर्शन, भाषाओं और साहित्य के विद्यार्थियों एवम् विद्वानों के साथ-साथ आम पाठकों के लिए भी विचारात्मक तथा रोचक सिद्ध होगी।

प्रो. कपिल कपूर ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंग्रेजी भाषा-साहित्य के प्राध्यापक, भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान के संकायाध्यक्ष एवं विशिष्ट संस्कृत अध्ययन केन्द्र के संस्थापक-समन्तर आचार्य के रूप में तदन्तर कुलदेशिक का पदभार वहन करते हुए साहित्य एवं भाषा-शास्त्रीय सिद्धान्त (भारतीय एवं पाश्चात्य ज्ञान-परम्पराओं में) एवं उन्नीसवी सदी के अंग्रेजी साहित्य के क्षेत्र में लगभग पाँच दशकों तक अध्यापन किया है एवं देश-विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में इन ज्ञान-विधाओं में व्याख्यान दिए हैं। प्रो. कपूर ने अनेक आमंत्रित शोध-निबंधों के माध्यम से साहित्य-सिद्धान्त, व्याकरण-सिद्धान्त एवं भारतीय ज्ञान-परम्परा- विषयक ग्रंथों एवं शोध-पत्रिकाओं में अपना सार्थक अवदान दिया है।

वे अनेक प्रसिद्ध ग्रंथों के लेखक-सम्पादक हैं । इनमें से कुछ इस प्रकार हैं - साउथ-इंडियन लव पोयट्री (सम्पादित); टैक्स एंड इंटरप्रैटेशन दी इंडियन ट्रेडिशन; लैंग्वेज, लिंग्विस्टिक्स एंड लिटरेचर दी इंडियन पर्सपेक्टिव; कैनोनिकल टैक्स्ट्स ऑफ इंग्लिश लिटरेरी क्रिटिसिज़्म; इंडियन नॉलेज सिस्टम्स (दो भाग, सम्पादित); डायमेन्शन्स ऑफ पाणिनि ग्रामर, इत्यादि।

प्राक्कथन

कई वर्षों पूर्व मुझे अनुभूति हुई कि भारतीय परम्परा ने आख्यान (या कथा) को ज्ञान बाँचने और बाँटने का मुख्य साधन माना । शास्त्र का शान सर्वग्राह्य नहीं - उसे प्राप्त करने के लिए एक विशिष्ट स्तर का बौद्धिक विकास तथा साधनों की क्षमता चाहिए, साथ ही एकाग्रता भी - यह सामान्य व्यक्ति के गुण नहीं होते। आनन्द-बोधक, रसात्मक काव्य-कथा शास्त्रीय ज्ञान सर्वग्राह्य बना देती है और अभिनवगुप्त के अनुसार यह सारस ज्ञान उसी प्रकार व्यक्ति के मोक्ष का साधन बनता है जैसे दूध में मिलाई गई औषधि व्यक्ति के स्वास्थयवर्धन की । तत: देश की विद्वत् तथा लोक-परम्परा दोनों में और सभी भारतीय भाषाओं में कथाओं/आख्यानों का असीम भण्डार है।

अन्य सांसारिक और आध्यात्मिक चेष्टाओं की तरह, भारत में काव्य/साहित्य भी व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में साधन-मात्र है पुरुषार्थ-चतुष्टय को सिद्ध करने का । विश्वनाथ (चौदहवीं शताब्दी) कहते हैं-

वेद तथा शास्त्रों से, पुरुषार्थ-चतुष्टय की सिद्धि रस-रिक्त होती है। परन्तु काव्य क्योंकि आनन्द-समूह की अभिव्यक्ति है, यह अपरिपक्व तरुणों को भी पुरुषार्थ-चतुष्टय (अपने जीवन में) सिद्ध करने में सक्षम बनाता है। - साहित्यदर्पण 1 महाभारत में भी कहा गया है-वेदों के अर्थ और उनकी सार्थकता (काव्य में) दर्शाए जा सकते हैं।

काव्य. 'साहित्य का हमारे समाज में एक सार्थक स्थान है । और काव्य में कथा मुख्य विधा है। भारत की मौखिक परम्परा में अनेक प्रकार के आख्यान हो सकते थे, और हैं - उपनिषदों के आख्यान, पालि में बौद्धों की जातक कथाएँ, प्राकृत में जैन गाथा, महाभारत के उपाख्यान, पुराण कथाएँ, पंचतन्त्र में निदर्शन कथाओं की माला, कथाओं का ''समुद्र, '' कथासरित्सागर? प्रेम व युद्ध की लोक-कथाओं का भारत की भिन्न भाषाओं में अपार भण्डार । यह एक विशाल कथा-राशि है जिसमें भिन्न-भिन्न विषय-वस्तु, भिन्न-भिन्न रस, भिन्न-भिन्न नायक और नायिका हैं।

इस ''परम्परा'' का कम निश्चित करना कठिन है - इस परम्परा में, प्रत्यक्ष रूप से उपनिषदों की नचिकेता जैसे ज्ञान-समर्पित नायकों वाली ज्ञान-विषयक कथाएँ हैं । उनके उपरान्त कर्म-समर्पित बोधिसत्व नायक वाली पालि भाषा की जातक कथाएँ आती हैं और उनके उपरान्त प्राकृत भाषा की जैन थेर व थेरी गाथाएँ । कहना कठिन है कब से, परन्तु, पुराणों की भक्त नायकों वाली भक्ति कथाएँ तीसरी मार्ग-धारा के रूप में, ऐसा सम्भव है, लगभग साथ-साथ बनती, चलती रहीं।

धर्म यदि प्रथम प्रयोजन है तो प्रश्न भारतीय मानसिकता के सामने यह था कि ''धर्म किसमें है? ''इसका सबसे पहले उत्तर उपनिषदों की कथाओं में है - ''धर्म ज्ञान में है'' । बौद्ध जातकों ने दूसरा उत्तर दिया-''धर्म उस कर्म में है जो दूसरों की भलाई के लिए किया जाए ।'' तीसरा उत्तर पुराणों में है-''धर्म भक्ति में हे''

वैदिक ज्ञान, बौद्ध कर्म तथा पौराणिक भक्ति को एक रस में बाँधा आदि शंकराचार्य ने, जिन्होंने भगवद्गीता के दूसरे अध्याय पर टीका करते हुए निर्णय किया कि ''ज्ञानयुक्त कर्म ही भक्ति है।''

काव्य में इसका प्रभाव कथा-परम्परा में स्पष्ट है। श्रृंगार और भक्ति, इस जगत् तथा पारलौकिक तत्त्व, को एक ही स्थायी भाव रति से निष्पन्न मानकर एक लम्बी कथा-परम्परा का सृजन हुआ जो सातवीं शताब्दी के तमिल आलवार सन्त-कवियों से शुरू हुई तथा गुरु गोविन्द सिंह के काव्य तथा परम्परागत पंजाबी प्रेमलोक-कथाओं में अठारहवीं शताब्दी तक जीवन्त रही ।16 वीं शताब्दी में और उसके बाद पाश्चात्य प्रभाव में आकर भारतीय साहित्य में प्रेम को भक्ति के स्थान पर एक मानसिक/शारीरिक आवेग मान लिया गया ।

प्रेम और भक्ति की कविताओं और कथाओं का बाहुल्य है । इनमें रति और भक्ति एक ही तथ्य के दो रूप माने गए हैं । इन कविता-कथाओं में मानवीय प्रेम भागवत् है तथा प्रेमी-प्रेमिका भगवान् के रूप की तरह वर्णित होते हैं । तथा भागवत् कथाओं में भगवान् प्रेमी 'प्रेमिका का रूप लेते हैं । प्राकृत गाथा सतसई, तमिल की मणिमेंखलई संस्कृत की गीत-गोविन्ह मीरा की वाणी, सूफीशाह हुसैन की वाणी, पंजाबी किस्सा ''सोहनी-महिवाल,'' क्षेत्रैया का तेलुगू काव्य श्रृंगार कीर्तन (सत्रहवीं शताब्दी) तथा कमला दास की अद्भुत कहानी पद्मावती का सच यही है।

इसी लम्बी रति-भक्ति कथा-परम्परा का अध्ययन करने का अवसर मुझे बिरला फाउण्डेशन ने 2007 में दिया । मैं बिड़ला फाउण्डेशन का आभारी हूँ कि उन्होंने एक ऐसे विषय को मान्यता दी जो आजकल के जितने वाद हैं उनसे हटकर है । मैं फाउण्डेशन के तत्कालीन निदेशक श्री बी .एन टंडन जी के प्रति हार्दिक आभार प्रकट करता हूँ कि उन्होंने ऐसे विषय को महत्त्व दिया जो कि समसामयिक वैचारिक सन्दर्भ में ''फैशनेबल'' नहीं है।

इस शोध और अध्ययन के क्रम में मुझे भारत की दार्शनिक परम्पराओं तथा भारतीय संस्कृति को समझने का अवसर मिला । इसके फलस्वरूप भारत की सनातन गंगा-प्रवाह-रूपी ज्ञान-परम्परा के प्रति मेरी श्रद्धा अगाध हो गई।

इस पुस्तक का लिखना मेरे और मेरे विस्तृत परिवार के लिए अविस्मरणीय है । मैंने इसे लखनऊ में 15 दिसम्बर 2007 को लिखना प्रारम्भ किया जब मेरी दौहित्री का जन्म होने वाला था । उसका जन्म 27 दिसम्बर को हुआ । आज जब यह छपने जा रही है तो मेरी प्रतिभाशलिा दौहित्री अनन्या ३ वर्ष की हो गई है । इस प्रबन्ध को उसका यह 'नानू' उसी को समर्पित करता है ।

जे.एन .यू- संस्कृत केन्द्र के डी रजनीश मिश्र तथा डी. संतोष शुक्ला ने सामग्री संकलन एवं मूल आलेख को व्यवस्थित करने में अपना अथक सहयोग दिया। एतदर्थ उन्हें साधुवाद एवं आशीर्वाद।

मैं डी.के प्रिण्टवर्ल्ड के श्री सुशील मित्तल के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करता हूँ । सुशील जी के नाम और व्यक्तित्व में समरसता है और उनका मेरे प्रति विशेष प्रेम है। उन्हीं के कारण यह पुस्तक पाठकों के पास है।

शोध सामग्री की हस्तलिखित पाण्डुलिपि के टंकण में श्री शिव प्रताप यादव ने बहुत परिश्रम किया। अत: उनके प्रति आभार व्यक्त करना मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूँ।

अन्तत: असमि भगवत्कृपा ने ही यह प्रबन्ध सम्भव किया है । और इस प्रबन्ध में मेरा कुछ भी मौलिक नहीं-जो सब है, जो भी अच्छा है, वह भक्तों, सन्तों, कवियों और आचार्यों का है । जो त्रुटियाँ है-बहुत त्रुटियाँ हैं इसमें वह सब मेरे सीमित ज्ञान के कारण है, और उनके लिए मैं क्षमा-प्रार्थी हूँ।

 

विषयानुक्रम

 
 

प्राक्कथन

vii

 

आभार

xiii

1

परम्परा

1

2

भारत की बौद्धिक परम्परा

5

3

काव्य का बौद्धिक वाङ्मय में स्थान

11

4

काव्य ज्ञान साधन

15

5

भारतीय काव्य-परम्परा में कथा

29

6

काव्य कथा

37

7

कथा-परम्परा

51

8

कथा तथा ज्ञान, कर्म एवं भक्ति

63

9

भक्ति, भगवत्तत्त्व, भक्ति कथाएँ

79

10

प्रेमाभक्ति और भक्ति काव्य

104

11

रस ही काव्यार्थ

112

12

भक्ति रस काव्य

141

13

रस-श्रृंगार से रस-भक्ति यात्रा:श्रीभक्तिरसामृतसिन्धु

144

14

प्रेमा-भक्ति काव्य-कथा

161

15

मधुर रस-भक्ति काव्य-कथा

170

16

रति-भक्ति काव्य-कथा

208

17

परिशिष्ट

 

1

ब्रज के हिंडोल गाँव में रिकॉर्डिड सख्य-भक्ति का एक लोक आख्यान

241

2

Teluguoriginal Song by Ksatrayya of 17th Century CE

244

 

संदर्भ ग्रन्थ-सूची

249

 

शब्दानुकमणिका

258

                 

 

 

 

 

 

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Testimonials
Wonderful service and excellent items. Always sent safely and arrive in good order. Very happy with firm.
Dr. Janice, Australia
Thank you. I purchased some books from you in the past and was so pleased by the care with which they were packaged. It's good to find a bookseller who loves books.
Ginger, USA
नमास्कार परदेस में रहने वाले भारतीयों को अपनी सभ्यता व संकृति से जुड़े रहने का माध्यम प्रदान करने हेतु, मैं आपका अभिनंदन करती हूँ| धन्यवाद
Ankita, USA
Namaste, This painting was delivered a little while ago. The entire package was soaking wet inside and out. But because of the extra special care you took to protect it, the painting itself is not damaged. It is beautiful, and I am very happy to have it. But all is well now, and I am relieved. Thank you!
Janice, USA
I am writing to convey my gratitude in the service that you have provided me. We received the painting of the 10 gurus by Anup Gomay on the 2nd January 2019 and the painting was packaged very well. I am happy to say that the recipient of the gift was very very happy! The painting is truly stunning and spectacular in real life! Thank you once again for all your help that you provided.
Mrs. Prabha, United Kingdom
I am writing to relay my compliments of the excellent services provided by exoticindia. The books are in great condition! I was not expecting a speedy delivery. Will definitely return to order more books.
Dr. Jamuna, New Zealand
I just received my powder pink wool shawl. It is beautiful. I bought it to wear over my dress at my son's wedding this coming Spring & it will be perfect if it's chilly in the garden. The package came very promptly & I couldn't be more pleased.
Pamela, Canada
I very much appreciate the tailoring service you offer. Many friends are delighted to see my last purchase. Hopefully more customers will contact you soon.
Ann, USA
Namaste Messrs Suresh Kumar/Vipin K I am positively impressed with orders from Exoticindiaart.com I have never had any reason to complain about my orders, which are filled instantly and shipped to me at the earliest time. I am grateful to be your customer.
Albert Cole, USA
Thanks many times over! Wonderful items and service!
Pomeroy, USA
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