| Specifications |
| Publisher: Naman Prakashan | |
| Author Pramila Upadhyay | |
| Language: Hindi | |
| Pages: 352 | |
| Cover: HARDCOVER | |
| 9.0x6.0 Inch | |
| Weight 570 gm | |
| Edition: 2024 | |
| ISBN: 9789395356510 | |
| HCF805 |
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: डॉ. प्रमिला
उपाध्याय जन्म : जोधपुर (राजस्थान) पिता का नाम: श्री ओमप्रकाश जी जोशी पति का नाम:
श्री सुशील जी उपाध्याय पुत्र-पुत्रीः सुमित उपाध्याय, अंजली उपाध्याय शिक्षा : 1.
पी.एच.डी. 2. एम.ए. (इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त, विश्व विद्यालय) दिल्ली 3. बी.एड.
कश्मीर युनिवर्सिटी (जम्मू-कश्मीर) 4. एम.एड. डॉ. हरिसिंग गौड़ युनिवर्सिटी (सागर),
मध्य प्रदेश 5. एम.बी.ए. कर्नाटक स्टेट ओपन युनिवर्सिटी 6. एल.एल.बी. दिल्ली युनिवर्सिटी
7. सी.टी.टी.सी इंदिरा गाँधी कम्प्यूटर साक्षरता मिशन 8. सर्टिफिकेट इन न्यूट्रिशन
एन्ड चाइल्ड केयर (इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त, विश्वविद्यालय-दिल्ली) प्राचार्या,
शिवप्रकाश मेमोरियल विद्यालय, दादरा नगर हवेली। भाजपा प्रदेश महिला मोर्चा उपाध्यक्ष,
दादरा नगर हवेली व दमन व दीव सलाहकार समिति की सदस्या कोयला मंत्रालय भारत सरकार अध्यक्षा,
निर्भया फाउंडेशन, दादरा नगर हवेली विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नारी समस्याओं पर लेखन
कार्य। दिव्य भास्कर पत्रिका द्वारा वर्ष 2022 और 2024 में महिला सशक्तिकरण सम्मान
राजभाषा विभाग द्वारा हिन्दी पखवाड़ा में अनेक पुरस्कार।
राष्ट्रभाषा
हिन्दी के प्रति गहरे लगाव ने मुझे वचपन से ही सदैव उत्साहित किया है यही कारण था कि
मैंने हिन्दी को ही अपना अध्ययन का विषय चुना। सन् 2008 में इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय
मुक्त विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् मेरी इच्छा
हुई कि मैं अध्ययन की निरन्तरता बनाये रखें। अस्तु मैंने कई महान् साहित्यकारों के
कथा साहित्य का गहन अध्ययन किया जिनमें कई महिला लेखिकाएं भी थी। अध्ययन-अध्यापन के
बीच मैंने यह पाया कि स्वतंत्रता के पश्चात् तमाम साहित्यकारों ने अपने कथा साहित्य
में पारिवारिक जीवन से संदर्भित स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर कथा का ताना-बाना बुना
है। एक कामकाजी महिला होने के नाते मेरा पारिवारिक विशेषतः दाम्पत्य जीवन सामान्य घरेलु
महिला से कुछ भिन्न होना स्वाभाविक ही है। अतः मन के भीतर एक ललक उत्पन्न हुई कि कथा-साहित्य
के माध्यम से उसमें चित्रित दाम्पत्य सम्बन्धों के बारे में भी कुछ पड़ताल करने की।
इसी क्रम में मैंने मन्नू भंडारी, कृष्णा सोबती, शिवानी, उषा प्रियवंदा, मंजुला भगत,
सुधा अरोड़ा, चित्रा मुद्गल, मालती जोशी, मैत्रेयी पुष्पा, मुट्टला गर्ग, प्रभा खेतान,
मेहरुनिसा परवेज, ममता कालिया, तसलीमा नसरीन, अलका सरावगी के उपन्यासों का अध्ययन किया।
इनके उपन्यासों में वर्णित दाम्पत्य सम्बन्धों को लेकर उत्पन्न विडंबनापूर्ण स्थिति
को देखकर मन भींग गया। भींगे मन से मैं निरन्तर सोचती रहती कि हमारे ग्रंथों में वर्णित
सोलह संस्कारों में पवित्रतम पाणिग्रहण संस्कार से जुड़े. इस जीवन के साथ क्या हो रहा
है? यही कारण था कि इन त्रय लेखिकाओं (मन्नू भंडारी, प्रभा खेतान, अलका सरावगी) द्वारा
रचित उपन्यास साहित्य में विवेचित स्त्री-पुरुष संबंधों पर लेखन कार्य करने का निश्चय
किया। हम उत्तर आधुनिकतावादी समय में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं इस जीवन के केन्द्र
में है हमारे अंतर्विरोध एवं अवधारणात्मक विचारधाराएँ। आज के बदलते संदभों और मानदंडों
के लिए सबसे महत्वपूर्ण विषय है पति-पत्नी का दाम्पत्य जीवन। स्त्री का जीवन आज के
संदों में पारिवारिक जीवन की महत्वपूर्ण कड़ी है। नारी सदैव पितृसतात्मक समाज द्वारा
सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, नैतिक एवा अन्यान्य प्रकार के दबावों से पीड़ित रहती आई
है नारी। हमारे समाज में युगों-युगों से पल्लवित अनावश्यक रुढीगत मान्यता और वर्तमान
मान्यताओं में भी पीड़ित है। नारी का चरित्र और उसका जैविक अस्तित्व पुरुष वर्चस्ववादी
समाज ने ले लिया है। समकालीन युग स्त्री चिन्तन का केन्द्र विन्दु है साहित्यिक क्षेत्र
में विभिन्न भाषाओं में विभिन्न समाजों में दाम्पत्य जीवन में आए गतिरोध को समझने की
आवश्यकता है। आज का साहित्य स्त्री-पुरुष संबंधों को कई आयामों में उजागर कर रहा हैं।
विगत दशकों में घटित स्त्री-पुरुष संबंधों, लोमहर्षक कांडों, दुर्घटनाओं, विचारों और
बहसों के चलते ही मेरे प्रश्नाकुल मन में हमारे समय की महत्त्वपूर्ण महिला कथाकारों
ने अपने-अपने रचना संसार के माध्यम से दाम्पत्य जीवन की बिडम्बनाओं और विचलनों को समझने
की गहरी उत्सुकता जागृत हुई। समकालीन परिदृश्य की महत्त्वपूर्ण लेखन से जुड़े मन्नू
भंडारी, प्रभा खेतान, अलका सरावगी के लेखन और उससे उपजी विचारोत्तेजक बहस ने इस विषय
के अध्ययन की महत्ता को और बढ़ा दिया है। प्राचीनकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल में दाम्पत्य
संबंधों को लेकर अनेक परिवर्तन हुए। बदलते मूल्यों एवं बदलते प्रतिमानों के परिप्रेक्ष्य
में पति-पत्नी संबंधों में अनेक परिवर्तन हुए हैं। इसका सीधा असर-असर हमारे समाज और
प्राचीनकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल में दाम्पत्य संबंधों को लेकर अनेक परिवर्तन हुए।
बदलते मूल्यों एवं बदलते प्रतिमानों के परिप्रेक्ष्य में पति-पत्नी संबंधों में अनेक
परिवर्तन हुए हैं। इसका सीधा असर-असर हमारे समाज और संस्कृति पर पड़ा है। इन बदलते
प्रतिमानों के कारण दाम्पत्य संबंध विडंबना पूर्ण स्थिति को प्राप्त होने लगे हैं।
हमारा धार्मिक संस्कार, सांस्कृतिक संस्कार और पारिवारिक संस्कार बदलने लगा है। इसका
सबसे बड़ा कारण बदलता हुआ समाज है। सामाजिक परिवर्तन का असर पारिवारिक परिप्रेक्ष्यों
पर भी पड़ता है क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज में हो रहे छोटे-बड़े
परिवर्तन उसके पारिवारिक एवं दाम्पत्य संबंधों को प्रभावित करते हैं। मैंने लेखन कार्य
की कड़ी में जुड़ते समय यह पाया कि हमारा भारतीय समाज और संस्कृति जिसकी एक मूलभूत
संरचना दाम्पत्य संबंध हैं वे बड़े ही विघटन पूर्ण स्थिति में है। आज के भारतीय समाज
पर औद्योगिकरण, बाजारवाद और भूमण्डलीकरण दुनिया की चकाचौंध में सारी चीजे हम सभी को
प्रभावित कर रही है। आज हमारे समक्ष दाम्पत्य संदर्भों को लेकर अनेक चुनौतियों है।
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