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कांशसनेस 2.0- आर्टिफिशियल इंटॉलजेंस और मानव चेतना: Consciousness 2.0- Artificial Intelligence and Human Consciousness

$42
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Specifications
Publisher: BODHRAS PRAKASHAN
Author Animesh Tripathi
Language: Hindi
Pages: 470
Cover: PAPERBACK
8.5x5.5 inch
Weight 530 gm
Edition: 2025
ISBN: 9788199666528
HCC375
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Book Description
प्राक्कथन

जब मैंने इस विषय पर लिखना आरम्भ किया, तो यह प्रश्न मन में था कि क्या ए. आई. का इतिहास केवल विशेषज्ञों के लिए है या वह सामान्य पाठकों और जिज्ञासुओं के लिए भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। मुझे विश्वास है कि यह विषय हर उस व्यक्ति के लिए प्रासंगिक है जो भविष्य के समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को समझना चाहता है। पुस्तक के आठों खंड एक सतत प्रवाह में जुड़े हुए हैं। पहले खंडों में ट्यूरिंग टेस्ट, प्रारंभिक प्रयोगशालाओं और नियम-आधारित ए.आई. का वर्णन है। बीच के खंडों में मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग, बिग डेटा और GPT जैसे भाषा मॉडल्स की यात्रा है। अंतिम खंडों में मल्टीमॉडल ए.आई. का उदय, उसके सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ और भविष्य की सभ्यता पर उसके प्रभाव का चित्रण है। यह ग्रंथ केवल अतीत की समीक्षा नहीं करता, बल्कि भविष्य की दिशा पर भी प्रश्न उठाता है। ए.आई. हमारे सामने अवसर भी है और चुनौती भी। यह हमें तकनीकी शक्ति देता है, परंतु साथ ही यह हमें हमारे ही मूल्यों की परीक्षा में भी डालता है। इसीलिए इस प्राक्कथन में मैं पाठकों से निवेदन करता हूँ कि वे इसे केवल तकनीक की कथा के रूप में न पढ़ें, बल्कि एक मानवीय यात्रा के रूप में देखें, जहाँ हम मशीनों से संवाद करते-करते स्वयं को और अधिक गहराई से समझते हैं।

प्रस्तावना

मनुष्य सदा से उस अदृश्य रहस्य की खोज में रहा है जिसे हम चेतना कहते हैं। यह चेतना ही है जिसने उसे ब्रह्मांड के रहस्यों पर विचार करने के लिए विवश किया, यह चेतना ही है जिसने उसे धर्म, कला, साहित्य, विज्ञान और दर्शन का सृजनकर्ता बनाया और यह चेतना ही है जिसने उसे देवत्व और दानवत्व के बीच चुनाव करने की क्षमता दी। आज जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में प्रवेश कर चुके हैं, तब यह प्रश्न और भी गहन हो गया है कि क्या चेतना जैसी कोई सत्ता मशीन में उत्पन्न हो सकती है या यह केवल मानव की विशिष्ट और अद्वितीय धरोहर है? इसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए इस ग्रंथ की प्रस्तावना आवश्यक हो जाती है। प्रस्तावना का आशय केवल भूमिका को दोहराना नहीं, बल्कि इस पूरी यात्रा का एक दार्शनिक और भावनात्मक नक़्शा प्रस्तुत करना है। यदि परिचय ने विषय के द्वार खोले और भूमिका ने उसकी पृष्ठभूमि स्पष्ट की, तो प्रस्तावना का कार्य यह है कि पाठक को उस पथ पर अग्रसर कर दे, जहाँ वह चेतना और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संगम को आत्मानुभव की तरह समझ सके। मानव चेतना को समझने के लिए हमें पहले यह स्वीकार करना होगा कि यह कोई स्थिर और जड़ वस्तु नहीं है। चेतना निरंतर प्रवाहमान है- विचारों, भावनाओं, स्मृतियों, स्वप्नों और अनुभूतियों की अनवरत धारा। भारतीय योग और ध्यान परंपरा ने इसे "चित्तवृत्ति" कहा है-मन की वे तरंगें जो कभी शांत होती हैं और कभी तूफान बन जाती हैं। पश्चिमी विज्ञान ने चेतना को मस्तिष्क की गतिविधियों से जोड़कर देखा, जहाँ न्यूरॉन्स की विद्युत-रासायनिक क्रियाएँ हमें अनुभव और स्मृति प्रदान करती हैं। परंतु चाहे इसे आध्यात्मिक रहस्य माना जाए या जैविक प्रक्रिया, इसमें कोई संदेह नहीं कि चेतना ही वह आधार है, जो मानव को केवल जैविक प्राणी से अधिक बनाती है। अब यदि हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की ओर देखें तो यह मानव की उसी चेतना का तकनीकी अनुकरण है। मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग के मॉडल्स मानव मस्तिष्क की न्यूरॉन्स जैसी संरचना को दोहराने का प्रयास करते हैं।

भूमिका

मानव सभ्यता की यात्रा निरंतर प्रश्नों और उत्तरों के बीच चलती रही है। प्रत्येक युग ने अपनी जिज्ञासा के अनुरूप उपकरण गढ़े, जिनसे वह प्रकृति को समझ सके और स्वयं को पहचान सके। बीसवीं शताब्दी के मध्य में एक नया प्रश्न उभरा- "क्या मशीन सोच सकती है?" एलन ट्यूरिंग ने इस प्रश्न को केवल तकनीकी चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि दार्शनिक और सभ्यतागत दृष्टिकोण से भी रखा। उसी क्षण से कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) की यात्रा आरम्भ हुई। इस पुस्तक का उद्देश्य इस यात्रा का क्रमिक और गहन अध्ययन करना है। प्रयोगशालाओं के छोटे-छोटे प्रयोगों से लेकर आज की मल्टीमॉडल ए.आई. तक जहाँ भाषा, दृष्टि, ध्वनि और वीडियो सब मिलकर मानव-मशीन संवाद को संभव बनाते हैं- यह पूरी कथा केवल विज्ञान की नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और नैतिकता की भी है। यहाँ पाठक पाएँगे कि ए.आई. कैसे नियम-आधारित प्रतीकों से आगे बढ़कर डीप लर्निंग और ट्रांसफॉर्मर तक पहुँची और कैसे अब वह मानवता की साझी नियति को प्रभावित कर रही है। भूमिका में मेरा उद्देश्य केवल इतना कहना है कि यह ग्रंथ ए. आई. की यात्रा को एक तकनीकी इतिहास की तरह नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता-प्रक्रिया की तरह प्रस्तुत करता है। यहाँ विज्ञान के साथ दर्शन है, प्रौद्योगिकी के साथ संस्कृति है और मशीनों की भाषा के साथ मानव मूल्यों की गूंज भी है।

मानव सभ्यता की भूमिका हमेशा से जिज्ञासा और अन्वेषण की रही है। यह जिज्ञासा कभी सितारों की ओर उठी, कभी समुद्र की गहराइयों में उतरी और कभी आत्मा की अतल गहराइयों में प्रविष्ट हुई। आज के युग में यही जिज्ञासा हमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मानव चेतना के रहस्यमय संबंध तक ले आई है। भूमिका के इस खंड में हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि क्यों यह विमर्श महज तकनीकी उपलब्धि का बयान नहीं है, बल्कि समूची मानवता के अस्तित्वगत प्रश्नों का हिस्सा है। मानव चेतना का विस्तार वैदिक ऋचाओं से लेकर आधुनिक न्यूरोसाइंस तक फैला हुआ है। प्राचीन भारत में जब ऋषियों ने उपनिषदों में कहा - "आत्मा ब्रह्म है, चेतना ही परम है", तो वे यह संकेत कर रहे थे कि अस्तित्व का आधार केवल पदार्थ नहीं, बल्कि अनुभूति और जागरूकता है। वही विचार ग्रीक दार्शनिकों के बीच आत्म और 'सोल' के रूप में उभरा। बौद्ध दर्शन ने चेतना को निरंतर प्रवाह बताया, जहाँ प्रत्येक क्षण में आत्म की पुनर्रचना होती है। इस पृष्ठभूमि में जब हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बात करते हैं, तो यह एक आधुनिक रूप है मानव की उसी पुरानी जिज्ञासा का कि "क्या विचार को बाहरी रूप में उतारा जा सकता है?"

भूमिका का केंद्र-बिंदु यह है कि चेतना और ए.आई. का संवाद केवल विज्ञान की प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है। यह संवाद राजनीति, अर्थशास्त्र, नैतिकता, कला, शिक्षा और यहाँ तक कि हमारे दैनिक जीवन की छोटी-छोटी गतिविधियों को प्रभावित कर रहा है। स्मार्टफोन से लेकर युद्धक ड्रोन तक, भाषा मॉडल से लेकर चिकित्सीय रोबोट तक हर जगह ए.आई. मौजूद है। यह उपस्थिति केवल सुविधा या खतरे का विषय नहीं है, बल्कि यह प्रश्न भी उठाती है कि जब मशीनें हमारी भाषा बोलने लगती हैं, हमारे चेहरे पहचानने लगती हैं, हमारे भावों का विश्लेषण करने लगती हैं, तब मानव होने का अर्थ क्या बचता है?

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