Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Sign In  |  Sign up
Your Cart (0)
Best Deals
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Language and Literature > हिन्दी साहित्य > अष्टाध्यायी पदानुक्रम कोश: (Word Index of Panini's Astadhyayi with Hindi Commentary and Astadhyayi Sutra-Patha at the End)
Subscribe to our newsletter and discounts
अष्टाध्यायी पदानुक्रम कोश: (Word Index of Panini's Astadhyayi with Hindi Commentary and Astadhyayi Sutra-Patha at the End)
Pages from the book
अष्टाध्यायी पदानुक्रम कोश: (Word Index of Panini's Astadhyayi with Hindi Commentary and Astadhyayi Sutra-Patha at the End)
Look Inside the Book
Description

पुरोवाक्

मेरे प्रिय अनुजकल्प श्री अवनीन्द्र कुमार ने पाणिनि की अष्टाध्यायी के प्रत्येक पद का अकारादि क्रम से नया कोष प्रस्तुत किया है वैसे पहले कत्रे द्वारा सम्पादित पाणिनि-कोष है, एक दो और अनुक्रमणिकाएँ हैं परन्तु इस कोष की अपनी तीन विशेषताएँ हैं-

. इसमें केवल पद प्रत्युत उसके सभी व्याकृत रूप पूरे सन्दर्भ के साथ दे दिये गये हैं

. प्रत्येक सन्दर्भ के साथ पूरा अर्थ भी सूत्र का दे दिया गया है

. जहाँ समास के भीतर भी कोई पद आया हुआ है, उसका भी अपोद्धार कर दिया गया है इस दृष्टि से यह कोश अत्यन्त संग्राह्य और उपयोगी हो गया है

श्री अवनीन्द्र कुमार ने बड़े मनोयोग से पूरी अष्टाध्यायी का मन्थन किया है, अष्टाध्यायी को उसकी समग्रता में पहचानने की कोशिश की है तथा एक-एक पद को पूरी अष्टाध्यायी के परिप्रेक्ष्य में परखा है यह दुस्साध्य कार्य रहा होगा मुझे परितोष है कि मेरे अनुज ने कहीं भी अपनी समग्र दृष्टि में शिथिल समाधिदोष नहीं आने दिया है

पाणिनि को समझना पूरे विश्व को समझना है, केवल भाषा के ही विश्व को नहीं भारत की सूक्ष्मेक्षिका प्रतिभा द्वारा साक्षात्कृत पूरी वास्तविकता को समेटने वाले अर्थ-विश्व को समझना है और बहुत अच्छा होता यदि प्रत्येक प्रविष्टि में विभक्ति कारक का निदेश भी यथा-संभव दे दिया गया होता उससे अर्थ स्पष्टतर होता जैसे- अगात् [( + )] = अग् पंचमी ] इतना देने से अगात् का अर्थ अधिक स्फुट हो जाता है, उसमें किसी दुविधा की गुंजाइश नहीं रहती, उसी प्रकार कहाँ प्रविष्टि-पद स्वयं का वाचक है, कहाँ अपने से ज्ञापित समूह का कहाँ अर्थ-कोटि का कहाँ प्रत्यय का कहाँ वर्ण का या वर्ण-समूह का यह भी स्पष्ट कर दिया गया होता तो कोष बड़ा तो हो जाता पर पूर्णतर होता पर ग्रन्थविस्तार का भय रहा होगा हिन्दी अनुवाद में ही ये बातें कुछ हद तक गम्य हैं ऐसा सोच लिया गया होगा

अस्तु प्रस्तुत पाणिनि-पदानुक्रमणी श्री अवनीन्द्र कुमार के बरसों के तप का श्लाध्य फल है और पाणिनि-अध्येताओं के लिए उत्तम सन्दर्भग्रन्थ है, मैं कोशकार को हृदय से आशीष देता हूँ उनका पाणिनि में मनोयोग और बढ़े और वे उत्तरोत्तर व्याकरण के अन्तर्दर्शन में प्रवृत्त हों

द्वे-वचसी

महर्षि पाणिनि-विरचित अष्टाध्यायी भारतीय चिन्तन से प्रसूत प्रज्ञा का चरमोत्कर्ष है महर्षि ने अपनी तपःप्रसूत साधना की सुदृढ़ आधारशिला पर प्रज्ञा-प्रासाद का निर्माण किया और अन्तर्दृष्टि-प्रसूत चिन्तन को आगे आने वाले युगों के लिए भाषा की अनवद्यता-हेतु हमें एक निकषोत्पल उपहत किया पाणिनि की अष्टाध्यायी के अध्येताओं की एक सुदीर्घ परम्परा है आधुनिक भाषा-वैज्ञानिकों ने भी मनोयोगपूर्वक पाणिनि-परम्परा से जुड़कर ज्ञानधारा में अवगाहन करने का शुभारम्भ किया है सर्वशास्त्रोपकारक होने के कारण पाणिनि-अष्टाध्यायी के सम्बन्ध में सामग्री का संश्लेषण और विश्लेषण भी कई प्रकार से सुधीजनों के सामने प्रस्तुत हुआ है प्रस्तुत कोष पाणिनि-अध्ययन-परम्परा के प्रति एक अभिनव अवदान-रूप है

मेरे प्रिय प्रोफेसर अवनीन्द्र कुमार व्याकरणशास्त्र में कृतभूरि-परिश्रम हैं इन्होंने पाणिनि-कोष को अपने चिन्तन के परिपाक से एक नूतन दृष्टि दी है इस तरह के प्रयास पाणिनि के अध्ययन की परम्परा को अक्षुण्ण बनाये रखने में तथा सुधी अध्येता को अनेकधा ''दुर्व्याख्याविषमूर्च्छित'' होने से बचा लेते है वस्तुत: कोष-ग्रन्थों में प्रयुक्त पद सुधी अध्येता के सम्मुख स्फटिकवत् अपना परिचय प्रस्तुत कर देते हैं भगवत्पाद पतञ्जलि व्याख्यान को 'विशेषप्रतिपत्ति' का हेतु मानते हैं-''व्याख्यानतो विशेष-प्रतिपत्ति:'' व्याख्यान में प्रत्येक सूत्र का पदच्छेद यदि सन्दर्भ-सहित सहज प्राप्त हो जाय तो वह सुबोध हो जाता है, इसे ही व्याख्यान का प्रथम रूप माना गया है पद से पदार्थ का बोध सहज होता है। मित्रवर प्रो० अवनीन्द्र कुमार ने समस्तपदों का विग्रह प्रस्तुत करके व्याख्यान के तीसरे चरण को भी अपनी इस कोष-ग्रन्ध में पूरा किया है इनके कोष के उपरिनिर्दिष्ट तीन वैशिष्ट्य इनकी प्रज्ञा से प्रसूत ''त्रिरत्न-स्वरूप'' हैं। प्राचीन ग्रन्थकारों ने ''बालाना सुखबोधाय'' रूप में आकर-ग्रन्थों के रहस्य को समझाने में बहुत प्रयास किया है उसी दिशा में प्राचीन परम्परा के प्रति समर्पित प्रो० कुमार ने आधुनिक प्रगत अध्ययन के परिप्रेक्ष्य में इस कोष का निर्माण करके सरस्वती के प्रांगण में अपने बुद्धि-वैभव की क्रीडा का दिग्दर्शन कराया है मुझे पूर्ण विश्वास है कि इनका यह बुद्धिविलास सुधी-समुदाय में समादृत होगा शब्द-ब्रह्म के उपासक के रूप में इनकी साधना और अधिक फलवती हो परमपिता परमात्मा से यही कामना करता हूँ

भूमिका

भाषा के माध्यम से भावाभिव्यक्ति मनुष्य की अन्यतम विशेषता है सृष्टि के आदिम समय में सम्भवतः इसी विशेषता को पहचान कर पहली बार मनुष्य अपनी श्रेष्ठता पर मोहित हुआ होगा। विरद्धिद्वारा चित्रित इस विचित्र प्रपज में जिन चमत्कारों को देखकर मनुष्य मन्त्रमुग्ध हुआ है, उनमें एक चमत्कार भाषा भी है यही कारण है कि सुदूर अतीतकाल से अद्यावधि भाषा मनुष्य के अध्ययन का प्रिय विषय रहा है

भाषा के अध्ययन के तीन प्रमुख पक्ष है-वैज्ञानिक पक्ष दार्शनिक पक्ष और वैयाकरण पक्ष यद्यपि संसार की सभी भाषाओं पर समय-समय पर अध्ययन होते रहे हैं किन्तु भारतीय उपमहाद्वीप की पुण्यभूमि पर आविर्भूत तथा पल्लवित संस्कृतभाषा का जितना सर्वाङ्गीण एवं आमूलचूल अध्ययन हुआ है उतना किसी अन्य भाषा का नहीं समृद्ध शब्दकोश अगाध साहित्यभण्डार प्राह्मल पदावली तथा सुगठित शब्दार्थविन्यास आदि संस्कृत भाषा की विलक्षण विशेषताओं ने विश्व की सर्वाधिक मेधा को अभिभूत किया है एशिया महाद्वीप की अधिकांश अद्यतन भाषाएँ संस्कृत भाषा की ऋणी हैं समस्त भारतीय भाषाएँ संस्कृत भाषा के विना निष्प्राण है अन्य भाषाओं को जीवन्त तथा समृद्ध करने वाली प्राणदायिनी संस्कृत भाषा को मृतभाषा कहने वाले तथाकथित कतिपय बुद्धिजीवियों की बौद्धिक दरिद्रता पर हम परिहास भी क्या करें!

अस्तु भारत में संस्कृत भाषा के अध्ययन की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है भारतीय परम्परा में संस्कृत के वैज्ञानिक दार्शनिक तथा वैयाकरण आदि तीनों पक्षों का विशद अध्ययन हुआ है संस्कृत के वैज्ञानिक पक्ष पर अध्ययन करने वाले आचार्य हैं-यास्क, औदुम्बरायण शाकटायन आदि; दार्शनिक पक्ष पर अध्ययन करने वाले आचार्य हैं- पतञ्जलि भर्तृहरि, गौतम जैमिनि आदि; और वैयाकरण पक्ष पर अध्ययन करने वाले आचार्य है- पाणिनि इन्द्र, शाकटायन आपिशलि शाकल्प काशकृत्स्न, शौनक, व्याडि, कात्यायन चन्द्रगोमिन् बोपदेव हेमचन्द्र जिनेन्द्रबुद्धि आदि

संस्कृत के वैज्ञानिक और दार्शनिक पक्षों की अध्ययन-परम्पराओं की अपेक्षा वैयाकरण पक्ष की अध्ययन-परम्परा अत्यन्त प्राचीन तथा समृद्ध है संस्कृत-व्याकरण-परम्परा का उद्धव कब से हुआ इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है किन्तु हमें संस्कृत-व्याकरण के मूल रूप का सूक्ष्मदर्शन वेदों से हो जाता है वैदिक भाषा का सूक्ष्म अध्ययन करने के उपरान्त हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि कतिपय व्यत्ययों के होने पर भी वैदिक भाषा भी व्याकरण-नियमों से प्रतिबद्ध रही होगी, अन्यथा इतने सन्तुलित शब्दार्थ-विन्यास वाले मन्त्रों की रचना संभव नहीं होती ।वेदों में बहुत से ऐसे मन मिलते हैं जिनमें शब्दों की त्युत्पत्ति साथ-साथ स्पष्ट रूप से वर्णित है जैसे-केतपू (केत+पू) वृत्रहन् (वृत्र+हन्), उदक उद्+अन्, आप: (आप्लृ व्याप्तौ), तीर्थ (तृ) और नदी (नद्) आदि अनेक शब्दों की व्युत्पत्ति मन्त्रों में स्पष्टतया प्रदर्शित है।

वैदिककालीन समाज में जैसे जैसे वेद-मचों का महत्व बढ़ता गया वैसे वैसे मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण शुद्ध अर्थज्ञान तथा शुद्ध शब्दज्ञान पर बल दिया जाने लगा परिणामत: शुद्ध उच्चारणज्ञान के लिए शिक्षा ग्रन्थ शुद्ध अर्थज्ञान के लिए निरुक्त और शुद्ध शब्दज्ञान के लिए व्याकरण ग्रन्थ आदि वेदाङ्गों का आविर्भाव हुआ वैदिक काल में पुष्पित व्याकरण-परम्परा ब्राह्मण काल में पल्लवित हुई मैत्रायणी संहिता में : विभक्तियों का उल्लेख मिलता है। ऐतरेय ब्राह्मण में वाणी के सात भागों (विभक्तियों) का उल्लेख मिलता है गोपथ ब्राह्मण में व्याकरण के ऐसे पारिभाषिक शब्दों का उल्लेख प्राप्त होता है, जिनका पाणिनीय व्याकरण में प्रयोग होता है

ब्राह्मण काल के बाद वेद की प्रत्येक शाखा के लिए प्रातिशाख्य नामक व्याकरण-ग्रन्थों का प्रणयन हुआ प्रातिशाख्यों में व्याकरण का प्रारम्भिक रूप मिलता है इस प्रकार संस्कृत-व्याकरण-परम्परा का विधिवत् आरम्भ प्रातिशाख्यों से माना जा सकता है प्रातिशाख्यों के बाद व्याकरण-परम्परा निरन्तर समृद्ध होती गई लगभग ई० पू० पांचवीं शती में आचार्य पाणिनि के आविर्भाव से व्याकरण-परम्परा की समृद्धि चरमोत्कर्ष पर पहुँची फलत: पाणिनि और संस्कृत-व्याकरण दोनों एक दूसरे के पर्याय हो गये

पाणिनि से पूर्व अनेक वैयाकरण हो चुके थे स्वयं पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी में दस आचार्यों का नामोल्लेख किया है-आपिशलि काश्यप गार्ग्य, गालव चाक्रवर्मण भारद्वाज शाकटायन शाकल्प सेनक और स्फोटायन पाणिनि-पूर्व व्याकरणों के सम्बन्ध में भर्तृहरि के वाक्यपदीय से हमें एक तथ्य उपलब्ध होता है भर्तृहरि के अनुसार व्याकरण दो प्रकार के होते थे- अविभाग और सविभाग अविभाग व्याकरण वह है। जिसमें प्रकृति-प्रत्ययादि के विभाग की कल्पना से रहित शब्दों का पारायण मात्र हो महाभाष्यकार पतञ्जलि के अनुसार अविभाग व्याकरण को शब्दपारायण कहा जाता था बृहस्पति द्वारा प्रोक्त व्याकरण तथा व्याडि का संग्रह ग्रन्थ अविभाग-व्याकरण के प्रतिनिधि हैं संविभाग व्याकरण वह है जिसमें प्रकृति-प्रत्ययादि के विभाग की कल्पना की गई हो तैत्तिरीय संहिता तथा महाभाष्य में उल्लिखित विभाग की कल्पना को स्पष्ट करने का प्रथम श्रेय आचार्य इन्द्र को ही जाता है इन्द्र से पहले केवल अविभाग व्याकरण का ही प्रचलन था क्लब में उल्लेख है कि इन्द्र ने अपनी व्याकरण की शिक्षा भरद्वाज को दी। ऐन्द्र व्याकरण आजकल अनुपलब्ध है किन्तु इसका उल्लेख जैन शाकटायन व्याकरण लङाक्वतारसूत्र यशस्तिलकचम्पू तथा अलबरुनी के भारतयात्रावर्णन में मिलता है तिब्बतीय अनुभूति के अनुसार ऐन्द्र व्याकरण का परिमाण २५ सहस्र श्लोक था जबकि पाणिनीय व्याकरण का परिमाण एक सहस्र श्लोक है सम्भवत: इन्द्र का व्याकरण दक्षिण में लोकप्रिय रहा होगा क्योंकि तमिल भाषा के व्याकरण 'तोल्काप्पियम् ' पर इन्द्र के व्याकरण का पर्याप्त प्रभाव है ऐन्द्र व्याकरण के बाद भरद्वाज काशकृत्सन आपिशलि शाकटायन आदि आचार्यों के द्वारा प्रणीत व्याकरणों का उल्लेख उपलब्ध होता है आपिशलि और शाकटायन के व्याकरणों का सर्वाधिक उल्लेख मिलता है किन्तु पाणिनीय व्याकरण के सर्वग्रासी प्रभाव के कारण समस्त पाणिनिपूर्व व्याकरण काल-कवलित हो चुके हैं यत्र तत्र उल्लिखित पाणिनिपूर्व व्याकरणों के कुछ सूत्र ही आज उपलब्ध होते हैं पाणिनिपूर्व व्याकरणों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि पाणिनि से पूर्व ऐन्द्र व्याकरणएक प्रमुख परम्परा के रूप में विकसित हो चुका था काशकृत्स्न आपिशलि और शाकटायन इसी परम्परा के पोषक थे। ऐन्द्र परम्परा का उत्तरकालीन विकास काशकृत्म आपिशल्रि शाकटायन आदि आचार्यों के माध्यम से होता हुआ कातन्त्र व्याकरण के रूप में हुआ

प्रत्याहार-पद्धति के आविष्कार से संस्कृत-व्याकरण-परम्परा में क्रान्ति गई इस पद्धति का आविष्कर्त्ता कौन है, इस बारे में कुछ निश्चित रूप से कहा नहीं जा सकता किन्तु पाणिनि अपने व्याकरण में इस प्रत्याहार-पद्धति का जितना वैज्ञानिक उपयोग करता है, उतना किसी भी पाणिनिपूर्व व्याकरण में दृष्टिगोचर नहीं होता अनुश्रुति है कि पाणिनि ने जिन प्रत्याहार-सूत्रों का उपदेश किया है, वे सूत्र महेश्वर- द्वारा पाणिनि को प्रदत्त माने जाते हैं

पाणिनि से पूर्व वर्णों के वगींकरण के सम्बन्ध में दो परम्पराएँ प्रतिष्ठित थीं एक परम्परा ऐन्द्र व्याकरण और प्रातिशाख्यों से सम्बद्ध थी और दूसरी परम्परा माहेश्वर सूत्रों से सम्बद्ध थी ऐज और प्रातिशाख्यों के वर्णसमाम्नाय में अकारादिक्रम से स्वरव्यंजनादि का पाठ किया जाता था और व्यञ्जनों का क्रम भी कण्ठय-तालव्य-मूर्धन्यादि वर्गक्रम के अनुसार ही रखा जाता था ऐन्द्र व्याकरण और प्रातिशाख्यों का उद्देश्य वर्णध्वनियों के उच्चारण का वैज्ञानिक अध्ययन था माहेश्वर सूत्र-पद्धति का उद्देश्य वर्णेाच्चारण का वैज्ञानिक अध्ययन होकर वर्णों का वैज्ञानिक वर्गीकरण था माहेश्वरसूत्रपद्धति में जिस वर्णसमाम्नाय का उपदेश किया जाता है उसमें वर्णध्वनियों के पारस्परिक सम्बन्ध तथा विनिमय को स्पष्ट किया जाता है माहेश्वर पद्धति के इसी दृष्टिकोण के कारण प्रत्याहारों का जन्म हुआ

पाणिनि-पूर्व की पूवोंक्त दोनों परम्पराएँ व्याकरण की दो शाखाओं के रूप में विकसित हुईं ऐन्द्र परम्परा प्राच्यशाखा के रूप में तथा माहेश्वर परम्परा औदीच्य शाखा के रूप में विकसित हुईं प्रत्याहार- पद्धति का आविष्कार औदीच्य शाखा में ही हुआ प्राच्य में नहीं प्राच्यशाखा में प्रत्याहारों का आश्रय लेकर पूरे-पूरे वर्णों का परिगणन किया गया है फलत: शप्न शाखा के व्याकरण अत्यन्त विस्तृत हो गये आचार्य पाणिनि औदीच्य शाखा के प्रमुख प्रवक्ता के रूप में अवतरित हुए और प्रत्याहार-पद्धति को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया

प्रत्याहार-पद्धति संस्कृत-व्याकरण-परम्परा के लिए औदीच्य शाखा की अमूल्य देन है इसी पद्धति ने पाणिनीय व्याकरण-ग्रन्थ अष्टाध्यायी को इतना लोकप्रिय बनाया कि समस्त पाणिनिपूर्व व्याकरण अप्रासङ्गिक हो गये तथा कातन्त्र, चान्द्र सारस्वत, हैम जैनेन्द्र आदि पाणिन्युत्तर व्याकरण भी अष्टाध्यायी के प्रभाव के समक्ष निष्प्रयोजन सिद्ध हुए

संस्कृत-व्याकरण-परम्परा में आचार्य पाणिनि का नाम महोज्ज्वल नक्षत्र के तुल्य देदीप्यमान है आचार्य पाणिनि ने अपनी अष्टाध्यायी के माध्यम से विश्वसाहित्य को जो अमूल्य देन दी, उतनी अमूल्य देन शायद ही किसी ने दी होगी पाणिनिकृत अष्टाध्यायी लौकिक संस्कृत का प्रथम सर्वाङ्गीण व्याकरण है और इसमें वैदिक संस्कृत का व्याकरण भी दिया गया है अष्टाध्यायी सूत्रपद्धति में लिखा ग्रन्थहै अष्टाध्यायी के सूत्रों की सूक्ष्म संरचना में पाणिनि ने जिस मेधा का परिचय दिया है, वह आधुनिक कम्प्यूटर भी कदाचित् ही दे सकता है । अष्टाध्यायी में आठ अध्याय हैं और प्रत्येक अध्याय में चार पाद हैं सूत्रों की संख्या लगभग चार हज़ार है अष्टाध्यायी प्रत्याहार-सूत्रों को आधार मानकर प्रणीत है पाणिनि ने केवल वर्णों का प्रत्याहार ही नहीं बनाया अपितु प्रत्ययों का भी प्रत्याहार बनाया जैसे-सुप् तित् आदि अष्टाध्यायी में अधिकार-सूत्र-पद्धति को अपनाया गया है निर्दिष्ट-स्थानपर्यन्त अधिकारसूत्रो का अधिकार चलता है, जैसे- अङ्गस्य पदस्य, धातो: आदि लाघव को ही पुत्रोत्सव मानने वाले महावैयाकरण आचार्य पाणिनि ने गणपाठों का प्रयोग किया है यदि एक ही कार्य अनेक शब्दों से होना है तो उन सभी शब्दों का एक गण बनाकर, प्रथम शब्द में आदि शब्द लगाकर सूत्र में निर्देश किया जाता है, जैसे-'नडादिभ्य: फक्' अष्टाध्यायी में गणों का निदेंश करने वाले लगभग २५८ सूत्र हैं। यद्यपि पाणिनि का प्रमुख उद्देश्य लौकिक संस्कृत का व्याकरण बनाना था तथापि वैदिक संस्कृत के व्याकरण की उपेक्षा नहीं की गई पाणिनि ने वैदिक व्याकरण को भी पर्याप्त महत्त्व दिया है। लौकिक संस्कृत के लिए ' भाषायाम् और वैदिक संस्कृत के लिए 'छन्दसि' शब्द का प्रयोग किया है पाणिनि ने अनेक पारि- भाषिक संज्ञाओं का प्रयोग किया है कुछ संज्ञाएँ परम्परागत हैं जैसे- आङ्, औङ् आदि; और कुछ संज्ञाएँ सर्वथा नई हैं जैसे नदी, घि आदि पाणिनि ने अनुबन्ध-प्रणाली का भी वैज्ञानिक उपयोग किया है पाणिनि का व्याकरण 'अकालक' कहा जाता है 'वर्त्तमानसमीप्ये वर्त्तमानवद्वा' इत्यादि सूत्रों के विश्लेषण से पता चलता है कि पाणिनि ने काल की अपेक्षा भाव को प्रमुखता दी है पाणिनि ने काल को स्पष्ट रूप से अशिष्य कहा है पाणिनि की शैली की यह विशेषता है कि वह किसी विशेष युक्ति से सभी नियमों का विधान करते हैं उत्सर्गापवाद-युक्ति परबलीयस्ल-युक्ति तथा नित्यकार्य-युक्ति पाणिनीय शैली की मौलिक विशेषताएँ हैं सपादसप्ताध्यायी और त्रिपादी की परिकल्पना पाणिनि की अपूर्व प्रतिभा का परिचायक है। पाणिनि ने लोप की चार स्थितियों का आविष्कार किया है वे चार स्थितियाँ है-लोप लुक् श्लु और लुप् यद्यपि वाजसनेयि-प्रातिशाख्य में वर्ण के अदर्शन को लोप कहा गया है, किन्तु पाणिनि की मौलिकता यह है कि वह लोप को वर्ण तक सीमित रखकर अदर्शन मात्र को लोप की संज्ञा दे देता है यद्यपि परवर्त्ती आचार्यों का मत है कि पर्यायवाची शब्दों के प्रयोग में गौरवलाघव- चर्चा नहीं की जानी चाहिए तथापि पाणिनि द्वारा प्रयुक्त 'विभाषा: ' विभाषितम् : 'अन्यतरस्याम्, 'वा', 'बहुल ' आदि पद कुछ निगूढ प्रयोजनों की ओर इंगित करते हैं जो कि अनुसन्येय हैं

पाणिनि ने अष्टाध्यायी के पूरक ग्रन्थों के रूप में धातुपाठ गणपाठ, उणादिकोश और लिड़ानु- शासन की भी रचना की पाणिनि के व्याकरण में इन पाँचों उपदेश ग्रन्थों का अनिवार्य महत्त्व है, क्योंकि ये पाँच उपदेश ग्रन्थ पाणिनि के व्याकरण को पूर्ण बनाते हैं

पाणिनि के व्याकरण की चर्चा हो और कात्यायन तथा पतञ्जलि की चर्चा हो, यह सम्भव ही नहीं है क्योंकि कात्यायन और पतञ्जलि से अनुस्यूत होकर ही पाणिनि पूर्ण होता है यही कारण है कि पाणिन्युत्तर-व्याकरण-परम्परा में पाणिनीय व्याकरण को 'त्रिमुनि व्याकरण़म्' कहा गया है कात्यायन ने अष्टाध्यायी के सूत्रों पर वार्त्तिकों की रचना की है पतञ्जलि ने कात्यायन-कृत वार्तिकों का आश्रय लेते हुए अष्टाध्यायी की सर्वाङ्रीण एवं विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत की, जो 'महाभाष्य' नाम से प्रसिद्ध है

कात्यायन ने अष्टाध्यायी के सूत्रों में आवश्यक परिवर्त्तन परिवर्धन और संशोधन के लिए जो नियम बनाए हैं, उन्हें वार्त्तिक कहा जाता है कात्यायनप्रणीत वार्त्तिकों की संख्या बताना कठिन हैक्योंकि महाभाष्य में अन्य आचार्यों के द्वारा रचित वार्त्तिक भी हैं प्राय: कात्यायन को पाणिनि के आलोचक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है किन्तु यह सर्वथा असत्य है स्वयं कात्यायन पाणिनि को श्रद्धेय आचार्य स्वीकार करते हैं किसी विषय पर उक्त, अस्प और दुरुक्तों का पर्यालोचन करना वाद होता है, विवाद नहीं यह वाद ही तत्त्वबोध का साधन होता है कात्यायन का महत्व इसी बात में है कि उन्होंने पाणिनि को आचार्य मानते हुए भी उनका पर्यालोचन करने का साहस दिखाया यही कात्यायन की निष्पक्ष दृष्टि का निदर्शन है

पतञ्जलि पाणिनीय व्याकरण-परम्परा में अन्तिम प्रामाणिक आचार्य हैं पतञ्जलि-प्रणीत महाभाष्य केवल व्याकरण का ही ग्रन्थ है अपितु एक विश्वकोश है महाभाष्य में तत्कालीन सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक तथ्यों का पर्याप्त उल्लेख मिलता है पतञ्जलि ने व्याकरण जैसे शुल्क और दुरूह विषय को इतने सरस और मनोज्ञ रूप में प्रस्तुत किया है कि अध्येताओं को महाभाष्य एक उपन्यास जैसा प्रतीत होता है भाषासारल्य स्फुट विवेचन विशद एवं स्वाभाविक विषय- प्रतिपादन प्राह्मल-सुबोध-वाक्यावली आदि पतञ्जलि की उत्कृष्ट शैली की विशेषताएँ है इसी कारण महाभाष्य संस्कृत वाड्मय का एक आदर्श ग्रन्थ माना जाता है

पतञ्जलि ने महाभाष्य में कात्यायन के वार्त्तिकों को आधार मानकर अष्टाध्यायी के सूत्रों पर विशद व्याख्या लिखी है पतञ्जलि ने यत्र-तत्र पाणिनि के सूत्र तथा सूत्रांशों का और कात्यायन के वार्त्तिकों का प्रत्याख्यान किया है किन्तु पंतजलिकृत इन प्रत्याख्यानों को आलोचना के रूप में नहीं समझना चाहिए क्योंकि हर बात पर उक्त, अस्प और दुरुक्तों पर निष्पक्ष पर्यालोचन करना संस्कृत-व्याकरण-परम्परा की एक अपूर्व विशेषता है इस प्रसङ्ग में कीलहार्न का यह वक्तव्य उल्लेखनीय है-

''कात्यायन का वास्तविक कार्य पाणिनि के व्याकरण में उक्त अस्प अथवा दुरुक्त अर्थो पर विचार करना था पतञ्जलि ने न्यायपूर्वक इन वार्त्तिकों को उसी क्रम से रखा है और पाणिनीय व्याकरण के अपने विचार को, उनके और उस समय तक अन्य उपलब्ध वार्त्तिकों के प्रकाश में, पूर्णता तक पहुँचाया है ऐसा करते हुए पतञ्जलि का यल भी वार्त्तिककारों के समान उक्त, अनुक्त और दुरुक्त अर्थ का चिन्तन और उसकी पूर्णता ही रहा है; ताकि एक ऐसा साधन खोजा जा सके, जिसे पाणिनीय दृष्टि में ही पूर्ण कहा जा सके सूक्ष्मता और संक्षेप की पाणिनीय धारणा को वे इस सीमा तक ले गए है कि उन्हें कात्यायन के या अन्यों के वार्त्तिकों में अथवा पाणिनीय सूत्रों में भी, यदि कहीं व्यर्थ का विस्तार या पुनरावृत्ति मिली है, तो उन्होंने उसका भी विरोध ही किया है परन्तु यह विरोध इतना सुन्दर और इस ढंग का है कि इसे विरोध कहकर सुधार और समन्वय कहना अधिक उचित लगता है ''

पाणिनि कात्यायन और पतञ्जलि द्वारा परिपोषित संस्कृत व्याकरण का अमरग्रन्ध अष्टाध्यायी भाषाशास्त्रियों के अनुसन्धान का केन्द्र-बिन्दु रहा है लगभग २५०० वर्षों से अष्टाध्यायी पर असंख्य अध्ययन और अनुसन्धान हो चुके हैं और आधुनिक काल में भी अष्टाध्यायी पर अनेक अध्ययन और अनुसन्धान हो रहे हैं अध्ययन और अनुसन्धान की पद्धतियाँ परिवर्त्तनशील रही हैं आधुनिक अनुसन्धान-पद्धति में कोशों की भूमिका को अत्यन्त महत्वपूर्ण माना जा रहा है अत: अनुसन्धान केक्षेत्र में अष्टाध्यायी के महत्व को देखते हुए अष्टाध्यायी पर एक विस्तृत एवं सर्वाङग्पूर्ण कोश के निर्माण की आवश्यकता का अनुभव किया जाना स्वाभाविक है

अनुमानत: २५०० वर्षों से संस्कृत-कोश-साहित्य के सृजन की परम्परा भारत में अव्याहत गति से चली रही है इस अवधि में १५० से भी अधिक विभिन्न प्रकार के जैसे निघण्टु पर्यायवाची कोश, समानार्थक, नानार्थक कोश पारिभाषिकशब्द कोश एकाक्षर कोश अक्षर कोश एवं त्र्यक्षरादि कोशों की रचना हुई यह दुःख का विषय है कि इसका अधिकांश भाग अभी तक अप्रकाशित है, वह या तो मातृकाओं के रूप में विभिन्न ग्रन्थागारों में प्राप्त होता है, अथवा सर्वथा लुप्त हो गया है आधे से कम ही अंश का कोश-साहित्य प्रकाशित मिलता है वास्तव में ऐसी स्थिति में कोश-साहित्य को ऐतिहासिक दृष्टि से लिपिबद्ध करना कुछ दुष्कर ही है

संस्कृत वाङ्मय में जिस विशाल कोश-साहित्य का सृजन हुआ है, वैसा विशाल कोश-साहित्य विश्व की किसी भाषा में नहीं है विविधता और समृद्धि की दृष्टि से भी संस्कृत भाषा के कोश अनुपम और अतुलनीय हैं वैदिक काल में सर्वप्रथम संस्कृत कोशों की रचना का श्रीगणेश हुआ कोशनिर्माण के प्रथम चरण में वैदिक संहिताओं के मन्त्रों में प्रयुक्त चुने हुए शब्दों का संकलन मात्र किया गया उनको विभिन्न श्रेणियों में रखकर उनके व्युत्पत्तिलभ्य अर्थों का निर्देश किया गया है कोशों की रचना का द्वितीय चरण लौकिक संस्कृत-साहित्य पर आधारित अमरकोश की रचना से आरम्भ होता है अमरकोश की रचना से पूर्व व्याडि, वररुचि आदि कोशकार हुए दुर्भाग्यवश उनकी रचनाएँ उपलब्ध हाँने के कारण उनके बारे में अधिक कहना सम्भव नहीं है अमरकोश के प्रणेता अमरसिंह ने स्वयं अपने पूर्ववत्तीं कोशकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है, इसी से उन रचनाओं की प्रामाणिकता का पता चलता है अमरसिंह का समय विद्वानों ने छठी शताब्दी ई० माना है

अमरकोश के कुछ टीकाकार क्षीरस्वामी, सर्वानन्द, रघुनाथ चक्रवर्ती आदि मात्र कोशकार ही नहीं अपितु वैयाकरण भी थे; उन्होंने शब्दों की व्युत्पत्ति देकर, उनके अर्थों का निर्देश कर कोशसाहित्य के विकास का तृतीय चरण आरम्भ किया व्याकरण-सम्मत त्युत्पत्ति देने से शब्दों के अर्थ की प्रामाणिकता स्वत: सिद्ध हो जाती है पूर्ववर्त्ती कोशकारों द्वारा दिए गए अर्थ प्रयोगों के ही आधार पर कोश-साहित्य के विकास के चौथे चरण में पारिभाषिक शब्दकोशों की रचना हुई यह धारा अमरसिंहविरचित लौकिक शब्दकोश के समानान्तर कोशरचना की धारा थी। आयुर्वेदशास्त्र के अन्तर्गत वनस्पतिशास्त्र पर रचित कुछ कोश अमरकोश से भी पहले के हैं ऐसा अनुसन्धानकर्त्ताओं का मत है धन्वन्तरिनिघण्टु पर्यायरत्नमाला, शब्दचन्द्रिका आदि मूल रूप में पारिभाषिक शब्दकोश ही हैं, जिनमें आयुर्वेद से सम्बद्ध, शब्दों के अतिरिक्त अन्य शब्दों का संग्रह ही नही है ये सभी कोश छन्दोबद्ध थे, अत: उन्हें कण्ठस्थ करना सरल था

कोश-साहित्य के पञच्म चरण में नानार्थकोशों की रचना हुई वैज्ञानिक सिद्धान्तों के आधार पर कोशों के निर्माण की दिशा में नानार्थ कोश प्रथम प्रयास है इन कोशों में प्रयोगों के आधार पर एक ही शब्द के अनेक अर्थ दिये गये हैं इस प्रकार के कोशों का आरम्भिक रूप अमरकोश के तृतीय काण्ड में भी देखने को मिलता है; लेकिन इसका पूर्ण विकसित रूप मेदिनीकोश तथा हलायुध में दिखाई देता है नानार्थकोशों में शब्दों की संरचना वर्णानुक्रम से पहली बार की गई, जो आधुनिकता और वैज्ञानिकता की दिशा में प्रथम प्रयास था

एकाक्षरकोशों की रचना से