प्राचीन भारत के लोक-जीवन के अध्ययन-प्रसंग में पहले तो बहुत संकोच के साथ में "हमारे कुछ प्राचीन लोकोत्सव" नामक पुस्तक लेकर पाठकों के समक्ष उपस्थित हुआ था। उसका निरादर न होते देख इस बार "प्राचीन भारतीय मनोरंजन" का उपहार प्रस्तुत कर रहा हूँ।
"प्राचीन लोकोत्सव" पर विचार किया जाय और चाहे "प्राचीन भारतीय मनोरंजन" ही पर क्यों न दृष्टि डाली जाय, दोनों के ध्येय में एकरूपता है। दोनों ही थोड़े समय के लिये संसार की झंझटों और बखेड़ों से हमारे मन को बिलकुल परे कर देते हैं। यदि बीच-बीच में मनोरंजन के ऐसे साधन न होते तो संभव है मानव-मात्र के लिये जीवित रहना दूभर हो जाता। इस विचार से "प्राचीन भारतीय मनोरंजन" "प्राचीन लोकोत्सव" का जुड़वाँ है।
चौबीसों घंटे कोई भी मानव पेट पालने की चिन्ता में हाय-हाय करते हुए नहीं फिरताः। अपनी क्रिया-शक्ति बनाये रखने, स्वास्थ्य को बिगड़ने से रोकने, हृदय में नवीन आशा, उत्साह, तेज, उमंग, प्रेरणा, कुतूहल प्रमुख सद्गुणों को सजग करने के लिये उसे उचित मात्रा में अवकाश और, विराम मिलना चाहिये। अवकाश के समय उस पर ऊपर से कोई भी काम लादा न जाय। वह अपने अवकाश के समय को जैसे चाहे वैसे काटे। इस विषय में उसको पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिये।
किन्तु आजकल की आधिक समस्याएँ ऐसी विकट है कि क्या कहा जाय ! बड़े-बड़े नगरों में केवल दाना-पानी जुटाने के लिये मध्यवित्त वाले कुछ लोग दो-दो, तीन-तीन काम करते हैं। उन्हें बिलकुल छुट्टी नहीं। जब देखो तब चक्की में पिसे जा रहे हैं। फलतः जिधर ही दृष्टि डाली जाय, उधर ही 'तन-छीन, मन-मलिन' नवयुवकों की टोलियाँ देख पड़ती हैं। इनके हृदय में न तो उमंग, न प्राणों में उच्चाशा-आकांक्षा, न मन में फुर्ती, न भुजाओं में शक्ति और न तो शरीर में तेज ही है !
प्राचीन काल में देश की आबादी कम होने, आर्थिक दशा सुगम होने और देश-वासियों की बनावटी माँगें थोड़ी होने के कारण उन्हें फुरसत की कमी न थी। वे यह फालतू समय अपनी-अपनी रुचि के अनुसार काटते थे। क्रमशः मनोरंजन के भिन्न-भिन्न साधनों को केन्द्र मान कर विविध प्रकार के क्रीड़ा-कौतुक, शिल्प-कला और विद्याओं की उत्पत्ति हुई। इनके अतिरिक्त मन बहलाव के कुछ साधन हेठे भी होते थे।
प्रस्तुत पुस्तक में प्राचीन भारत के भिन्न-भिन्न कालों में प्रचलित मनोरंजन के विविध साधनों का धारावाहिक विवरण दिया गया है। प्राचीन भारत के जन-जीवन का सम्यक अध्ययन अभी तक अधूरा ही है। इस विचार से इस विषय के निर्वाचन में थोड़ी मौलिकता है। मौलिकता के साथ "थोड़ी" विशेषण इसलिये जोड़ा गया, कि इसके पहले दो-चार सज्जनों ने इस रोचक विषय के भिन्न-भिन्न पहलुओं पर सारगर्भित निबंध लिखे हैं। इनमें बनारस संस्कृत कालिज के अध्यापक श्री अनंत शास्त्री फड़के जी ने सरस्वती भवन स्टडीज के दसवें भाग में संस्कृत भाषा में मनोविनोद के प्राचीन साधनों की एक छोटी-सी सूची प्रस्तुत की थी। डा० वासुदेव शरण अग्रवाल जी ने पाणिनि की अष्टाध्यायी में वर्णित "गेमस् एण्ड एम्यूजमेन्टस्" पर एक सुन्दर लेख लिखा है। इसके पहले डा० बोगेल ने "शालभंजिका" पर एवं डा० राजेन्द्र लाल मित्र ने "पिक्निक्" पर महत्त्वपूर्ण लेख लिखे थे। कहने की आवश्यकता नहीं, मैने इन निबंधों का पूरा-पूरा उपयोग किया है। अतः पथ-प्रदर्शक के रूप में में उक्त बहुश्रुतों का ऋणी हूँ।
अध्ययन-काल के अन्तिम पाद में हमारे देश में प्रचलित मन-बहलाव के साधनों के वर्णन-प्रसंग में तात्कालिक सामाजिक दशा पर परोक्ष रीति से आलोकपात हो गया है। यह आविष्कार इस पुस्तक की विशिष्टताओं में समझिये। इसके पहले स्यात् ही किसी ऐतिहासिक ने देश-विजय के बिलकुल पूर्व सामाजिक दशा का विशद वर्णन किया हो।
इस पुस्तक के लिखने में भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखित सुलभ-दुर्लभ सब प्रकार के मूल-ग्रंथों का उपयोग किया गया है।
अपने पास ग्रंथों का संग्रह नाम-मात्र है। इस कठिनाई को सुलझाने में सरस्वती भवन, विश्वनाथ लाइब्रेरी और श्री स्याद्वाद् जैन महाविद्यालय के अध्यक्षों ने दुर्लभ से दुर्लभ पुस्तकादि दे कर मेरी जो सहायता की है, उसे में कभी भूल नहीं सकता। अंत में में अपने पुराने विद्यार्थीं, "स्वतंत्रभारत" (लखनऊ) के साहित्यिक सम्पादक, पंडित बलदेव प्रसाद मिश्र, बी० ए०, को आन्तरिक आशीर्वाद बिना दिये यह लेख समाप्त नहीं कर सकता। उन्होंने पाण्डुलिपि पढ़ कर दो-एक अमूल्य सम्मतिएँ दी थीं, जिससे प्रस्तुत पुस्तक की उपयोगिता बहुत बढ़ गयी है।
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