लेखक परिचय
डॉ. गणपत सिंह राजपुरोहित जन्म स्थान : ग्राम-फोगेरा, तहसील-गडरा रोड, जिला-बाड़मेर शिक्षा : एम.ए. नेट जेआरएफ, सेट इतिहास, एम.ए. नेट जेआरएफ अर्थशास्त्र (2011) भूगोल (2012), पीएच.डी. (2024) व्यवसाय : सहायक आचार्य इतिहास विभाग, कॉलेज शिक्षा विभाग, राजस्थान सरकार, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बाड़मेर, राजस्थान, भारत प्रकाशित शोध पत्र 1 हिंद स्वराज: वर्तमान प्रासंगिकता, 2. नई शिक्षा नीति 2020: चुनौतीपूर्ण राह, 3. मध्यकालीन मारवाड़ की बहियों में महारानियों की भूमिका समाज एवं कतिपय प्रमाण, 4. छठी शताब्दी ईसा पूर्व के गणतंत्रात्मक राज्य (वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता), 5. जैसलमेर राज्य की जातिगत व्यवस्था एवं उनके व्यवसायिक कार्य प्रकाशित पुस्तक : छठी शताब्दी ईसा पूर्व के गणतंत्रात्मक राज्य (वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता) उपलब्धि एवं पूर्व चयन वरिष्ठ अध्यापक, • प्राध्यापक, प्रधानाध्यापक, सहायक आचार्य (वर्तमान) विशेष रुचि : मूल एवं प्रमाणित स्रोतों के आधार पर वास्तविक शोध के माध्यम द्वारा तथ्यात्मक इतिहास
डॉ. जयश्री तंवर हसील-गडरा रोड, पिता : स्व. श्री मनवर सिंह तंवर ट इतिहास, एम.ए. भूगोल (2012), शिक्षा : एम.ए.-2008, एम.फिल.-2009, पीएच.डी.-2020 (इतिहास) इतिहास विभाग, सरकार, राजकीय राजस्थान, भारत प्रकाशन : 1. युग प्रवर्तक स्वामी विवेकानंद (2016), 2. भगवान गौतम बुद्ध एवं भारतीय समाज : एक अध्ययन (563 ईसा पूर्व से 12वीं शताब्दी के मध्य) 2021, 3. 6 शोध पत्रों का प्रकाशन स्वराज : वर्तमान 020 : चुनौतीपूर्ण की बहियों में कतिपय प्रमाण, णतंत्रात्मक राज्य . जैसलमेर राज्य सदस्यता : राजस्थान प्रदेश कार्यकारिणी सचिव, आदिशक्ति फाउंडेशन। सायिक कार्य ही ईसा पूर्व के प्रासंगिकता) संगोष्ठी : 20 से अधिक संगोष्ठियों में भागीदारी व अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्रों का प्रकाशन उ अध्यापक, बहायक आचार्य के आधार पर पात्मक इतिहास अनुभव : 10 वर्षों से अध्ययन एवं अध्यापन निरंतर जारी।
पुस्तक परिचय
जैसलमेर का राज्य अन्य राज्यों से अत्यन्त प्राचीन होने के कारण अपने आपमें एक प्रभावशाली अद्भुत पहचान रखता है। इसकी स्थापना 1156 ई. में रावल जैसल द्वारा की गई और यहाँ का विकास कर इसे मुख्य नगर के रूप में स्थापित किया। इस क्षेत्र की उत्तर पश्चिम की वह अवस्थिति थी जो इस राज्य के व्यापार वाणिज्य और आर्थिक दृष्टि सम्पन्नता के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। यहाँ के व्यापारिक मार्ग भी अपना विशेष स्थान रखते थे। इन मार्गों की सुरक्षा का भी उचित प्रबन्ध गढ़ियों व चौकियों के द्वारा किया गया था। सिन्ध के क्षेत्रों का सामान जैसलमेर मार्ग से होकर ही निकलता था। इसी प्रकार राजपुताने का व्यापारिक वर्ग इसी रास्ते से अपना माल सिन्ध तक पहुँचाते थे। इस हेतु जैसलमेर के शासकों ने मुख्य बाजारों का निर्माण कर अपनी महत्ता को और अधिक सुदृढ़ किया इससे कई व्यापारिक जातियाँ उभर कर सामने आई, स्थापत्य कला की ओर दृष्टि डाले तो पाते हैं कि यहाँ की भव्य इमारतें पीले पाषाणों द्वारा निर्मित अद्भुत सौंदर्य की छटा बिखेरती हैं। यहाँ के भवन, दुर्ग, जैन मंदिर, हिन्दू मंदिर, मृत्यु स्मारक और राजप्रसाद साथ ही जलस्रोत निर्माण व उनका स्थापत्य कारिगरों की कारीगरी एक अलग विशेषता लिए हुए है। यहाँ सामाजिक, सांस्कृतिक इतिहास एक विशेष पहचान लिए हुए है। भिन्न-भिन्न जाति विशेष की वेशभूषा व आभूषण चटक रंगों के कारण विशेष रूप से ध्यान आकृष्ट करती हैं। यहाँ के शासकों के द्वारा किये गए शाके विश्वविख्यात हैं और इनके संघर्षों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि यह राज्य जो भाटियों की स्थली था कई बार उजड़ा और कई बार बसा जो गजनी से भटनेर और जैसलमेर तक विस्तृत था। इनके संघर्षों ने जैसलमेर शासकों के वैभव, मान-सम्मान और गौरवान्वित करने वाली स्वाभिमानता को बढ़ाया। जैसलमेर के शासकों ने अपने राज्य में अनेकों स्थापत्य निर्माण करवाए परन्तु शासक वर्ग के साथ-साथ यहाँ के अधिकारी व व्यापारी वर्ग ने भी अनेकों सुन्दर स्थापत्य निर्माण स्वरूप कई हवेलियां बनवाई जिनमें नथमल की हवेली, दीवान सालमसिंह की हवेली, पटवों की हवेलियां अपना विशेष स्थान रखती हैं। उत्तर पश्चिम से होने वाले आक्रमणों से जैसलमेर के शासकों ने रक्षात्मक दृष्टिकोण अपनाया चूंकि यहाँ की अवस्थिति उत्तर पश्चिम की ओर होने के कारण पहला सामना जैसलमेर रियासत का ही होता था। यहाँ के भाटी शासकों ने आक्रान्ताओं को हर संभव राज्य प्रवेश से रोकने का प्रयास किया। अतः ये अपने राज्य में प्रवेश करने वालों को रोकने का द्वार बनकर इस क्षेत्र की रक्षा करते थे। अतः सुरक्षा प्रदान करने के कारण इन्हें 'उत्तर भड़ किवाड़ भाटी' की उपाधि से अलंकृत किया गया था।
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