इस कार्य के करने की मूल प्रेरणा अहिन्दी भाषा-भाषियों के लिये 'बेसिक उर्दू-हिन्दी रोडर' तैयार करते समय मिली थी। कालान्तर में योजना की संक्षिप्त रूप-रेखा तैयार की गई जिसको विश्वविद्यालय अनुदान घायोग ने १६६४-६५ के सत्र के लिये स्वीकार कर लिया। आयोग के अधिकारियों की इस महती कृपा का ही प्रतिफल यह प्रस्तुत कार्य है।
कार्य सम्पादन की विस्तृत योजना हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष तथा प्रोफ सर डा० हरवंशलाल शर्मा की परामर्श से तैयार की गई और समय-समय पर भी उनसे सत्परामर्श प्राप्त होता रहा। कार्य की योजना के सम्बन्ध में डा० भोलानाथ तिवारी, एम० ए०, डी० फिल्॰ से विचार-विमर्श किया। डा० तिवारी ताशकन्द विश्वविद्यालय (यू० एस० एस० आर०) से लौटे ही थे और रूस में इस प्रकार के कार्य का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त किया था। समय-समय पर मैंने क० मु० हिन्दी तथा भाषा-विज्ञान विद्यापीठ के संचालक डा० माताप्रसाद गुप्त तथा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा के निदेशक डा० ब्रजेश्वर वर्मा से भी इस सम्बन्ध में वार्तालाप किया। सागर विश्वविद्यालय के भाषा-विज्ञान-विभाग के अध्यक्ष तथा वरिष्ठ भाषाविद् डा० धीरेन्द्र वर्मा (अब उप-कुलपति जबलपुर वि० वि०) से भी सत्परामर्श लेकर कार्य की समाप्ति की ओर प्रेरित हुआ। कार्य की समाप्ति पर उर्दू-विभाग के अध्यक्ष तथा भूतपूर्व डीन प्रो० आले अहमद सुरूर के सुझावों के अनुसार कुछ परिवर्द्धन किया। लेखक इन सभी महानुभावों के प्रति हृदय से आभारी है।
विभागीय सहयोगियों की शुभ कामनाओं और अध्यक्ष महोदय की प्रेरणा के फलस्वरूप यह कार्य समाप्त हुआ। अपने अभिन्न मित्र डा० विश्वनाथ शुक्ल के प्रति आभारी हूँ जिन्होंने समय-समय पर परामर्श दिया। उन सबके प्रति भी मैं आभारी हूँ जिनकी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहायता से यह कार्य सम्पन्न हुआ। डा० महावीरशरण जैन, जबलपुर विश्वविद्यालय के प्रति भी कृतज्ञता प्रकट करना चाहता हूँ जिनकी दौड़-धूप की बदौलत मिशनरियों द्वारा किये गये कार्य से परिचय प्राप्त कर सका ।
इस प्रकार के कार्य संस्थाओं के द्वारा ही सम्पन्न होते हैं, फिर भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एक और केवल एक ही व्यक्ति को सौंपकर यह कार्य निश्चित अवधि में पूरा करवाया, अतएव पुनः एक बार मैं कृतज्ञता प्रकट करना चाहता हूँ। डा० नूरुलहसन के प्रति भी हृदय से आभार प्रकट करना चाहता हूँ जिन्होंने अत्यन्त ब्यस्त रहते हुए भी इस पुस्तक का प्राक्कथन लिखा। जब यह कार्य प्रेस में था तो पूना के दकन कालेज से डा० ए० एम० घटगे द्वारा सम्पादित 'फोनेमिक एड मोफ मिक फ्रीक्वेंसीज इन हिन्दी' (१९६४) तथा आगरा के केन्द्रीय हिन्दी संस्थान से 'हिन्दी की आधारभूत शब्दावली' (१६६७) प्रकाशित हुई। दोनों कार्य कुछ भिन्न पद्धति से सम्पन्न हुए हैं। भविष्य में हिन्दी की बेसिक शब्दावली के चुनाव में ये सारे कार्य योग दे सकेंगे ।
अपने इस लघु प्रयास को मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ और आशा करता हूँ कि पाठक बन्धु अपने सुझावों से अवगत कराते रहेंगे ।
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