पुस्तक परिचय
विभिन्न अवसरों पर की जाने वाली पारम्परिक पूजा-पाठ का क्रियात्मक रूप कर्मकाण्ड है। यह वैदिक संस्कृति का प्रधान अंग है। इससे ही समस्त मनुष्यों की कामनाएँ सिद्ध होती है। कल्याण व लौकिक सुख शान्ति तथा मन में संकल्पित अनेकानेक इच्छाओं को पूर्ण करता है। इसका विधिवत् पालन करने से व्यक्ति पुण्य अर्जित करता है। हमें उन गहन अवसरों, हमारी सर्वोच्च आशाओं में अपने गहन विचारों और भावनाओं से जुड़ने के लिए आवश्यक अनुष्ठान को सक्षम बनाती है और परिपुष्ट करता है। हमें अपने बदलते शरीर और रिश्तों की वास्तविकताओं का सामना करने के लिए इसकी जरूरत है। वैदिक संस्कृति का कर्मकाण्ड प्रधान अंग है। यह मनुष्य के अनेको भौतिक और अध्यात्मिक इच्छाओं को पूर्ण करता है। कई ऋऋषि-महर्षि जो कर्मकण्डी थे, वे शास्त्रों के अनुसार ही अपना जीवन व्यतीत करते हुए कर्मकाण्ड के द्वारा अपना और जगत का कल्याण किया करते थे। कर्मकाण्ड का सम्बन्ध सिर्फ पूजा-पाठ, यज्ञ, विभिन्न प्रकार के अनुष्ठान से ही नहीं अपितु मानव इसकी स्कूल परिभाषा है। यह कर्मकाण्ड ज्ञान काण्ड एवं उपासना काण्ड का भी प्रतिपादन करता है । सम्पूर्ण वैदिक धर्म या वेद तीन काण्डों में विभिक्त है-
१. कर्मकाण्ड २. ज्ञानकाण्ड और ३. उपासना काण्ड | इसलिए मनुष्य को सद्गति के लिए कर्मकाण्ड एक आवश्यक विधा है। जो मनुष्य के समग्रता का परिचायक है ।
भूमिका
आत्मतत्व और शरीर का संयोग ही जीवन है, जिसको सुस्थिर रखने वाली क्रिया योग है। साथ ही इसका फलाफल चित्त की प्रसन्नता और विकारों का निस्तारणपूर्वक सदासयता का आधान है उत्कर्ष है। दूसरी ओर मनुष्य सृजनात्मक है और सूजन में सहभागिता परक भी, जिसका जन्म यज्ञ भगवान् उनकी भावना अथवा कारण ही संभव होता है। इसलिए प्रजापति ने यज्ञ को मनुष्य के साथ जुड़वा की तरह पैदा किया, यह व्यवस्था बनाते हुए कि मनुष्य और यज्ञ एक दूसरे का अभिवर्द्धन करते हुए फूलें-फलें। तात्पर्य यह कि मनुष्य अपनी आकांक्षा को मिटा कर परहित की भावना को परिष्कृत करता रहे, ताकि योग और यज्ञ का यह समन्वय योगत्व का परिचायक बन जाय और यही समन्वय के सिद्धान्त स्वरूप प्रतिपादित कर्मकाण्ड, जो हमारे लिए उपहार के तौर पर एक अनुपम तथा बहुयामि आयाम है, जीवन्त हो उठे। जिसका अस्तीत्व हम एक अरसे से स्वीकार करते आ रहे हैं, कर रहे हैं और करते रहेंगे। क्योंकि, यही सनातन है, यही भारतवर्ष का उत्कर्ष है। जगतगुरू कहलाने का अनोखा मापदण्ड है। हाँ, स्थान-काल परिस्थिति आदि के भेदों से समय-समय पर इसके विधि-विधानों में बदलाव होता रहा है, जो स्वभाविक है। किन्तु हमारी धर्मध्वजा यथावत् अटल है।
इसी परिप्रेक्ष्य में चाचाश्री स्मृतिशेष पं. दिवाकर पाण्डेय, (प्रक्रिया के पंडित) पिताश्री स्मृतिशेष पं. प्रभु पाण्डेय (सद् गृहस्थ) एवं मामाश्री स्मृति शेष पं. रामलषण पाण्डेय व्याकरणाचार्य (प्रधानाचार्य, श्री बंशीधर संस्कृत विद्यालय, फतेहपुर, गया) के असीम अनुकम्पा एवं सत्प्रेरणा से संबन्धित विभिन्न पद्धतियों के गहन अवलोकन के उपरान्त उपरान्त वैदिक एवं लौकिक परम्पराओं से अभिभूत यह संकलन प्रस्तुत है। विश्वास है सुधिजन इसे पसन्द करेंगे क्योंकि इसके अन्तर्गत देवपूजन-यज्ञोपवीत संस्कार-शुभ विवाह संस्कार आदि बहुत स्पष्ट और सरल ढंग से विवेचित हैं। प्रमाद बस कहीं भूल हो सकती है। कृपया उसे अन्यथा नहीं लेंगे और संसूचित करने का कष्ट करेंगे ताकि यथोचित त्रुटि का निवारण हो सके।