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भगवत दानं- Bhagavat Danam- Multicolour (Inscriptions of Bharahut Stupa in the Dhammalipi, Roman and Devanagari Scripts)

$37
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In the scupture and inscriptions of Bharhut we shall have in future a real landmark is the religions and literary history of India, and many theories hitherto held by Sanskrit scholars will have to be modified accordingly.

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Specifications
Publisher: DHAMMALIPI PUBLICATION, BHOPAL
Author Motilal Alamchandra
Language: PALI, ENGLISH AND HINDI
Pages: 127 (Color Illustrations)
Cover: PAPERBACK
9x6 inch
Weight 450 gm
Edition: 2025
ISBN: 9788198215925
HCD157
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Book Description
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पुस्तक परिचय
भरहुत स्तूप के शिल्प और शिलालेख के प्रभाव ने मुझे ""भगवत दानं"" पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया। आज से छह साल पहले भरहुत स्तूपाँ की नजदीक से शोध करने की मेरी जिज्ञासा भरहुत खींच ले गई लेकिन भरहुत पहुँचने पर निराशा हाथ लगी। महान स्तूप के नाम पर मौके पर छह-सात फीट ऊँचे ईंटों के अवशेष के अलावा कुछ नहीं बचा है। भरहुत के स्तूप की सुंदर वेदिका का वर्तमान ठिकाना पता किया तो ज्ञात हुआ कि मध्यप्रदेश की यह अमूल्य धरोहर कोलकाता के इंडियन म्यूजिय में सुरक्षित रखी गई है। भरहुत भ्रमण के पाँच साल बाद कोलकाता जाने का अवसर मिला। भरहुत की वेदिका को पास से देखने, छूने की उत्सुकता को जीते हुए कोलकाता पहुँचे। कोलकाता का आठ दिवसीय दूर का मुख्य उद्देश्य मात्र भरहुत की वेदिका के शिलालेखों और शिल्पांकनों का संकलन और शोध करना था। पहली बार जब इन्हें नजदीक से देखा तो विगत पाँच वर्षों से इन्हें पास से देखने, पढने और महसूस करने की लालसा पूरी हुई। एक-एक शिलालेख को बारीकी से परखा गया, पेन से कागज पर उतारा गया, कई कॉणों से छायाचित्र लिए गये। शिल्पांकन को सूक्ष्मता से अध्ययन किया गया। साँची और भरहुत में एक बुनियादी अंतर यह है कि साँची में प्रदर्शित शिल्प को तत्समय शिला पर लेखबद्ध नहीं किया गया जबकि भरहुत में अधिकांश शिल्प की घटनाओं को शिलालेख से अंकन भी किया गया है जिससे समझने में आसानी होती है। भरहुत स्तूप के शिल्प और शिलालेख इतने महत्तवपूर्ण है कि सर अलेक्सजेंडर कनिंघम के द्वारा भरहुत स्तूपों के शिल्प और शिलालेखों पर THE STUPA OF BHARHUT पुस्तक लिखी जिसे वर्ष 1879 में ब्रिटेन से प्रकाशित किया गया था। भरहुत स्तूप के शिल्प और शिलालेख के महत्तव को रेखांकित करते हुए डॉ. फ्रेडरिक मैक्स म्यूलर ने कहा जिसे धम्मलिपिकार मोतीलाल आलमचंद्र ने इस प्रकार अनुवाद किया है। ""भरहुत की शिल्पकला और शिलालेख भविष्य में, भारत के धर्म और साहित्य के इतिहास में वास्तविक मील का पत्थर साबित होगा। संस्कृत विद्वानों को अब तक के कई सिद्धांतों को तदनुसार संशोधित करना पड़ेगा।"" पुरातात्विक दृष्टि से दीपों की पाळि बनाने के उत्सव के साक्ष्य भरहुत के स्तूप से प्राप्त होते है। पाळि का अर्थ पंक्ति होता है। दीप पाळि अर्थात दीपों की पाळि । दीपावली अर्थात दीपों की वल्ली दीपों की लता। अत्त दीपो भव, अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो की परिकल्पना बुद्ध की देन है। दीप का अर्थ दीपक और द्वीप होता है इसलिए अंग्रेजो ने दीप का अनुवाद Lamp and Island किया है। अत्त दीपो भव Be own Island. भरहुत के स्तूप पर ही दीप पाळि के दिन पूजे जाने वाले शिल्प महामाया का गजों द्वारा धन-धान से स्नान कराते हुए शिल्प मिलता है। भरहुत के स्तूप से सात भगवतों के शिल्प सहित शिलालेख मिलते है। भूत और पलितों के शिलालेख मिलते है। भूत और पलित एकांत में रहने वाले बोधी की प्रत्याशा वाले ध्यानस्थ अरहत है लेकिन भाषाई उवाच ने इन पवित्र शब्दों को विकृत कर दिया है जिससे वर्तमान में उनके मायने ही बदल गये है। भगवतों और भूत-पलितों के शिलालेख भारतीय इतिहास के पुर्नलेखन, पुर्नस्थापना में महत्तवपूर्ण भूमिका निभायेगा। तथाकथित स्थापित आधार खिसकने से कई सिद्धांतों ढह जायेंगे तथा पुरातात्विक आधार पर नये सिद्धांत आकार लेंगे और डॉ. फ्रेडरिक मैक्स म्यूलर का कथन सच साबित होगा।

लेखक परिचय
मान्यवर मोतीलाल आलमचंद्र प्रख्यात धम्मलिपिकार है। मोतीलाल आलमचंद्र जी जमीन खोदकर अनूठी और सटीक पुरातात्विक जानकारी पाठक के समक्ष परोसने के लिए जाने जाते है। आप सम्राट अशोक के शिलालेखों की भाषा और लिपि पर गहरी समझ रखने वाले मजबूत स्तंभ है, सामाजिक विचारक होने के साथ आप कवि, उपन्यासकार भी है। विगत सात वर्षों से बुद्धिस्ट पुरातात्विक स्थल तथा सम्राट अशोक के शिलालेखों पर आप गहन शोध कर रहे है। आपकी आठ पुस्तकें प्रकाशित है। साँची के अभिलेखों की गहरे से पड़ताल करती और धम्मलिपि सिखाने वाली लोकप्रिय पुस्तक ""साँची दानं"" और सम्राट अशोक के शिलालेखों में प्रयुक्त शब्दों का शब्दकोश ""धम्मलिपि डिक्शनरी"" से आप खासे परिचित है। ""भगवत दानं"" पुस्तक आपके हाथों में है। ""भगवत दानं"" पुस्तक इतिहास को नई दिशा देने में सक्षम है। यह पुस्तक जनमानस में व्याप्त कई भ्रम तोड़ेगी। भगवतों और भूत पलितो के बारे में पुख्ता और आश्चर्यचकित करने वाली जानकारी प्राप्त होगी। धम्मलिपि और पालि व्याकरण, साँची और सारू-मारू, सिंह विनय, मधुमासगंज, कितने - भारत एक सामाजिक वेदना, नई कोपलें, आपकी अन्य महत्त्वपूर्ण रचनाएँ है। वर्तमान में आप मध्यप्रदेश शासन की राज्य प्रशासनिक सेवा अंतर्गत राजपत्रित अधिकारी है तथा जिला शिवपुरी के पोहरी अनुभाग में एस०डी०ओ०/एस०डी०एम० के पद पर पदस्थ है।

भूमिका
भरहुत स्तूप के शिल्प और शिलालेख के प्रभाव ने मुझे ""भगवत दानं"" पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया। आज से छह साल पहले भरहुत स्तूपों को नजदीक से शोध करने की मेरी जिज्ञासा भरहुत खींच ले गई लेकिन भरहुत पहुँचने पर निराशा हाथ लगी। महान स्तूप के नाम पर मौके पर छह-सात फीट ऊँचे ईंटों के अवशेष के अलावा कुछ नहीं बचा है। भरहुत के स्तूप की सुंदर वेदिका का वर्तमान ठिकाना खोजा तो ज्ञात हुआ कि मध्यप्रदेश की यह अमूल्य धरोहर कोलकाता के इंडियन म्यूजिय में सुरक्षित रखी गई है। भरहुत भ्रमण के पाँच साल बाद कोलकाता जाने का अवसर मिला। भरहुत की वेदिका को पास से देखने, छूने की उत्सुकता को जीते हुए कोलकाता पहुँचे। कोलकाता का आठ दिवसीय टूर का मुख्य उद्देश्य मात्र भरहुत की वेदिका के शिलालेखों और शिल्पांकनों का संकलन और शोध करना था। पहली बार जब इन्हें नजदीक से देखा तो विगत पाँच वर्षों से इन्हें पास से देखने, पढने और महसूस करने की तमन्ना पूरी हुई। एक एक शिलालेख को बारीकी से परखा गया, पेन से कागज पर उतारा गया, कई कॉणों से छायाचित्र लिए गये। शिल्पांकन को सूक्ष्मता से अध्ययन किया गया। शिल्प, शिलालेख से समझने में बहुत सहयोगी रहा। साँची और भरहुत में एक बुनियादी अंतर यह है कि साँची में प्रदर्शित शिल्प को तत्समय शिला पर लेखबद्ध नहीं किया गया जबकि भरहुत में अधिकांश शिल्प की घटनाओं को शिलालेख से अंकन भी किया गया है जिससे समझने में आसानी होती है। भरहुत स्तूप के शिल्प और शिलालेख इतने महत्तवपूर्ण है कि सर अलेक्सजेंडर कनिंघम के द्वारा भरहुत स्तूपों के शिल्प और शिलालेखों पर THE STUPA OF BHARHUT पुस्तक लिखी जिसे वर्ष 1879 में ब्रिटेन से प्रकाशित किया गया था। भरहुत स्तूप के शिल्प और शिलालेख के महत्व को रेखांकित करते हुए डॉ. फ्रेडरिक मैक्स म्यूलर ने कहा जिसे धम्मलिपिकार मोतीलाल आलमचंद्र ने इस प्रकार अनुवाद किया है।

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