श्री संजय दीक्षित समकालीन भारत के अग्रणी बुद्धिजीवियों एवं प्रभावशाली मीडिया व्यक्तित्वों में से एक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित कर रहे हैं। उनके विचार स्वाभाविक रूप से गहन और प्रेरक हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 'जयपुर डायलॉग्स' नामक एक विशिष्ट मंच की स्थापना की है, जहाँ वे विभिन्न वक्ताओं और विषयों के माध्यम से धार्मिक और सांस्कृतिक विचारों पर व्यापक चर्चा करते हैं।
एक लेखक के रूप में, संजय जी ने भारत, हिन्दू दर्शन, और सनातन धर्म के समक्ष उपस्थित विविध चुनौतियों पर अधिकारपूर्वक और सटीक रूप से प्रकाश डाला है। उनकी पुस्तकें भारत की महान सभ्यता को विकृत करने के प्रयासों के विरुद्ध एक सशक्त और तार्किक प्रतिवाद प्रस्तुत करती हैं। ये पुस्तकें मीडिया और शैक्षिक संस्थानों द्वारा पोषित भ्रान्तियों और विकृतियों का खण्डन करती हैं, जो बाहरी सांप्रदायिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक शक्तियों के प्रभाव में संचालित होती हैं।
दीक्षित जी की नवीनतम पुस्तक सभी पन्थ एकसमान नहीं की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि यह विभिन्न पन्थों के मध्य विद्यमान महत्त्वपूर्ण भेदों को सुव्यवस्थित, तर्कसंगत, और अनुभवजन्य रूप से प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक इस पर गहन प्रकाश डालती है कि विभिन्न पन्थ मनुष्य, समाज, ज्ञान, ब्रह्माण्ड की प्रकृति, और जीवन के वास्तविक उद्देश्य को किस प्रकार परिभाषित और समझते हैं। यह पुस्तक कोरी भावुकता या राजनैतिक प्रेरणा से मुक्त है। इसके प्रत्येक विचार एक सुविचारित और तर्कशील दृष्टिकोण से उपजे हैं। सञ्जय जी ने सत्य की प्रस्तुति में किसी भी प्रकार की झिझक नहीं दिखाई है। उन्होंने न तो किसी पन्थ के प्रति पक्षपात किया है, न ही किसी घिसे-पिटे विचार को दोहराया है, और न ही पन्थों के बीच के मौलिक भेदों को अनदेखा किया है।
यह पुस्तक पन्थों के मध्य मौजूद आन्तरिक और बाह्य, व्यक्तिगत और सामूहिक, मानवीय और ब्रह्माण्डीय स्तरों पर मूलभूत भेदों को वैज्ञानिक स्पष्टता और तर्कसंगत दृष्टिकोण के साथ उजागर करती है।
संजय दीक्षित जी हिन्दू दर्शन और सनातन धर्म को उसके मूल सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत करते हैं, न कि अब्राहमिक और एकेश्वरवादी अवधारणाओं के संदर्भ में। वह यह स्पष्ट करते हैं कि सनातन धर्म एक सार्वभौमिक ज्ञान की सम्पूर्ण प्रणाली है, जिसे अपनी सामाजिक, वैज्ञानिक, या आध्यात्मिक प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए विरोधी पंथों की स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है।
अब्राहमिक पन्थों के विषय में श्री दीक्षित का ऐतिहासिक और सैद्धान्तिक दृष्टिकोण इन पन्थों में अन्तर्निहित अलगाववादी प्रवृत्ति और परम सत्य के प्रति इनके तर्कहीन दावे को स्पष्ट करता है, जिसका उद्देश्य परमतत्त्व के प्रति अन्य सभी दृष्टिकोणों को अपवित्र और अयोग्य ठहराना है। दीक्षित जी उन मान्यताओं का वर्णन करते हैं जिनकी कारण ईसाइयत और इस्लाम आज भी विरोधियों पर आधिपत्य स्थापित करने और आपस में संघर्ष करने की ओर प्रेरित होते हैं। यह प्रवृत्ति उनके मतवाद और परलोक-विद्या में गहराई से अन्तर्निहित है।
एकेश्वरवादी पंथों में वर्चस्ववाद की जड़ों को वैध ठहराने के लिए, इन पंथों को अपने यहूदी मूल से मुँह मोड़ना पड़ता है; ताकि उनके मूल और अन्तिम दैवी सत्य होने के दावे को वैध ठहराया जा सके जिसकी तुलना में शेष सबकुछ नष्ट करने योग्य है। इस प्रकार का विनाशकारी व्यवहार एकेश्वरवादी पंथों के मतवाद को प्रतिबिम्बित करता है; और जब तक यह उनकी मान्यता-आधारित जड़ों में उपस्थित है, इसका अन्त नहीं हो सकता है। दीक्षित जी इस तथ्य को मानवता के भविष्य के लिए एक चेतावनी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार, यह प्रवृत्ति निरंतर संघर्षों, या यहाँ तक कि विनाशकारी विश्वयुद्धों, का कारण बन सकती है। आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक युद्ध, इज़राइल में जारी संघर्ष, और भारत पर पाकिस्तान के निरंतर आक्रमण जैसे उदाहरण इसकी पुष्टि करते हैं।
दीक्षित जी अपनी पुस्तक यह स्पष्ट करते हैं कि हमें मतांतरण आधारित एकेश्वरवाद में व्याप्त विरोधाभासों और संकटों को समझना चाहिए। जब तक इन्हें चुनौती देकर दूर नहीं किया जाता तब तक ऐसे वर्चस्ववादी पंथों के साथ कोई भी सन्धि या समझौते विश्व में स्थायी शान्ति नहीं स्थापित कर सकते।
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