प्रस्तुत पुस्तक मेरे मौलिक उपाधि के लिये लिखित शोध ग्रन्थ का परिवर्तित, परिष्कृत रूप है। प्रस्तुत पुस्तक में बीसवी शताब्दी में वाराणसी में में महिला शिक्षा के विकास का एक क्रमबद्ध, वैज्ञानिक एवं गवेषणात्मक (शोधपरक) इतिहास का उल्लेख किया गया है। वाराणसी के सम्बन्ध में किये गये विभिन्न अध्ययन यह इंगित करते हैं कि वाराणसी इतिहास का शहर है जहाँ ऊर्जा संस्कृति में रूपांतरित हुयी है। विश्व के कुछ नगरों को पृथ्वी का केन्द्र कहा जाता है, जब कि वाराणसी को इतिहास से भी पुराना एवं विश्व और ब्रहमस्ता के मध्य में अभिकेन्द्रित तीर्थ कहा गया है।
वाराणसी के सांस्कृतिक एवं धार्मिक महात्म्य एवं इतिहास पर पुस्तकों की बहुलता है, परन्तु वाराणसी के शिक्षा के अति प्राचीन केन्द्र के रूप में होने के बावजूद इसके शैक्षणिक इतिहास पर ग्रन्थों का अभाव है। शिक्षा जो कि सामाजिक बदलाव और व्यवहार का प्रमाणिक औजार है और जीवन जीने का एक अनिवार्य हिस्सा है, चाहे वह महिला हो या पुरुष हो एवं महिला शिक्षा के सन्दर्भ में यह ज्यादा महत्वपूर्ण विषय है। शिक्षा महिलाओं को जीवन के मार्ग को चुनने व अधिकार देने का पहला कदम है। जिस पर अग्रसर बढ़ती है। अतः शैक्षणिक विकास और विशेषतया महिला शिक्षा के विकास में पुस्तकों की सफलता को देखते हुए इस विषय पर पुस्तक का विवेचन अपेक्षित था। अंग्रेजों के भारत आममन के साथ हमें भारतीय परम्परा में शिक्षा के ब्रिटिश दर्शन प्रति कई प्रतिक्रियाएं मिलती हैं। वुड डिस्पैन (1854) द्वारा प्रतिपादित शिक्षा की नीतियों के क्रियान्वयन के कारण 19वीं शताब्दी के अंत तक वाराणसी में कई सरकारी, समर्पित स्कूल और कॉलेज आए। वाराणसी की विविध शैक्षणिक गतिविधियाँ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध एवं वीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में जिस प्रकार राष्ट्रीय चेतना का विस्तार कर रही थी तथा वाराणसी की गौरव गरिमा अर्वाचीन भारत तथा कुशल नेतृत्व क्षमताओं से युक्त थी, इस तथ्य का विस्तृत विवरण प्रस्तुत पुस्तक में निरूपित करने का प्रयास किया गया है।
यह पुस्तक वाराणसी में अंग्रेजों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयोगों को पारंपरिक तरीके से देखने में विभिन्न स्थानीय रूझानों की पड़ताल करती है। स्वतंत्रता आन्दोलनों के दौरान, महिला शिक्षा के क्षेत्र में वाराणसी के विशिष्ट योगदानों का उल्लेख, स्थानीय स्वावलम्बी एवं विशुद्ध राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था एवं अनेकों शिक्षण संस्थानों का चित्रण इस पुस्तक के माध्यम से किया गया है। इसके लेखन में मूल साधनों के साथ साक्षात्कार पद्धति भी अपनायी गयी है। तत्कालीन वयोवृद्ध महिला आचार्यों, विद्वानों, विदुषियों तथा शिक्षाविदों के साक्षात्कार के द्वारा अवश्य ज्ञानवर्धक एवं सदुपयोगी जानकारी संकलित की गई है। चूँकि वीसवीं शताब्दी वाराणसी में महिला शिक्षा के विकास की दृष्टि से एक क्रान्तिकारी युग है और यह पुस्तक इस दिशा में किया गया एक सार्थक प्रयास है, जिससे महिला शिक्षा के सन्दर्भमें वाराणसी के योगदान को समझने में मदद मिलेगी।
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