मध्यप्रदेश के सुदूर उत्तरी सीमांत पर चंबल नदी घाटी में अवस्थित भिण्ड जिला ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। प्रागौतिहासिक पाषाण उपकरणों एवं शैलचित्रों तथा ताम्रपाषाण कालीन पुरावशेषों का इस क्षेत्र में अभाव दिखाई देता है। इसका मुख्य कारण इस क्षेत्र में प्रवाहित चंबल एवं उसकी सहायक नदियों से निर्मित मिट्टी के ऊँचे-नीचे विशाल एवं अनियमित टीलों जनित भौगोलिक बनावट मानी जा सकती है। परंतु उत्तरकालीन संस्कृतियों एवं राजवंशानुगत इतिहास के परिप्रेक्ष्य में भिण्ड जिले की उल्लेखनीय स्थिति दृष्टिगोचर होती है। महाभारत एवं पौराणिक साहित्य में चर्मण्वती नदी (आधुनिक चंबल नदी) का अपूर्व वैभव प्रकट होता है। महाभारत काल में तो चंबल नदी घाटी का यह क्षेत्र अत्यंत समृद्धशाली रहा था। महाजनपद काल में यह क्षेत्र चेदि जनपद के अंतर्गत सम्मिलित था।
मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में बिखरी पुरासंपदा, स्थल, स्मारक आदि को चिन्हित कर उन्हें प्रकाश में लाने के उद्देश्य से संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय द्वारा प्रदेश के प्रत्येक जिले का तहसीलवार ग्राम से ग्राम सर्वेक्षण करवाया जाता है। इसी तारतम्य में भिण्ड जिले की 10 तहसीलों का ग्राम से ग्राम पुरातात्त्विक सर्वेक्षण कार्य सम्पन्न होकर सर्वेक्षण-प्रतिवेदनों के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन सर्वेक्षणों के फलस्वरूप भिण्ड जिले से पूर्व ऐतिहासिक काल से लेकर लगभग 20वीं शती ईस्वी तक के प्राचीन टीले, मृद्भाण्ड, मंदिर, मण्डपिका, मूर्तियाँ, सती एवं वीरस्तंभ, किला/गढ़ी/हवेली, छत्रियां, तालाब, बावड़ी, कुंआ, बगीचा, मकबरा, धर्मशाला, सराय आदि अनेक नवीनतम् सूचनाएँ प्रकट हुई हैं।
इनसे स्पष्ट होता है कि भिण्ड जिले का भू-भाग पूर्व ऐतिहासिक काल, तदुपरांत महाजनपद काल से लेकर मौर्य, शुंग, कुषाण, नाग, हूण, गुप्त, गुर्जर-प्रतीहार, कच्छपघात, दिल्ली सल्तनत, मुगल, तोमर, भदौरिया, जाट, सिंधिया, अंग्रेज आदि विभिन्न राजनैतिक शक्तियों के उत्थान एवं पतन का साक्षी रहा है। गढ़ा, गजना, परा, रिदौली, बिस्वारी, रहावली बीहड़, ररी शिकारपुरा, उगारीखेड़ा आदि स्थलों से पूर्व ऐतिहासिक काल की मृद्भाण्ड परंपराएँ ज्ञात हुई हैं। कठुवाँ गुर्जर, निसार, महदाँ खेड़ा, कुडरिया पुरा से विदित लगभग द्वितीय-तृतीय शती ईस्वी से चौथी-पाँचवीं शती ईस्वी की मृण्मयी मूर्तियाँ एवं मनके तथा डांग का उत्तर गुप्तकालीन स्मारक स्तंभ इस क्षेत्र में नाग, शुंग एवं गुप्तकालीन प्रभाव को स्पष्ट करते हैं। अकोड़ा एवं गोहद से नागवंशीय सिक्के प्राप्त हुए हैं।
गुप्त कालोपरांत चंबल नदी घाटी आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं कलात्मक रूप से वैभवशाली होकर सत्ता के मुख्य केंद्र के रूप में विकसित हुई। चंबल नदी घाटी का भिण्ड जिला प्रमुखतः अपने गुर्जर-प्रतीहार एवं कच्छपघात कालीन मंदिर स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प के लिए गणनीय है। यह कला-संपदा प्रमुखरूपेण शैव, वैष्णव, शाक्त एवं जैन धर्मों से संबंधित रही है। डांग, तिलोरी, बाराहेड, बरहद, एनो, नागोर, सर्वा, बिलोनी, छर्रेता, लावन, नोनेरा, बिरखड़ी, छिमका, खुर्द, खनेता, जमदारा, बारा, रतवा, धम्सा, बिलाव आदि प्रतीहार एवं कच्छपघात कला शैलियों की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थल हैं।
कोल्हूओं की बहुलता प्राचीन काल से ही चंचल नदी घाटी में सरसों के उत्पादन एवं तेल-व्यापार को पुष्ट करते हुए क्षेत्र की आर्थिक संम्पन्नता को स्पष्ट करते हैं। भदावर एवं जाट राजवंशों के काल में इस क्षेत्र में अनेक गढ़ियों एवं हवेलियों का निर्माण हुआ था।
इस जिले में "घारों" की भी वैभवशाली परंपरा रही है। चम्बल नदी घाटी के इस क्षेत्र में तंवरघार, गुर्जरघार, जटवारा, सिकरवारी, भदावर, कछवाहा आदि विभिन्न धारों का प्रभाव देखने को मिलता है।
भिण्ड जिले के अनेक ऐतिहासिक स्मारक संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय पुरातत्त्व विभाग द्वारा संरक्षित हैं। इनमें डांग का शिव मंदिर, विरखड़ी का शिव मंदिर, गोहद का किला, नवीन महल एवं लक्ष्मण मंदिर, अमाहा का रहकला देवी मंदिर एवं प्राचीन टीले, चौम्हो का देवी मंदिर, लावन का सीताराम एवं शिव/देवी मंदिर, बरहद का विष्णु मंदिर, दूल्हागन का बोरेश्वर मंदिर, भिण्ड का किला एवं दरबार हॉल, अटेर का देवी एवं शिव मंदिर, छिमका का शिव एवं प्राचीन मंदिर, भारोली का सूर्य मंदिर, बाराहेड का विष्णु मंदिर, आलमपुर की मल्हार राव होल्कर की छतरी, घिनौची की बारादरी एवं बगीचा, रौन की बारादरी, गोहद किले का इटायली दरवाजा आदि उल्लेखनीय हैं।
प्रस्तुत् पुस्तक भिण्ड जिले के ग्रामवार सर्वेक्षण-प्रतिवेदनों के आधार पर दो भागों में तैयार की गई है। इस पुस्तक के संकलन का कार्य डॉ. नवनीत कुमार जैन, पुराविद् द्वारा तथा इसे प्रकाशन योग्य बनाने में पुरातत्त्वीय अधिकारी डॉ. रमेश यादव की प्रभावी भूमिका रही है।
संचालनालय पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय, मध्यप्रदेश, भोपाल द्वारा जिलेवार पुरातत्त्व ग्रंथ-प्रकाशन की श्रृंखला में प्रस्तुत पुस्तक "भिण्ड जिले का पुरातत्त्व" (दोनों भाग) निश्चित ही एक नवीन उपलब्धि है। संचालनालय द्वारा पूर्व में प्रकाशित पुस्तकों के समान यह पुस्तक भी विद्यार्थियों, शोधार्थियों, इतिहासकारों एवं जिज्ञासु पाठकों के लिए अत्यंत ही उपयोगी होगी, ऐसी मुझे आशा है।
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