Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Your Cart (0)
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Philosophy > मन ही पूजा मन ही धूप: Mind is Worship....Mind is Incense....
Displaying 1882 of 2813         Previous  |  NextSubscribe to our newsletter and discounts
मन ही पूजा मन ही धूप: Mind is Worship....Mind is Incense....
मन ही पूजा मन ही धूप: Mind is Worship....Mind is Incense....
Description

पुस्तक के विषय में

रैदास कहते हैं: मैंने तो एक ही प्रार्थना जानी-जिस दिन मैंने मैंऔर मेराछोड़ दिया। वहीं बंदगी है। जिस दिन मैंने मैं और मेरा छोड़ दिया। क्योंकि मैं भी धोखा है और मेरा भी धोखा है। जब मैं भी नहीं रहता और कुछ मेरा भी नहीं रहता, तब जो शेष रह जाता है तुम्हारे भीतर, वही तुम हो, वही तुम्हारी ज्योति है-शाश्वत, अंनत, असीम। तत्वमसि! वही परमात्मा है। बंदगी की यह परिभाषा कि मैं और मेरा छूट जाए, तो सच्ची बंदगी।

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु: प्रेम बहुत नाजुक है, फूल जैसा नाजुक है! जीवन एक रहस्य है मन है एक झूठ, क्योंकि मन है जाल-वासनाओं का अप्प दीपो भव! अपने दीये खुद बनो प्रेम और विवाह साक्षीभाव और तल्लीनता ओशो के होने ने ही हमारे पूरे युग को धन्य कर दिया है। ओशो ने अध्यात्म के चिरंतन दर्शन को यथार्थ की धरती दे दी है।

आमुख

आदमी को क्या हो गया है? आदमी के इस बगीचे में फूल खिलने बंद हो गए! मधुमास जैसे अब आता नहीं । जैसे मनुष्य का हृदय एक रेगिस्तान हो गया है; मरूद्यान भी नही कोई । हरे वृक्षों की छाया भी न रही । दूर के पंछी बसेरा करें, ऐसे वृक्ष भी न रहे । आकाश को देखने वाली आंखे भी नहीं । अनाहत को सुनने वाले कान भी नही । मनुष्य को क्या हो गया है?

मनुष्य ने गरिमा कहां खो दी है? यह मनुष्य का ओज कहां गया? इसके मूल कारण की खोज करनी ही होगी । और मूल कारण कठिन नहीं है समझ लेना । जरा अपने ही भीतर खोदने की बात है और जड़ें मिल जाएंगी समस्या की । एक ही जड़ है कि हम अपने से वियुक्त हो गए हैं; अपने से ही टूट गए हैं अपने से ही अजनबी हो गए हैं!

और जो अपने से अजनबी है, वह सबसे अजनबी हो जाता है । अपने को जिसने पहचान लिया, उसकी सबसे पहचान हो जाती है । उसके लिए अजनबी भी अजनबी नहीं रह जाते, क्योंकि उसे दिखाई पड़ता है: भीतर एक ही तरंग, एक ही चैतन्य, एक ही ज्योति । दीये होंगे अलग दीयों के ढंग होंगे अलग, आकृति-रंग होंगे अलग; मगर ज्योति तो एक है! लेकिन जिसनें अपनी ही ज्योति नहीं देखी, वह किसके भीतर ज्योति को देखेगा! उसे तो चलती-फिरती लाशें दिखाई पड़ती हैं । वह खुद भी मुर्दा है और दूसरे भी उसे मुर्दा ही मालूम होते है । वह मुर्दों की बस्ती में जीता है ।

एक दुर्घटना घटी है और उस दुर्घटना के प्रति सचेत हो जाना जरूरी है, अन्यथा अपनी खोज न हो सकेगी । और जिसने स्वयं को न जाना उसने कुछ भी न जाना । वह जीया भी और जीया भी नहीं । वह जीया नही, बस मरा ही । उसके जन्म और मृत्यु के बीच में कुछ भी न घटा। अगर जन्म और मृत्यु के बीच में परमात्मा न घटे तो जानना कि कुछ भी न घटा; खाली आए, खाली गए । शायद कुछ गंवा कर गए, कमा कर नहीं ।

एक दुर्घटना हुई है और वह दुर्घटना है: मनुष्य की चेतना बहिर्मुखी हो गई है । सदियों में धीरे-धीरे यह हुआ, शनैः-शनै:, क्रमशः-क्रमश: । मनुष्य की आंखें बस बाहर थिर हो गई हैं, भीतर मुड़ना भूल गई हैं । तो कभी अगर धन से ऊब भी जाता है- और ऊबेगा ही कभी, कभी पद से भी आदमी ऊब जाता है-ऊबना ही पड़ेगा, सब थोथा है! कब तक भरमाओगे अपने को? भ्रम हैं तो टूटेंगे । छाया को कब तक सत्य मानोगे? माया का मोह कब तक धोखा देगा? सपनो मे कब तक अटके रहोगे? एक न एक दिन पता चलता है सब व्यर्थ है ।

लेकिन तब भी एक मुसीबत खड़ी हो जाती है । वे जो आंखें बाहर ठहर गई हैं, वे आंखें अब भी बाहर खोजती है । धन नहीं खोजती, भगवान खोजती है-मगर बाहर ही । पद नहीं खोजती, मोक्ष खोजती है-लेकिन बाहर ही । विषय बदल जाता है, लेकिन तुम्हारी जीवन-दिशा नहीं बदलती ।

और परमात्मा भीतर है, वह अंतर्यात्रा है । जिसकी भक्ति उसे बाहर के भगवान से जोडे हुए है, उसकी भक्ति भी धोखा है ।

मन ही पूजा मन ही धूप ।

चलना है भीतर! मन है मंदिर! उसी मन के अंतरगृह मे छिपा हुआ बैठा है मालिक ।

आदमी ने अपनी तरफ पीठ कर ली, यही उसका दुर्भाग्य है । रैदास याद दिलाते है : मुड़ो, अपनी ओर मुड़ो । मन ही पूजा मन ही धूप! छोडो मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे । वे सब तो आदमी के बनाए हुए हैं । खोजो अपने भीतर के चैतन्य में, क्योंकि वही परमात्मा से आया है । वही एक किरण है प्रकाश की, जो उस परम सूर्य तक ले जा सकती है, क्योंकि वह उस परम सूर्य से आती है । वही है सेतु।

 

अनुक्रम

1

आग के फूल

1

2

जीवन का रहस्य

27

3

क्या तू सोया जाग अयाना

53

4

मन माया है

81

5

गाइ गाइ अब का कहि गाऊं

109

6

आस्तिकता के स्वर

135

7

भगती ऐसी सुनहु रे भाई

159

8

सत्संग की महिमा

187

9

संगति के परताप महातम

211

10

आओ और डूबो

239

 

 

मन ही पूजा मन ही धूप: Mind is Worship....Mind is Incense....

Item Code:
NZA636
Cover:
Hardcover
Edition:
2011
ISBN:
9788172610258
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 7.0 inch
Pages:
279 (11 B/W illustrations)
Other Details:
Weight of the Book: 600 gms
Price:
$25.00   Shipping Free
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
मन ही पूजा मन ही धूप: Mind is Worship....Mind is Incense....

Verify the characters on the left

From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 2988 times since 16th Feb, 2014

पुस्तक के विषय में

रैदास कहते हैं: मैंने तो एक ही प्रार्थना जानी-जिस दिन मैंने मैंऔर मेराछोड़ दिया। वहीं बंदगी है। जिस दिन मैंने मैं और मेरा छोड़ दिया। क्योंकि मैं भी धोखा है और मेरा भी धोखा है। जब मैं भी नहीं रहता और कुछ मेरा भी नहीं रहता, तब जो शेष रह जाता है तुम्हारे भीतर, वही तुम हो, वही तुम्हारी ज्योति है-शाश्वत, अंनत, असीम। तत्वमसि! वही परमात्मा है। बंदगी की यह परिभाषा कि मैं और मेरा छूट जाए, तो सच्ची बंदगी।

पुस्तक के कुछ मुख्य विषय-बिंदु: प्रेम बहुत नाजुक है, फूल जैसा नाजुक है! जीवन एक रहस्य है मन है एक झूठ, क्योंकि मन है जाल-वासनाओं का अप्प दीपो भव! अपने दीये खुद बनो प्रेम और विवाह साक्षीभाव और तल्लीनता ओशो के होने ने ही हमारे पूरे युग को धन्य कर दिया है। ओशो ने अध्यात्म के चिरंतन दर्शन को यथार्थ की धरती दे दी है।

आमुख

आदमी को क्या हो गया है? आदमी के इस बगीचे में फूल खिलने बंद हो गए! मधुमास जैसे अब आता नहीं । जैसे मनुष्य का हृदय एक रेगिस्तान हो गया है; मरूद्यान भी नही कोई । हरे वृक्षों की छाया भी न रही । दूर के पंछी बसेरा करें, ऐसे वृक्ष भी न रहे । आकाश को देखने वाली आंखे भी नहीं । अनाहत को सुनने वाले कान भी नही । मनुष्य को क्या हो गया है?

मनुष्य ने गरिमा कहां खो दी है? यह मनुष्य का ओज कहां गया? इसके मूल कारण की खोज करनी ही होगी । और मूल कारण कठिन नहीं है समझ लेना । जरा अपने ही भीतर खोदने की बात है और जड़ें मिल जाएंगी समस्या की । एक ही जड़ है कि हम अपने से वियुक्त हो गए हैं; अपने से ही टूट गए हैं अपने से ही अजनबी हो गए हैं!

और जो अपने से अजनबी है, वह सबसे अजनबी हो जाता है । अपने को जिसने पहचान लिया, उसकी सबसे पहचान हो जाती है । उसके लिए अजनबी भी अजनबी नहीं रह जाते, क्योंकि उसे दिखाई पड़ता है: भीतर एक ही तरंग, एक ही चैतन्य, एक ही ज्योति । दीये होंगे अलग दीयों के ढंग होंगे अलग, आकृति-रंग होंगे अलग; मगर ज्योति तो एक है! लेकिन जिसनें अपनी ही ज्योति नहीं देखी, वह किसके भीतर ज्योति को देखेगा! उसे तो चलती-फिरती लाशें दिखाई पड़ती हैं । वह खुद भी मुर्दा है और दूसरे भी उसे मुर्दा ही मालूम होते है । वह मुर्दों की बस्ती में जीता है ।

एक दुर्घटना घटी है और उस दुर्घटना के प्रति सचेत हो जाना जरूरी है, अन्यथा अपनी खोज न हो सकेगी । और जिसने स्वयं को न जाना उसने कुछ भी न जाना । वह जीया भी और जीया भी नहीं । वह जीया नही, बस मरा ही । उसके जन्म और मृत्यु के बीच में कुछ भी न घटा। अगर जन्म और मृत्यु के बीच में परमात्मा न घटे तो जानना कि कुछ भी न घटा; खाली आए, खाली गए । शायद कुछ गंवा कर गए, कमा कर नहीं ।

एक दुर्घटना हुई है और वह दुर्घटना है: मनुष्य की चेतना बहिर्मुखी हो गई है । सदियों में धीरे-धीरे यह हुआ, शनैः-शनै:, क्रमशः-क्रमश: । मनुष्य की आंखें बस बाहर थिर हो गई हैं, भीतर मुड़ना भूल गई हैं । तो कभी अगर धन से ऊब भी जाता है- और ऊबेगा ही कभी, कभी पद से भी आदमी ऊब जाता है-ऊबना ही पड़ेगा, सब थोथा है! कब तक भरमाओगे अपने को? भ्रम हैं तो टूटेंगे । छाया को कब तक सत्य मानोगे? माया का मोह कब तक धोखा देगा? सपनो मे कब तक अटके रहोगे? एक न एक दिन पता चलता है सब व्यर्थ है ।

लेकिन तब भी एक मुसीबत खड़ी हो जाती है । वे जो आंखें बाहर ठहर गई हैं, वे आंखें अब भी बाहर खोजती है । धन नहीं खोजती, भगवान खोजती है-मगर बाहर ही । पद नहीं खोजती, मोक्ष खोजती है-लेकिन बाहर ही । विषय बदल जाता है, लेकिन तुम्हारी जीवन-दिशा नहीं बदलती ।

और परमात्मा भीतर है, वह अंतर्यात्रा है । जिसकी भक्ति उसे बाहर के भगवान से जोडे हुए है, उसकी भक्ति भी धोखा है ।

मन ही पूजा मन ही धूप ।

चलना है भीतर! मन है मंदिर! उसी मन के अंतरगृह मे छिपा हुआ बैठा है मालिक ।

आदमी ने अपनी तरफ पीठ कर ली, यही उसका दुर्भाग्य है । रैदास याद दिलाते है : मुड़ो, अपनी ओर मुड़ो । मन ही पूजा मन ही धूप! छोडो मंदिर, मस्जिद, गिरजे, गुरुद्वारे । वे सब तो आदमी के बनाए हुए हैं । खोजो अपने भीतर के चैतन्य में, क्योंकि वही परमात्मा से आया है । वही एक किरण है प्रकाश की, जो उस परम सूर्य तक ले जा सकती है, क्योंकि वह उस परम सूर्य से आती है । वही है सेतु।

 

अनुक्रम

1

आग के फूल

1

2

जीवन का रहस्य

27

3

क्या तू सोया जाग अयाना

53

4

मन माया है

81

5

गाइ गाइ अब का कहि गाऊं

109

6

आस्तिकता के स्वर

135

7

भगती ऐसी सुनहु रे भाई

159

8

सत्संग की महिमा

187

9

संगति के परताप महातम

211

10

आओ और डूबो

239

 

 

Post a Comment
 
Post Review
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy

Based on your browsing history

Loading... Please wait

Related Items

Osho Talks: Relaxing Into Awareness (DVD)
Osho Shemaroo Entertainment Pvt. Ltd (2010)
Approx. 77 Minutes
Item Code: ICT039
$28.00
Add to Cart
Buy Now
Osho Talks: The Potential of Love (DVD)
Shemarro
Item Code: IDA077
$16.00
Add to Cart
Buy Now
Osho Nadabrahma Meditation (Audio CD)
Osho
Music Today (2007)
60:00 Minutes
Item Code: ICO093
$28.00
Add to Cart
Buy Now
Music From The World of Osho (Celebrative and Meditative Dance Music) (Audio CD)
Osho
Music Today(2005)
74 min. & 83 sec.
Item Code: IZZ335
$35.00
Add to Cart
Buy Now
The Greatest Problem In The World And The Only Solution: With Booklet Inside (DVD)
Osho
Spotlight Video (2010)
111 Min. Approx
Item Code: ICZ091
$30.00
Add to Cart
Buy Now
Feng Shui: The Eight Fold Path (With Booklet Inside) (Audio CD)
Chinmaya Dunster
Times Music (2002)
44 Minutes
Item Code: ICV001
$30.00
Add to Cart
Buy Now
Hope Lounge Style (Audio CD)
Bapu Padmanabha
New Age Music (2007)
42 Min. 30 Sec.
Item Code: IZZ822
$28.00
Add to Cart
Buy Now
Zen: The Quantum Leap From Mind to No-Mind (The World Of Zen)
by Osho
Hardcover (Edition: 2009)
Osho Media International
Item Code: NAE135
$35.00
Add to Cart
Buy Now
The Zen Manifesto Freedom from Oneself by Osho
by Osho
Hardcover (Edition: 2008)
Rebel Book
Item Code: IHL709
$50.00
Add to Cart
Buy Now
Nowhere To Go But In (Unique Answers To Real Questions) (Osho)
by Osho
Hardcover (Edition: 2006)
A Rebel Book
Item Code: IHK070
$35.00
Add to Cart
Buy Now
The Osho Upanishad
by Osho
Hardcover (Edition: 2010)
Osho Media International
Item Code: NAE151
$37.50
Add to Cart
Buy Now
Meditation: An Ecstasy (Osho Meditation Series)
by Osho
Paperback (Edition: 2011)
Full Circle
Item Code: NAD662
$9.00
Add to Cart
Buy Now
The Path of The Mystic (In Search of The Ultimate Freedom) (Osho)
by Osho
Hardcover (Edition: 2007)
A Rebel Book
Item Code: IHK071
$40.00
Add to Cart
Buy Now
Live Dangerously (Osho Meditation Series)
by Osho
Paperback (Edition: 2007)
Full Circle Publishing
Item Code: IHL012
$10.00
Add to Cart
Buy Now

Testimonials

I received my black Katappa Stone Shiva Lingam today and am extremely satisfied with my purchase. I would not hesitate to refer friends to your business or order again. Thank you and God Bless.
Marc, UK
The altar arrived today. Really beautiful. Thank you
Morris, Texas.
Very Great Indian shopping website!!!
Edem, Sweden
I have just received the Phiran I ordered last week. Very beautiful indeed! Thank you.
Gonzalo, Spain
I am very satisfied with my order, received it quickly and it looks OK so far. I would order from you again.
Arun, USA
We received the order and extremely happy with the purchase and would recommend to friends also.
Chandana, USA
The statue arrived today fully intact. It is beautiful.
Morris, Texas.
Thank you Exotic India team, I love your website and the quick turn around with helping me with my purchase. It was absolutely a pleasure this time and look forward to do business with you.
Pushkala, USA.
Very grateful for this service, of making this precious treasure of Haveli Sangeet for ThakurJi so easily in the US. Appreciate the fact that notation is provided.
Leena, USA.
The Bhairava painting I ordered by Sri Kailash Raj is excellent. I have been purchasing from Exotic India for well over a decade and am always beyond delighted with my extraordinary purchases and customer service. Thank you.
Marc, UK
TRUSTe
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2017 © Exotic India