स्थानीय या जनजातीय देवता कई समुदायों की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन देवताओं को विशेष गांवों, क्षेत्रों या कबीले की रक्षा और आशीर्वाद देने वाला माना जाता है, और उनकी पूजा स्थानीय मिथकों और प्रकृति में निहित होती है। ये देवता अक्सर प्रकृति, आत्माओं, पूर्वजों या नायकों के रूप में होते हैं और इनके मंदिर प्राकृतिक स्थलों, जैसे पहाड़ों या नदियों के पास होते हैं। अनुष्ठानों में खाद्य, फूलों और जुलूसों के भेंट शामिल होते हैं।
आशापुरी देवी, जो नालंदा क्षेत्र की एक प्रतिष्ठित स्थानीय देवी हैं, वहां के समुदाय के लिए गहन आध्यात्मिक महत्व रखती हैं। इन्हें आशा और इच्छाओं की पूर्ति की देवी के रूप में पूजा जाता है, और माना जाता है कि वह इच्छाएँ पूर्ण करती हैं और सुरक्षा प्रदान करती हैं। तीर्थयात्री उनके मंदिर में स्वास्थ्य, समृद्धि और सफलता के लिए आशीर्वाद प्राप्त करने आते हैं, खासकर त्योहारों के दौरान फूलों, मिठाइयों और प्रार्थनाओं की भेंट चढ़ाते हैं।
आशापुरी देवी नालंदा क्षेत्र की सांस्कृतिक ताने-बाने से गहराई से जुड़ी हुई हैं, और स्थानीय किंवदंतियाँ उन्हें इस भूमि और उनके रक्षक के रूप में प्रस्तुत करती हैं। यह मंदिर न केवल पूजा और साधना का स्थान है, बल्कि सांस्कृतिक सभा का केंद्र भी है। उनकी पूजा ग्रामीण भारत में स्थानीय देवताओं की निरंतर भूमिका को दर्शाती है, जो आध्यात्मिक और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देती है।
आशापुरी देवी, शक्ति और करुणा का प्रतिनिधित्व करती हैं, और अपने भक्तों को सुरक्षा और साहस प्रदान करती हैं। तीर्थयात्री व्यक्तिगत संघर्षों पर विजय प्राप्त करने के लिए उनके मंदिर में आशीर्वाद मांगने आते हैं, और नवरात्रि के दौरान उन्हें बुराई के संहारक के रूप में की जाने वाली विशेष अनुष्ठान मनाए जाते हैं। आशापुरी देवी दिव्य स्त्री शक्ति का प्रतीक हैं, जो आशा और स्थिरता का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह मंदिर नालंदा में एक आध्यात्मिक केंद्र है, जहाँ पूजा और सांस्कृतिक पहचान देवी की रक्षात्मक दृष्टि के नीचे एकजुट होती है, जिससे उनकी उपस्थिति इस धरती और इसके लोगों की भलाई के लिए महत्वपूर्ण बन जाती है।
आशापुरी देवी का मंदिर एक अद्वितीय स्थल है और यह बौद्ध विरासत के साथ भी जुड़ती है। आशापुरी देवी के वात्सल्य भाव रूप को समर्पित यह मंदिर जगत जननी पार्वती रूप को भी प्रदर्शित करता है। भक्त यहाँ आशीर्वाद पाने के लिए आते हैं, यह विश्वास करते हुए कि वह उन्हें चुनौतियों पर काबू पाने और बुराई की ताकतों को पराजित करने में मदद करती हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है-बौद्ध मूर्तियों का पारंपरिक हिंदू प्रतीकवाद के साथ सह-अस्तित्व। नालंदा और यशोवर्मपुर (आधुनिक घोसरावाँ), जो बौद्ध अध्ययन का एक प्राचीन केंद्र है, बौद्ध कला और संस्कृति का एक समृद्ध इतिहास रखता है। मंदिर के निकट बुद्ध और बोधिसत्त्व की आकृतियाँ हिंदू देवताओं के चित्रण के साथ मिलती हैं, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक विविधता को दर्शाती हैं। यह परंपराओं का समागम सदियों की सह-अस्तित्व को दर्शाता है, जिससे यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि साझा विरासत और कलात्मक महत्व का प्रतीक बन जाता है।
नालंदा जिले के घोसरावाँ गाँव का आशापुरी देवी का मंदिर न केवल स्थानीय धार्मिक प्रथाओं में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पुरातात्त्विक अभिलेखों में भी उल्लेखनीय है। यह मंदिर, जो आध्यात्मिक और शैक्षणिक अध्ययन का केंद्र रहा है, अपनी वास्तुकला और मूर्तियों के लिए जाना जाता है जो हिंदू और बौद्ध कला का मिश्रण प्रस्तुत करता है, जो इस क्षेत्र के परतदार धार्मिक इतिहास को दर्शाता है। आशापुरी देवी और बौद्ध मूर्तियों की उपस्थिति इसे एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध स्थल बनाती है, जो पुरातात्विक सर्वेक नालंदा जिले के घोसरावाँ गाँव का आशापुरी देवी का मंदिर न केवल स्थानीय धार्मिक प्रथाओं में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह पुरातात्त्विक अभिलेखों में भी उल्लेखनीय है। यह मंदिर, जो आध्यात्मिक और शैक्षणिक अध्ययन का केंद्र रहा है, अपनी वास्तुकला और मूर्तियों के लिए जाना जाता है जो हिंदू और बौद्ध कला का मिश्रण प्रस्तुत करता है, जो इस क्षेत्र के परतदार धार्मिक इतिहास को दर्शाता है। आशापुरी देवी और बौद्ध मूर्तियों की उपस्थिति इसे एक सांस्कृतिक रूप से समृद्ध स्थल बनाती है, जो पुरातात्विक सर्वेक्षणों में प्रमुखता से चित्रित है।
इस मंदिर में पुरातात्त्विक रुचि, इसकी ऐतिहासिक और कलात्मक महत्वता से आती है, जगजननी के प्रतीकों और बौद्ध प्रतीकवाद के समागम को प्रदर्शित करती है, जो धार्मिक सह-अस्तित्व के एक काल को इंगित करती है। मंदिर की मूर्तियों और अवशेषों के अध्ययन इसकी शैली और प्रतीकवाद के अद्वितीय मिश्रण का दस्तावेजीकरण करते हैं, जो इसके विविध आध्यात्मिक विरासत की व्यापक समझ में योगदान देती हैं, जहाँ हिंदू और बौद्ध परंपराओं ने एक स्थायी सांस्कृतिक धरोहर छोड़ी।
मैं ईश्वर भक्ति अपनी विरासत से ही पाया। मेरे पिताजी, जिन्होंने 29 जनवरी 2024 को अपने इस भौतिक शरीर का त्याग कर दिया, अपनी दिनचर्या में आहार लेने से पहले कुछ-न-कुछ पूजा-पाठ अवश्य कर लेते थे और मेरी माँ भी करती है, जिसका प्रभाव मेरे ऊपर भी पड़ा और मैं भी बचपन से ही किसी-न-किसी रूप में पूजा पाठ करना शुरू कर दिया। बचपन में हनुमान चालीसा का पाठ किया करता था। तब मेरे लिए यह स्वाभाविक था कि अपने गाँव घोसरावाँ में एक देवी की बहुत प्रसिद्धि थी और है भी, उस ओर मेरा झुकाव होना। इस देवी मठ की अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि थी। इस देवी और देवी मन्दिर की प्रसिद्धि, वर्तमान में भी इतनी दूर फैली हुई है कि इस मंदिर का, बिना किसी प्रकार के विज्ञापन के दूसरे-दूसरे राज्यों से भी श्रद्धालु भक्त दर्शन को आते हैं और दर्शन कर अपने को भाग्यशाली मानते हैं तथा कृतार्थ समझते हैं। पुस्तक के नाम से ही, आप अनुमान तो कर ही रहे है कि वह देवी कौन है और वह मठ या मंदिर कौन है? फिर भी इस भाग में भी उसका नाम बताना अनावश्यक नहीं समझता हूँ। वह देवी हैं- आशा या आशापुरी देवी या महारानी। उनके बारे में ऐसी मान्यता बन चुकी है कि इस मंदिर में आकर इनके दर्शन करने से भक्त जो कुछ आशा लेकर आता है वह पूरी हो जाती है। अतः आशापुरी महारानी कहना तर्कसंगत ही कहा जा सकता है क्योंकि विशेषण भी तो संज्ञा प्राप्त करता है। मठ या मंदिर का नाम है- आशापुरी मंदिर, जो पहले तो गाँव के पश्चिम में माना जाता था परन्तु वर्तमान में उसे गाँव के पश्चिम नहीं कहा जा सकता क्योंकि गाँव का विस्तार मंदिर से पश्चिम में भी हो चुका है।
जैसे-जैसे मेरी उम्र और बुद्धि बढ़ती गयी वैसे-वैसे मेरी भक्ति भी दृढ़ होती गयी। लेकिन शायद दिशा सही नहीं था, अब ऐसा प्रतीत होता है। 1999 तक मुझमें भक्ति-भाव तो अवश्य था, पूजा-पाठ भी करता था लेकिन मंदिर नहीं जाता था। उसी वर्ष मेरे जीवन में एक घटना घटी जो मेरे लिए दुखदायी होते हुए, जीवन के लिए एक सीख दिया। इसने मेरे सोच की दिशा बदल दी। कर्मवाद की दिशा से घुमाकर भाग्यवाद की ओर सोचने को विवश किया जिससे सारे कर्मों को करने का बोझ उतर गया। जबकि कर्म तो हो ही रहा है और उसका फल भी मिल हो रहा है। कहा जाता है कि ईश्वर जब आपके हाथ से कछ छीनकर उसे खाली करता है तो यह आवश्यक नहीं कि आपको दुःख देना ही उनकी इच्छा है बल्कि संभव है कि उससे (जो छीना उससे अधिक देना चाहते हैं और अधिक सुख देना चाहते हैं। उस घटना के बाद मैं मंदिर जाना शुरू कर दिया जो एक साधना बन गया और साधना से होने वाला एकाग्रता और आत्मबल बढ़ता गया। जो एक महान उपलब्धि समझता हूँ। उम्र और समय के साथ आर्थिक स्थिति दयनीय ही होती गयी, परन्तु अचानक 2010 में मुझे एक छोटी सी नौकरी मिल गई। नौकरी तो छोटी रही लेकिन स्थान बढ़िया मिला, जहाँ से मुझे आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त होता गया। तब विभिन्न क्षेत्रों के अध्ययन की सुविधा मिल गई। इसी संदर्भ में मुझे यहाँ कुछ ऐसी पुस्तकें भी मिली जिसमें घोसरावाँ के बारे में बहुत कुछ जानकारी मिलती है। जब यह जानकारी मुझे मिली तो उस स्थल के बारे में सामान्य लोगों विशेषकर स्थानीय लोगों और माँ आशा के प्रति श्रद्धा रखने वाले श्रद्धालुओं को भी बताने की इच्छा बलवती होती गई। फिर मुझे अंतःकरण से ईश्वरीय प्रेरणा मिली कि मैं आशा देवी और मंदिर का प्रचार-प्रसार करूँ जिनकी साधना से, जिनकी कृपा से मुझे यह सौभाग्य और अवसर मिला, मैंने उनके प्रति अपनी कृतज्ञता जताने का यह अवसर खोना नहीं चाहा। हाँलाकि इस रूप में कृतज्ञता जताना तो सूर्य को दीपक से देखने के समान है। फिर भी उसका प्रचार-प्रसार ही तो उस कृतज्ञता का अभिव्यक्त रूप है। इस पुस्तक में मैं कुछ नया का दावा नहीं कर रहा हूँ। नया तो नहीं ही पुराना सब कुछ है, ऐसा भी दावा नहीं है।
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