भूमिका
प्रेमचंद की मान्यता है कि साहित्य का चाहे जो भी रूप या विद्या हो, उसका उद्देश्य हमारे जीवन की आलोचना और व्याख्या होना चाहिए। साहित्य अपने काल का प्रतिविंव होता है। जो भाव और विचार लोगों की हृदय को स्पोंद करने हैं। पुनः प्रेमचंद जी कहते हैं कि हमारे लिए कविता के वे भाव निरर्थक हैं, जिनसे संसार के नश्वरता का आधिपत्य हमारे हृदय पर और दृढ़ हो जाय, जिनसे हमारे हृदयों में नैराश्य छा जाय। वे प्रेम कहानियों, जिनसे हमारे मासिक पत्रों के पृष्ठ भरे रहते हैं, हमारे लिए अर्थहीन है, अगर वे हम में हरकत और गर्मी नहीं पैदा करतीं। हमें उसे कल की आवश्यकता है जिसमें कर्म का संदेश हो। असम प्रदेश की राजनैतिक पृष्ठभूमि असम भारतवर्ष के पूर्वोत्तर राज्यों में स्थित एक खूबसूरत प्रदेश है। इसका प्राचीन नाम प्रागज्योतिषपुर था। असम पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है और सुरम्य प्राकृतिक सौंदर्य से संपन्न भारत का सबसे पूर्वी प्रहरी। इससे प्रायः तीन ओर से विदेशी राष्ट्रों ने घेर रखा है। उत्तर में तिब्बत अथवा चीन देश, पूर्व में चीन और म्यांमार देश, दक्षिण में म्यांमार और बांग्लादेश है। पश्चिमी सीमा का अधिक भाग बांग्लादेश से घिरा हुआ है। इसी कारण से सुरक्षा की दृष्टि से इसका महत्व आज अत्यधिक है। असम आर्य जाति की प्राचीन निवास भूमि है। विभिन्न कालों में इसके विभिन्न नाम मिलते हैं। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इस भूखंड को प्रागज्योतिषपुर के नाम से जाना जाता था। महाभारत के अनुसार कृष्ण के पोता अनिरुद्ध ने यहां के उषा नाम की युवती पर मोहित होकर उसका अपहरण कर लिया था। इस घटना को असम में कुमारहरण के नाम से जाना जाता है। महाभारत के सभी पों में 'कामरूप' राज्य का नाम मिलता है। यही के राजा भगदत्त ने कुरुक्षेत्र में युद्ध किया था। लौकिक संस्कृत कावयो में भी 'प्रागज्योतिष' के साथ 'कामरूप' का उल्लेख मिलता है। महाकवि कालिदास ने अपने काव्य में दोनों का उल्लेख एक ही प्रदेश के अर्थ में किया है। राजा भगदत्त और उसके उत्तराधिकारियों ने कामरूप में लगभग 3000 वर्षों तक शासन किया और उनके बाद पुष्यवर्मन राजा हुआ। महाराज कुमार भास्कर वर्मन जिन्हें भगदत्त का वंशज माना जाता है तक आते-आते असम का इतिहास स्पष्ट हो जाता है। भास्कर वर्मन राजा हर्षवर्धन का साथी था। हर्ष की बाणभट्ट द्वारा रचित जीवनी 'हर्ष चरित्र' में उसका उल्लेख मिलता है। इस देश में बाणासुर, नरकासुर, घटोत्कच, बळवाह आदि अनेक पौराणिक महाप्रितवी असुर अथवा किरात राज हुए। कृष्ण की पत्नी रुक्मणी फिर उषा, चित्रलेखा, हीरंबा, चित्रांगदा आदि महिषी नारियों की जन्मभूमि इसी कामरूप को ही मानी जाती है। असम नाम कब और किसने दिया, इस संबंध में कोई ठोस तथ्य उपलब्ध नहीं है। इसके संबंध में विभिन्न मत प्रचलित हैं। सभी मतों पर विचार तथा चिंतन-मनन करने पर भी किसी ठोस परिणाम तक पहुंच पाना दुष्कर कार्य प्रतीत होता है। परंतु यह स्पष्ट है कि असम नाम बहुत अधिक प्राचीन नहीं है। यद्यपि कुरुक्षेत्र युद्ध के काल में असम में अनार्य राजा ही राज्य शासन करते थे, तथापि आर्य सभ्यता तथा आर्य धर्म का स्रोत प्रबल था। उसी सभ्यता का आश्रय लेकर असम कामरूप भारत का एक अग्रगण्य प्रदेश हो सका था। हिंदू राजत्व के अंतिम दिनों में यह राज्य तीन करो में विभाजित हुआ। पूर्व में आहोम वंश, पश्चिम में पाल वंश और दक्षिण में कछारी वंश राजाओं ने अपना अपना शासन चलाया। अलग-अलग राज्य रहने के उपरांत भी सांस्कृतिक दृष्टि से तीनों एक ही बने रहे। लगभग 700 वर्षों तक असम लगातार तीन राजवंशियों के नेतृत्व में रहा और मध्यकालीन योग में प्रायः 600 वर्षों तक असम के नेतृत्व में था। उस समय मुगलों को छोड़कर कोई भी विदेशी शक्तियां असम राज्य पर आक्रमण करने में सफल नहीं रही। मुगलों ने असम पर कुल 17 बार आक्रमण किया, जिन में से केवल एक बार उनके हाथ एक छोटी सी सफलता लगे जिसमें असम के छोटे से भाग पर उन्हें केवल दो साल तक शासन करने मिला। ब्रिटिशों के आने तक कोई भी असम साम्राज्य पर कब्जा करने में असफल रहा। असम -इतिहास के अविस्मरणीय लाचित बरफुकन ने मुगलों को इस तरह से हराया की आगे इस ओर आंखें न उठाने की प्रतिज्ञा करनी पड़ी आहोम ने ब्रह्मपुत्र घाटी में 6 सदियों तक अपना आधिपत्य जमाया। चुकाफा और उसे उत्तराधिकारियों ने आहोम साम्राज्य को 6 शताब्दी तक चलाया और विस्तार किया। आहोम शासको और लोगों ने असम में मुगलिया सल्तनत के विस्तार को रोका। 19वीं सदी की शुरुआती वर्षों में आहोम लोगों के बीच गृह युद्ध छिड़ गया जिसकी वजह से उनकी ताकत और संसाधन घटते चले गए.
लेखक परिचय
डॉ. जोनाली बरुवा जन्म: १८ अगस्त स्थान: कामपुर, नगाँव (असम) माता दीनमाई गगै बरुआ (सेवा निवृत्त शिक्षिका) पिता: डॉ. प्रसन्न बरुआ शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी व असमीया) स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद), पी. एचडी. सम्प्रति : एसोसिएट प्रोफेसर, मरिधल महाविद्यालय, धेमाजी (असम) रुचि : लोकसाहित्य, तुलनात्मक अध्ययन प्रकाशित रचनाएँ/कृति सेतु (अनुवाद, कहानी संकलन), कोलाहल (कविता), साहित्य एवं लोक साहित्य (निबंध संग्रह) अरण्य रोदन (कविता संग्रह), व्यक्ति, समाज एवं साहित्य, असमीया लोक समाज में डाक प्रवचन। काव्य संरचना, आत्म सृजन, अभिजना, शब्द सृजन, चिरंतन, काव्य धारा, काव्य चिंतन, सृजन प्रवाह, भावों के मोती, सृजन संगम, अंतर्मन के भाव, भावों की रश्मियाँ (काव्य संकलन) प्रकाशित एवं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आलेख प्रकाशित। सम्पादनः अन्वेषा, कपिली नन्दिनी, डरियली, प्रज्ञा, प्रतिबिम्बन (पत्रिका) आदि, और ५पुस्तकें सम्मान : काव्य संरचना, साहित्यश्री, शब्द साधक, काव्य चिंतन साहित्य सम्मान, राष्ट्र गौरव, भावोन्नति साहित्य सम्मान, वाग्देवी सम्मान एवं आत्म सृजन साहित्य सम्मान आदि (श्री नर्मदा प्रकाशन, लखनऊ द्वारा)
Hindu (हिंदू धर्म) (13724)
Tantra (तन्त्र) (1005)
Vedas (वेद) (728)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2081)
Chaukhamba | चौखंबा (3180)
Jyotish (ज्योतिष) (1561)
Yoga (योग) (1168)
Ramayana (रामायण) (1334)
Gita Press (गीता प्रेस) (723)
Sahitya (साहित्य) (24773)
History (इतिहास) (9044)
Philosophy (दर्शन) (3634)
Santvani (सन्त वाणी) (2629)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist