चंचल घाटी का महत्वपूर्ण जिला मुरैना अपनी अनुपम भौगोलिक स्थिति के कारण सदियों से आकर्षण का केंद्र रहा है। मानव के सांस्कृतिक विकास के प्रथम चरण से ही यह भूमि मानव की कर्मस्थली रही है। मानव मस्तिष्क के विकास के द्योतक शैलचित्र जिले के कई स्थलों से प्रकाश में आये हैं। महाभारत काल में भी चंबल घाटी का अत्यंत प्रभावी योगदान रहा था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में चंबल घाटी प्रागौतिहासिक युगोपरांत पूर्व ऐतिहासिक काल एवं उसके बाद महाजनपद काल से लेकर मौर्य, शुंग, कुषाण, नाग, हूण गुप्त. गुर्जर प्रतिहार, कच्छपघात, परवर्ती प्रतिहार, दिल्ली सत्वनत, कछवाहा, तोमर, जाट, सिंधिया, अंग्रेज आदि विभिन्न राजनैतिक शक्तियों के उत्थान एवं पतन की अनवरत् साक्षी रही है। महाभारत काल में तो यह क्षेत्र बेहद व्यापक एवं अत्यंत समृद्धशाली था, साथ ही गोपराष्ट्र का यह गौ-विचरण क्षेत्र भी रहा था। अधिकांश पौराणिक आख्यान् चंबल घाटी को महाभारतकाल से ही जोड़ते हैं। मुरैना तहसील में स्थित कुतवार तो प्रसिद्ध महाभारतकालीन नगर था। इसी विशेषता के कारण नाग राजवंश ने भी कुतवार को ही अपना गढ़ बनाया था। महाजनपद काल में यह क्षेत्र चेदि जनपद के अंतर्गत परिगणित था। आधुनिक परिवेश में भी चंबल घाटी पर बृजक्षेत्र का सीधा प्रभाव देखा जा सकता है।
इन राजनैतिक शक्तियों के शासनकाल में चंबल घाटी आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं कलात्मक रूप से अत्यंत वैभवशाली होकर सत्ता का मुख्य केंद्र बनी। चंबल घाटी मुख्यतः अपने प्रतिहार एवं कच्छपघातकालीन मंदिर स्थापत्य एवं मूर्तिशिल्प के लिए जगतप्रसिद्ध है। यह कलासंपदा प्रमुखरूपेण शैव, वैष्णव, शाक्त एवं जैन धर्मों से संबंधित रही है। नरेसर, बटेसर, मितावली, पढ़ावली, सिहोनिया, ऐंती. बरहावली आदि इन कलाशैलियों के बेजोड़ ऐतिहासिक स्मारक स्थल हैं और साथ ही केंद्रीय एवं राज्य शासन द्वारा संरक्षित राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारक होने के साथ ही पर्यटन के आकर्षक केंद्र भी हैं।
मंदिर एवं मूर्तियों के अलावा भी मुरैना जिला अन्य शिल्पगत एवं संरचनात्मक निर्माणों के लिए भी उल्लेखनीय रहा है। अभिलेखों की दृष्टि से भी यह क्षेत्र अत्यंत धनी रहा है। चंबल अंचल गढ़ी/महल / किला/हवेली सन्निवेशः बावडी, ताल व कुंआ, छत्रियाँ, कोल्हू, सती व वीर स्मारक स्तंभ, सराय, धर्मशाला, मस्जिद, मकबरा, सड़क मार्ग एवं उन पर नदी सेतु आदि विविध ऐतिहासिक संपदाओं से भरपूर है। स्मारक स्तंभों की अधिकता एवं उनका व्यापक विस्तार चंबल घाटी को प्राचीनकाल से ही "रणभूमि" के रूप में प्रसिद्ध करते हैं। आज भी भारतीय सेना में चंबल घाटी का प्रभावी योगदान रहता है। कोल्हूओं की बहुलता और साथ ही यहाँ के अभिलेखों में तेलिक संघों का उल्लेख प्राचीनकाल से ही चंबल घाटी में सरसों के उत्पादन एवं तेल-व्यापार को पुष्ट करते हुए क्षेत्र की आर्थिक सम्पन्नता की ओर संकेत करते हैं। सल्तनत काल से लेकर सिंधियाकाल तक इस क्षेत्र में अनेक छोटी-बड़ी गढ़ियों एवं भवनों का निर्माण हुआ था।
मुरैना जिले के अनेक ऐतिहासिक स्मारक राज्य पुरातत्त्व विभाग द्वारा संरक्षित भी हैं। इनमें लिखीछाज के शैलाश्रय, बरहावली का विष्णु मंदिर, ऐती के सूर्य एवं विष्णु मंदिर, भैसोरा का शिव मंदिर, अमलेड़ा का शिव मंदिर, अर्थोनी का शिव मंदिर, नूराबाद का नदीसेतु व गौना बेगम का मकबरा, हुसैनपुरा की गढ़ी एवं महल, सुमाचली की गढी, सबलगढ़ की नवलसिंह खांडेराव की हवेली उल्लेखनीय हैं।
अस्तु, मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में बिखरी पुरासंपदा, स्थल, स्मारक आदि को चिन्हित कर उन्हें प्रकाश में लाने के उद्देश्य से संचालनालय पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय द्वारा प्रत्येक जिले का तहसीलवार ग्राम से ग्राम सर्वेक्षण करवाया गया है। इसी तारतम्य में वर्ष 2017 से 2020 तक मुरैना जिले की छह तहसीलों का ग्राम से ग्राम पुरातात्विक सर्वेक्षण कार्य सम्पन्न हुआ और यह कार्य डॉ. रमेश यादव (पुरातत्त्वीय अधिकारी), श्री पी. सी. महोबिया (संग्रहाध्यक्ष), श्री गोविंद बाथम (तकनीकी सहायक), श्री घनश्याम बाथम (मार्गदर्शक) एवं श्री सुल्तान सिंह अनंत (तकनीकी सहायक) द्वारा निष्पादित कर सर्वेक्षण प्रतिवेदनों के रूप में प्रस्तुत किया गया। इन सर्वेक्षणों के फलस्वरूप मुरैना जिले से प्रागौतिहासिक काल से लेकर लगभग 20वीं शती ईस्वी तक के पाषाण-उपकरण, मृद्भाण्ड, मंदिर, मण्डपिका, मूर्तियों, सती एवं वीरस्तंभ, किला/गढ़ी, छत्री, तालाब, बावडी, कुंआ, मकबरा, सराय आदि अनेक नवीनतम जानकारियों प्रकाश में आई हैं। इनके साथ ही अनेक पूर्व ऐतिहासिककालीन टीलास्थल भी प्रकाश में आये हैं। इन स्थलों पर पुरातत्त्वीय उत्खनन कार्य कराया जावेगा।
मुरैना जिले के ये ग्रामवार पुरातात्त्विक सर्वेक्षण प्रतिवेदन क्षेत्र के इतिहास एवं पुरातत्त्व पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। प्रस्तुत पुस्तक इन सर्वेक्षण प्रतिवेदनों तथा नवीनतम् शोधों के आधार पर ही तैयार की गई है। इस पुस्तक के संकलन का कार्य डॉ. नवनीत कुमार जैन, पुराविद् द्वारा किया गया है। इसे प्रकाशन योग्य बनाने में संचालनालय पुरातत्त्व के पुरातत्त्वीय अधिकारी डॉ. रमेश यादव की अत्यंत प्रभावी भूमिका रही है।
संचालनालय पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय, मध्यप्रदेश, भोपाल द्वारा जिलेवार पुरातत्त्व ग्रंथ-प्रकाशन की श्रृंखला में प्रस्तुत् पुस्तक "मुरैना जिले का पुरातत्व" निश्चित ही एक नवीन उपलब्धि है। संचालनालय द्वारा पूर्व में प्रकाशित पुस्तकों के समान यह पुस्तक भी विद्यार्थियों, शोधार्थियों, इतिहासकारों एवं जिज्ञासु पाठकों के लिए अत्यंत ही उपयोगी होगी, ऐसी मुझे आशा है।
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