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Books > History > भारत का प्रागैतिहास और आद्द इतिहास: Prehistory and Protohistory of India (Palaeolithic-Non-Harappan Chalcolithic Cultures)
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भारत का प्रागैतिहास और आद्द इतिहास: Prehistory and Protohistory of India (Palaeolithic-Non-Harappan Chalcolithic Cultures)
भारत का प्रागैतिहास और आद्द इतिहास: Prehistory and Protohistory of India (Palaeolithic-Non-Harappan Chalcolithic Cultures)
Description

पुस्तक परिचय

1950 के दशक से नई खुदाइयों, नई काल निर्धारण तकनीकियों एवं निरंतर विकसित होते वैचारिक ढाँचों ने भारतीय उपमहाद्वीप के प्रागैतिहास एवं आद्य इतिहास के वारे में हमारे दृष्टिकोण को काफी हद तक बदल दिया है। मूलत स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षाओं के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई यह पुस्तिका भारत में पाषाणकाल और गैर हड़प्पाई ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों को संक्षिप्त लेकिन व्यापक रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें भारतीय पाषाणकाल एवं ताम्रपाषाणकाल से सम्बन्धित औजारों एवं तकनीकियों, बस्तियों की जीविका शैली और उनका फैलाव तथा उनकी पारिस्थितिकीय पृष्ठभूमि के बारे में नवीनतम सूचनाओं को निष्पक्ष नजरिये से प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक में प्रायद्वीपीय भारत एवं दक्कन की महापाषाणकालीन संस्कृतियों को भी स्थान दिया गया है । पुरातत्व में आमतौर पर प्रयोग होने वाली शब्दावली, मानचित्र, रेखा चित्र और प्रमुख स्थलों पर व्याख्यात्मक टिपणियों के समावेश से यह पुस्तक और भी अधिक उपयोगी हो गई है।

डा. थी .के. जैन दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु कॉलेज में इतिहास के प्राध्यापक हैं। अब तक उनकी दो अन्य पुस्तकें टुडे एण्ड द्रडेर्स इन वेस्टर्न इडिस नई दिल्ली, 1990 और सिटीज एण्ड साइट्स ऑफ एनसिएन्ट एण्ड अर्ली मिडीएवल इण्डिया ए हिस्टोरिकल प्रोफाइल नई दिल्ली, 1998 प्रकाशित हो चुकी हैं।

आमुख

विगत पचास वर्षों के दौरान भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में काफी कुछ किया जा चुका है । इस अवधि के दौरान बडी संख्या में हुई खोजें एवं खुदाइयां इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं । इन खुदाइयों एवं खोजों के आधार पर ही पुरातत्ववेत्ताओ ने विशाल साहित्य की रचना की है । यद्यपि कई खुदाइयों की रिपोर्टे प्रकाशित नहीं हो पायी हैं, फिर भी विद्वानों ने सभी प्रकाशित उपलव्य सामग्रियों का समुचित उपयोग किया और भारत के अतीत के बारे में हमारी समझ एवं ज्ञान को मजबूत आधार प्रदान किया है । पुरातात्विक साहित्य में मौजूद सूचनाएं एवं व्याख्याएं अभी भी पाठ्य पुस्तकों में यथोचित स्थान नहीं प्राप्त कर सकी हैं । ये अभी भी अध्यापकों एवं विद्यार्थियों, दोनों के लिए सर्वसुलभ नहीं हो पायी हैं । डॉ वी.के जैन का वर्तमान कार्य इस दिशा में किया गया एक सराहनीय प्रयास है ।

कई वर्षो से एक प्रेरक शिक्षक और समर्पित अनुसंधानकर्ता के रूप में कार्य कर रहे डी. वी.के जैन ने सम्पूर्ण सम्बद्ध साहित्य का अनवरत अध्ययन किया और भारत के अतीत त्रने सम्बन्धित सभी सूचनाओं एव आकड़ो को एकत्र करने का महान् कार्य किया है । उन्होंने किसी विचारधारा. प्रवृत्ति या परम्परा से प्रभावित हुए बिना विवादास्पद मुद्दों पर गहन अनुसंधान किया । इस पुस्तक में उन्होंने पुरापाषाणकाल से लेकर गैर हड़प्पाई ताम्रपाषाण काल तक के औजारों एव तकनीकियों, जीविका प्रणाली और बस्तियो के वितरण एवं पारिस्थितिकीय पृष्ठभूमि सम्बन्धी नवीनतम सूचनाओं को व्यापक दृष्टिकोण में प्रस्तुत किया है । मध्य भारत और दक्कन की महापाषाणकालीन संस्कृतियों का वर्णन. औजारों के रेखा चित्रण और महत्वपूर्ण पुरातात्चिक स्थलों की मानचित्र सहित व्याख्यात्मक टिप्पणियों से युका परिशिष्ट पुस्तक के महत्वपूर्ण भाग हैं । इससे यह पुस्तक पाठको के लिए अत्यन्त उपयोगी हो गई है । मुझे विश्वास है कि विद्यार्थीगण और अध्यापकगण, दोनों डी. जैन की पुस्तक को भारतीय प्रागैतिहास और आद्य इतिहास के अध्ययन में एक अनिवार्य एवं उपयोगी पुस्तिका पायेंगे और उन्हें हडप्पा सभ्यता पर इसके सहायक अंक के प्रकाशन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा रहेगी ।

प्राक्कथन

विगत आधी शताब्दी के दोरान हुई नवीनतम खुदाइयों, नई काल निर्धारण तकनीकियों एवं निरंतर विकसित होते वैचारिक ढाँचों ने भारतीय उपमहाद्वीप के प्रागैतिहासिक एवं आद्य ऐतिहासिक अतीत के बारे में हमारे नजरिये को काफी हद तक बदल दिया है । लेकिन डी.के. चक्रवर्ती, एफ.आर. अलचिन डी.पी. अग्रवाल, के. पद्दाया और कुछ अन्य की पुस्तकों को छोडकर अभी भी अधिकांश पुस्तकें परम्परागत संस्कृति इतिहास अवधारणा या संग्रहण एवं वर्णन अवधारणा का ही अनुसरण करती है । परम्परागत अवधारणाओं में परिवर्तन एवं निरन्तरता की सांस्कृतिक प्रक्रिया पर जोर नहीं दिया जाता है । 1950 से इस क्षेत्र में अनुसंधानों की गति बढ़ी है, जिसके कारण आज प्राचीन भारत की सांस्कृतिक प्रगति को दर्शाने के लिए हमारे पास पर्याप्त आकड़े उपलव्य हैं । इनके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारतीय समाज कभी भी स्थिरर या स्थायी नहीं रहा था तथा यह भी अन्य समाजों की तरह समय एवं परिस्थितियों के साथ गतिशील एवं विकसित होता रहा है ।

यह पुस्तिका भारत के प्रागौतिहास और आद्य इतिहास को संक्षिप्त लेकिन व्यापक तरीके से प्रस्तुत करने का एक प्रयास है । इसमें भारत के प्रागैतिहास और आद्य इतिहास से सम्बन्धित औजारों एवं तकनीकियों, बस्तियों की जीविका शैली और उनका फैलाव तथा उनकी पारिस्थितिकीय पृष्ठभूमि के बारे में नवीनतम सूचनाओं को निष्पक्ष नजरिये से प्रस्तुत किया गया है । इसमें पुरापाषाणकाल से लेकर गैर हड़प्पाई संस्कृतियों का विशेष उल्लेख किया गया है और हडप्पा सभ्यता का वर्णन आगामी अंक में किये जाने के लिए छोड दिया गया है । इस अंक की शुरआत प्रागैतिहास और आद्य इतिहास की परिभाषा से की गई है और साथ ही पुरातत्व में नवीनतम काल निर्धारण तकनीकियों एवं सैद्धान्तिक परिदृश्यों के महत्व को रेखांकित किया गया है । अध्याय 2 में 1950 के बाद हुए उन भारतीय पुरातात्विक अध्ययनों की समीक्षा की गई है, जिनसे भारतीय इतिहास के बारे में हमारे ज्ञान में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है । बाद के अध्यायों में पुरापाषाणकाल, मध्यपाषाणकाल, नवपाषाणकाल और गैर हडप्पाई ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियों की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है । परिशिष्ट में प्रायद्वीपीय भारत और दक्कन (1000 .पू. से 300 .पू) की लोहा इस्तेमाल करने वाली एक मात्र महापाषाणकालीन संस्कृतियों के प्रमुख घटकों की चर्चा की गई है, जिनके बारे में एकमात्र सूचनाये हमें विभिन्न पुरातात्विक खुदाइयों से ही प्राप्त हुई हैं । पुरातात्विक अध्ययन में अक्सर प्रयोग होने वाले महत्वपूर्ण शब्दों को तथा इस पुस्तक मे उल्लेखित प्रमुख स्थलों (Prominent Sites) पर व्याख्यात्मक टिप्पणियों को भी परिशिष्ट मे शामिल किया गया है । दरअसल यह पुस्तक विद्वानों के एक दल द्वारा उच्च स्तर की पाठ्य पुस्तकों के लिए तैयार किये गये अध्यायों का ही एक बडा रूप है । इसीलिए यह स्वाभाविक तौर पर विद्यार्थियों के अनुरूप है, हालाकि भारत के प्राचीन इतिहास एवं अतीत के जिज्ञासु आम पाठक भी इसे लाभप्रद पायेंगे । इस तरह की पुस्तकें लिखने में सबसे बड़ी मुश्किल जो आती है वह है इस बात का निर्णय करना कि पुस्तक में क्र।। शामिल किया जाये और क्या नहीं । इस मुश्किल से छुटकारा पाने के लिए मैंने अपने शैक्षणिक अनुभव और विवेक का इस्तेमाल किया है । क्योंकि ऐसे विषय में जो असख्य सूचनाओं, अनसुलझे मुद्दों और विवादों रवे भरा पडा हो. उसमें हर एक तथ्य या व्याख्या के साथ न्याय कर पाना सभव नहीं है । यह पुस्तक लिखते समय मेरा यही प्रयास रहा है कि मैं तकनीकी तथ्यों की जटिलता में न उलझकर तथ्यों को सामान्य भाषा में प्रस्तुत कर सकूं और सांस्कृतिक प्रगति के महत्वपूर्ण पक्षों पर ज्यादा प्रकाश डाल सकूं । पुस्तक में पुरातात्विक बहसो को कम से कम स्थान दिया गया है और जहाँ कहीं भी उनका उल्लेख किया गया है, वहाँ उनकी भरपूर व्याख्या की गई है या पुस्तक के अन्त में दी गई शब्द सूची मे उनकी व्याख्या स्पष्ट की गई हे । इसके लिए यथासंभव चित्रांकन रेखा चित्रण, निदर्शन और मानचित्र का सहारा लिया गया है । ऐसे पाठकों के लिए जो अधिक जानकारी के इच्छुक हैं, उनके लिए पुस्तक के अन्त मे विशेष गन्थ सूची जोड़ी गयी है । कहीं कहीं कुछ तथ्य दुहराये भी गये हैं और कुछ तथ्यों या शब्दों में अशुद्धियां भी हो सकती हैं । इस सम्बन्ध में सुधारों के लिए मिले पाठकों के सुझावों से लेखक को प्रसन्नता होगी ।

मैं उन विद्वानों के प्रति अपना आभार प्रकट करना चाहता हूँ जिनके योगदान का मैंने इस पुस्तक में इस्तेमाल किया है । मैं दिल्ली विश्वविद्यालय मे इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो बी.पी साहू और दिल्ली विश्वविद्यालय के ही प्रो. आर सी ठाकरान के सहयोग और प्रोत्साहन के लिए उनका कृतज्ञतापूर्वक्? आभार व्यक्त करना चाहता हूँ । मैं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के राष्ट्रीय संग्रहालय और मोतीलाल नेहरु कॉलेज मे सेवारत अपने कई मित्रों और शुभचिन्तकों का भी शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होंने हरसंभव इस कार्य में मेरी सहायता की । राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली में प्रागैतिहास खण्ड के प्रभारी श्री डी पी. शर्मा का भी आभारी हूँ जिन्होने जरुरत पडने पर पुस्तकों लेखों और सुझावों से मदद पहुंचायी । मैं साक्ष्यों का अवलोकन करने एवं बहुमूल्य टिप्पणियों के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डी. नागार्च का भी शुक्रगुजार हूँ । मैं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राष्ट्रीय संग्रहालय के पुस्तकालय कर्मचारियों, विशेषकर श्री भगवान चौबे का पुस्तक लेखन के दौरान जरुरी सामग्रिया प्राप्त करने में हर संभव मदद के लिए धन्यवाद अदा करता हूँ ।

मै अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान् और भारतीय इतिहास काग्रेस (66 वां अधिवेशन, शान्तिनिकेतन) के सभापति प्रो. डी.एन. झा का भी ऋणी हूँ जिन्होंने विभिन्न कार्यों में व्यस्त रहने के बावजूद अपना कीमती समय निकाला और इस पुस्तक के लिए दो शब्द लिखकर मुझे कृतज्ञ किया ।

मैं यहाँ डी.के. प्रिन्टवर्ल्ड (प्रा.) लि. के श्री सुशील कुमार मित्तल के प्रयास की भी सराहना करना चाहूंगा, जिन्होंने पुस्तक में व्यक्तिगत रुचि दिखाते हुए निर्धारित समय से पूर्व पुस्तक का प्रकाशन संभव बनाया ।

अन्त में मैं अपनी पत्नी डी. कृष्णा जैन और अपने पुत्र सिद्धार्थ को भी धन्यवाद देना चाहूंगा, जिन्होंने बड़े प्टार, धैर्य और आत्मीयता के साथ मुझे पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार करने में भावनात्मक समर्थन प्रदान किया ।

मुझे यह पुस्तक प्रो. आर.एस शर्मा के सम्मान में साभार समर्पित करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है । प्रो. शर्मा ने भारतीय विद्या अध्ययनो मे सदैव निष्पक्ष एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया । भारतीय ऐतिहासिक अनुसधान परिषद, नई दिल्ली के सस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक अध्ययनों को सकारात्मक दिशा प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य किया । 1970 के दशक में दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग में प्रवक्ता एवं अध्यक्ष के तौर पर उन्होने विद्यार्थियों में सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास के विभिन्न पक्षों के प्रति नया उत्साह पैदा किया और उन्हें इस दिशा में अनुसंधान करने के लिए प्रोत्साहित किया । प्रो. शर्मा के सम्पर्क में जो भी व्यक्ति आये, चाहे वह विद्यार्थी हों या अनुसंधानकर्ता, कोई भी उनकी दयालुता, अनुकम्पा और विषय के प्रति उनके समर्पण को कभी भूल नहीं पायेंगे ।

 

विषय सूची

 

दो शब्द

vii

 

प्राक्कथन

ix

 

मानचित्र और चित्रों की सूची

xvi

1

परिचय

1

 

प्रागैतिहास क्या है

1

 

पर्यावरणीय घटक

4

 

मानव विकास एवं भारतीय प्रागैतिहास

5

 

वैज्ञानिक काल निर्धारण (Dating) एवं संम्बन्धित तकनीकियां

10

 

नये सैद्धान्तिक दृष्टिकोण

15

2

विगत पाँच दशकों के दौरान भारतीय एवं उसका महत्व

19

3

पुरापाषाणकालीन संस्कृतियां

37

 

परिचय

37

 

कालक्रम

38

 

औजार एवं तकनीकियों

40

 

पुरापाषाणकालीन स्थलों का विस्तार व वितरण

47

 

बस्तियां और जीविका शैलो

50

 

निष्कर्ष

52

4

मध्यपाषाणकालीन संस्कृतियां

53

 

परिचय

53

 

प्रमुख विशेषताएं

53

 

कलि क्रम

55

 

क्षेत्रीय वितरण

57

 

औजार एवं तकनीकियां

57

 

भौतिक संस्कृति एवं जीविका शैली

60

 

निष्कर्ष

62

 

शैल कला

63

5

नवपाषाणकालीन संस्कृतियां

70

 

परिचय

70

 

मुख्य विशेषतायें

71

 

कालक्रम वितरण

73

 

उत्तर पश्चिम भारत

74

 

उत्तरी भारत

78

 

मध्य भारत

81

 

मध्य गांगेय क्षेत्र

83

 

पूर्वी भारत

85

 

दक्षिण भारतीय नवपाषाणकालीन संस्कृतियां जले गोबर के टिले

86

 

निष्कर्ष

88

6

गैर हडप्पाई ताम्रपाषाण संस्कृतियां

89

 

परिचय

91

 

हडप्पाई क्षेत्र से बाहर की संस्कृतियां

91

 

बस्ती प्रणाली

92

 

जीविका पद्धति

97

 

औजार एवं तकनीकियां

100

 

व्यापार सम्बन्ध

101

 

धार्मिक मान्यताएं एवं क्रियाकलाप

101

 

निष्कर्ष

103

 

ताम्र भडार संस्कृतियां

103

 

परिशिष्ट I

 
 

महायाषाणकालीन संस्कृतियां (प्रायद्वीपीय भारत और दक्कन सन् 1000 ई.पू. 300 ई.पू.)

109

 

परिचय

109

 

महापाषाणकालीन संरचनाएं एव उनका वितरण

111

 

कालक्रम

114

 

भौतिक सस्कृति

114

 

जीविका अर्थव्यवस्था

116

 

निष्कर्ष

119

 

परिशिष्टII प्रमुख स्थल

122

 

शब्दावली

164

 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

187

 

अनुक्रमणिका

195

 

 

 

 

 

भारत का प्रागैतिहास और आद्द इतिहास: Prehistory and Protohistory of India (Palaeolithic-Non-Harappan Chalcolithic Cultures)

Item Code:
HAA314
Cover:
Paperback
Edition:
2008
ISBN:
9788124604434
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
220
Other Details:
Weight of the Book: 265 gms
Price:
$19.00   Shipping Free
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पुस्तक परिचय

1950 के दशक से नई खुदाइयों, नई काल निर्धारण तकनीकियों एवं निरंतर विकसित होते वैचारिक ढाँचों ने भारतीय उपमहाद्वीप के प्रागैतिहास एवं आद्य इतिहास के वारे में हमारे दृष्टिकोण को काफी हद तक बदल दिया है। मूलत स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षाओं के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर तैयार की गई यह पुस्तिका भारत में पाषाणकाल और गैर हड़प्पाई ताम्रपाषाणिक संस्कृतियों को संक्षिप्त लेकिन व्यापक रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें भारतीय पाषाणकाल एवं ताम्रपाषाणकाल से सम्बन्धित औजारों एवं तकनीकियों, बस्तियों की जीविका शैली और उनका फैलाव तथा उनकी पारिस्थितिकीय पृष्ठभूमि के बारे में नवीनतम सूचनाओं को निष्पक्ष नजरिये से प्रस्तुत किया गया है। इस पुस्तक में प्रायद्वीपीय भारत एवं दक्कन की महापाषाणकालीन संस्कृतियों को भी स्थान दिया गया है । पुरातत्व में आमतौर पर प्रयोग होने वाली शब्दावली, मानचित्र, रेखा चित्र और प्रमुख स्थलों पर व्याख्यात्मक टिपणियों के समावेश से यह पुस्तक और भी अधिक उपयोगी हो गई है।

डा. थी .के. जैन दिल्ली विश्वविद्यालय के मोतीलाल नेहरु कॉलेज में इतिहास के प्राध्यापक हैं। अब तक उनकी दो अन्य पुस्तकें टुडे एण्ड द्रडेर्स इन वेस्टर्न इडिस नई दिल्ली, 1990 और सिटीज एण्ड साइट्स ऑफ एनसिएन्ट एण्ड अर्ली मिडीएवल इण्डिया ए हिस्टोरिकल प्रोफाइल नई दिल्ली, 1998 प्रकाशित हो चुकी हैं।

आमुख

विगत पचास वर्षों के दौरान भारतीय पुरातत्व के क्षेत्र में काफी कुछ किया जा चुका है । इस अवधि के दौरान बडी संख्या में हुई खोजें एवं खुदाइयां इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं । इन खुदाइयों एवं खोजों के आधार पर ही पुरातत्ववेत्ताओ ने विशाल साहित्य की रचना की है । यद्यपि कई खुदाइयों की रिपोर्टे प्रकाशित नहीं हो पायी हैं, फिर भी विद्वानों ने सभी प्रकाशित उपलव्य सामग्रियों का समुचित उपयोग किया और भारत के अतीत के बारे में हमारी समझ एवं ज्ञान को मजबूत आधार प्रदान किया है । पुरातात्विक साहित्य में मौजूद सूचनाएं एवं व्याख्याएं अभी भी पाठ्य पुस्तकों में यथोचित स्थान नहीं प्राप्त कर सकी हैं । ये अभी भी अध्यापकों एवं विद्यार्थियों, दोनों के लिए सर्वसुलभ नहीं हो पायी हैं । डॉ वी.के जैन का वर्तमान कार्य इस दिशा में किया गया एक सराहनीय प्रयास है ।

कई वर्षो से एक प्रेरक शिक्षक और समर्पित अनुसंधानकर्ता के रूप में कार्य कर रहे डी. वी.के जैन ने सम्पूर्ण सम्बद्ध साहित्य का अनवरत अध्ययन किया और भारत के अतीत त्रने सम्बन्धित सभी सूचनाओं एव आकड़ो को एकत्र करने का महान् कार्य किया है । उन्होंने किसी विचारधारा. प्रवृत्ति या परम्परा से प्रभावित हुए बिना विवादास्पद मुद्दों पर गहन अनुसंधान किया । इस पुस्तक में उन्होंने पुरापाषाणकाल से लेकर गैर हड़प्पाई ताम्रपाषाण काल तक के औजारों एव तकनीकियों, जीविका प्रणाली और बस्तियो के वितरण एवं पारिस्थितिकीय पृष्ठभूमि सम्बन्धी नवीनतम सूचनाओं को व्यापक दृष्टिकोण में प्रस्तुत किया है । मध्य भारत और दक्कन की महापाषाणकालीन संस्कृतियों का वर्णन. औजारों के रेखा चित्रण और महत्वपूर्ण पुरातात्चिक स्थलों की मानचित्र सहित व्याख्यात्मक टिप्पणियों से युका परिशिष्ट पुस्तक के महत्वपूर्ण भाग हैं । इससे यह पुस्तक पाठको के लिए अत्यन्त उपयोगी हो गई है । मुझे विश्वास है कि विद्यार्थीगण और अध्यापकगण, दोनों डी. जैन की पुस्तक को भारतीय प्रागैतिहास और आद्य इतिहास के अध्ययन में एक अनिवार्य एवं उपयोगी पुस्तिका पायेंगे और उन्हें हडप्पा सभ्यता पर इसके सहायक अंक के प्रकाशन की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा रहेगी ।

प्राक्कथन

विगत आधी शताब्दी के दोरान हुई नवीनतम खुदाइयों, नई काल निर्धारण तकनीकियों एवं निरंतर विकसित होते वैचारिक ढाँचों ने भारतीय उपमहाद्वीप के प्रागैतिहासिक एवं आद्य ऐतिहासिक अतीत के बारे में हमारे नजरिये को काफी हद तक बदल दिया है । लेकिन डी.के. चक्रवर्ती, एफ.आर. अलचिन डी.पी. अग्रवाल, के. पद्दाया और कुछ अन्य की पुस्तकों को छोडकर अभी भी अधिकांश पुस्तकें परम्परागत संस्कृति इतिहास अवधारणा या संग्रहण एवं वर्णन अवधारणा का ही अनुसरण करती है । परम्परागत अवधारणाओं में परिवर्तन एवं निरन्तरता की सांस्कृतिक प्रक्रिया पर जोर नहीं दिया जाता है । 1950 से इस क्षेत्र में अनुसंधानों की गति बढ़ी है, जिसके कारण आज प्राचीन भारत की सांस्कृतिक प्रगति को दर्शाने के लिए हमारे पास पर्याप्त आकड़े उपलव्य हैं । इनके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भारतीय समाज कभी भी स्थिरर या स्थायी नहीं रहा था तथा यह भी अन्य समाजों की तरह समय एवं परिस्थितियों के साथ गतिशील एवं विकसित होता रहा है ।

यह पुस्तिका भारत के प्रागौतिहास और आद्य इतिहास को संक्षिप्त लेकिन व्यापक तरीके से प्रस्तुत करने का एक प्रयास है । इसमें भारत के प्रागैतिहास और आद्य इतिहास से सम्बन्धित औजारों एवं तकनीकियों, बस्तियों की जीविका शैली और उनका फैलाव तथा उनकी पारिस्थितिकीय पृष्ठभूमि के बारे में नवीनतम सूचनाओं को निष्पक्ष नजरिये से प्रस्तुत किया गया है । इसमें पुरापाषाणकाल से लेकर गैर हड़प्पाई संस्कृतियों का विशेष उल्लेख किया गया है और हडप्पा सभ्यता का वर्णन आगामी अंक में किये जाने के लिए छोड दिया गया है । इस अंक की शुरआत प्रागैतिहास और आद्य इतिहास की परिभाषा से की गई है और साथ ही पुरातत्व में नवीनतम काल निर्धारण तकनीकियों एवं सैद्धान्तिक परिदृश्यों के महत्व को रेखांकित किया गया है । अध्याय 2 में 1950 के बाद हुए उन भारतीय पुरातात्विक अध्ययनों की समीक्षा की गई है, जिनसे भारतीय इतिहास के बारे में हमारे ज्ञान में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है । बाद के अध्यायों में पुरापाषाणकाल, मध्यपाषाणकाल, नवपाषाणकाल और गैर हडप्पाई ताम्रपाषाणकालीन संस्कृतियों की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डाला गया है । परिशिष्ट में प्रायद्वीपीय भारत और दक्कन (1000 .पू. से 300 .पू) की लोहा इस्तेमाल करने वाली एक मात्र महापाषाणकालीन संस्कृतियों के प्रमुख घटकों की चर्चा की गई है, जिनके बारे में एकमात्र सूचनाये हमें विभिन्न पुरातात्विक खुदाइयों से ही प्राप्त हुई हैं । पुरातात्विक अध्ययन में अक्सर प्रयोग होने वाले महत्वपूर्ण शब्दों को तथा इस पुस्तक मे उल्लेखित प्रमुख स्थलों (Prominent Sites) पर व्याख्यात्मक टिप्पणियों को भी परिशिष्ट मे शामिल किया गया है । दरअसल यह पुस्तक विद्वानों के एक दल द्वारा उच्च स्तर की पाठ्य पुस्तकों के लिए तैयार किये गये अध्यायों का ही एक बडा रूप है । इसीलिए यह स्वाभाविक तौर पर विद्यार्थियों के अनुरूप है, हालाकि भारत के प्राचीन इतिहास एवं अतीत के जिज्ञासु आम पाठक भी इसे लाभप्रद पायेंगे । इस तरह की पुस्तकें लिखने में सबसे बड़ी मुश्किल जो आती है वह है इस बात का निर्णय करना कि पुस्तक में क्र।। शामिल किया जाये और क्या नहीं । इस मुश्किल से छुटकारा पाने के लिए मैंने अपने शैक्षणिक अनुभव और विवेक का इस्तेमाल किया है । क्योंकि ऐसे विषय में जो असख्य सूचनाओं, अनसुलझे मुद्दों और विवादों रवे भरा पडा हो. उसमें हर एक तथ्य या व्याख्या के साथ न्याय कर पाना सभव नहीं है । यह पुस्तक लिखते समय मेरा यही प्रयास रहा है कि मैं तकनीकी तथ्यों की जटिलता में न उलझकर तथ्यों को सामान्य भाषा में प्रस्तुत कर सकूं और सांस्कृतिक प्रगति के महत्वपूर्ण पक्षों पर ज्यादा प्रकाश डाल सकूं । पुस्तक में पुरातात्विक बहसो को कम से कम स्थान दिया गया है और जहाँ कहीं भी उनका उल्लेख किया गया है, वहाँ उनकी भरपूर व्याख्या की गई है या पुस्तक के अन्त में दी गई शब्द सूची मे उनकी व्याख्या स्पष्ट की गई हे । इसके लिए यथासंभव चित्रांकन रेखा चित्रण, निदर्शन और मानचित्र का सहारा लिया गया है । ऐसे पाठकों के लिए जो अधिक जानकारी के इच्छुक हैं, उनके लिए पुस्तक के अन्त मे विशेष गन्थ सूची जोड़ी गयी है । कहीं कहीं कुछ तथ्य दुहराये भी गये हैं और कुछ तथ्यों या शब्दों में अशुद्धियां भी हो सकती हैं । इस सम्बन्ध में सुधारों के लिए मिले पाठकों के सुझावों से लेखक को प्रसन्नता होगी ।

मैं उन विद्वानों के प्रति अपना आभार प्रकट करना चाहता हूँ जिनके योगदान का मैंने इस पुस्तक में इस्तेमाल किया है । मैं दिल्ली विश्वविद्यालय मे इतिहास विभाग के अध्यक्ष प्रो बी.पी साहू और दिल्ली विश्वविद्यालय के ही प्रो. आर सी ठाकरान के सहयोग और प्रोत्साहन के लिए उनका कृतज्ञतापूर्वक्? आभार व्यक्त करना चाहता हूँ । मैं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के राष्ट्रीय संग्रहालय और मोतीलाल नेहरु कॉलेज मे सेवारत अपने कई मित्रों और शुभचिन्तकों का भी शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होंने हरसंभव इस कार्य में मेरी सहायता की । राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली में प्रागैतिहास खण्ड के प्रभारी श्री डी पी. शर्मा का भी आभारी हूँ जिन्होने जरुरत पडने पर पुस्तकों लेखों और सुझावों से मदद पहुंचायी । मैं साक्ष्यों का अवलोकन करने एवं बहुमूल्य टिप्पणियों के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डी. नागार्च का भी शुक्रगुजार हूँ । मैं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और राष्ट्रीय संग्रहालय के पुस्तकालय कर्मचारियों, विशेषकर श्री भगवान चौबे का पुस्तक लेखन के दौरान जरुरी सामग्रिया प्राप्त करने में हर संभव मदद के लिए धन्यवाद अदा करता हूँ ।

मै अन्तर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त विद्वान् और भारतीय इतिहास काग्रेस (66 वां अधिवेशन, शान्तिनिकेतन) के सभापति प्रो. डी.एन. झा का भी ऋणी हूँ जिन्होंने विभिन्न कार्यों में व्यस्त रहने के बावजूद अपना कीमती समय निकाला और इस पुस्तक के लिए दो शब्द लिखकर मुझे कृतज्ञ किया ।

मैं यहाँ डी.के. प्रिन्टवर्ल्ड (प्रा.) लि. के श्री सुशील कुमार मित्तल के प्रयास की भी सराहना करना चाहूंगा, जिन्होंने पुस्तक में व्यक्तिगत रुचि दिखाते हुए निर्धारित समय से पूर्व पुस्तक का प्रकाशन संभव बनाया ।

अन्त में मैं अपनी पत्नी डी. कृष्णा जैन और अपने पुत्र सिद्धार्थ को भी धन्यवाद देना चाहूंगा, जिन्होंने बड़े प्टार, धैर्य और आत्मीयता के साथ मुझे पुस्तक की पाण्डुलिपि तैयार करने में भावनात्मक समर्थन प्रदान किया ।

मुझे यह पुस्तक प्रो. आर.एस शर्मा के सम्मान में साभार समर्पित करते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है । प्रो. शर्मा ने भारतीय विद्या अध्ययनो मे सदैव निष्पक्ष एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दिया । भारतीय ऐतिहासिक अनुसधान परिषद, नई दिल्ली के सस्थापक अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ऐतिहासिक अध्ययनों को सकारात्मक दिशा प्रदान करने का महत्वपूर्ण कार्य किया । 1970 के दशक में दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग में प्रवक्ता एवं अध्यक्ष के तौर पर उन्होने विद्यार्थियों में सामाजिक एवं आर्थिक इतिहास के विभिन्न पक्षों के प्रति नया उत्साह पैदा किया और उन्हें इस दिशा में अनुसंधान करने के लिए प्रोत्साहित किया । प्रो. शर्मा के सम्पर्क में जो भी व्यक्ति आये, चाहे वह विद्यार्थी हों या अनुसंधानकर्ता, कोई भी उनकी दयालुता, अनुकम्पा और विषय के प्रति उनके समर्पण को कभी भूल नहीं पायेंगे ।

 

विषय सूची

 

दो शब्द

vii

 

प्राक्कथन

ix

 

मानचित्र और चित्रों की सूची

xvi

1

परिचय

1

 

प्रागैतिहास क्या है

1

 

पर्यावरणीय घटक

4

 

मानव विकास एवं भारतीय प्रागैतिहास

5

 

वैज्ञानिक काल निर्धारण (Dating) एवं संम्बन्धित तकनीकियां

10

 

नये सैद्धान्तिक दृष्टिकोण

15

2

विगत पाँच दशकों के दौरान भारतीय एवं उसका महत्व

19

3

पुरापाषाणकालीन संस्कृतियां

37

 

परिचय

37

 

कालक्रम

38

 

औजार एवं तकनीकियों

40

 

पुरापाषाणकालीन स्थलों का विस्तार व वितरण

47

 

बस्तियां और जीविका शैलो

50

 

निष्कर्ष

52

4

मध्यपाषाणकालीन संस्कृतियां

53

 

परिचय

53

 

प्रमुख विशेषताएं

53

 

कलि क्रम

55

 

क्षेत्रीय वितरण

57

 

औजार एवं तकनीकियां

57

 

भौतिक संस्कृति एवं जीविका शैली

60

 

निष्कर्ष

62

 

शैल कला

63

5

नवपाषाणकालीन संस्कृतियां

70

 

परिचय

70

 

मुख्य विशेषतायें

71

 

कालक्रम वितरण

73

 

उत्तर पश्चिम भारत

74

 

उत्तरी भारत

78

 

मध्य भारत

81

 

मध्य गांगेय क्षेत्र

83

 

पूर्वी भारत

85

 

दक्षिण भारतीय नवपाषाणकालीन संस्कृतियां जले गोबर के टिले

86

 

निष्कर्ष

88

6

गैर हडप्पाई ताम्रपाषाण संस्कृतियां

89

 

परिचय

91

 

हडप्पाई क्षेत्र से बाहर की संस्कृतियां

91

 

बस्ती प्रणाली

92

 

जीविका पद्धति

97

 

औजार एवं तकनीकियां

100

 

व्यापार सम्बन्ध

101

 

धार्मिक मान्यताएं एवं क्रियाकलाप

101

 

निष्कर्ष

103

 

ताम्र भडार संस्कृतियां

103

 

परिशिष्ट I

 
 

महायाषाणकालीन संस्कृतियां (प्रायद्वीपीय भारत और दक्कन सन् 1000 ई.पू. 300 ई.पू.)

109

 

परिचय

109

 

महापाषाणकालीन संरचनाएं एव उनका वितरण

111

 

कालक्रम

114

 

भौतिक सस्कृति

114

 

जीविका अर्थव्यवस्था

116

 

निष्कर्ष

119

 

परिशिष्टII प्रमुख स्थल

122

 

शब्दावली

164

 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची

187

 

अनुक्रमणिका

195

 

 

 

 

 

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