भूमिका
मनुष्य स्वभाव से उद्योगशील और कुतूहल पूर्ण प्राणी है। अभी इक्कीसवीं सदी का पाँचवां भाग भी पूरा नहीं हुआ है, फिर इक्कीसवीं सदी के साहित्य की चर्चा करना कितना विस्मयकारी है। इस विषय में एक उद्भावना ही परम्परा के सहारे प्रस्तुत की जा सकती है। एक लघु काल खण्ड का भी समग्र परिचय संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में इक्कीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य की चर्चा करना कुतूहल ही तो है। हमने इस कठिन कार्य के लिए एक अनुसंधान प्रणाली का सहारा लेकर अपने विचार को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। किसी भी काल का साहित्य उस समय की सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों का प्रतिफल होता है। 1980 के बाद से वैश्वीकरण का दौर प्रारंभ होता है। 1990 तक उसका तुमुल घोष दुनिया के कोने-कोने में फैल जाता है। इसी समय राजनीतिक एवं सामाजिक परिवर्तन का दौर प्रारंभ हो जाता है, सरकारों के परिवर्तन के साथ-साथ जनता की चेतना की दिशा बदलने लगती है। स्त्री, विमर्श, दलित विमर्श के नए स्वर साहित्य में गूंजने लगते हैं। कालान्तर में मंडल कमीशन के लागू होने से प्रतिस्पर्धा की दिशा बदलने लगती है। इस दौरान वैश्वीकरण अथवा बाजारीकरण का प्रभाव महानगरों पर प्रभावी होने लगता है। उपग्रहों के निरन्तर प्रक्षेपण के परिणाम स्वरूप सूचनाओं का आदान-प्रदान तीव्रता से होने लगता है। जनसामान्य के मानस पर आर्थिकी का प्रभाव छा जाता है और दृश्य द्रुत गति से बदलने लगता है। एक नई तरह की विचारधारा का प्रवेश हुआ, जिसमें विकास का अर्थ आर्थिक बन गया। मनुष्य का प्रेम मनुष्य से हटकर वस्तुओं से हटकर कल्पित चित्रों में उलझ गया। हर युग की एक आर्थिक संस्कृति होती है, जिसका पालन राजनीति करती है। सन्तुष्टि एवं प्रसन्नता मानव जीवन के अमूल्य अंग रहे हैं। जब मनुष्य में वैयक्तिक स्वार्थ अधिक बढ़ने लगता है, तब सुख और चैन काफूर होने लगते हैं। जो कुछ समाज में घटित होता है वही मूलरूप से साहित्यिक चित्रों में आवर्तित होता है, कल्पना के मिलने से उसका स्वरूप अनेक वर्षी हो जाता है। आज विडंबना यह है कि कल्पना का स्थान यथार्थ ने लिया है। सामाजिकता का स्थान वैयक्तिकता ने ले लिया है। मनुष्य ने आशावाद की जो गांठ ईश्वर नामक प्रत्यय से बांधी थी, अब वह छूट चुकी है। कभी मनुष्य ने अनन्त संभावनाओं को परमात्मा से अभिहित किया था, आज उसने पल्लू सीमित स्वार्थों से बांध रखा है। सीमित स्वाथों से बंधने के कारण वह अपरिभाषित बन गया है। इसी मनुष्य का साहित्य लिखा जा रहा है। तथाकथित सभ्य देश (विकसित देश) विकासशील देशों के गुरू बनकर मार्गदर्शन कर रहे हैं। आज विकासशील एवं अविकसित देश इस स्थिति में नहीं रह गये है कि वे विकसित देशों को चुनौती दे सकें। ऐसी स्थिति में इन देशों में भी उन प्रणालियों का प्रयोग हो रहा है, जिससे मनुष्य व्यक्तिगत उन्नति कर सम्पन्न बन सके। इस पिपासा ने मानव जीवन में कई प्रकार के असंतुलन पैदा किये हैं। पहला असंतुलन लोगों में परस्पर प्रेम का अभाव है। दूसरा असंतुलन अलगाववादी भावना है। तीसरा असंतुलन उस व्यक्तिवादी महत्वाकांक्षा को लेकर है, जो केवल भोगवादी है। लेखक या विचारक इन विरोधी भावनाओं से साहित्य में टकराता है। प्रगतिवाद, प्रयोगवाद के बाद नयी कविता के जन्म एवं विकास के साथ कविता में जीवन घूमने लगता है, साथ ही वर्तमान जीवन के विविध आयाम घुलने लगते हैं। फिर अस्सी तक आते-आते नवगीत का स्वर तीव्र होने लगता है। इसी काल में कविता में हिन्दी गजल नई चमक पैदा करती है, गजल के साथ कविता का स्वर दैनिक जीवन को सामाजिक जीवन से जोड़ने लगता है।
लेखक परिचय
नाम : डॉ. किरन हजारिका पत्नी : पूर्णिमा हजारिका पिता : श्री सत्यवान हजारिका माता : श्रीमती सत्यवती हजारिका जन्म तिथि: 12 मई, 1968 जन्म स्थान : बचागाव, उत्तर लखीमपुर, असम शिक्षा : एम. ए., पी. एच.डी. (वी. बी. एस पूर्वांचल विश्वविद्यालय) IDHEL कार्य जीवन : पिछले 35 वर्षों से कार्यरतः डी एच एस के कॉमर्स कॉलेज, डिब्रूगढ़ में हिन्दी विभाग में प्राध्यापन के साथ विभागाध्यक्ष का दायित्व काल 17 साल से निर्वहन किया ! प्राचार्य, तेंगाखाट महाविद्यालय (शासकीय डिग्री कॉलेज) के प्राचार्य, डिब्रूगढ़, असम ! कमिशन मेम्बर, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग सम कुलपति, IGNO संप्रति : सम कुलपति, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रकाशित कृतियाँ: 1. पुरवाई (2008 सम्पादित ग्रन्थ), 2. पुरवाई (2010 सम्पादित ग्रन्थ), 3. नागार्जुन की प्रजातान्त्रिक दृष्टि मानव मूल्य (2013), 4. काव्य भाषा और परिवेश (2015), 5. प्रसाद और नारी परंपरा (2016), 6. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और द्विवेदि युग (2017), 7. दलित चिंतन का आधुनिक परिदृश्य (2018), 8. इक्कीसवी सदी की साहित्यक पृष्टभूमि (2018)
पुस्तक परिचय
परम्परा, दलित विमर्श और प्रासंगिकता' नामक पुस्तक जो आपके समक्ष प्रस्तुत है। इसमें चिन्तन तथा साहित्य का ऐसा संगुफन है जहाँ से स्वतंत्रता, समानता तथा बन्धुता की सुरभि समाज की फुलवारी को सुवासित करती है। दर्शन से चिन्तन तथा संवेदना से साहित्य का जन्म होता है। साहित्य और चिन्तन दोनों में उग्र तथा समंजनशील विचारक एवं क्रान्तदर्शी साहित्यकार, अपनी प्रभा बिखेरते हैं। इस पुस्तक में प्रजातांत्रिक परिवेश के आयाम में चिन्तकों और साहित्यकारों की समीक्षा की गयी है। इस समीक्षा में वाद, विवाद एवं संवाद को समाधान के घटक के रूप में पेश करने की प्रेरणा है। यह अकेली पुस्तक है जिसमें दर्शन और साहित्य को अंगांगी (परस्पर पूरक मानते हुए) बनाकर यथार्थ को प्रस्तुत करने का प्रयास है। आज दलित विमर्श एवं नारी विमर्श का युग है, ऐसी स्थिति में दलित विमर्श की प्रासंगिकता बढ़ गयी है। देश की जनसंख्या का बीस फीसद दलित है, उसकी उपेक्षा कर देश आगे नहीं बढ़ सकता। संघर्ष, विवेक तथा परिवेश कात्रिक मानवीय विजयश्री को जन्म होता है। ऐसा इस पुस्तक के लेखक का विचार है। सहस्रों पाठकों को लेखक ने इस पुस्तक को समर्पित किया है।
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