चिकित्सा के आदि स्रोत-वेद बहुत विशाल एवं व्यापक विषय है। वेदी में यह विषय इतना फैला हुआ है कि इसे समेटना और यह भी कुछ महीनों में, एक अत्यन्त कठिन कार्य था और एक चुनौती के रूप में सामने आया। मैंने इस चुनौती पूर्ण महान् कार्य को इस लिए स्वीकार किया, क्योंकि अध्ययन तथा अनुसन्धान मेरा प्रिय विषय रहा है। गत वर्षों में मैंने इस सम्बन्ध में कुछ अनुसन्धान कार्य किया है, जिसे वेदों के अधिकारी विद्वानों में सराहा है। अथर्ववेद पर मेरी एक पुस्तक "ग्लिंप्सिज ऑफ सोसाइटी इन अथर्ववेद कई वर्ष पूर्व प्रकाशित हुई थी। इस तरह पिछले प्रायः पन्द्रह वर्ष से में वैदिक अनुसन्धान के विविध आयामों पर कार्यरत हूं। गत वर्षों में एक ओर पुस्तक वैदिक मैषज्य' नाम से लिखी गई। इस की भी विद्वानों द्वारा मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की गई। मैषज्य का विषय वेदों में भरा पड़ा है। सबसे अधिक अथर्ववेद में है। ऋग्वेद और यजुर्वेद में भी इस विषय पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है। सामवेद में मैषज्य विषयक चर्चा नाममात्र ही है। इस तरह बहुत बिखरे इन विषयों को एक स्थान पर, सीमित समय में संकलित करना एक दुरूह कार्य था, जिसे सम्पन्न करने का मैंने प्रयास किया है। इस पार्वत प्रयास में मैं कितना सफल हुआ हूं, इस बात का निर्णय अथवा मेरे इस कार्य का मूल्यांकन वैदिक अनुसन्धान के पारंगत विद्वान् ही करेंगे। मैंने इस विषय में कुछ नहीं कहना। मैंने तो सारस्वत अग्निहोत्र में 'सरस्वत्यै स्वाहा इदंन मम' कह कर एक आहुति दे डाली है। विश्वास है. सारस्वत यज्ञ के पुरोधा यथापूर्व इस प्रयास को सराहेंगे और मेरी इस आहुति को भी स्वीकारेंगे।
इस से पूर्व दर्जन से अधिक पुस्तकों के प्रणयन में साहित्यकारों, अनुसन्धाताओं, अध्यापकों और विद्वानों का आशीर्वाद मिलता रहा है। आशा है यह कार्य भी शीघ्र प्रकाशित होकर विद्वज्जनों से प्रशस्ति प्राप्त करेगा।
\प्रस्तुत पुस्तक में वैदिक योग विषय पर एक नई दिशा में काम किया गया है। मैंने वैदिक प्राण विद्या को वैदिक योग माना है। भरपूर प्रमाण देकर प्राण विद्या को योग विद्या सिद्ध करने की चेष्टा की है। प्राकृतिक चिकित्सा और औषध चिकित्सा वाले अध्यायों में भी संक्षेप में सारवान् वस्तु के प्रस्तुतीकरण का प्रयत्न किया है। समयाभाव के कारण प्रत्येक विषय को संक्षेप में कहने की चेष्टा की गई है। प्रत्येक स्थापना को वैदिक प्रमाणों, उद्धरणों एवम् उदाहरणों से सिद्ध किया है। फिर भी जहां कहीं प्रमादवश वा अज्ञानवश स्रवलित हुआ लगू, विशेषज्ञों से अनुरोध है कि तत्तत् स्वलित स्थानों से मुझे अवगत कराएं, जिससे भविष्य में सुधार किया जा सके।
इस कार्य में उत्तर क्षेत्रीय सांस्कृतिक केन्द्र चण्डीगढ़ वा पटियाला के कुशल, कर्मठ एवं गतिशील निदेशक, माननीय श्री राम तीर्थ जिन्दल, आई.ए.एस्. का पदे पदे सहयोग एवं दिशा निर्देश सुलभ रहा है। केन्द्र की आर्थिक सहायता से यह कार्य सम्पन्न हो सका है। अतः उनके प्रति में हार्दिक आभार व्यक्त करता हूं।
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