| Specifications |
| Publisher: Naman Prakashan | |
| Author Sumanlata Srivastava | |
| Language: Hindi | |
| Pages: 141 | |
| Cover: HARDCOVER | |
| 9.0x6.0 Inch | |
| Weight 300 gm | |
| Edition: 2025 | |
| ISBN: 9789395356572 | |
| HCF680 |
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सन 1946 में
बुन्देलखंड के सागर जिले में जन्मी, संगीतशास्त्र में पी-एच. डी. तथा कालिदास साहित्य
में डी.लिट्. की उपाधि प्राप्त, ज्ञान और अनुभव की आभा से दीप्त सहज सरल व्यक्तित्व
की धनी डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव प्रतिष्ठित लेखिका होने के साथ साहित्य-कला-संस्कृति
के संरक्षण-संवर्धन में संलग्न रहती हैं। साहित्य, रवीन्द्रसंगीत, नृत्य, नाटक, हस्तकला,
गृहोद्यान एवं समाज-सेवा में रुचि आपको व्यस्त और स्वस्थ रखती हैं। संस्कृत, हिन्दी
एवं इतिहास की गोष्ठियों में अनेक शोधपत्रों का वाचन एवं प्रकाशन हो चुका है। कतिपय
पुस्तकों के सम्पादन का भी श्रेय आपको जाता है। संस्कृत वाड्मय में चतुष्षष्टि कलाओं
पर भी आपने उल्लेखनीय कार्य किया है। डॉ. सुमनलता के शोधकार्य के बाद 'संगीत संकल्प',
'गोंडी पब्लिक ट्रस्ट' एवं स्थानीय प्रशासन के सहयोग से मण्डला के रामनगर किले में
विस्मृत संगीतशास्त्री गोंडराजा हृदयशाह की स्मृति में 'हृदयशाह समारोह' का शुभारम्भ
हुआ, जो अब 'आदि उत्सव' के रूप में मनाया जाता है। यह मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक उपलब्धि
है।
यदि आप बुन्देली
बोली की मिठास और समृद्ध सांस्कृतिक वैभव के साथ, लोकजीवन के नाना रंगों, मानव-मन की
अतल गहराइयों, आशा-आकांक्षाओं के सहज-सुन्दर मर्मस्पर्शी संसार में डूबना चाहते हैं
तो श्री जगदीश पटेल की 'अमूर्त में मूर्त' चित्रकला से सुसज्जित, संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध
कथाकार डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव का नवीनतम बुन्देली कहानी-संग्रह 'स्वयंसिद्धा' अवश्य
पढ़ें।
एक निदर्शनः
"तीनइ भौजाइयें सास में बचाकें ताना मारवे सें नें चूकें। एक कहै- 'अरे, अपनी
बाई सूदरी हैं। उनें कौन पतुरियों घाई छंद-बंद आत हैं।' मनों कहवे खों कह जाएँ के ऐसी
भी का औरत, कै आदमी खों अपने तई बाँधकें नें रख सकै? दूसरी कहै- 'कौन माँ-बाप चाहत
हैं, के बेटी खों परदेस पठा देवें, बा तो उमर भर उनइ की आँखों के सामने रही आए, सोइ
अच्छी है।' रुकमनी मतलब समजत ती। कहबे की हती कै बिटियें सासरे मेंइ सोभा देती हैं;
आई-गई बनी रहें, सोइ सुहात है। तीसरी कहै-'लालाजी की खातरदारी में आनन्द कम नईंयाँ।
हम एते जानइ नें देहें।' इसारो समज कें रुकमनी खों गतको सो लगत ती - कुत्ता पालै, सो
कुत्ता; सुसराल जमाई सो कुत्ता।"
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