Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Your Cart (0)
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Hindi > देवादिदेव महादेव शिव: Lord Shiva (In The Context of Puranas)
Displaying 11063 of 11131         Previous  |  NextSubscribe to our newsletter and discounts
देवादिदेव महादेव शिव: Lord Shiva (In The Context of Puranas)
देवादिदेव महादेव शिव: Lord Shiva (In The Context of Puranas)
Description

पुस्तक परिचय

 

वैदिक देवताओं में देवादिदेव महादेव शिव महत्त्वपूर्ण पद के अधिकारी है । वैदिक रुद्र की तुलना मे पौराणिक शिव अधिक महिमामण्डित प्रतीत होते हैं क्योंकि जहा एक ओर उनके आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक रूप को पूर्ण विस्तार तथा स्पष्टता से परिचित करवाया गया है, वहीं उनका सती के साथ सम्बन्ध, दक्षयज्ञ विध्वंस पार्वतीवल्लभ, कैलासवासी, नागभूषण, चन्द्रमौलि गजाधर, नीलकण्ठ और कार्तिकेय तथा गणेश के जनक आदि पारिवारिक रूप भी उल्लेखनीय है । तात्त्विक दृष्टि से ये दोनों रूप एक हैं, अभिन्न है तथापि दोनों रूपों का परिचय ही महादेव शिव को जानने के लिए अपेक्षित है।

देवादिदेव महादेव शिव में मेरा अपना कुछ नहीं है । देवादिदेव के सम्बन्ध मे रामायण महाभारत तथा पुराणो से उपलब्ध सामग्री का जैसा अर्थ मुझे बुद्धिगम्य तथा हृदयमें हुआ, उसी का पूर्ण निष्ठा तथा परिश्रम से प्रस्तुतीकरण है प्रस्तुत पुस्तक ।

वस्तुत शिव का इतिवृत्त बहुत व्यापक है, विस्तृत है, विविध है गूढ़ भी है और रहस्यात्मक भी । विविध आख्यानो, के साथ उनके चार सहस्रनाम, शतनाम, अष्टोत्तरशतनाम नामावली, स्तुतिया, स्तोत्र, कवच आदि भी पुराणों मे यत्र तत्र उपलब्ध है । उन सभी को संकलित किया गया है । विविध कल्पो में अज शिव विभिन्न अभिधानो से अवतरित होते हैं, उनका भी समायोजन पुस्तक मे हुआ है । शिव ही एक मात्र देव हैं जिनका लिंङ भी उतना ही पूज्य है, जितने स्वय शिव है । द्वादश ज्योतिर्लिङो के विशद परिचय के साथ उज्जयिनी के चौरासी लिखो, काशी के अनेक लिङों तथा अन्यत्र भी उपलब्ध प्रमुख लिङो की नामावली का सग्रह भी पुस्तक मे उपलब्ध है ।

शिव को परिचित करवाया जाए तो उनका शिवलोक, उनके गण आदि पर प्रकाश डालना भी अपेक्षित होता है । प्रारम्भ में उनका भी परिचय प्रस्तुत किया गया है ।

 

निवेदन

 

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।

वंशानुचरित चैव पुराण पञ्चलक्षणम् ।।

पुराणों के प्रतिपाद्य के सच्च ध मे पुराणों में जहा सृष्टि एव प्रलय के उपरान्त पुन. सृष्टि आदि विषयो के अतिरिक्त मनुओं, ऋषियों, राजाओं प्रभृति की वंशावली के साथ देवों के विवरण को भी एक सामान्य विषय वस्तु स्वीकार किया गया है वहीं दूसरी ओर शैव पुराण, वैष्णव पुराण, ब्राह्म पुराण आदि कहकर पुराणों का प्रमुख वर्ण्य विषय देवों को ही माना गया है । अत. यह स्पष्ट होता है कि देव, देवियों का वर्णन पुराणों का एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय है और तभी पुराणों में पंचदेव उपासना को महत्त्व प्राप्त हुआ है । इसी कारण आज से पांच वर्ष पूर्व आपके हाथो में मैंने पार्वती (पुराणों के सन्दर्भ में) सौंपी थी और आज प्रस्तुत है देवादिदेव महादेव शिव (पुराणों के सन्दर्भ में) । मेरी महादेव शिव विषयक प्रस्तुत योजना के विषय मे जानकर परिमल पब्लिकेशन्स के संस्थापक, आज गोलोकवासी डा० के० एल० जोशी जी ने अपनी रोग शय्या से ही शिव. विष्णु, कृष्ण आदि विषयक एक पूरी शृंखला प्रस्तुत करने के लिए मुझे टेलीफोन के माध्यम से ही प्रेरित तथा उत्साहित किया था । अन्य विविध कार्यो में स्वय को मैने उलझाया हुआ है अत आज शृंखला की प्रथम कड़ी ही आपके हाथों सौंप रही हूँ ।

देवादिदेव महादेव शिव में मेरा अपना कुछ नहीं है । देवादिदेव के सम्बन्ध में रामायण, महाभारत तथा पुराणों से उपलब्ध सामग्री का जैसा अर्थ मुझे बुद्धिगम्य तथा हृदयडुग्म हुआ, उसी का पूर्ण निष्ठा तथा परिश्रम से प्रस्तुतीकरण है प्रस्तुत पुस्तक । पुराणो में शिव के दो रूप परिलक्षित होते हैं प्रथम उनका आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक रूप तथा दूसरा उनका पारिवारिक तथा देववृन्द के अधीश्वर का रूप । आध्यात्मिक वर्णन के अनुसार अज, अनादि. अनन्त शिव का उद्भव अज्ञेय है अत. वे स्वयम्भू हैं । सर्वत्र व्याप्त शिव दिग्वास है । सत्व, रज तथा तम रूपी शूल को धारण करने वाले वे शूली हैं तो काम क्रोध मद लोभ आदि रूपी सर्पों के आभूषणधारी वे सर्पभूषण हैं । वे घोर हैं तभी रुद्र कहलाते है, अघोर हैं अत वे शिव हैं । वे प्राण, अपान है तो वे ही काल हैं, मृत्यु हैं । सोमनिस्यन्दी चन्द्र से शोभित वेचन्द्रमौली हैं तो हलाहल विष को कण्ठ में धारण कर विश्व की रक्षा करने वाले वे नीलकण्ठ हैं । समस्त देवों में महनीय हैं. महान् विषय के अधिकारी हैं, महत् विश्व के पालक हैं अत. महेश्वर हैं, महादेव हैं । वे ही प्रणवरूप ओम हैं, निर्गुण ब्रह्म हैं ।

उनका दूसरा रूप है, लीलापुरुष शिव का जो नाना रूप धारण कर विविध संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं । सती के दग्ध होने पर जहा दक्ष यज्ञ का विध्वंस करते हैं वहीं प्रेमार्द्र चित्त से सती की अर्धदग्ध देह को कन्धे पर उठाकर वियोगी शिव यत्र तत्र सर्वत्र पर्यटन करते हैं. परिणामत सती पीठों की स्थापना होती है । लीलाधर वे ही कालान्तर में नाना छल करके मेना तथा हिमालय को छकाते हैं तो पार्वती वल्लभ बनकर विविध लीलाओं को रूपायित करते हैं, कार्त्तिकेय के जनक बनते हैं तो गणेश के साथ भयावह युद्ध करने के उपरान्त गजानन बनाकर गणेश को देवताओं का अग्रपूज्य वे ही बनाते हैं ।

देवादिदेव वे विष्णु के आराध्य बनकर उनके मुख से सहस्रनाम कहलवाते हैं. उनके एक नेत्र कमल की भेंट ग्रहण करते हैं तो स्वयं विष्णु की आराधना करते हैं, उनका ध्यान करते हैं । महादेव शिव ब्रह्मा के गर्वित सिर का छेदन करके ब्रह्महत्या से प्रताड़ित होते हैं तो स्वय ब्रह्मापुत्र बनकर रुद्र रूप में प्रकट होते है। रावण को दस सिरो का वर देते हैं तो द्रौपदी को पंचपतियों का वर भी वे ही देते हैं ।

वस्तुत शिव का इतिवृत्त बहुत व्यापक है, विस्तृत है. विविध है, गूढ़ भी है और रहस्यात्मक भी। विविध आख्यानों, उपाख्यानों के साथ उनके चार सहस्रनाम शतनाम अष्ठेत्तरशतनाम, नामावली, स्तुतिया, स्तोत्र, कवच आदि भी पुराणों मे यत्र तत्र उपलब्ध हैं । उन सभी को संकलित किया गया है । विविध कल्पों में अज शिव विभिन्न अभिधानो से अवतरित होते हैं, उनका भी समायोजन पुस्तक में हुआ है । शिव ही एक मात्र देवं हैं जिनका लिग्ङ भी उतना ही पूज्य है, जितने स्वयं शिव हैं। द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों के विशद परिचय के साथ उज्जयिनी के चौरासी लिग्ङों, काशी के अनेक लिके तथा अन्यत्र भी उपलब्ध प्रमुख लिङ्को की नामावली का संग्रह भी पुस्तक में उपलब्ध है ।

शिव को परिचित करवाया जाए तो उनका शिवलोक, उनके गण आदि पर प्रकाश डालना भी अपेक्षित होता है । प्रारम्भ में उनका भी परिचय प्रस्तुत किया गया है । अपनी समस्त अक्षमताओं तथा सीमाओं से अवगत मेरी सम्पूर्ण निष्ठा तथा परिश्रम का परिणाम है देवादिदेव महादेव शिव (पुराणों के सन्दर्भ में) । यदि मेरा यह विनम्र प्रयास स्वत आलोकित महादेव, महेश्वर शिव के महनीय व्यक्तित्व को स्वल्प मात्रा में भी परिचित करवा सके तो मैं समझूगी मेरी निष्ठा फलीभूत हुई, मेरा परिश्रम सार्थक हुआ ।

 

अनुक्रमणिका

संकेत सूची

xi

निवेदन

XV

देवादिदेव महादेव शिव

1

परमात्मा

1

बाह्य रूप

10

भूषण

14

पुष्प

15

वाहन

15

लोक

16

गण

19

शिवरात्रि

21

शिव पारिवारिक जीवन

22

सती एव दक्षयज्ञ विध्वंस

23

विधुर शिव

35

पार्वती

41

कामदहन

43

पार्वती परीक्षा तथा विवाह

46

काशीवास

52

पुत्र कार्त्तिकेय

54

पुत्र गणेश

57

दाम्पत्य जीवन

59

आध्यात्मिक सम्पर्क

64

अर्धनारीश्वर

65

शिव और नदियां

67

देववृन्द के अधीश्वर

69

ब्रह्मा विष्णु एवं सुदर्शन चक्र

69

रामचन्द्र

95

हनुमान्

98

वासुदेव कृष्ण

100

अन्य देववृन्द

104

शिव भक्त

110

भक्तवत्सलता और कालकूट

110

राजा वीरमणि

114

शुक्राचार्य

114

परशुराम

119

अन्धकासुर

121

गुणनिधि (कुबेर)

125

बाणासुर

125

वृकासुर

127

त्रिपुराधिपति तारकाक्ष

128

जलन्धर

130

अन्याय भक्त एक विहङाग्वलोकन

131

शिव अवतार

142

नील

142

कद्र

143

अन्य अवतार

145

शिव नाम

153 163

सहस्रनाम,

153

शतनाम, अष्टोत्तरशतनाम,

154

नामावली कवच

155

अष्टोत्तरशत मूर्तिया, श्रीकण्ठमातृकान्यास

157

शिव तथा तीर्थनाम

159

शिव लिङ्ग

164

लिङ्ग विशद परिचय

164

द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग

169

शतरुद्रीय

175

संहारी शिव

180

 

देवादिदेव महादेव शिव: Lord Shiva (In The Context of Puranas)

Item Code:
HAA161
Cover:
Hardcover
Edition:
2011
ISBN:
9788171103904
Language:
Hindi
Size:
9.0 inch X 6.0 inch
Pages:
198
Other Details:
Weight of the Book: 370 gms
Price:
$20.00   Shipping Free
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
देवादिदेव महादेव शिव: Lord Shiva (In The Context of Puranas)

Verify the characters on the left

From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 2785 times since 12th Feb, 2013

पुस्तक परिचय

 

वैदिक देवताओं में देवादिदेव महादेव शिव महत्त्वपूर्ण पद के अधिकारी है । वैदिक रुद्र की तुलना मे पौराणिक शिव अधिक महिमामण्डित प्रतीत होते हैं क्योंकि जहा एक ओर उनके आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक रूप को पूर्ण विस्तार तथा स्पष्टता से परिचित करवाया गया है, वहीं उनका सती के साथ सम्बन्ध, दक्षयज्ञ विध्वंस पार्वतीवल्लभ, कैलासवासी, नागभूषण, चन्द्रमौलि गजाधर, नीलकण्ठ और कार्तिकेय तथा गणेश के जनक आदि पारिवारिक रूप भी उल्लेखनीय है । तात्त्विक दृष्टि से ये दोनों रूप एक हैं, अभिन्न है तथापि दोनों रूपों का परिचय ही महादेव शिव को जानने के लिए अपेक्षित है।

देवादिदेव महादेव शिव में मेरा अपना कुछ नहीं है । देवादिदेव के सम्बन्ध मे रामायण महाभारत तथा पुराणो से उपलब्ध सामग्री का जैसा अर्थ मुझे बुद्धिगम्य तथा हृदयमें हुआ, उसी का पूर्ण निष्ठा तथा परिश्रम से प्रस्तुतीकरण है प्रस्तुत पुस्तक ।

वस्तुत शिव का इतिवृत्त बहुत व्यापक है, विस्तृत है, विविध है गूढ़ भी है और रहस्यात्मक भी । विविध आख्यानो, के साथ उनके चार सहस्रनाम, शतनाम, अष्टोत्तरशतनाम नामावली, स्तुतिया, स्तोत्र, कवच आदि भी पुराणों मे यत्र तत्र उपलब्ध है । उन सभी को संकलित किया गया है । विविध कल्पो में अज शिव विभिन्न अभिधानो से अवतरित होते हैं, उनका भी समायोजन पुस्तक मे हुआ है । शिव ही एक मात्र देव हैं जिनका लिंङ भी उतना ही पूज्य है, जितने स्वय शिव है । द्वादश ज्योतिर्लिङो के विशद परिचय के साथ उज्जयिनी के चौरासी लिखो, काशी के अनेक लिङों तथा अन्यत्र भी उपलब्ध प्रमुख लिङो की नामावली का सग्रह भी पुस्तक मे उपलब्ध है ।

शिव को परिचित करवाया जाए तो उनका शिवलोक, उनके गण आदि पर प्रकाश डालना भी अपेक्षित होता है । प्रारम्भ में उनका भी परिचय प्रस्तुत किया गया है ।

 

निवेदन

 

सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।

वंशानुचरित चैव पुराण पञ्चलक्षणम् ।।

पुराणों के प्रतिपाद्य के सच्च ध मे पुराणों में जहा सृष्टि एव प्रलय के उपरान्त पुन. सृष्टि आदि विषयो के अतिरिक्त मनुओं, ऋषियों, राजाओं प्रभृति की वंशावली के साथ देवों के विवरण को भी एक सामान्य विषय वस्तु स्वीकार किया गया है वहीं दूसरी ओर शैव पुराण, वैष्णव पुराण, ब्राह्म पुराण आदि कहकर पुराणों का प्रमुख वर्ण्य विषय देवों को ही माना गया है । अत. यह स्पष्ट होता है कि देव, देवियों का वर्णन पुराणों का एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय है और तभी पुराणों में पंचदेव उपासना को महत्त्व प्राप्त हुआ है । इसी कारण आज से पांच वर्ष पूर्व आपके हाथो में मैंने पार्वती (पुराणों के सन्दर्भ में) सौंपी थी और आज प्रस्तुत है देवादिदेव महादेव शिव (पुराणों के सन्दर्भ में) । मेरी महादेव शिव विषयक प्रस्तुत योजना के विषय मे जानकर परिमल पब्लिकेशन्स के संस्थापक, आज गोलोकवासी डा० के० एल० जोशी जी ने अपनी रोग शय्या से ही शिव. विष्णु, कृष्ण आदि विषयक एक पूरी शृंखला प्रस्तुत करने के लिए मुझे टेलीफोन के माध्यम से ही प्रेरित तथा उत्साहित किया था । अन्य विविध कार्यो में स्वय को मैने उलझाया हुआ है अत आज शृंखला की प्रथम कड़ी ही आपके हाथों सौंप रही हूँ ।

देवादिदेव महादेव शिव में मेरा अपना कुछ नहीं है । देवादिदेव के सम्बन्ध में रामायण, महाभारत तथा पुराणों से उपलब्ध सामग्री का जैसा अर्थ मुझे बुद्धिगम्य तथा हृदयडुग्म हुआ, उसी का पूर्ण निष्ठा तथा परिश्रम से प्रस्तुतीकरण है प्रस्तुत पुस्तक । पुराणो में शिव के दो रूप परिलक्षित होते हैं प्रथम उनका आध्यात्मिक अथवा दार्शनिक रूप तथा दूसरा उनका पारिवारिक तथा देववृन्द के अधीश्वर का रूप । आध्यात्मिक वर्णन के अनुसार अज, अनादि. अनन्त शिव का उद्भव अज्ञेय है अत. वे स्वयम्भू हैं । सर्वत्र व्याप्त शिव दिग्वास है । सत्व, रज तथा तम रूपी शूल को धारण करने वाले वे शूली हैं तो काम क्रोध मद लोभ आदि रूपी सर्पों के आभूषणधारी वे सर्पभूषण हैं । वे घोर हैं तभी रुद्र कहलाते है, अघोर हैं अत वे शिव हैं । वे प्राण, अपान है तो वे ही काल हैं, मृत्यु हैं । सोमनिस्यन्दी चन्द्र से शोभित वेचन्द्रमौली हैं तो हलाहल विष को कण्ठ में धारण कर विश्व की रक्षा करने वाले वे नीलकण्ठ हैं । समस्त देवों में महनीय हैं. महान् विषय के अधिकारी हैं, महत् विश्व के पालक हैं अत. महेश्वर हैं, महादेव हैं । वे ही प्रणवरूप ओम हैं, निर्गुण ब्रह्म हैं ।

उनका दूसरा रूप है, लीलापुरुष शिव का जो नाना रूप धारण कर विविध संवेदनाओं को व्यक्त करते हैं । सती के दग्ध होने पर जहा दक्ष यज्ञ का विध्वंस करते हैं वहीं प्रेमार्द्र चित्त से सती की अर्धदग्ध देह को कन्धे पर उठाकर वियोगी शिव यत्र तत्र सर्वत्र पर्यटन करते हैं. परिणामत सती पीठों की स्थापना होती है । लीलाधर वे ही कालान्तर में नाना छल करके मेना तथा हिमालय को छकाते हैं तो पार्वती वल्लभ बनकर विविध लीलाओं को रूपायित करते हैं, कार्त्तिकेय के जनक बनते हैं तो गणेश के साथ भयावह युद्ध करने के उपरान्त गजानन बनाकर गणेश को देवताओं का अग्रपूज्य वे ही बनाते हैं ।

देवादिदेव वे विष्णु के आराध्य बनकर उनके मुख से सहस्रनाम कहलवाते हैं. उनके एक नेत्र कमल की भेंट ग्रहण करते हैं तो स्वयं विष्णु की आराधना करते हैं, उनका ध्यान करते हैं । महादेव शिव ब्रह्मा के गर्वित सिर का छेदन करके ब्रह्महत्या से प्रताड़ित होते हैं तो स्वय ब्रह्मापुत्र बनकर रुद्र रूप में प्रकट होते है। रावण को दस सिरो का वर देते हैं तो द्रौपदी को पंचपतियों का वर भी वे ही देते हैं ।

वस्तुत शिव का इतिवृत्त बहुत व्यापक है, विस्तृत है. विविध है, गूढ़ भी है और रहस्यात्मक भी। विविध आख्यानों, उपाख्यानों के साथ उनके चार सहस्रनाम शतनाम अष्ठेत्तरशतनाम, नामावली, स्तुतिया, स्तोत्र, कवच आदि भी पुराणों मे यत्र तत्र उपलब्ध हैं । उन सभी को संकलित किया गया है । विविध कल्पों में अज शिव विभिन्न अभिधानो से अवतरित होते हैं, उनका भी समायोजन पुस्तक में हुआ है । शिव ही एक मात्र देवं हैं जिनका लिग्ङ भी उतना ही पूज्य है, जितने स्वयं शिव हैं। द्वादश ज्योतिर्लिङ्गों के विशद परिचय के साथ उज्जयिनी के चौरासी लिग्ङों, काशी के अनेक लिके तथा अन्यत्र भी उपलब्ध प्रमुख लिङ्को की नामावली का संग्रह भी पुस्तक में उपलब्ध है ।

शिव को परिचित करवाया जाए तो उनका शिवलोक, उनके गण आदि पर प्रकाश डालना भी अपेक्षित होता है । प्रारम्भ में उनका भी परिचय प्रस्तुत किया गया है । अपनी समस्त अक्षमताओं तथा सीमाओं से अवगत मेरी सम्पूर्ण निष्ठा तथा परिश्रम का परिणाम है देवादिदेव महादेव शिव (पुराणों के सन्दर्भ में) । यदि मेरा यह विनम्र प्रयास स्वत आलोकित महादेव, महेश्वर शिव के महनीय व्यक्तित्व को स्वल्प मात्रा में भी परिचित करवा सके तो मैं समझूगी मेरी निष्ठा फलीभूत हुई, मेरा परिश्रम सार्थक हुआ ।

 

अनुक्रमणिका

संकेत सूची

xi

निवेदन

XV

देवादिदेव महादेव शिव

1

परमात्मा

1

बाह्य रूप

10

भूषण

14

पुष्प

15

वाहन

15

लोक

16

गण

19

शिवरात्रि

21

शिव पारिवारिक जीवन

22

सती एव दक्षयज्ञ विध्वंस

23

विधुर शिव

35

पार्वती

41

कामदहन

43

पार्वती परीक्षा तथा विवाह

46

काशीवास

52

पुत्र कार्त्तिकेय

54

पुत्र गणेश

57

दाम्पत्य जीवन

59

आध्यात्मिक सम्पर्क

64

अर्धनारीश्वर

65

शिव और नदियां

67

देववृन्द के अधीश्वर

69

ब्रह्मा विष्णु एवं सुदर्शन चक्र

69

रामचन्द्र

95

हनुमान्

98

वासुदेव कृष्ण

100

अन्य देववृन्द

104

शिव भक्त

110

भक्तवत्सलता और कालकूट

110

राजा वीरमणि

114

शुक्राचार्य

114

परशुराम

119

अन्धकासुर

121

गुणनिधि (कुबेर)

125

बाणासुर

125

वृकासुर

127

त्रिपुराधिपति तारकाक्ष

128

जलन्धर

130

अन्याय भक्त एक विहङाग्वलोकन

131

शिव अवतार

142

नील

142

कद्र

143

अन्य अवतार

145

शिव नाम

153 163

सहस्रनाम,

153

शतनाम, अष्टोत्तरशतनाम,

154

नामावली कवच

155

अष्टोत्तरशत मूर्तिया, श्रीकण्ठमातृकान्यास

157

शिव तथा तीर्थनाम

159

शिव लिङ्ग

164

लिङ्ग विशद परिचय

164

द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग

169

शतरुद्रीय

175

संहारी शिव

180

 

Post a Comment
 
Post Review
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy

Related Items

Testimonials

Today Lord SIVA arrived well in Munich. Thank you for the save packing. Everything fine. Hari Om
Hermann, Munchen
Thank you very much for keeping such an exotic collection of Books. Keep going strong Exotic India!!!
Shweta, Germany
I am very thankful to you for keeping such rare and quality books, DVDs, and CDs of classical music and even Dhrupad which is almost unbelievable. I hope you continue to be this good in your helpfulness. I have found books about rare cultural heritage such as Kodava samaj, Dhrupad and other DVDs and CDs in addition to the beautiful sarees I have from your business, actually business is not the right word, but for lack of a word I am using this.
Prashanti, USA
Shiva Shankar brass statue arrived yesterday. It´s very perfect and beautiful and it was very carefully packed. THANK YOU!!! OM NAMAH SHIVAYA
Mª Rosário Costa, Portugal
I have purchased many books from your company. Your packaging is excellent, service is great and attention is prompt. Please maintain this quality for this order also!
Raghavan, USA
My order arrived today with plenty of time to spare. Everything is gorgeous, packing excellent.
Vana, Australia
I was pleased to chance upon your site last year though the name threw me at first! I have ordered several books on Indian theatre and performance, which I haven't found elsewhere (including Amazon) or were unbelievably exorbitantly priced first editions etc. I appreciate how well you pack the books in your distinctive protective packaging for international and domestic mailing (for I order books for India delivery as well) and the speed with which my order is delivered, well within the indicated time. Good work!
Chitra, United Kingdom
The statue has arrived today. It so beautiful, lots of details. I am very happy and will order from you shop again.
Ekaterina, Canada.
I love your company and have been buying a variety of wonderful items from you for many years! Keep up the good work!
Phyllis, USA
The Lakshmi statue arrived today and it is beautiful. Thank you so much for all of your help. I am thrilled and she is an amazing statue for my living room.
Susanna, West Hollywood, CA.
TRUSTe
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2017 © Exotic India