पुस्तक परिचय
स्वामी निरंजनानंद जी ने गंगा दर्शन विश्व योगपीठ में ।। 15 दिसंबर 2017 तक आयोजित योग चक्र कार्यक्रम के दौरान मन्गस्तुत की। यह कार्यक्रम योग के अगले अध्याय को विकसित कराने की प्रक्रिया का अंग था, जिसका लक्ष्य योग विद्या से जुड़कर इसके गहन आयामों का अन्वेषण करना है। सत्संगों का विषय राजयोग और भक्तियोग था, जो षडंगीय रोग चक्र के दो महत्त्वपूर्ण अंग है। स्वामीजी ने समझाया कि किस प्रकार राजयोग और भक्तियोग एक-दूसरे के सन्पूरक है. इसलिए इन्हें अलग-अलग प्रणालियों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने प्रतिभागियों को इन दोनों योगशाखा ओं की समानांतर यात्रा करावी, जिसमे वे मन और भावनाओं के बीच सामंजस्य लाने की प्रक्रिया का गहराई से अनुभव कर सके। स्वामीजी ने इस विषय पर कई भ्रांतियों को स्पष्ट किया और प्रतिभागियों को अपनी व्यक्तिगत समझ एवं अनुभव विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया ताकि वे योग के उभरने दसरे अध्याय के संदेशवाहक बन सके।
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