प्राक्कथन
आधुनिक भारतीय शिक्षा पर अनेक देशी-विदेशी विचारकों एवं चिन्तकों का प्रभाव पड़ा है। देशी विचारकों में मुस्लिम, हिन्दू, ईसाई, पारसी सभी प्रकार के चिन्तकों ने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भारतीय शिक्षा व्यवस्था को थोड़ी या अधिक मात्रा में प्रभावित किया है। अतः इस परिपेक्ष को दृष्टि में रखते हुए, मुस्लिम विचारकों का भारतीय शैक्षिक चिन्तन एवं व्यवस्था पर पड़ने वाले प्रभावों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही साथ मुस्लिम विचारकों से सम्बन्धित साहित्य का सर्वेक्षण करने के पश्चात् यह बात प्रमाणित होती है कि सर सैयद अहमद खाँ, हजरत कासिम नानौतवी, अल्लामा शिबली नुमानी आदि मुस्लिम विचारकों पर जितनी भी पठनीय सामग्री उपलब्ध है, उनकी भाषा या तो अंग्रेजी है अथवा उर्दू। हिन्दी में इन विचारकों की न तो स्वयं की कृतियां हैं और न ही अन्य विद्वानों ने इन पर अपनी हिन्दी भाषा कृतियों के द्वारा प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। अतः इस समस्या को दृष्टि में रखते हुए प्रस्तुत शोध-समस्या का चयन किया गया है, जिससे अधिक से अधिक संख्या में लोग इन मुस्लिम चिन्तकों के विचारों को सामान्य रूप से जान सकें एवं विशेष रूप से इन मुस्लिम शिक्षाविदों के आधुनिक भारतीय शिक्षा में दिये गये योगदान को समझ सके।इस पुस्तक "उन्नीसवीं सदी के मुस्लिम शिक्षाविदों का आधुनिक भारतीय शिक्षा में योगदान" को सात अध्यायों में विभाजित किया गया है। पहले अध्याय में विषय प्रवेश के रूप में प्रस्तावना, दूसरे अध्याय में उन्नीसवीं सदी के पूर्व के सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, आर्थिक राजनैतिक, स्थिति पर प्रकाश डाला गया। तीसरे अध्याय में उन्नीसवीं सदी में शिक्षा के विकास पर विचार किया गया है, जिसमें ब्रिटिश कालीन शैक्षिक स्थिति, ईसाई मिशनरियों के समय शैक्षिक विकास, हिन्दू समाज सुधारकों का शैक्षिक जगत में योगदान और उन्नीसवीं सदी के मुस्लिम चिन्तकों एवं विचारकों का शिक्षा के क्षेत्र में योगदान पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय चार में उत्तर भारत के प्रमुख मुस्लिम शिक्षाविदों सर सैयद अहमद खां, हजरत कासिम नानौतवी तथा मौलाना शिबली नुमानी के जीवन परिचय, उनकी रचनाओं एवं शैक्षिक आन्दोलनों को सम्मिलित किया गया है। पांचवे अध्याय में उपरोक्त शिक्षाविदों के शैक्षिक दर्शन को वर्णित करने का प्रयास किया गया है। अध्याय छः के अन्दर सभी शिक्षाविदों के शैक्षिक योगदानों का समन्वित मूल्यांकन किया गया है। अन्तिम अध्याय में समालोचना के रूप में सभी ऐतिहासिक तथ्यात्मक विषयवस्तु को संश्लेषित किया गया है। कुल मिलाकर इस पुस्तक में धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण के साथ आधुनिक भारतीय शैक्षिक दृश्य को केन्द्र मानकर उत्तर भारत के प्रमुख तीन शिक्षाविदों के शैक्षिक योगदान का शैक्षिक दृष्टि से विश्लेषण किया गया है। पुस्तक का स्वरूप प्रदान करते में अनेक महानुभावों ने मेरी सहायता की, उन सबके प्रति मैं हार्दिक आभार प्रकट करती हूँ। मैं अपने निर्देशक डॉ. हरिकेश सिंह, रीडर, शिक्षासंकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जो मार्गदर्शन प्राप्त करती रही हूँ उसके लिए ऋणी हूँ। शैक्षिक जीवन को गतिशील बनाने में उनकी प्रेरणायें हमेशा याद रहेंगी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ग्रन्थ विज्ञान विभाग के प्रवक्ता डॉ. हरिनाथ प्रसाद की भी शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने अपना अमूल्य समय दिया। इस कार्य में अपने परिवार के सदस्यों एवं मित्रों ने जो स्नेह दिया उसे भुलाया नहीं जा सकता, जिनकी प्रेरणायें मुझे प्रगति पथ पर अग्रसर होने में हमेशा बल प्रदान करती रहीं और करती रहेंगी. |
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