पुस्तक परिचय
भारत के वास्तुशिल्प, मूर्तिकला, कला और शिल्प की जड़े भारतीय सभ्यता के इतिहास में बहुत दूर गहरी प्रतीत होती हैं। भारतीय मूर्तिकला आरम्भ से ही यचार्य रूप लिए हुए है, जिसमें मानव आकृतियों में प्रायः पतली कमर, लचीले अंगों और एक तरुण और संवेदनापूर्ण रूप को चित्रित किया जाता है। भारतीय मूर्तियों में पेड़-पौधों और जीव जन्तुओं से लेकर असंख्य देवी-देवताओं को चित्रित किया गया है।
प्रस्तुत पुस्तक को हर दृष्टि से उपयुक्त बनाने का प्रयास किया गया है। पुस्तक की भाषा सरल रखी गई है। आशा है, पाठक पुस्तक का अध्ययन कर लाभान्वित होंगे।
लेखक परिचय
आगरा में जन्मी डॉ. अननू महाजन ने आगरा कॉलेज, डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा से चित्रकला में परास्नातक (प्रथम श्रेणी, प्रथम पद) की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने दो बार National Eligibility Test पास करने के उपरान्त डॉ. चित्रलेखा सिंह भूतपूर्व डायरेक्टर ललित कला संस्थान, के निर्देशन में शोध कार्य की उपाधि प्राप्त की। प्रारम्भ से ही उनकी चित्रांकन एवं लेखन में रुचि रही है।
चित्रकारिता एवं लेखन के साथ-साथ कता शिक्षण करते हुए क्रमशः एम.जी.पी.जी. कॉलेज, फिरोजाबाद, आगरा कॉलेज, आगरा, ललित कला संस्थान, इन्स्टीट्यूट ऑफ फाइन आर्टस, डॉ. भीम राव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, आगरा, राजकीय विद्यालय, दिल्ली होते हुये आज वी. आर.ए.एल. राजकीय महिला महाविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं।
विभिन्न कला प्रदर्शनियों, कप्ता शिविरों, कार्यशालाओं, संगोष्ठियों एवं राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सेमीनारों में डॉ. अन्नू की निरन्तर प्रतिभागिता रही है।
कला विषय पर विभिन्न राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में उनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।
प्रस्तावना
भारत के वास्तुशिल्प, मूर्तिकला, कला और शिल्प की जड़े भारतीय सभ्यता के इतिहास में बहुत दूर गहरी प्रतीत होती हैं। भारतीय मूर्तिकला आरम्भ से ही यथार्थ रूप लिए हुए है, जिसमें मानव आकृतियों में प्रायः पतली कमर, लचीले अंगों और एक तरूण और संवेदनापूर्ण रूप को चित्रित किया जाता है। भारतीय मूर्तियों में पेड़-पौधों और जीव जन्तुओं से लेकर असंख्य देवी-देवताओं को चित्रित किया गया है।
भारत की सिंधु घाटी सभ्यता के मोहनजोदड़ों के बड़े-बड़े जल कुण्ड प्राचीन मूर्तिकला का एक श्रेष्ठ उदाहरण हैं। दक्षिण के मंदिरों जैसे कि कांचीपुरम, मदुरै, श्रीरंगम और रामेश्वरम तथा उत्तर में वाराणसी के मंदिरों की नक्काशी की उस उत्कृष्ट कला के चिर-प्रचलित उदाहरण है, जो भारत में समृद्ध हुई।
केवल यही नहीं, मध्य प्रदेश के खजुराहो मंदिर और उड़ीसा के सूर्य मंदिर में इस उत्कृष्ट कला का जीता जागता रूप है। सांची स्तूप की मूर्तिकला भी बहुत भव्य है जो तीसरी सदी ई.पू. से ही इसके आस-पास बनाए गए जंगलों (बालुस्ट्रेड्स) और तोरण द्वारों को अलंकृत कर रही हैं। मामल्लापुरम का मंदिर; सारनाथ संग्रहालय के लायन केपीटल (जहां से भारत की सरकारी मुहर का नमना तैयार किया गया था) में मोर्य की पत्थर की मूर्ति, महात्मा बुद्ध के जीवन की घटनाओं को चित्रित करने वाली अमरावती और नागर्जुनघोंडा की वास्तुशिल्पीय मूर्तियां इसके अन्य उदाहरण हैं।