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अमर शहीद सरदार भगत सिंह: Amar Shahid Sardar Bhagat Singh

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पुस्तक के विषय में अमर शहीद सरदार भगत सिंह मात्र एक जीवनी परक पुस्तक नहीं, स्वाधीनता संग्राम और मातृभूमि प्रेम का जीवंत आख्यान है । 23 मार्च 1931 का दिन भारतीय इतिहास मे ब्रिटिश राज की बर्...

पुस्तक के विषय में

अमर शहीद सरदार भगत सिंह मात्र एक जीवनी परक पुस्तक नहीं, स्वाधीनता संग्राम और मातृभूमि प्रेम का जीवंत आख्यान है । 23 मार्च 1931 का दिन भारतीय इतिहास मे ब्रिटिश राज की बर्बरता का ज्वलंत उदाहरण है । इस दिन सरदार भगत सिह और उनके दो अन्य साथियों सुखदेव और राजगुरु को फांसी पर चढ़ा दिया गया था । समय बीतने के साथ-साथ आज भी यह मृत्यु अतीत नहीं हुई है । आज भी यह दिन भारतीयों के लिए शहादत दिवस है । प्रस्तुत पुस्तक को सरदार भगत सिंह की जीवनी न कहकर उनकी संघर्ष कथा कहना ज्यादा बेहतर होगा । सन् 1931 में जब यह पुस्तक पहली बार अंग्रेजी में लिखी गई तो ब्रिटिश सरकार ने इसे जब्त कर लिया । उसी को आधार बनाकर इसे फिर से विस्तारपूर्वक लिखा गया और हिन्दी में पहली बार 1947 में कर्मयोगी प्रेस से इसका प्रकाशन हुआ ।

ब्रिटिश सरकार द्वारा पुस्तक जब्त करने की कलुषित मनोवृत्ति के विवरण से लेकर भगत सिंह के जीवन की तमाम महत्वपूर्ण घटनाओं, उनकी गतिविधियों, उनके संघर्षों की दास्तान तथा उनके सहकर्मियों के बलिदानों को जितने तथ्यपूर्ण ढंग से जितेन्द्रनाथ सान्याल ने इस पुस्तक में रखा है, अन्यत्र कहीं मिलना दुर्लभ है । लेखक सरदार भगत सिंह के आत्मीय मित्र थे । अपने देश और देश के इतिहास से भली भांति परिचित होने के लिए आम हिन्दी पाठकों के लिए यह एक प्रेरणादायक संग्रहणीय पुस्तक है ।

भूमिका

सरदार भगत सिंह के पार्थिव शरीर का नाश हुए 16 वर्ष से अधिक हो गए । आज. भी उनका चित्र नगरों और ग्रामों के घरों और दूकानों में, कहीं अकेला और कहीं देश के दो-चार ऐतिहासिक पुरुषों या देवताओं के चित्रों के साथ, लगा दिखाई देता हे । उनका नाम देश के कोने-कोने में फैला है और श्रद्धा से स्मरण किया जाता है । उनके बलिदान ने उनके नाम को देश की प्रिय-वस्तु बना दिया है ।

आज जब भांरतवर्ष में ब्रिटिश-शासन की समाप्ति के अंतिम दृश्य हम देख रहे हैं, हमें भगत सिंह की बरबस याद आती है । हम भूल नहीं सकते कि उस शासन की जडों को अपने क्रांतिकारी कामों और आत्म-समर्पण से भगत सिंह ने गहरा धक्का दिया था और जनता के हृदय में उसके उखाड़ फेंकने की तीव्र भावना भर दी थी ।

भगत सिंह युवावस्था में चले गए, उनकी भावनाओं की कुछ कल्पना उनके कामों और अदालत में दिए गए उनके बयानों से हम कर सकते हैं । मुझको याद है कि केंद्रीय असेंबली में बम. फेंकने के अभियोग के उत्तर में जो बयान उन्होंने अदालत में दिया था, उसका कितना गहरा प्रभाव मेरे हृदय पर पड़ा था ।

इस पुस्तक में भगत सिंह के जीवन की कड़ियों को लड़ी में बांधने का यत्न है । कई वर्ष हुए, श्री जितेन्द्रनाथ सान्याल ने अंग्रेजी में एक पुस्तक 'सरदार भगत सिंह' के शीर्षक से लिखी थी । उस पुस्तक का प्रकाशन गवर्नमेंट की आज्ञा से रोका गया था । कुछ महीने हुए हमारे प्रांत की गवर्नमेंट ने उस रोक को हटाया है । इस पुस्तक के प्रकाशक श्री रामरख सिंह सहगल की चिरंजीविनी, कुमारी स्नेहलता सहगल ने उसी पुस्तक के आधार पर यह पुस्तक लिखी है, 'किंतु इस पुस्तक में परिशिष्ट के रूप में सरदार भगत सिंह के संबंध में अधिक सामग्री दी गई है । हमारे देश के एक विशिष्ट पुरुष और उसके साथियों का विवरण होने के कारण यह पुस्तक देश के राजनीतिक इतिहास के अध्ययन में हिंदी-प्रेमियों के लिए सहायक होगी । मैं इसका स्वागत करता हूं ।

आज की स्थिति में यह पुस्तक सामयिक है। भगत सिंह और उनके साथियों का विश्वास देशवैरियों की हिंसा के पक्ष में था । इस समय यह प्रश्न एक दूसरी पृष्ठभूमि में हमारे सामने है। हिंसा अथवा अहिंसा-हमारे देश का पुराना दार्शनिक- प्रश्न है। हममें से हर एक के जीवन का रूप इस बात पर निर्भर करता है, कि वह किस रीति से हिंसा और अहिंसा का समन्वय करता है। जन-रक्षा और शासन से जिनका संबंध है, उनके सामने इन दो विरोधी-सिद्धांतों के समन्वय का प्रश्न हर समय व्यावहारिक रूप में रहता है । वास्तव में मनुष्य की प्रेरणाओं में और बाह्य प्रकृति की क्रीड़ाओं में रक्षा और संहार, दोनों शक्तियां साथ काम करती दिखाई देती हें । प्रकृति हमें उत्पन्न करती है और हमारी रक्षा करती है, साथ ही अपनी एक हिलोर में हमारा नाश करती है । जिसके ऊपर समाज संचालन का दायित्व रहता है उन्हें भी रक्षा और संहार, दोनों ही काम करने पड़ते हैं । इसी अर्थ का द्योतक भगवत-गीता का वह वाक्य है 'परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुकृताम्' । दुष्टों का नाश, संसार की प्रगति का आवश्यक अंग है । यदि हमारी गहरी दृष्टि हो, तो उस हिंसा में भी हमें अहिंसा दिखाई देगी । मैं किसी को मारता हूं तो इसका यह आवश्यक अर्थ नहीं है कि मैं उसका बुरा चाहता हूं उसकी भलाई मेरे उस काम में निहित हो सकती है । हमारे हृदयों में भावनाओं का वैसे ही करुणापूर्ण संघर्ष होता है, जैसा अर्जुन के हृदय में हुआ था । सरदार, भगत सिंह ने अपने लिए किस रूप में इस समस्या का हल ढ़ूंढ़ा, यह हम इस पुस्तक से जान सकेंगे ।

 

विषय-सूची

1

प्रकाशक के नाते

सात

2

भूमिका

तेरह

अमर शहीद सरदार भगत सिंह

3

पुस्तक की जप्ती का मनोरंजक विवरण

3

4

मुकदमे का फैसला

13

अमर शहीद सरदार भगत सिंह

5

वंश-परिचय और बचपन

25

6

हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन

29

7

अध्ययन

31

8

क्रांतिकारी दल में प्रारंभिक कार्य

33

9

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन

36

10

सांडर्स हत्याकांड

39

11

असेंबली में बमकांड

45

12

बमकांड के संबंध में

47

13

भूख हड़ताल

51

14

लाहौर कांसपिरेसी केस

55

15

फैसला और उसके बाद

60

16

फांसियां

64

17

कुछ संस्मरण

67

 

परिशिष्ट

72

स्वर्गीय सरदार भगत सिंह के कुछ

प्रमुख सहयोगियों का संक्षिप्त परिचय

18

स्वर्गीय सुखदेव

81

19

स्वर्गीय शिवराम राजगुरु

84

20

स्वर्गीय चन्द्रशेखर 'आजाद'

87

21

स्वर्गीय हरिकिशन

90

लाहौर षड्यंत्र की मनोरंजक कार्यवाही

22

मुकदमों का संक्षिप्त इतिहास

97

23

पहले लाहौर षड्यंत्र केस का फैसला

100

24

स्पेशल ट्रिब्यूनल की दैनिक कार्यवाही

106

कुछ फुटकर सामग्री

25

इतिहास के विद्यार्थियों के लिए

255

 

Sample Pages
















Item Code: NZD100 Author: जितेन्द्रनाथ सान्याल (Jitendranatha Sanyal) Cover: Paperback Edition: 2012 Publisher: National Book Trust ISBN: 9788123729329 Language: Hindi Size: 8.5 inch X 5.5 inch Pages: 319(6 B/W Illustrations) Other Details: Weight of the Book: 370 gms
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