पुस्तक परिचय
स्वामी चिदानंद सरस्वती अध्यक्ष परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश भारतवर्ष की ज्ञान एवं चिंतन परंपरा का स्वरूप व्यापक है, उसे जानने और अभिव्यक्त करने के प्रयास भिन्न-भिन्न रूपों में होते रहे हैं। सनातन है भी यही, जो अनादि, सत्य और शाश्वत को जानने, अभिव्यक्त करने और विस्तारित करने में रत है। इसलिए सनातन का दूसरा नाम भारत है। भारत शब्द के विभिन्न अर्थ हैं, एक अर्थ यह भी है-वह देश जो अपने ज्ञान रूपी प्रकाश को चहुं ओर फैलाने में लगा हुआ है। यह भारतवर्ष ही एकमात्र ऐसा देश है जहां ऋषि, मुनि और साधकों की अंतहीन परंपरा मिलती है। फिर दर्शन और विज्ञान की तो यह जन्मस्थली ही है। सनातन चिंतन व्यक्ति सापेक्ष न होकर समष्टि सापेक्ष रहा है। हमारे लिए 'वसुधैव कुटुंबकम्' केवल एक उद्घोष नहीं है अपितु यह हमारा जीवन दर्शन है... मेरे लिए कुंभ सागर मंथन से प्रेरणा लेकर स्वयं के मंथन की यात्रा है। यह भारतीय समाज में व्याप्त शुद्धता, समानता, भाईचारे और दिव्यता के संदेश को प्रसारित करता है। कुंभ न केवल व्यक्तिगत आस्था बल्कि सामाजिक एकता का भी प्रतीक है। कुंभ यह सिखाता है कि हर व्यक्ति में समान दिव्यता और परमतत्व का समावेश है फिर चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, क्षेत्र या समुदाय से हो। यह अध्यात्म के साथ साथ प्रकृति, संस्कृति एवं बंधुत्व के संरक्षण-संवर्धन का महापर्व है। कुंभ व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को दिशा भी प्रदान करता है, यह सनातन का अभिन्न अंग है और भारतीय संस्कृति की ऐसी अनमोल धरोहर है जो प्रत्येक पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है...।
सनातन का अर्थ शाश्वत, सत्य पर आधारित, सबके लिए व सदा के लिए है। सनातन को किसी काल, स्थिति, व्यक्ति, जाति, धर्म, संस्कृति, क्षेत्र एवं राष्ट्र की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता, क्योंकि वह तो अनंत और शाश्वत सत्य है। सनातन है तो वसुधैव कुटुंबकम् के दिव्य मंत्र हैं जो पूरे विश्व को एक परिवार की तरह लेकर आगे बढ़ने का आह्वान करते हैं। सनातन है तो प्रकृति का महत्व है, सनातन है तो मानवता है, सनातन है तो समरसता है, सनातन है तो उसके मूल में एक ऐसा दर्शन है जो सभी में समभाव देखता है। वह आत्मवत् सर्व भूतेषु अर्थात् सभी प्राणियों में स्वयं का प्रतिबिंब देखने का संदेश देता है। सनातन की शक्ति व ताकत तलवारों में नहीं है बल्कि भारत की दिव्य संस्कृति व संस्कारों में है। आज विकसित भारत व विश्वगुरु भारत के संकल्प और समूची मानवता के कल्याण के लिए सनातन को जानने, समझने और जीने की आवश्यकता है।
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