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आनन्दमय दिव्य जीवन की खोज: Aanandmay Divya Jeevan ki Khoj

$24
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Specifications
Publisher: Sahityagar, Jaipur
Author Khemchand Chaturvedi
Language: Hindi
Pages: 207
Cover: HARDCOVER
9.0x6.0 Inch
Weight 380 gm
Edition: 2011
ISBN: 9788177112092
HCB648
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Book Description

प्राक्कथन

     

 

मानव जीवन के विकास की कहानी, मेरे अध्ययन का प्रिय विषय है। आदि मानव से लेकर, आधुनिक युग तक, इस मानव जीवन का विकास कितना रुचिकर और कितना आश्चर्यजनक है। वह मूल दिव्यशक्ति कब और किस प्रकार इस पदार्थ जगत् (Material world) में परिवर्तित हुई, इसको कल्पना करना भी कठिन है। हमारी ज्ञानेन्द्रियों, मन और बुद्धि की पहुँच वहाँ तक नहीं है किन्तु ऐसा लगता। मानव के इस भौतिक शरीर में, निश्चित् रूप से, कहीं कोई दिव्य शक्ति रहस्यमय ढंग से छुपी बैठी है। संभवतः अनजाने में इस दिव्य शक्ति की खोज उस दिन प्रारम्भ हो गयी थी, जिस दिन यह मानव नामक प्राणी इस पृथ्वी पर अवतरित हुआ। इस खोज के लिए इसे बड़े कष्ट उठाने पड़े। एक ओर अपने भौतिक अस्तित्त्व को सुरक्षित रखने की समस्या और दूसरी ओर अंतिम सत्य को जानने की उसकी अदम्य जिज्ञासा। एक ओर प्रकृति का आकर्षण तो दूसरी ओर प्रकृति का प्रकोप सर्दी, गर्मी, वर्षा, आतप। एक ओर दिव्यता की सहज अनुभूति तो दूसरी ओर पशु-प्रवृत्तियों का ताण्डव नृत्य। इन सारी समस्याओं का समाधान ब्रोजने के लिए उसने अन्नमय कोष से अपनी यात्रा प्रारम्भ की। वह प्राणमय कोष से चलता हुआ कई युगों के बाद मनोमय कोष तक जा पहुँचा किन्तु मनोमय कोष पर जाकर अटक गया। उसे ऐसा लगा मानों उससे जीवन का अंतिम लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। उसने एक के बाद एक आश्चर्यजनक आविष्कार किये। उसने योगियों से भी श्रेष्ठ दूर श्रवण, और दूरदर्शन की सिद्धियाँ प्राप्त कर लीं। किन्तु हाय रे मानव जीवन ! तू तो अभी भी अतृप्त है। तेरे ये एक से एक सुन्दर और सुखद आवास, द्रुतगामिनी कारें, वायु को पराजित करने वाले वायुयान, स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोज्य और पेय पदार्थ, सुखद शैया क्या तेरे सुख के लिए पर्याप्त नहीं है? फिर भी तू इतना बेचेन क्यों है? तू क्यों मनोचिकित्सकों के पास नींद की गोलियों के लिए भागा भागा फिरता है? ऐसा लगता है, जिसे तू खोज रहा है, वह तुझे अभी मिला नहीं है? किन्तु तू अपनी खोज जारी रख। जो तू चाहता है, वह तुझे अवश्य मिलेगा। तेरे जीवन का लक्ष्य आनन्दमय कोष तक पहुंचना है। यह आनन्दमय कोष कहीं बाहर नहीं है। अतः केवल बाहर भटकने से तुझे शांति और तृप्ति मिलने वाली नहीं है। थोड़ा अन्दर झाँकने का प्रयास कर; अन्तर्मुखी होने का प्रयास कर। वह जिसे तुम खोज रहे हो, वह अन्दर छुपा बैठा हुआ है। उससे संपर्क होते ही दुनियाँ बदल जायेगी। भौतिक दृष्टि से सब कुछ प्राप्त करने के बाद भी यह जो व्याकुलता है, यह व्याकुलता भी बड़ी सार्थक है। इस व्याकुलता का कारण इस संसार की परिवर्तनशीलता और मृत्यु का भय है जो तुम्हारे अवचेतन और अचेतन मन में जन्मजन्मान्तरों के अनुभवों के कारण चित्त को निरन्तर अशान्त बनाये हुए है। इस व्याकुलता को दूर करने के लिए संसार से भागने का प्रयास कभी मत करना। यह विश्व ईश्वर का व्यक्त रूप है। इसकी रचना ईश्वर ने तुम्हारे त्याग पूर्वक उपभोग और आनन्द के लिए की है। यदि तुम इसका संयम और त्याग पूर्वक उपभोग करोगे तो ईश्वर को इससे बड़ी प्रसन्नता होगी और वह प्रसन्नता आपके हृदय को प्रभावित किए बिना न रहेगी। उसकी प्रसन्नता के स्पर्श को ही ईश्वरानुभूति, मोक्ष या निर्वाण कहते हैं? इस दिव्यानुभूति के पश्चात् सारे दुःख-दारिद्रय अदृश्य हो जाते हैं; मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। इस पवित्र जीवन के आनन्द का संकेत देते हुए एक उपनिषद् का ऋषि कहता है - "आनन्दो ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कुचश्चनः" आनन्द पूर्वक ब्रह्म में विचरण करने वाला तत्त्ववेत्ता विद्वान् किसी से भयभीत नहीं होता। मैंने इस पुस्तक में जो कुछ लिखा है, वह एक प्रकार से हमारे दिन-प्रतिदिन के व्यावहारिक जीवन में उस आनन्द की खोज है, जिसे हम मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य कह सकते हैं। मैंने अपने इसी व्यावहारिक दृष्टिकोण से इससे पूर्व दो पुस्तकें और भी लिखी हैं (1) शाश्वत जीवन की व्याख्या-गीता, (2) आधुनिक परिप्रेक्ष्य में योग साधना। इन पुस्तकों को पाठकों ने कितना पसन्द किया, यह मैं किन शब्दों में व्यक्त करूँ, मेरी समझ में नहीं आता। मैं आभारी हूँ उन पाठकों का जिन्होंने मेरे उत्साहवर्द्धन के लिए मुझे सैकड़ों पत्र लिखे। मैं आभारी हूँ श्री राधेश्यामजी धूत, श्री अशोक कुमार धूत, श्री रामलक्ष्मण गुप्त, श्री दामोदरजी भगेरिया का जिन्होंने मेरी पुस्तक जीवन की व्याख्या का द्वितीय संस्करण प्रकाशित करवाकर, भारत के कोने-कोने में प्रेषित किया। पुस्तक को पढ़कर पाठकों ने प्रतिक्रिया स्वरूप जो पत्र लिखे उन पत्रों से ही मुझे इस पुस्तक को लिखने का संबल प्राप्त हुआ। मेरे प्रिय पाठकों ने मेरे इस दृष्टिकोण को पूरी तरह समझा और सराहा कि हमें "अंतिम सत्य की खोज" इस व्यावहारिक जीवन में ही करनी है, इससे भाग कर नहीं। यदि मेरे सुधी पाठकों को, इस पुस्तक से कुछ भी मन की शांति मिली या आनन्दमय दिव्य जीवन की कुछ भी प्रेरणा मिली तो मैं इसे ईश्वर की असीम कृपा मानूँगा।

 

पुस्तक परिचय

 

संसार में आवागमन का चक्र तो सतत गतिशील है किन्तु इस गतिशीलता का लक्ष्य क्या है ध्यातव्य है। इसे गतिशील कौन बनाए हुए है? इस प्रश्न का उत्तर मिलते ही जीवन आनन्द से ओतप्रोत हो जाता है। किन्तु इस उत्तर को प्राप्त करने के लिए हमारे जीवन के संपूर्ण क्रियाकलापों का सुविचारित, वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक होना नितान्त आवश्यक है। विद्धान लेखक श्री खेमचन्द चतुर्वेदी ने जीवन के सभी महत्त्वपूर्ण क्रियाकलापों का विश्लेषण सरल किन्तु आकर्षक शैली में किया है। इनकी लेखनी की प्रमुख विशेषता यह है कि ये भारतीय चिन्तन के गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों को इतने सरल ढंग से प्रस्तुत करते हैं कि उनकी व्यावहारिकता में ज़रा भी कठनाई का अनुभव नहीं होता। प्रस्तुत पुस्तक ' आनन्दमय दिव्य जीवन की खोज' में श्री चतुर्वेदी ने जीवन की प्रत्येक समस्या और जीवन के प्रत्येक आयाम का स्पर्श बड़ी निपुणता, सरसता और प्रभावशाली ढंग से किया है। जैसे मानव की आकांक्षा, आस्तिकता, अहं के गुण-दोष, विचारों के परे, अनासक्त जीवन का आनन्द, चित्त की एकाग्रता और कार्यकुशलता, ईश्वरानुभूति और आनन्दमय दिव्य जीवन आदि प्रकरणों से इनके गंभीर चिन्तन और लोकमंगल की हार्दिक कामना का आभास सहज ही लगाया जा सकता है।

 

लेखक परिचय

 

खेमचन्द्र चतुर्वेदी का जन्म 2 जनवरी, 1929 को बडगाँव जिला मथुरा में हुआ। इन्होंने स्नातकोत्तर परीक्षा हिन्दी में उत्तीर्ण की तथा सन् 1951 से 1984 तक राजस्थान शिला विभाग में अध्यापन करते हुए प्रधानाचार्य हा.सै. के पद से टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज, अजमेर से सेवानिवृत हुए। प्रारम्भिक अध्यापन काल से ही इन्हें माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के अन्तर्गत पाठ्यपुस्तकें संकलन और लेखन कार्य में अत्यधिक रुचि रही और इन्होंने विभिन्न परीक्षाओं के विद्याथियों के लिए अनेक पुस्तकें लिखीं। इनकी शैक्षिक अनुसंधान में विशेष रुचि रही। श्री चतुर्वेदी राष्ट्रीय तथा आध्यात्मिक विचारों के व्यक्ति हैं। अपने इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर इन्होंने समाजोत्थान सम्बन्धी पुस्तकें अनेक लिखीं जिनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है:- 1. सन् 1992 में 'भारत का उत्थान और वैचारिक क्रांति' (भारत सरकार द्वारा अनुदानित) प्रकाशित हुई। यह पुस्तक अत्यधिक लोकप्रिय रही। 2. सन् 2004 में 'शाश्वत जीवन की व्याख्या गीता प्रकाशित हुई। यह इतनी लोकप्रिय हुई कि श्री राधेश्याम धूत, श्री रामलक्ष्मण गुप्त, श्री दामोदर भगेरिया (जयपुर) आदि विद्धानों ने 1000 प्रतियाँ छपवाकर गीता प्रेमियों को निःशुल्क वितरित कीं। 3. 'योग साधना, आधुनिक परिप्रेक्ष्य में' विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी से प्रकाशित हुई। 4. सन् 1998 में 'राह यही है' लघु उपन्यास काफी चर्चित रहा। यह उपन्यास राष्ट्रीय एकता को दृष्टि में रखकर लिखा गया। 5. विभिन्न आध्यात्मिक पत्र-पत्रिकाओं इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं। 6. आनन्दमय दिव्य जीवन की पुस्तक का प्रकाशन साहित्यागार, जयपुर द्वारा होने जा रहा है। श्री चतुर्वेदी इस समय स्थायी रूप से अजमेर में निवास कर रहे हैं।

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