लेखक परिचय
प्रभा माथुर संक्षिप्त परिचय शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी) हिन्दी विशारद (साहित्य सम्मेलन प्रयाग) एम. फिल. (हिन्दी) डिप्लोमा Linguistics संगीत विशारद (तबला सितार गायन, भातखण्डे पूनीवर्सिटी, लखनऊ) परिवार: पति श्री ए.पी. माथुर (अवकाश प्राप्त सीनियर जनरल मैनेजर महिन्द्रा एण्ड महिन्द्रा) पुत्री, दीपा माथुर (C.A.) Head of Corporate प्रकाशन : 'लक्ष्मण रेखा' काव्य पुस्तक प्रकाशित (1986) उपन्यास 'धुली धुली शाम का उजाला', 'भीगे पंख', (काव्य संग्रह) 3 नवम्बर 2006 में 'लो' कहानी संग्रह, 'ऐसा क्यों', नाटक एकांकी संग्रह, 'किसने कहा', निबंध संग्रह प्रकाशित। देश-विदेश की अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेख, कविता, कहानी, नाटक, लघुकथा आदि प्रकाशित होते आ रहे हैं। 'नव भारत' में दो वर्ष 'कालम' लिखा है (अर्ज किया है नाम से) बाल साहित्य में रुचि एवं कथा कहानी आदि प्रकाशित होते रहते हैं। लोक साहित्य में रुचि। व्यवसाय : लेखिका, कवयित्री (हिन्दी) शिक्षिका रह चुकी हूँ। पूरा समय लेखन में है। उपलब्धियाँ: Poona F.T.I.I. से Film appreciation course का सर्टिफिकेट प्राप्त । सांस्कृतिक प्रोग्राम व अन्य साहित्यिक गतिविधियों में बचपन से सक्रिय हूँ। नाटकों का मंचन भागीदारी आदि। सतत् लेखन व कव्वाली के लिये भारत के राष्ट्रपति स्व. ज्ञानी जैल सिंह से प्रस्कृत और श्रेष्ठ रोटरी Ann जिसकी अपनी पुस्तकें प्रकाशित हुई। पुरस्कार : 1. अम्बिका प्रसाद दिव्य ज्योति अलंकरण पुरस्कार सागर से प्राप्त। उपन्यास एवं कविता संग्रह के लिये, 2. खानकाह सूफी दीदार चिश्ती थाणे से 'साहित्य रत्न' से सम्मानित, 3. अन्तर्राष्ट्रीय पराविद्या शोध संस्थान कल्याण से 'साहित्य अम्बिका' से सम्मानित, 4. कादम्बरी संस्था जबलपुर से 'उपन्यास' पर पुरस्कार प्राप्त, 5. भुसावल दलित साहित्य अकादमी से 'काव्य साधना' उपाधि प्राप्त ।
पुस्तक परिचय
आये दिन पढ़ने को देखने-सुनने को मिलता है। दहेज प्रताड़ना, आत्महत्या या हत्या, बलात्कार, मारपीट आदि घटनायें चरम सीमा पर हैं।
मेरी कहानियों इन्हीं विकृतियों पर आधारित हैं। मैंने प्रयत्न किया है कि समाज व महिलायें कुछ समझदारी से विचार करके कुछ हल निकालें न कि निराश होकर या भयभीत होकर सहन करती रहें। मान-मर्यादा का प्रश्न जब उठता है तब सब लोग सहमत होकर निकालें। मैंने यही मुद्दा उठाया है और अपनी राह चुनने को प्रेरित किया है। गुलामी छोड़ कर अपने व्यक्तित्व को उभारने का प्रयत्न करना चाहिये। नाहक अबला, कमजोर, सहनशील आदि कहना व्यर्थ की बात है। महिलाओं में क्षमता की कमी नहीं है। अपने उद्देश्य व उसूलों पर सही रहकर सामना करना चाहिये। दहेज प्रथा इतनी घिनौनी, शर्मनाक है कि जो माता-पिता अपनी पुत्री को बड़ा करते हैं, पढ़ा-लिखा कर व्यक्तित्व निखारते हैं उनसे दहेज की माँग करना छोटेपन की निशानी है। सारी कमाई वे क्यों दें? पुत्री दे दी उस पर खर्च किया उसकी चिन्ता न होकर माँगना कहाँ तक उचित है। यदि स्वयं में इतनी सामर्थ्य नहीं है तो विवाह करने का कोई हक नहीं बनता। विवाह दो परिवारों का मिलन है न कि गुलामी की जंजीर है।
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