| Specifications |
| Publisher: GARUDA PRAKASHAN PVT. LTD. | |
| Author Pravin Godkhindi | |
| Language: HINDI | |
| Pages: 180 | |
| Cover: PAPERBACK | |
| 8.00x5.00 inch | |
| Weight 150 gm | |
| Edition: 2025 | |
| ISBN: 9798885752329 | |
| HCH217 |
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'प्रहर हर', प्रवीण गोडखिंडी द्वारा लिखित और नीलेश द्विवेदी द्वारा अनूदित यह उपन्यास शास्त्रीय संगीत में प्रयुक्त 'राग-समय सिद्धान्त' को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। जहाँ तक उपन्यास का प्रश्न है, इसे प्रवीण जी ने बहुत सुन्दर तरीके से लिखा है। इसमें 'राग-समय सिद्धान्त' के औचित्य को सुन्दर कहानी के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। रागों से उपचार, खास तौर से, मनोरोग अथवा इलाज में ऐसी स्थिति आने पर जहाँ एलोपैथी काम करना बन्द कर दे, वहाँ शास्त्रीय संगीत के रागों से उत्पन्न तरंगों से रोग की चिकित्सा हो सकती है, यह बात प्रमाणित करने की कोशिश की गई है। उपन्यास में प्रवीण जी शुरू से अंत तक रोचकता बनाए रखते हैं। उनका यह कौशल पाठकों के हृदय को छूता है। कहानी में पात्रों के मनोभावों का बहुत सुन्दर चित्रण हुआ है। उसे इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि वह पाठक के सामने दृश्य बिम्ब उपस्थित करती चलती है। हिन्दी में इस उपन्यास को पढ़ते वक्त ऐसा नहीं लगता कि हम अनुवाद पढ़ रहे हैं। यह नीलेश द्विवेदी के अनुवाद का कमाल है।
प्रवीण जी ने जिस विषय को लेकर यह उपन्यास लिखा है, वह कहानी कहने के लिहाज से एकदम नया है और संगीत जगत में विवादास्पद भी। राग के समय-सिद्धान्त को जब भी बनाया गया, उस समय देश, काल और परिस्थिति अलग थीं। आज ये तीनों चीजें एकदम बदल गई हैं। इसलिए इस सिद्धान्त के औचित्य पर प्रश्न स्वाभाविक तौर पर ही खड़ा होता है कि क्या आज इसकी जरूरत है? महफिल या संगीत समारोह अक्सर शाम को 6.30 से शुरू होकर 10.00 बजे के बीच समाप्त हो जाते हैं। शास्त्रीय संगीत के गायक या वादक इसी समय में राग 'मालकौंस', 'दरबारी', 'सोहनी' तक गा-बजा लेते हैं। प्रहर के हिसाब से ये सब रात्रि के अन्तिम प्रहर के राग हैं। अर्थात् समय के मान से कलाकार 6 से 8 घंटे आगे के राग गा-बजा लेते हैं और रसिक श्रोता उसका आनन्द भी लेते हैं। कोई एतराज नहीं करते। लेकिन वही कलाकार शाम की इन्हीं महफिलों में 6 से 8 घंटे पहले, यानी दिन के राग जैसे- 'तोड़ी', 'जौनपुरी', 'सारंग' के प्रकार, 'भीमपलास' आदि गाए-बजाए तो रसिक श्रोता आपत्ति जताने लगते हैं। यह विडम्बना उत्तर भारत में ही है। दक्षिण भारत में तो कर्नाटकीय गायकों, वादकों व रसिकों ने बहुत पहले राग के समय-सिद्धान्त को नकार दिया है। वहाँ सारे राग किसी भी समय में गाए-बजाए जाने लगे हैं।
इस बाबत मुझे अपना एक अनुभव याद आता है। वर्ष 2015 के आस-पास की बात है। संगीत रिसर्च अकादमी कोलकाता ने राग के समय-सिद्धान्त को लेकर मुम्बई के एनसीपीए (नेशनल सेन्टर ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स) में एक सेमिनार आयोजित किया था। उसमें हम दोनों भाइयों (गुन्देचा बन्धु) के अलावा पंडित शिवकुमार शर्मा भी मंच पर थे। पंडित शिवकुमार शर्मा जी ने उस समय राग के समय-सिद्धान्त को लेकर कहा था, "आज के समय में इसका कोई महत्त्व नहीं रह गया है, ऐसा मेरा व्यक्तिगत मत है। लेकिन शाम की संगीत सभा में मुझसे कोई कहे कि आप राग तोड़ी बजा दीजिए, तो मैं बिल्कुल नहीं बजाऊँगा।" इसका अर्थ यह हुआ कि खास तौर पर उत्तर भारत में गायक और वादक आज भी राग के समय-सिद्धान्त को तोड़ते हुए अपनी प्रस्तुति देने में संकोच करते हैं।
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