पुस्तक परिचय
बीसवीं शती के भारतीय जन जीवन के अमर कथाकार प्रेमचन्द की इक्यावन कालजयी कहानियों का संकलन प्रेमचन्द के व्यापक कथा-साहित्य की बानगी ही नहीं प्रस्तुत करता, उसे समग्रता के साथ रूपायित भी करता है। प्रेमचन्द के कथा-साहित्य का क्षेत्र बहुत विस्तृत रहा है। भारतीय ग्राम्य जीवन और अपने युग के उत्पीड़न और शोषण का जितना जीवन्त चित्रण प्रेमचन्द ने किया है, उतना अन्य किसी कथाकार ने नहीं। सामाजिक समस्याओं के चित्रण के साथ ही अपने युग के सुधारवादी आन्दोलनों और उनसे जुड़े नेताओं के चरित्र को उजागर करके प्रेमचन्द ने प्रजातन्त्र के उदय के पूर्व ही संभावित भ्रष्टाचार का संकेत दे दिया है। कथ्य और संवेदना का यह व्यापक क्षेत्र मानसरोवर के आठ-भागों में संकलित है, जो वर्तमान महँगाई में सामान्य पाठकों की क्रयशक्ति के बाहर है। इधर उनकी कहानियों के कुछ संकलन भी आए हैं, पर वे केवल प्रेमचन्द साहित्य की बानगी ही प्रस्तुत करते हैं। इन सबसे हट कर उनके 8 खण्डो के मानसरोवर से 51 मोती चुनने का जो कार्य सम्पादक ने किया है, वह प्रेमचन्द का ही श्रेष्ठ नहीं हिन्दी कथा साहित्य का श्रेष्ठ है। प्रेमचन्द के कथा साहित्य के व्यापक संदर्भ से सम्पृक्त होने में पाठकों के लिए यह संकलन उपादेय होगा, ऐसा विश्वास है। उत्कृष्ट मुद्रण एवं कलात्मक आवरण के लिए प्रकाशक साधुवाद के पात्र हैं।
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