Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Your Cart (0)
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Hindu > हिन्दी > साक्षी की साधना: Silence of Witness
Displaying 1 of 7342         Previous  |  NextSubscribe to our newsletter and discounts
साक्षी की साधना: Silence of Witness
साक्षी की साधना: Silence of Witness
Description

पुस्तक  के विषय में

अंधेरा हटाना हो, तो प्रकाश लाना होता है। और मन हटाना हो, तो ध्यान लाना होता है। मन को नियंत्रित नहीं करना है, वरन जानना है कि व है ही नहीं। यह जानते ही उससे मुक्ति हो जाती है।

यह जानना साक्षी  चैतन्य से होता है। मन के साक्षी बनें। जो है उसके साक्षी बनें। कैसे होना चाहिए इसकी चिंता छोड़ दें। जो है जैसा है उसके प्रति जागें जागरूक हों। कोई निर्णय न लें कोई नियंत्रण न करें किसी संघर्ष में न पड़े। बस मौन होकर देखें। देखना ही यह साक्षी होना ही मुक्ति बन जाता है।

साक्षी बनत ही चेतना दृष्टा को छोड़ द्रष्टा पर स्थिर हो जाती है। इस स्थिति में अकंप प्रज्ञा की ज्योति उपलब्ध होती है। और यही ज्योति मुक्ति है।

साक्षीभाव आत्मा में प्रवेश का उपाय

पूछा है कि यह जो साक्षीभाव है, क्या यह भी मन की क्रिया होगी?

नहीं, अकेली एक ही क्रिया है, जो मन की नहीं है, और वह साक्षीभाव है । इसे थोड़ा समझना जरूरी है । और केवल साक्षीभाव ही मनुष्य को आत्मा में प्रतिष्ठा दे सकता है । क्योंकि वही हमारे जीवन में एक सूत्र है जो मन का नहीं है, माइंड का नहीं है ।

आप रात को स्वप्न देखते है । सुबह जाग कर पाते हैं कि स्वप्न था और मेंने समझा कि सत्य है । सुबह स्वप्न तो झूठा हो जाता है, लेकिन जिसने स्वप्न देखा था, वह झूठा नहीं होता । उसे आप मानते है कि जिसने देखा था, वह था जो देखा था, वह स्वप्न था । आप बच्चे थे, युवा हो गए; बचपन तो चला गया, युवापन आ गया; युवावस्था भी चली जाएगी, बुढ़ापा आ जाएगा । लेकिन जिसने बचपन को देखा, युवावस्था को देखा, बुढापे को देखेगा, वह न आया और न गया, वह मौजूद रहा । सुख आता है, सुख चला जाता है । दुख आता है, दुख चला जाता है । लेकिन जो दुख को देखता है और सुख को देखता है, वह मौजूद बना रहता है ।

तो हमारे भीतर दर्शन की जो क्षमता है, वह सारी स्थितियों में मौजूद बनी रहती है । साक्षी का जो भाव है, वह जो हमारी देखने की क्षमता है, वह मौजूद बनी रहती है । वही क्षमता हमारे भीतर अविच्छिन्न रूप से, अपरिवर्तित रूप से मौजूद है ।

आप बहुत गहरी नींद में हो जाएं तो भी सुबह कहते है, रात बहुत गहरी नींद आई, रात बड़ी आनंदपूर्ण निद्रा हुई । आपके भीतर किसी ने उस आनंदपूर्ण अनुभव को भी जाना, उस आनंदपूर्ण सुषुप्ति को भी जाना । तो आपके भीतर जानने वाला, देखने वाला जो साक्षी है, वह सतत मौजूद है । मन सतत परिवर्तनशील है और साक्षी सतत अपरिवर्तनशील हें । इसलिए साक्षीभाव मन का हिस्सा नहीं हो सकता ।

और फिर, मन की जो-जो क्रियाएं है, उनको भी आप देखते है । आपके भीतर विचार चल रहे हैं। आप शांत बैठ जाएं, आपको विचारो का अनुभव होगा कि वे चल रहे है, आपको दिखाई पडेंगे ।अगर शांत भाव से देखेंगे, तो वे विचार वैसे ही दिखाई पडेंगे, जैसे रास्ते पर चलते हुए लोग दिखाई पड़ते है । फिर अगर विचार शून्य हो जाएंगे, विचार शांत हो जाएंगे, तो यह दिखाई पड़ेगा कि विचार शांत हो गए हैं, शून्य हो गए है, रास्ता खाली हो गया ।

निश्चित ही जो विचारों को देखता है, वह विचार से अलग होगा । वह जो हमारे भीतर देखने वाला तत्व है, वह हमारी सारी क्रियाओ से, सबसे भिन्न और अलग है । जब आप श्वास को देखेंगे, श्वास को देखते रहेंगे, देखते-देखते श्वास शांत होने लगेगी । एक घड़ी आएगी, आपको पता ही नहीं चलेगा कि श्वास चल भी रही है या नहीं चल रही है । जब तक श्वास चलेगी, तब तक दिखाई पड़ेगा कि श्वास चल रही है । और जब श्वास नहीं चलती हुई मालूम पड़ेगी, तब दिखाई पड़ेगा कि श्वास नहीं चल रही है । लकिन दोनों स्थितियों में देखने वाला पीछे खड़ा हुआ है ।

यह जो साक्षी है, यह जो विटनेस है, यह जो अवेयरनेस है पीछे यह जो बोध का बिंदु है, यह बिंदु मन के बाहर है, मन की क्रियाओ का हिस्सा नहीं है । क्योकि मन की क्रियाओं को भी यह जानता है । जिसको हम जानते हैं, उससे हम अलग हो जाते हैं । जिसको भी आप जान सकते हैं, उससे आप अलग हो सकते है । क्योंकि आप अलग हैं ही, नहीं तो उसको जान ही नही सकते । जिसको आप देख रहे है, उससे आप अलग हो जाते है । क्योंकि जो दिखाई पड़ रहा है वह अलग होगा और जो देख रहा है वह अलग होगा ।

साक्षी को आप कभी नहीं देख सकते । आपके भीतर जो साक्षी है, उसको आप कभी नहीं देख सकते । उसको कौन देखेगा, जो देखेगा वह आप हो जाएंगे और जो दिखाई पड़ेगा वह अलग हो जाएगा । साक्षी आपका स्वरूप है । उसे आप देख नहीं सकते । क्योंकि देखने वाला, आप अलग हो जाएंगे, तो फिर वही साक्षी होगा जो देख रहा है । जो दृश्य बन जाएगा, ऑब्जेक्ट बन जाएगा, वह फिर आत्मा नहीं रहेगी ।

साक्षीभाव जो है वह आत्मा मे प्रवेश का उपाय है ।

असल में पूर्ण साक्षी स्थिति को उपलब्ध हो जाना, स्वरूप को उपलब्ध हो जाना है । वह मन की कोई क्रिया नहीं है । और जो भी मन की क्रियाएं हैं, वे फिर ध्यान नहीं होंगी । इसलिए मै जप को ध्यान नहीं कहता हूं । वह मन की क्रिया है । किसी मंत्र को स्मरण करने को ध्यान नहीं कहता हूं । वह भी मन की किया है । किसी पूजा को, किसी पाठ को ध्यान नहीं कहता हूं । वे सब मन की क्रियाएं हैं । सिर्फ एक ही आपके भीतर रहस्य का मार्ग है, जो मन का नहीं है, वह साक्षी का है । जिस-जिस मात्रा मे आपके भीतर साक्षी का भाव गहरा होता जाएगा, आप मन के बाहर होते जाएंगे । जिस क्षण साक्षी का भाव पूरा प्रतिष्ठित होगा, आप पाएंगे मन नहीं है ।

 

अनुक्रम

साक्षी की साधना

1

अनंत धैर्य और प्रतीक्षा

9

2

श्रद्धा-अश्रद्धा से मुक्ति

25

3

सहज जीवन-परिवर्तन

47

4

विवेक का जागरण

67

5

प्रेम है परम सौदर्य

87

6

समाधि का आगमन

105

7

ध्यान अक्रिया है

125

8

अहंकार का विसर्जन

137

साक्षी का बोध

1

ध्यान आत्मिक दशा है

147

2

साक्षीभाव

155

3

ध्यान एकमात्र योग है

175

4

सत्य की खोज

189

5

ध्यान का द्वार : सरलता

201

ओशो-एक परिचय

215

ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिजॉर्ट

216

ओशो का हिंदी साहित्य

217

 

साक्षी की साधना: Silence of Witness

Item Code:
NZA656
Cover:
Paperback
Edition:
2012
ISBN:
9788172611828
Language:
Hindi
Size:
8.0 inch X 6.0 inch
Pages:
224(13 B/W illustrations)
Other Details:
Weight of the Book: 330 gms
Price:
$20.00   Shipping Free
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
साक्षी की साधना: Silence of Witness

Verify the characters on the left

From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 2408 times since 15th Feb, 2014

पुस्तक  के विषय में

अंधेरा हटाना हो, तो प्रकाश लाना होता है। और मन हटाना हो, तो ध्यान लाना होता है। मन को नियंत्रित नहीं करना है, वरन जानना है कि व है ही नहीं। यह जानते ही उससे मुक्ति हो जाती है।

यह जानना साक्षी  चैतन्य से होता है। मन के साक्षी बनें। जो है उसके साक्षी बनें। कैसे होना चाहिए इसकी चिंता छोड़ दें। जो है जैसा है उसके प्रति जागें जागरूक हों। कोई निर्णय न लें कोई नियंत्रण न करें किसी संघर्ष में न पड़े। बस मौन होकर देखें। देखना ही यह साक्षी होना ही मुक्ति बन जाता है।

साक्षी बनत ही चेतना दृष्टा को छोड़ द्रष्टा पर स्थिर हो जाती है। इस स्थिति में अकंप प्रज्ञा की ज्योति उपलब्ध होती है। और यही ज्योति मुक्ति है।

साक्षीभाव आत्मा में प्रवेश का उपाय

पूछा है कि यह जो साक्षीभाव है, क्या यह भी मन की क्रिया होगी?

नहीं, अकेली एक ही क्रिया है, जो मन की नहीं है, और वह साक्षीभाव है । इसे थोड़ा समझना जरूरी है । और केवल साक्षीभाव ही मनुष्य को आत्मा में प्रतिष्ठा दे सकता है । क्योंकि वही हमारे जीवन में एक सूत्र है जो मन का नहीं है, माइंड का नहीं है ।

आप रात को स्वप्न देखते है । सुबह जाग कर पाते हैं कि स्वप्न था और मेंने समझा कि सत्य है । सुबह स्वप्न तो झूठा हो जाता है, लेकिन जिसने स्वप्न देखा था, वह झूठा नहीं होता । उसे आप मानते है कि जिसने देखा था, वह था जो देखा था, वह स्वप्न था । आप बच्चे थे, युवा हो गए; बचपन तो चला गया, युवापन आ गया; युवावस्था भी चली जाएगी, बुढ़ापा आ जाएगा । लेकिन जिसने बचपन को देखा, युवावस्था को देखा, बुढापे को देखेगा, वह न आया और न गया, वह मौजूद रहा । सुख आता है, सुख चला जाता है । दुख आता है, दुख चला जाता है । लेकिन जो दुख को देखता है और सुख को देखता है, वह मौजूद बना रहता है ।

तो हमारे भीतर दर्शन की जो क्षमता है, वह सारी स्थितियों में मौजूद बनी रहती है । साक्षी का जो भाव है, वह जो हमारी देखने की क्षमता है, वह मौजूद बनी रहती है । वही क्षमता हमारे भीतर अविच्छिन्न रूप से, अपरिवर्तित रूप से मौजूद है ।

आप बहुत गहरी नींद में हो जाएं तो भी सुबह कहते है, रात बहुत गहरी नींद आई, रात बड़ी आनंदपूर्ण निद्रा हुई । आपके भीतर किसी ने उस आनंदपूर्ण अनुभव को भी जाना, उस आनंदपूर्ण सुषुप्ति को भी जाना । तो आपके भीतर जानने वाला, देखने वाला जो साक्षी है, वह सतत मौजूद है । मन सतत परिवर्तनशील है और साक्षी सतत अपरिवर्तनशील हें । इसलिए साक्षीभाव मन का हिस्सा नहीं हो सकता ।

और फिर, मन की जो-जो क्रियाएं है, उनको भी आप देखते है । आपके भीतर विचार चल रहे हैं। आप शांत बैठ जाएं, आपको विचारो का अनुभव होगा कि वे चल रहे है, आपको दिखाई पडेंगे ।अगर शांत भाव से देखेंगे, तो वे विचार वैसे ही दिखाई पडेंगे, जैसे रास्ते पर चलते हुए लोग दिखाई पड़ते है । फिर अगर विचार शून्य हो जाएंगे, विचार शांत हो जाएंगे, तो यह दिखाई पड़ेगा कि विचार शांत हो गए हैं, शून्य हो गए है, रास्ता खाली हो गया ।

निश्चित ही जो विचारों को देखता है, वह विचार से अलग होगा । वह जो हमारे भीतर देखने वाला तत्व है, वह हमारी सारी क्रियाओ से, सबसे भिन्न और अलग है । जब आप श्वास को देखेंगे, श्वास को देखते रहेंगे, देखते-देखते श्वास शांत होने लगेगी । एक घड़ी आएगी, आपको पता ही नहीं चलेगा कि श्वास चल भी रही है या नहीं चल रही है । जब तक श्वास चलेगी, तब तक दिखाई पड़ेगा कि श्वास चल रही है । और जब श्वास नहीं चलती हुई मालूम पड़ेगी, तब दिखाई पड़ेगा कि श्वास नहीं चल रही है । लकिन दोनों स्थितियों में देखने वाला पीछे खड़ा हुआ है ।

यह जो साक्षी है, यह जो विटनेस है, यह जो अवेयरनेस है पीछे यह जो बोध का बिंदु है, यह बिंदु मन के बाहर है, मन की क्रियाओ का हिस्सा नहीं है । क्योकि मन की क्रियाओं को भी यह जानता है । जिसको हम जानते हैं, उससे हम अलग हो जाते हैं । जिसको भी आप जान सकते हैं, उससे आप अलग हो सकते है । क्योंकि आप अलग हैं ही, नहीं तो उसको जान ही नही सकते । जिसको आप देख रहे है, उससे आप अलग हो जाते है । क्योंकि जो दिखाई पड़ रहा है वह अलग होगा और जो देख रहा है वह अलग होगा ।

साक्षी को आप कभी नहीं देख सकते । आपके भीतर जो साक्षी है, उसको आप कभी नहीं देख सकते । उसको कौन देखेगा, जो देखेगा वह आप हो जाएंगे और जो दिखाई पड़ेगा वह अलग हो जाएगा । साक्षी आपका स्वरूप है । उसे आप देख नहीं सकते । क्योंकि देखने वाला, आप अलग हो जाएंगे, तो फिर वही साक्षी होगा जो देख रहा है । जो दृश्य बन जाएगा, ऑब्जेक्ट बन जाएगा, वह फिर आत्मा नहीं रहेगी ।

साक्षीभाव जो है वह आत्मा मे प्रवेश का उपाय है ।

असल में पूर्ण साक्षी स्थिति को उपलब्ध हो जाना, स्वरूप को उपलब्ध हो जाना है । वह मन की कोई क्रिया नहीं है । और जो भी मन की क्रियाएं हैं, वे फिर ध्यान नहीं होंगी । इसलिए मै जप को ध्यान नहीं कहता हूं । वह मन की क्रिया है । किसी मंत्र को स्मरण करने को ध्यान नहीं कहता हूं । वह भी मन की किया है । किसी पूजा को, किसी पाठ को ध्यान नहीं कहता हूं । वे सब मन की क्रियाएं हैं । सिर्फ एक ही आपके भीतर रहस्य का मार्ग है, जो मन का नहीं है, वह साक्षी का है । जिस-जिस मात्रा मे आपके भीतर साक्षी का भाव गहरा होता जाएगा, आप मन के बाहर होते जाएंगे । जिस क्षण साक्षी का भाव पूरा प्रतिष्ठित होगा, आप पाएंगे मन नहीं है ।

 

अनुक्रम

साक्षी की साधना

1

अनंत धैर्य और प्रतीक्षा

9

2

श्रद्धा-अश्रद्धा से मुक्ति

25

3

सहज जीवन-परिवर्तन

47

4

विवेक का जागरण

67

5

प्रेम है परम सौदर्य

87

6

समाधि का आगमन

105

7

ध्यान अक्रिया है

125

8

अहंकार का विसर्जन

137

साक्षी का बोध

1

ध्यान आत्मिक दशा है

147

2

साक्षीभाव

155

3

ध्यान एकमात्र योग है

175

4

सत्य की खोज

189

5

ध्यान का द्वार : सरलता

201

ओशो-एक परिचय

215

ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिजॉर्ट

216

ओशो का हिंदी साहित्य

217

 

Post a Comment
 
Post Review
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy

Based on your browsing history

Loading... Please wait

Related Items

अध्यात्म उपनिषद (ओशो): Adhyatma Upanishad (Osho)
by Osho
Hardcover (Edition: 2015)
Osho Media International
Item Code: HAA273
$40.00
Add to Cart
Buy Now
मरौ हे जोगी मरौ: Osho on Gorakhnath
by ओशो (Osho)
Hardcover (Edition: 2013)
OSHO Media International
Item Code: NZA633
$40.00
Add to Cart
Buy Now
सत भाषै रैदास: Osho on Raidas
Item Code: NZE219
$25.00
Add to Cart
Buy Now
ध्यान-सूत्र: Dhyana Sutra by Osho
by ओशो (Osho)
Paperback (Edition: 2012)
Osho Media International
Item Code: NZA890
$20.00
Add to Cart
Buy Now
चित चकमल लागै नहीं: Discourses by Osho
by ओशो (Osho)
Paperback (Edition: 2012)
Osho Media International
Item Code: NZA889
$12.00
Add to Cart
Buy Now
ज्योतिष विज्ञान: Science of Astrology
by ओशो (Osho)
Hardcover (Edition: 2013)
Osho Media International
Item Code: NZA915
$20.00
Add to Cart
Buy Now
गीता दर्शन : Gita Darshan (Set of 8 Volumes)
by ओशो (Osho)
Hardcover (Edition: 2013)
Osho Media International
Item Code: NZB929
$325.00
Add to Cart
Buy Now
क्रांतिबीज: The Seeds of Revolution
by ओशो (Osho)
Paperback (Edition: 2013)
Osho Media International
Item Code: NZA907
$25.00
Add to Cart
Buy Now
पिव पिव लागी प्यास: Piv Piv Lagi Pyaas
by ओशो (Osho)
Hardcover (Edition: 2014)
OSHO Media International
Item Code: NZA655
$30.00
Add to Cart
Buy Now
जीवन रहस्य: Secret of Life
by ओशो (Osho)
Hardcover (Edition: 2013)
OSHO Media International
Item Code: NZA624
$25.00
Add to Cart
Buy Now

Testimonials

I am overwhelmed with the amount of hard-to-find Hindu scriptural texts that I have been able to locate on the Exotic India website as well as other authentic cultural items from India. I am impressed with your fast and reliable shipping methods.
Lee Scott, USA
Your service is excellent.
Shambhu, USA
Exotic India has the best selection of Hindu/Buddhist statues at the best prices and best shipping that I know of.I have bought many statues from them.I am thankful for their online presence.
Michael, USA
Thanks for sharpening our skills with wisdom and sense of humor.The torchbearers of the ancient deity religion are spread around the world and the books of wisdom from India bridges the gap between east and west.
Kaushiki, USA
Thank you for this wonderful New Year sale!
Michael, USA
Many Thanks for all Your superb quality Artworks at unbeatable prices. We have been recommending EI to friends & family for over 5 yrs & will continue to do so fervently. Cheers
Dara, Canada
Thank you for your wonderful selection of books and art work. I am a regular customer and always appreciate the excellent items you offer and your great service.
Lars, USA
Colis bien reçu, emballage excellent et statue conforme aux attentes. Du bon travail, je reviendrai sur votre site !
Alain, France
GREAT SITE. SANSKRIT AND HINDI LINGUISTICS IS MY PASSION. AND I THANK YOU FOR THIS SITE.
Madhu, USA
I love your site and although today is my first order, I have been seeing your site for the past several years. Thank you for providing such great art and books to people around the World who can't make it to India as often as we would like.
Rupesh
TRUSTe
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2018 © Exotic India