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Books > Hindu > Puranas > Bhagavata Purana > भागवत की कथाएँ : Stories from The Bhagavata
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भागवत की कथाएँ : Stories from The Bhagavata
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भागवत की कथाएँ : Stories from The Bhagavata
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Description

(पुस्तक के विषय में)

भागवत धर्म

'उद्धव! जिस परम पिवत्र भागवत धर्म का श्रद्धापूर्वक पाल करने से मनुष्य मृत्यु से भी अनायास ही मुक्ति पा सकता है, वह मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो- मेंरा स्मरण करके समस्त कार्यों को शुरू करना तथा कर्म के फल मुझे अर्पित करना। साधुगण जिस प्रकार का आचरण करते हैं, वैसा ही आचरण करना। मेंरे नाम पर अनुष्ठित होनेवाले महोत्सवों में भाग लेना। भक्तों तिा महापुरुषों की जीवन-कथा पर चर्चा करना। इन सबके द्वारा जब भक्त के मन की मलिनता मिट जाएगी, तब वह सभी प्राणियों में निवास करनेवाले मुझ (भगवान) को अपने हृदय में स्पष्ट रूप से अनुभव करेगा। तब वह समस्त जीवों में भी मुझे देख सकेगा। ब्रहामण और अब्रहामण, साधु और असाधु, सूर्य और आगऔ की चिंगारी, अच्छा और बुरा-जो सबके प्रति समान दृष्टि रखते हैं, वे ही ज्ञानी हैं। जान लो कि सभी प्राणियों में ईश्वर की सत्ता का अनुभव करना ही मुझे प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ है।'

प्रकाशकीय

श्रीमद्भागवत को समस्त पुराणो में श्रेष्ठ-महापुराण कहते हैं । स्वयं भागवत में ही इसकी महिमा का सुन्दर निरूपण हुआ है- 'सर्ववेदान्तसार' हि श्रीभागवतमिष्यते। तद्रसामृततृप्स्य नान्यत्र स्याद्रति: क्वचित् ।' - 'श्रीमद्भागवत वेदान्त का सार है । जो व्यक्ति इसके रसामृत का पान करके परितृप्त हो जाता है, उसकी अन्यत्र कहीं भी आसक्ति नही रह जाती।'

श्रीरामकृष्ण के जीवन की एक घटना भी इस ग्रन्थ की महिमा को प्रकट करती है । एक बार वे भागवत की कथा सुनते-सुनते भावाविष्ट हो गए। तभी उन्हें श्रीकृष्ण की ज्योतिर्मय मूर्ति के दर्शन हुए। मूर्ति के चरणों से रस्सी की भाँति एक ज्योति निकली । सर्वप्रथम उसने भागवत को स्पर्श किया और उसके बाद श्रीरामकृष्ण के सीने से लगकर उन तीनों को कुछ देर के लिए एक साथ जोड़े रखा । इससे श्रीरामकृष्ण के मन में दृढ़ धारणा हो गई कि भागवत, भक्त और भगवान-तीनों एक हैं तथा एक के ही तीन रूप हैं ।

स्वामी अमलानन्द जी ने भागवत की कुछ कथाओं का संक्षिप्त तथा सरल बँगला भाषा में पुनर्लेखन किया था, जो बेलघरिया के रामकृष्ण मिशन कोलकाता विद्यार्थी भवन द्वारा 1985 . में पहली बार प्रकाशित हुआ। अद्वैत आश्रम के अनुरोध पर छपरा के डॉ. केदारनाथ लाभ, डी. लिट् ने इस पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद किया और तदुपरान्त यह हमारे रायपुर के रामकृष्ण मिशन विवेकानन्द आश्रम के स्वामी विदेहात्मानन्द द्वारा सम्पादित होकर, उसी आश्रम से प्रकाशित होनेवाली मासिक पत्रिका 'विवेक ज्योति' के सितम्बर 2007 से नवम्बर 2008 तक के 15 अंकों में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुई । वही से अब हम इसे एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। स्वामी निर्विकारानन्द, स्वमी प्रपत्यानन्द तथा श्रीमती मधु दर ने इसके प्रूफ संशोधन आदि में विशेष सहायता की है । श्री अलिम्पन घोष के चित्रो ने पुस्तक को अति सुन्दर बना दिया है । इसके लिए हम इन सभी के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते है।

 

अनुक्रमणिका

 

पूर्व कथन

 

1

भागवत की रचना

9

 

प्रथम स्कन्ध

 

2

सूत मुनि द्वारा भागवत का प्रचार

11

3

अवतार-कथा

12

4

राजा परीक्षित

12

 

द्वितीय स्कन्ध

 

5

शुकदेव का उपदेश

15

6

चार श्लोकों में भागवत

16

 

तृतीय स्कन्ध

 

7

विदुर-उद्धव-मैत्रेय संवाद

19

8

जय-विजय

20

9

कपिल मुनि

21

 

चतुर्थ स्कन्ध

 

10

दक्ष-यज्ञ एवं सती का देहत्याग

24

11

ध्रुव उपाख्यान

26

12

पुरजन की कथा

29

13

पंचम स्कन्ध

 

14

जड़भरत

33

15

षष्ठ स्कन्ध

 

16

अजामिल

38

17

दधीचि का आत्मत्याग और वृत्रासुर-वध

40

 

सप्तम स्कन्ध

 

18

प्रह्लाद-चरित्र

44

19

अष्टम स्कन्ध

 

20

गजेन्द्र- मोक्ष

51

21

समुद्र- मन्थन

53

22

बलि और वामन

55

23

नवम स्कन्ध

 

24

अम्बरीष और दुर्वासा

59

25

ययाति और देवयानी

62

26

दुष्यन्त-शकुन्तला

64

27

रन्तिदेव की अतिथि-सेवा

65

 

दशम स्कन्ध

 

28

श्रीकृष्ण का जन्म

68

29

पूतना-वध

71

30

यशोदा का विश्वरूप-दर्शन

72

31

दाम-बन्धन

73

32

यमलार्जुन-उद्धार

74

33

ब्रह्मा का मोह-भंग

75

34

कालिय- दमन

78

35

गोवर्धन-गिरि धारण

79

36

रास लीला

81

37

सुदर्शन-शंखचूड़-अरिष्टासुर वध

86

38

अक्रूर और कृष्ण-बलराम

87

39

कंस-वध

89

40

उग्रसेन को राज्य-दान

93

41

कृष्ण-बलराम की गुरु-दक्षिणा

94

42

उद्धव का व्रज-गमन तथा गोपियों की उलाहना

95

43

हस्तिनापुर का समाचार

97

44

जरासन्ध से युद्ध

99

45

कालयवन और मुचुकुन्द

100

46

रुक्मिणी-विवाह

101

47

प्रद्युम्र

103

48

स्यमन्तक मणि-जाम्बवती और सत्यभामा

104

49

इन्द्रप्रस्थ में कुन्तीदेवी से वार्तालाप

106

50

उषा और अनिरुद्ध

107

51

नारद का द्वारका-दर्शन

108

52

जरासन्ध वध

110

53

राजसूय यज्ञ और शिशुपाल वध

112

54

दन्तवक्र वध

114

55

सहपाठी श्रीदाम

115

56

महादेव का संकट

117

57

भृगु के चरण-चिह्न

119

58

द्वारका और यदुवंश

120

 

एकादश स्कन्ध

 

59

ऋषियों का शाप-मूसल और उसका परिणाम

122

60

नारद-वसुदेव संवाद (नव योगीन्द्र)

123

61

श्रीकृष्ण-उद्धव संवाद

129

62

उद्धव-गीता

131

63

अवधूत के चौबीस गुरु

131

64

बन्धन और मुक्ति

137

65

भगवान की विभूतियाँ

139

66

उद्धव के प्रश्न और श्रीकृष्ण के उत्तर

140

67

उद्धव को श्रीकृष्ण का अन्तिम उपदेश

141

68

श्रीकृष्ण का महाप्रयाण

143

 

द्वादश स्कन्ध

 

69

युगधर्म और शुकदेव का अन्तिम उपदेश

147

70

परीक्षित का देहत्याग

149

71

जनमेंजय का सर्पयज्ञ

150

 

उपसंहार

 

72

भागवत के कुछ अन्तिम श्लोक

151

 

Sample Pages







भागवत की कथाएँ : Stories from The Bhagavata

Item Code:
NZA942
Cover:
Paperback
Edition:
2013
ISBN:
9788175053939
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
152 (15 Color Illustrations)
Other Details:
Weight of the Book: 200 gms
Price:
$10.00   Shipping Free
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भागवत की कथाएँ : Stories from The Bhagavata

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(पुस्तक के विषय में)

भागवत धर्म

'उद्धव! जिस परम पिवत्र भागवत धर्म का श्रद्धापूर्वक पाल करने से मनुष्य मृत्यु से भी अनायास ही मुक्ति पा सकता है, वह मैं तुमसे कहता हूँ, सुनो- मेंरा स्मरण करके समस्त कार्यों को शुरू करना तथा कर्म के फल मुझे अर्पित करना। साधुगण जिस प्रकार का आचरण करते हैं, वैसा ही आचरण करना। मेंरे नाम पर अनुष्ठित होनेवाले महोत्सवों में भाग लेना। भक्तों तिा महापुरुषों की जीवन-कथा पर चर्चा करना। इन सबके द्वारा जब भक्त के मन की मलिनता मिट जाएगी, तब वह सभी प्राणियों में निवास करनेवाले मुझ (भगवान) को अपने हृदय में स्पष्ट रूप से अनुभव करेगा। तब वह समस्त जीवों में भी मुझे देख सकेगा। ब्रहामण और अब्रहामण, साधु और असाधु, सूर्य और आगऔ की चिंगारी, अच्छा और बुरा-जो सबके प्रति समान दृष्टि रखते हैं, वे ही ज्ञानी हैं। जान लो कि सभी प्राणियों में ईश्वर की सत्ता का अनुभव करना ही मुझे प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ है।'

प्रकाशकीय

श्रीमद्भागवत को समस्त पुराणो में श्रेष्ठ-महापुराण कहते हैं । स्वयं भागवत में ही इसकी महिमा का सुन्दर निरूपण हुआ है- 'सर्ववेदान्तसार' हि श्रीभागवतमिष्यते। तद्रसामृततृप्स्य नान्यत्र स्याद्रति: क्वचित् ।' - 'श्रीमद्भागवत वेदान्त का सार है । जो व्यक्ति इसके रसामृत का पान करके परितृप्त हो जाता है, उसकी अन्यत्र कहीं भी आसक्ति नही रह जाती।'

श्रीरामकृष्ण के जीवन की एक घटना भी इस ग्रन्थ की महिमा को प्रकट करती है । एक बार वे भागवत की कथा सुनते-सुनते भावाविष्ट हो गए। तभी उन्हें श्रीकृष्ण की ज्योतिर्मय मूर्ति के दर्शन हुए। मूर्ति के चरणों से रस्सी की भाँति एक ज्योति निकली । सर्वप्रथम उसने भागवत को स्पर्श किया और उसके बाद श्रीरामकृष्ण के सीने से लगकर उन तीनों को कुछ देर के लिए एक साथ जोड़े रखा । इससे श्रीरामकृष्ण के मन में दृढ़ धारणा हो गई कि भागवत, भक्त और भगवान-तीनों एक हैं तथा एक के ही तीन रूप हैं ।

स्वामी अमलानन्द जी ने भागवत की कुछ कथाओं का संक्षिप्त तथा सरल बँगला भाषा में पुनर्लेखन किया था, जो बेलघरिया के रामकृष्ण मिशन कोलकाता विद्यार्थी भवन द्वारा 1985 . में पहली बार प्रकाशित हुआ। अद्वैत आश्रम के अनुरोध पर छपरा के डॉ. केदारनाथ लाभ, डी. लिट् ने इस पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद किया और तदुपरान्त यह हमारे रायपुर के रामकृष्ण मिशन विवेकानन्द आश्रम के स्वामी विदेहात्मानन्द द्वारा सम्पादित होकर, उसी आश्रम से प्रकाशित होनेवाली मासिक पत्रिका 'विवेक ज्योति' के सितम्बर 2007 से नवम्बर 2008 तक के 15 अंकों में धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुई । वही से अब हम इसे एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। स्वामी निर्विकारानन्द, स्वमी प्रपत्यानन्द तथा श्रीमती मधु दर ने इसके प्रूफ संशोधन आदि में विशेष सहायता की है । श्री अलिम्पन घोष के चित्रो ने पुस्तक को अति सुन्दर बना दिया है । इसके लिए हम इन सभी के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करते है।

 

अनुक्रमणिका

 

पूर्व कथन

 

1

भागवत की रचना

9

 

प्रथम स्कन्ध

 

2

सूत मुनि द्वारा भागवत का प्रचार

11

3

अवतार-कथा

12

4

राजा परीक्षित

12

 

द्वितीय स्कन्ध

 

5

शुकदेव का उपदेश

15

6

चार श्लोकों में भागवत

16

 

तृतीय स्कन्ध

 

7

विदुर-उद्धव-मैत्रेय संवाद

19

8

जय-विजय

20

9

कपिल मुनि

21

 

चतुर्थ स्कन्ध

 

10

दक्ष-यज्ञ एवं सती का देहत्याग

24

11

ध्रुव उपाख्यान

26

12

पुरजन की कथा

29

13

पंचम स्कन्ध

 

14

जड़भरत

33

15

षष्ठ स्कन्ध

 

16

अजामिल

38

17

दधीचि का आत्मत्याग और वृत्रासुर-वध

40

 

सप्तम स्कन्ध

 

18

प्रह्लाद-चरित्र

44

19

अष्टम स्कन्ध

 

20

गजेन्द्र- मोक्ष

51

21

समुद्र- मन्थन

53

22

बलि और वामन

55

23

नवम स्कन्ध

 

24

अम्बरीष और दुर्वासा

59

25

ययाति और देवयानी

62

26

दुष्यन्त-शकुन्तला

64

27

रन्तिदेव की अतिथि-सेवा

65

 

दशम स्कन्ध

 

28

श्रीकृष्ण का जन्म

68

29

पूतना-वध

71

30

यशोदा का विश्वरूप-दर्शन

72

31

दाम-बन्धन

73

32

यमलार्जुन-उद्धार

74

33

ब्रह्मा का मोह-भंग

75

34

कालिय- दमन

78

35

गोवर्धन-गिरि धारण

79

36

रास लीला

81

37

सुदर्शन-शंखचूड़-अरिष्टासुर वध

86

38

अक्रूर और कृष्ण-बलराम

87

39

कंस-वध

89

40

उग्रसेन को राज्य-दान

93

41

कृष्ण-बलराम की गुरु-दक्षिणा

94

42

उद्धव का व्रज-गमन तथा गोपियों की उलाहना

95

43

हस्तिनापुर का समाचार

97

44

जरासन्ध से युद्ध

99

45

कालयवन और मुचुकुन्द

100

46

रुक्मिणी-विवाह

101

47

प्रद्युम्र

103

48

स्यमन्तक मणि-जाम्बवती और सत्यभामा

104

49

इन्द्रप्रस्थ में कुन्तीदेवी से वार्तालाप

106

50

उषा और अनिरुद्ध

107

51

नारद का द्वारका-दर्शन

108

52

जरासन्ध वध

110

53

राजसूय यज्ञ और शिशुपाल वध

112

54

दन्तवक्र वध

114

55

सहपाठी श्रीदाम

115

56

महादेव का संकट

117

57

भृगु के चरण-चिह्न

119

58

द्वारका और यदुवंश

120

 

एकादश स्कन्ध

 

59

ऋषियों का शाप-मूसल और उसका परिणाम

122

60

नारद-वसुदेव संवाद (नव योगीन्द्र)

123

61

श्रीकृष्ण-उद्धव संवाद

129

62

उद्धव-गीता

131

63

अवधूत के चौबीस गुरु

131

64

बन्धन और मुक्ति

137

65

भगवान की विभूतियाँ

139

66

उद्धव के प्रश्न और श्रीकृष्ण के उत्तर

140

67

उद्धव को श्रीकृष्ण का अन्तिम उपदेश

141

68

श्रीकृष्ण का महाप्रयाण

143

 

द्वादश स्कन्ध

 

69

युगधर्म और शुकदेव का अन्तिम उपदेश

147

70

परीक्षित का देहत्याग

149

71

जनमेंजय का सर्पयज्ञ

150

 

उपसंहार

 

72

भागवत के कुछ अन्तिम श्लोक

151

 

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Item Code: GPA959
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